सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)
Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra
सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें११४ नामदेव की हिन्दी कविता
परम तत्त्व की अभिव्यक्ति एक दुर्गम कार्य है । सन्तों ने इस बात को स्वीकार
किया है कि वह जैसा कहा जाता है वैसा ही उसका पूर्ण रूप में भी होना सम्भव नहीं
है, वह जैसा है, वैसा ही है ।१
वास्तव में परम तत्त्व का कोई उपयुक्त विचार ही नही कर सकता । गुरु
नानक के अनुसार वह वाणी और बुद्धि दोना की सीमा से परे है ।२
दादू उस अव्यक्त ब्रह्म को बाहर और भीतर प्रत्येक दिशा में देखते हैं । उनके
अनुसार उसको छोड़कर दूसरा कुछ है ही नहीं ।३
सहजोबाई ने एक स्थान पर लिखा है कि उसका कोई नाम नहीं है फिर भी
सब नाम उसी के है । उसका कोई रूप नही है फिर भी सब रूप उसी के हैं ।४
दादू ने उस नूर-स्वरूपी (ज्योति स्वरूप) ब्रह्म का जिससे ये सब खेलत है,
सुंदर वर्णन किया है ।५
संत रज्जब ने भी घट में ही उस व्यापक ब्रह्म को देखा है ।६
यद्यपि उस पर ब्रह्म को यथार्थ रूप में कोई नही जान सकता तब भी संतों ने
१. जस कहिये तस होत नही, जस है तैसा सोई ।
कहत सुनत सुख उपजै, अस परमारथ होई ॥
—कबीर ग्रन्थावली पृ० २३१
२. सोचे सोच न होवई, जे सोचे लखवार ।
—ग्रन्थ साहब, पृ० १
३. दादु देखौ दयाल को बाहिरि भीतरि सोई ।
सब दिसो देखौ पीव को दूसर नाही होई ॥
—दादू दयाल की बानी भाग १, पृ० २३ ।
४. नाम नही और नाम सब, रूप नही सब रूप ।
—सन्त सुधासार, पृ० १६१ ।
५. नूर सरीखा नूर है तेज सरीखा तेज ।
जोति सरीखी जोति है दादू खेले सेज ।
—दादू दयाल की बानो, भाग १ पृष्ठ ५६ ।
६. सब घट घटा समानि है, ब्रह्म बिज्जुली मांहि ।
रज्जब चमकै बौन में सो समझै कोई नाहिं ॥
—सत बान्य, पृष्ठ ३३६ ।