सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)
Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra
सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१२८ नामदेव की हिन्दी कविता
दादू के राम और अल्लाह, अलख, इलाही सब एक ही है ।१
कबीर कहते हैं कि जिन्होंने एक परमात्मा को माना उन्हों को सत्य का साक्षा-
त्कार हुआ । जो उससे लौ लगाते हैं वे आवा-गौन के फेर से मुक्त हो जाते हैं ।२
कथनी तथा करनी में एकरूपता
अपनी तीव्र सामाजिक चेतना के कारण संत व्यावहारिकता एवं आदर्श में
संतुलन स्थापित करने के पक्षपाती थे । इसलिए उनके साहित्य में किसी भी प्रकार की
अतिवादिता के प्रचार की गंध नहीं मिलती । व्यवहार और आदर्श के साथ ही इन
संतो ने विचार और आचरण में भी सामञ्जस्य लाने पर जोर दिया । उनके साहित्य में
भी केवल काल्पनिक बातों और विचारों का ही प्राचुर्य नहीं है । उन्होंने जो कुछ भी
लिखा है अपने अनुभव के आधार पर तथा अपने उपदेशा पर आचरण करके ही लिखा
है । उनके द्वारा प्रतिपादित सिद्धान्तो एवं उनके दैनिक आचरण में कोई विरोध कदाचित
ही मिले ।
सांसारिक व्यक्तियों की सामान्य प्रवृत्ति होती है कि वे कहते कुछ हैं और करते
कुछ और हैं । संतो के अनुसार मनुष्य को वैसा ही आचरण करना चाहिए जैसा वह
उपदेश देता हो । सभी निर्गुण कवियों में इस ढंग की बात मिलती है । नामदेव ने भी
'करनी के बिना कथनी' की आलोचना की है । उनके अनुसार भक्त और परमात्मा में
कोई अन्तर नहीं है । जा इस प्रकार का अन्तर मानता है वह नर पशु है । जो परमात्मा
को छोड़कर वेद-विधि से कार्य करता है वह जल भुन कर मर जाता है । गर्वित बातें
तो बहुत बढ़ बढ़कर बनाता है किन्तु विरला ही कोई उनको कार्यान्वित करता है ।३
१. एकै अलह राम है समरथ सांई सोइ ।
मैदे के पकवान सम खाता होइ सो होइ ॥
—संत काव्य, पृष्ठ २५६,
२. एक-एक जिनि जांणिया तिनहि सब पाया ।
प्रेम प्रीति ल्यौ लोन मन, तबहुरि न आया ॥
—कबीर ग्रन्थावली, पृष्ठ १६ ।
३. भगवंत भगता नही अंतरा ।
जै करि जानै पशुआ नरा ॥ टेक ॥
छाड़ि भगवत वेद विधि करै ।
दाझै सूजै जारंम परै ॥ १ ॥
कथनी बदनी सब कोई कहै ।
करनी जन कोई बिरला रहै ॥ २ ॥