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सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra

सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished332 पृष्ठ

पृष्ठ 117, कुल 332 में से

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पृष्ठ 117

नामदेव और निर्गुण काव्यधारा १२१
पूर्ण है । भले ही पुजारी इन्हे विशुद्ध और पवित्र समझे । कीटो, भ्रमरों, बछड़ो
आदि के द्वारा ये पहले ही जुठला दिये गये है । इससे वे अपवित्र और अशुद्ध है । फिर
ये पूजा की सामग्री कैसे हो सकते हैं ? १
करोड़ो तीर्थ यात्राएं, पिण्ड दान तथा अन्य सभी प्रकार के दान व्यर्थ है । नाम-
देव अपने मन को प्रबोधित करते हुए कहते है कि हे मन ! तू पाखण्ड को छोड़ दे,
कपट न कर तथा नित्य मनोयोग से हरि नाम ले । २
मूर्ति पूजा का खण्डन करते हुए वे कहते है—एक पत्थर पूजा जाता है और
दूसरा ठुकराया जाता है। यदि एक में देवत्व की अनुभूति है तो दूसरे में क्यो
नही ? ३
संत नामदेव का यह तार्किक मन्तव्य सहज भक्ति की मान्यता और आडम्बर
पूर्ण मूर्ति पूजा की व्यर्थता प्रतिपादित करता है ।
योग, यज्ञ, तप, होम, नेम-व्रत आदि बाह्याडम्बर किस काम के ? हे मन ! तू
राम नाम जप । ४
१. आणिले कुसुम गूँथिले माला बाल गोविद हि हार रचूँ ।
पहली बास जुं भंवरे लोनो, जूठनि भेला काई करुँ ।।
आणिने तंदुल रांधिले खीरा बाल गोविंद हि भोग रचूँ ।
पहली दूध जु बछा विटाल्या जूठानि भेला काइ करुँ ।।
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद ६१ ।
२. बानारसी तपु करै उलटि तीरंथ मरै
अगनि दहै काइआ कलपु कीजै ।
असुमेध जगु कीजै सोना परमादानु दीजै ।
रामनाम सरि तऊ त पूजै ।।
छोड़ि छोड़ि रे पाखंडा मन कपटु न कीजै ।
हरिवा नामु नित नित ही लीजै ।।
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद १५६ ।
३. एकै पाथर कीजै भाउ । दूजै पाथर धरीए पाउ ।।
जे ओहु देउ त ओहु भी देवा । कहि नामदेऊ हम हरि की सेवा ।।
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद १५२
४. भइया कोई तू ले रे राम नाम ।
जोग जिग तप होम नेम व्रत ए सब कोने काम ।। टेक ।।
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद १३८ ।