सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)
Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra
सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा
पृष्ठ 105, कुल 332 में से
संदर्भ में पढ़ेंनामदेव और निर्गुण काव्यधारा १०६
है संयोग की आनंदावस्था का चित्रण और तीसरा है वियोग के करण विदग्ध रूप का
चित्रण ।
सिद्ध संप्रदाय
सिद्ध साहित्य की विचार धारा का संत साहित्य पर विचार और शैली दोनों
दोनों ही दृष्टियों से बड़ा प्रभाव है। भगवान् बुद्ध द्वारा अनुप्राणित तथा अशोक द्वारा
प्रचारित बौद्ध धर्म को आगे चलकर वज्रयान और मंत्रयान द्वारा कलंकित किया गया ।
ये वज्रयानी सिद्ध रहस्यात्मक उक्तियाँ कहा करते थे । इनका धर्म 'महासुखवाद' था ।
इनकी अटपटी वाणी - 'काया तरुवर पंच बिडाल', 'गंगा जमुना माँझि बहेरी एक
नाडी' आदि योग की ओर आध्यात्मिक ढंग से संकेत करती हैं। इन्हीं की चलाई प्रणाली
से संत साहित्य की सृष्टि हुई । इसी परंपरा का विकसित रूप गोरखनाथ के नाथ
संप्रदाय में तथा व्यापक एवं पुष्ट रूप ज्ञानाश्रयी निर्गुण भक्ति शाखा में पाया जाता है,
जहाँ संत काव्य अपनो पराकाष्ठा पर पहुँचा प्रतीत होता है ।
वज्रयान के सिद्धों और निर्गुणयों में यह समता है कि दोनों ही ने तत्कालीन
काव्य भाषा की उपेक्षा कर जन भाषा में ही अपनी रचनाएँ कीं । दोनों ने अन्तः
साधना पर जोर दिया और पण्डितों का तिरस्कार कर शास्त्रों को निरर्थक ठहराया ।१
शून्यवाद, सुरति, निरति, इडा, पिंगला, सुपुम्ना आदि को इंगला, पिंगला,
सुखमना आदि बनाकर कबीर ने इसी मत से ले लिया है। सिद्धों ने जिसे 'काया तरुवर
पंच विडाल' कहा केवल उन्हो पाँच विकारों को निर्गुण धारा के संतों ने भी लिया ।
शैली की दृष्टि से भी सिद्धों की 'संधा भाषा' में जो 'कूट' और प्रतीक हैं उन्हीं से
कबीर के रूपक और उलटवासियों का निर्माण हुआ है !
इस प्रकार वज्रयानी सिद्धों तथा वाममार्गियों ने नाथ पंथ का तथा नाथ पंथी
योगियों ने कबीर द्वारा प्रवर्तित निर्गुण सन्त मत के प्रचार के लिए पहले से ही रास्ता
तैयार कर दिया था ।
नाथ पंथ
भारतीय धर्म साधना में दसवीं-ग्यारहवीं शताब्दी में जिन विभिन्न साधनाओं
का बोलबाला था उनमें नाथ पंथ की साधना पद्धति का स्वर अत्यन्त प्रभावशाली रहा
१. (अ) अवणा गमण ण तेन विखंडिअ ।
तो विणिलज्ज भणइ हउं पंडित ॥—सरहपा,
(आ) मै कहता हूँ आँखिन देखी । तू कहता है कागद लेखी । कबीर