सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)
Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra
सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा
पृष्ठ 119, कुल 332 में से
संदर्भ में पढ़ेंनामदेव और निर्गुण काव्यधारा १२३
हिन्दू धर्म और समाज की बुराइयों पर कबीर ने भी कुठाराघात किया है।
हिन्दुओं के तीर्थ, व्रत, मूर्ति पूजा आदि से उन्हे बेहद चिड़ है। मूर्ति पूजा का खण्डन
करते हुए वे कहते हैं कि पत्थर की मूर्ति को पूजने से यदि परमात्मा मिल सकता है तो
मै पहाड़ को पूजा करूँगा। उसकी अपेक्षा तो यह चक्की भली जिसका पीसा सारा
संसार खाता है। १
जो लोग पत्थर की मूर्ति बनाकर उसे करतार समझकर उसकी पूजा करने हे वे
पाप की धारा में डूब जाते हैं। २
तीर्थ और व्रत बेल के समान संपूर्ण संसार पर छाए हुए हैं। कबीर ने इन
बाह्याचारों को जड़ से ही नष्ट कर दिया। इस विष को कौन खायगा ? ३
भक्ति से रहित जप-तप तथा तीर्थों एवं व्रतों पर विश्वास करना भी भ्रम है। ये
सब तो सेमर के फूल के समान हैं जो देखने में बड़ा आकर्षक पर वस्तुतः सारहीन
है। ४
हे जीवात्मा ! केशों के मुड़ाने से भी कुछ नहीं होता। बंधन का कारण तो
वेश नहीं मन के विकार हैं। तू उस मन को क्यों नहीं मारता जिसमें विषय-विकार
भरे पड़े हैं। ५
केवल वैष्णव बनने से काम नहीं चलता। बिना विवेक के संसार की कोई
१. पाहन पूजे हरि मिले तो मै पूजूँ पहार।
ताते वह चाकी भली पीस खाय संसार ॥
—साखी संग्रह, पृष्ठ १८३ ।
२. पाहण केरा पूतला करि पूजै करतार ।
इही भरोसे जे रहे बूड़े काली धार ॥
—कबीर ग्रन्थावली, पृष्ठ ४३।
३. तीरथ त सब बेलड़ी, सब जग मेल्या छाइ ।
कबीर मूल निकंदिया, कौण हलाहल खाइ ।
—कबीर ग्रन्थावली, पृष्ठ ४४ ।
४. जप तप दीसै थोथरा तीरथ व्रत बेसास ।
सूवै सेंबल सेविया यो जग चल्या निरास ॥
—कबीर ग्रंथावली, पृष्ठ ४४ ।
५. केसन कहा बिगाड़िया, जे मूंड़े सौ बार ।
मन कौं काहे न मूंडिए जामै विषै विकार ॥
—कबीर ग्रन्थावली, पृष्ठ ४६ ।