सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)
Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra
सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा
नामदेव और निर्गुण काव्यधारा १२६
जब तक अंतःकरण शुद्ध नहीं है तब तक ध्यान, जप आदि के करने से क्या
लाभ ? सांप केंचुली छोड़ देता है परन्तु विष नही छोड़ता ।¹
पाखंड पूर्ण भक्ति से राम नहीं रीझते, रीझते हैं तो आँख के अंधे ही ।²
जब तक अंतःकरण शुद्ध न हो तब तक नहाने धोने से क्या लाभ ? गले में तो
तुलसी की माला है और अंतःकरण कोयले सा काला है ।³
नाचने गाने तथा घिस घिस कर चंदन लगाने से क्या लाभ ? यदि तूने स्वयं
को नहीं पहचाना तो समझना होगा कि भ्रम में पड़ा तेरा मन चारों ओर भटक रहा है ।⁴
कबीर ने 'करनी बिना कथनी' की निन्दा की है। उनके अनुसार जब तक
मनुष्य के वचन और कर्म में सामंजस्य नहीं होता तब तक उसका सारा परिश्रम व्यर्थ
है। जो लोग कहते कुछ हैं और करते कुछ हैं वे मनुष्य नहीं पशु हैं और अंत समय वे
नरक को प्राप्त होते हैं ।⁵
केवल बाह्य रूप से राम नाम की रट लगाने से कुछ नहीं होता जब तक हृदय
में उसका महत्त्व नहीं जाना जाता । कबीर कहते हैं कि मनुष्य राम नाम का कीर्तन
बड़े जोर से मुख उठाकर करता है। वह वास्तविकता को न पहचान कर बिना सिर
कहत नामदेव ममता जाइ।
तो साध संगति में रहा समाई ॥ ३ ॥
—सत नामदेव की हिन्दी पदावली, पद ११७ ।
१. काहे कू कीजै ध्यान जपना । जो मन नाही सुध अपना ॥
सांप कांचली छांड़ै बिख नहीं छाड़ै । उदिक में बग ध्यान माड़ै ॥
—संत नामदेव की हिन्दी पदावली, पद २३ ।
२. पापड भगति राम नही रीझै । बाहुरि आंधा लोक पतीजै ॥
—संत नामदेव की हिन्दी पदावली, पद २१ ।
३. न्हावै धोवै करै सनांन । हिरदै आपिन भाथै कान ॥१॥
गलि गलि पहिरै तुलसी की माला । अंतरगति कोइला सा काला ॥२॥
—सत नामदेव की हिन्दी पदावली, पद २४ ।
४. का नाचीला का गाईला । का घसि घसि चंदन लाईला ॥टेक॥
आपा पर नहिं चीन्हीला । तो चित चितारे डहकीला ॥१॥
—सत नामदेव की हिन्दी पदावली, पद २० ।
५. जैसी मुख तैं नीकसै, तैसो चालै नाहिं ।
मानिष नहिं ते स्वान गति, बांध्या जमपुर जाहिं ॥
—कबीर ग्रंथावली, पृष्ठ ३८ ।
६
१३० नामदेव की हिन्दी कविता
के ढोर के समान कार्य करता है । १
कबीर साहब कहते हैं कि कथनी खाड के समान मीठी है परन्तु करनी अर्थात्
कृति प्रत्यक्ष जहर का घूंट है । मनुष्य यदि लंबी-चौड़ी बातें बनाना छोड़कर कृति को
महत्त्व दे तो विष का अमृत बन जाये । २
कबीर साहब ने अपनी एक साखी में बतलाया है कि वास्तव में 'सहजसील'
के ही अभ्यास में मेरे 'मत' का सार आ जाता है । इस 'सहजसील' का परिचय देते
हुए वे एक स्थान पर कहते हैं कि इसके लिए कम से कम सती, संतोषी, सावधान,
शब्दभेदी तथा सुविचारवान होने की आवश्यकता है जो सद्गुरु के प्रसाद अथवा अपार
कृपा पर निर्भर है । ३
इनमें से 'सुविचार' का गुण हमारे भीतर सारग्राहिता की भावना जागृत करता
है तथा उसी प्रकार कथनी और करनी के बीच सामंजस्य बनाये रखने का भी यत्न
करता है । इस प्रकार के सहजसील का अभ्यास निरंतर होना रहना चाहिये । इसके
सफल हो जाने पर ही हमें उस सहजावस्था की भी उपलब्धि हो जाती है जिसमें
'अपनी पांचो ज्ञानेन्द्रियाँ पूर्णत अपने कहने में आ जाती हैं और ऐसा प्रतीत होने
लगता है कि हमें स्वयं परमात्मा का ही स्पर्श अथवा प्रत्यक्ष अनुभव हो रहा है ।' ४
अब कथनी एवं करनी में कोई अंतर नहीं रह जाता । जैसा मुख से निकलता है वैसा
ही अपना दैनिक व्यवहार भी चलता है ।
संत रज्जब करनी तथा कथनी की एकरूपता पर बल देते हुए कहते हैं कि
औषधि बिना पथ्य के तथा पथ्य बिना औषधि का किस काम का ? यदि नामस्मरण
१. करता दीसे कीरतन ऊँचा करि करि तूँड ।
आगे बूझे कुछ नही योही आंधा रूँड ॥
—कबीर ग्रंथावली, पृष्ठ ३८ ।
२. कथनी मीठी खांड सी करनी विष की सोय ।
कथनी तजि करनी करै विष तैं अमृत होय ॥
—कबीर वचनावली, पृष्ठ २४ ।
३. सती संतोषी सावधान सब्द भेद सुविचार ।
सतगुरु के प्रसाद थैं सहजसील मत सार ॥
—कबीर ग्रंथावली, पृष्ठ ६३ ।
४. जैसी मुख तैं नीकसै, तैसी चालै चाल ।
पारब्रह्म नेड़ा रहै, पल में करै निहाल ॥
—कबीर ग्रंथावली, पृष्ठ ३८ ।
नामदेव और निर्गुण काव्यधारा १३१
और कृति में मेल न हो तो दोनो की प्रशंसा नही होती ।¹
मनुष्य भजन और साखी गाकर आनंदित होता है कि उसने ईश्वर की भक्ति
कर ली । लेकिन यह सब व्यर्थ है जब तक उस परम तत्व के नाम का ध्यान नही
किया । उसके कंठ में यम का फंदा अवश्य पड़ेगा ।²
भक्ति और ऐहिक कार्य में एकता :
भक्ति और सांसारिक कार्यों को संतो ने अलग अलग नही समझा । भक्ति और
जीविका के कर्मों में कोई विरोध नही क्योकि भक्ति हृदय से होती है और कर्म हाथों
से । इसीलिए उन्होने श्रम और भक्ति दोनों को एक दूसरे का पूरक माना है। श्रम से
भक्ति सहज होती है और भक्ति से श्रम सहज । संतो ने नाम-स्मरण और श्रम साथ
साथ किया ।
इस प्रकार नामस्मरण और कर्म का समन्वय नये वेदांत की अद्वितीय विशेषता
है । कबीर³ भजन और बुनकरी, नामदेव भजन और दर्जी का काम, रैदास भजन
और मोची का काम, सेना भजन और नाई का काम साथ-साथ करते थे । रैदास ने⁴
अपनी समस्या का समाधान करते हुए कहा कि सब प्रतिवाद छोड़कर अहर्निश हरि
स्मरण करना चाहिए ।
प्राचीन वेदांत में भक्ति केवल साधन है, साध्य नही है । इसके विपरीत नया
वेदांत भक्ति को परम साध्य मानता है । यही एक मात्र सार वस्तु है। यह भजन है या
नाम की साधना है । भक्त निशि-दिन भजन करता है । इसका भजन अजपा जप है ।
१. ओषध बिना पथ्य का करै पथ्य बिना ओषधि आदि ।
यूँ सुमिरण सुकृत अमिल, उभे न पावहि दादि ॥
—संत काव्य, पृष्ठ ३४० ।
२. पद गाए मन हरषियां, साषी कहयां आनंद ।
सो तत नाव न जाणिया, गलमे पड़िया फंध ॥
—कबीर ग्रंथावली, पृष्ठ ३८ ।
३. 'हम घरि सूतु तनहि नित ताना'
—गुरु ग्रन्थ साहब, राग आसा, पद २६ ।
'बूनि बुनि आप आपु पहिरावउ'
—गुरु ग्रन्थ साहब, राग भैरऊ, पद ७ ।
४. अहनिसि हरि सुमिरिये छांडि सकल प्रतिवाद ।
—संक्षिप्त संत सुधा-सार, पृष्ठ ६६ ।
१३२ नामदेव की हिन्दी कविता
भजन के बिना वह जी नहीं सकता। यही उसकी रहनी है। यह भाव-भक्ति है। इसी
को प्रेम लक्षण भक्ति भी कहा जाता है।
नामदेव की भक्ति भी भाव-भक्ति है। वे भी भक्ति तथा ऐहिक कार्य की एकता
पर बल देते हैं। उनके अनुसार प्रत्येक व्यक्ति को अपनी जीविका का काम करते समय
हरि भजन या नाम स्मरण भी करते रहना चाहिए। नामदेव कहते हैं कि मेरा मन
गज है और जिह्वा कैंची है। मैं मन रूपी गज और जिह्वा रूपी कैंची की सहायता से
यम का बंधन काटता हूँ। मैं कपड़ा रंगने और सिलने का काम करता हूँ—घड़ी भर
के लिए भी भगवन्नाम विस्मृत नहीं करता हूँ। १
नामदेव के विचार से राम का ध्यान संसार के सभी आवश्यक कार्य करते हुए
करना चाहिए। उनका कथन है कि 'मेरा मन राम नाम से इस प्रकार बिंधा हुआ है
जैसे स्वर्ण तोलते समय सुवर्णकार का ध्यान तुला की ओर बना रहता है। जिस प्रकार
युवतियाँ सिर पर पानी से भरे घड़े लेकर आपस में मनोविनोद करती हुई चलती हैं
किंतु उनका ध्यान सदा घड़ों पर ही रहता है, जिस प्रकार माता का मन घरेलू झंझटों
में फँसे रहने पर भी पलने में पौढ़ाये हुए अपने बालक की ओर रहता है उसी प्रकार
मेरा मन उसमें लगा रहता है।' २
भाव भगति का प्रतिपादन करते हुए नामदेव एक अन्य स्थान पर कहते हैं कि
हृदय में सच्चा भाव नहीं है और नामदेव हरि का नाम लेता है। हे केशव ! पानी के
बिना नाव कैसे तरेगी ? ३
१. मन मेरो गजु जिह्वा मेरी काती।
मरि मरि काटउ जम की फासी ॥१॥
राँगनि राँगउ सीवनि सीवउ।
राम नाम बिनु घरीय न जीवउ ॥२॥
— संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद १८।
२. ऐसो मन राम नामै बेधिला। जैसे कनक तुला चित राखिला ॥टेक॥
आनिले कुंभ भराइले उदिक, राजकुंवारि पुरंदरिये।
हसत बिनोद देत करताली चित सू गागरि राखिला ॥
भणत नामदेव सुनो त्रिलोचन, बालक पलनि पोढ़िला।
अपने मंदिर काज करती, चित सू बालक राखिला ॥
— संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद १६।
३. अभि अंतर नही भाव, नाम कहै हरि नाव सू।
नीर बिहूनी नाव, कैसे तिरिबो केसवे ॥
— संत नामदेव की हिंदी पदावली, पृष्ठ ११४ (साखी १)
नामदेव और निर्गुण काव्यधारा १३३
अंतःकरण तो काला है और बाहर भक्ति का दिखावा करता है। नामदेव
कहते है कि हरि भजन के बिना उसे निश्चय ही नरकवास मिलेगा ।¹
अंतःकरण तो परमात्मा से अनुरक्त है परन्तु बाहर से उदास है। भाव भक्ति
के कारण मुझे परमात्मा का साक्षात्कार हुआ ।²
भाव-भगति को कबीर ने 'हरि सूं गठ जोरा' कहा है ।³ उनके अनुसार
'भगति' वा भक्ति से तात्पर्य 'हरि नाम का भजन' मात्र है। अन्य बातें अपार दुःख से
भरी हुई हैं ।⁴ नारद के समान कबीर ने भी भक्ति को कर्म, ज्ञान तथा योग से श्रेष्ठ
कहा है। वे उसे मुक्ति का एक मात्र उपाय मानते हैं ।⁵ जब तक भाव-भक्ति न करोगे
तब तक भव सागर कैसे पार कर सकते हो ?⁶
कर्मकांड को कबीर पाखंड ही के अंतर्गत मानते है क्योंकि परमात्मा की भक्ति
तन को स्वयं ही अपने अनुकूल बना लेगी। भक्ति की सच्ची भावना होने से कर्म भी
अनुकूल होने लगेंगे। परन्तु केवल माला जपने से अथवा पूजा पाठ करने से कुछ नही
१. अभि अंतरि काला रहै, बाहरि करै उजास ।
नाम कहै हरि भजन बिन, निहचे नरक निवास ॥
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, साखी २, पृष्ठ ११४
२. अभि अंतरि राता रहै बाहरि रहै उदास ।
नाम कहै मै पाइयो, भाव भगति बिसवास ॥
संत नामदेव की हिंदी पदावली, साखी ३ पृष्ठ ११४
३. कहै कबीर तन मन का ओरा ।
भाव भगति हरि सूं गठ जोरा ॥
—कबीर ग्रन्थावली, पद २१३, पृष्ठ १६०
४. भगति भजन हरि नांव है दूजा दुख अपार ।
मनसा वाचा कर्मना, कबीर सुमिरण सार ॥
—कबीर ग्रन्थावली साखी ४, पृष्ठ ५
५. भाव भगति बिसवास बिन कहै न संसै शूल ।
कहै कबीर हरि भगति बिन, मूकति नही रे मूल ॥
—कबीर ग्रन्थावली, पृष्ठ २४५
६. जब लग भाव भगति नहीं करिहौ !
तब लग भवसागर क्यूँ तिरिहौ !
—कबीर ग्रन्थावली पृष्ठ २४५
१३४ नामदेव की हिन्दी कविता
हो सकता। यह तो मानो और भी अधिक माया में पड़ना है।१ जब तक भगवान को
भाव-भक्ति से रिझा न लिया जाय तब तक जप, तप, व्रत, संयम, स्नान आदि से क्या
लाभ ?२
सत्संग की प्रधानता
पुरानी व्यवस्था ज्ञानमूलक समाज व्यवस्था की पक्षपाती थी। उसने चातुर्वर्ण्य
का समर्थन किया जिससे कालांतर में अनेक जातियाँ बनी। कबीर जाति-पाँति के
नियमो के कट्टर विरोधी थे। उनकी दृष्टि में सब मनुष्य समान थे तथा भगवद् भक्ति
का सबको समान अधिकार था। 'जाति पाँति पूछै नहि कोई। हरि को भजै सो हरि
का होई' उक्ति इसी सिद्धांत की द्योतक है।
जो हरि का भजन करता है वही हरिजन है। मनुष्य मात्र को हरिजन होना
चाहिये। संतो की जाति नही होती। सभी लोगो को संतो के चरित्र से शिक्षा लेनी है।३
जीवोत्पत्ति की दृष्टि से भी जाति व्यवस्था अप्राकृतिक है। पुराना वेदांत मानव
को उद्भिञ्ज मानता है किंतु कबीर के अनुसार सभी मानव योनिज हैं। भिन्न शरीरो
को धारण करने तथा वंशानुगत क्रमानुसार किसी जाति के परिवार विशेष में जन्म
ग्रहण करने के कारण लोग एक दूसरे को अपने से भिन्न मान लेते हैं। उस एक मात्र
सत्य के प्राकृतिक नियमो पर विचार करने से दो व्यक्तियो में कोई मौलिक अंतर नही
दीख पडता।
निर्गुण मत जाति व्यवस्था का उन्मूलन करता है। अलगाव की प्रथाओ का
खण्डन करता है, बाह्य आडम्बरो के निराकरण की अपील करता है और अंत में भक्ति
पूर्ण कथनी, करनी और रहनी की व्यवस्था करता है। इससे उसने एक नया समाज
बनाया जो 'सत्संग' के नाम से प्रसिद्ध है। यह सत्संग एक समतामूलक, भक्तिमूलक
तथा निजी आर्थिक व्यवस्था वाला संगठन है।
१. जप तप पूजा अरचा जोतिग जग बौराना ।
कागद लिखि लिखि जगत भुलाना मन ही मन न समाना ॥
२. क्या जप क्या तप सयम्रो क्या व्रत क्या इस्नान ।
जब लग जुक्ति न जानिये भाव भक्ति भगवान ॥
—कबीर ग्रन्थावली, पृष्ठ ३२६
३. संतन जात न पूछो निरगुनियां ।
हिंद तुकैं दुइ दीन बने है कछु नही पहुचनियां ॥
—संक्षिप्त संत-सुधा सार, पृष्ठ ४८
नामदेव और निर्गुण काव्यधारा १३५
यह सत्संग विरक्त साधुओं की जमात नहीं है। यह गृहस्थ भक्तों का संगठन
है। उनको यह उत्पादक श्रम तथा अध्यात्म दोनों की शिक्षा देता है। प्रत्येक भक्त को
उत्पादक श्रम करना चाहिए। नामदेव, कबीर, रैदास सेना आदि भक्तों ने जीवन
पर्यंत अपना पेशेवर कार्य किया। नया वेदांत कर्म और अध्यात्म भावना का समन्वय
करता है। सत्संग इस समन्वय को मूर्त रूप देता है।
सत्संगति को भक्ति का प्रमुख साधन माना जाता है। अध्यात्म रामायण में
तो इसे प्रथम साधन कहा ही है। इस साधन को नामदेव ने विशेष महत्व दिया है।
उन्होंने अपनी रचनाओं में उसके आदर्शों का प्रतिपादन किया है।
संतों के सहवास के लिए नामदेव आतुर हैं। वे अपनी आंतरिक अभिलाषा इस
प्रकार व्यक्त करते है—आज मुझे कोई हरि का दास मिले तो परम सुख होगा। वह
मेरे मन में भाव-भगति जाग्रत करेगा, मेरे मन की दुविधा दूर करेगा तब आत्मज्ञान
का प्रकाश फैलेगा। नामदेव कहते हैं कि जब मेरा मन उदास रहता है तब संत समा-
गम से मुझे अपार सुख होता है।१
संसार में ऐसा भक्त विरला ही होता है। हे पंडितो ! तुम वेद तथा पुराणों
का अनुशीलन कर देखो। दही बिलोकर निकाला घृत फिर दही से एक रूप नहीं होता
अग्नि लकड़ी के जितने हिस्से को जलाती है वह फिर लकड़ी नहीं हो सकता। पारस
के स्पर्श से जो लोहा सोना बनता है वह फिर से लोहा नहीं हो सकता। पलाश चंदन
से बेढ़े जाने पर चंदन होता है। इसी प्रकार जो लोग निष्काम भाव से राम से लौ
लगाते हैं वे राम रूप हो जाते हैं।२
१. आज कोई मिलसो मुने राम सनेही।
तब सुख पावै हमारी देही ॥टेक॥
भाव भगति मन में उपजावै। प्रेम प्रीति हरि अंतरि आवै ॥१॥
आपा पर दुविधा सब नासै। सहजै आतम ग्यान प्रकासै ॥२॥
जनु नामा मन परा उदास। तब सुष पावै मिलै हरिदास ॥३॥
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद १०२
२. ऐसे जगथैं दास नियारा।
वेद पुरान सुमृत किन देखो पंडित करहु विचारा ॥ टेक ॥
दधि विलोइ जैसे घृत लीजे। बहुरि न एकठ थाई ॥
पावक दार जतन करि काढ्या, बहुरि न दार समाई ॥१॥
पारस परसि लोह जैसे कंचन बहुरि न म्यंछक होई।
आक पलास बेधीया चंदन, काष्ट कहै नही कोई ॥२॥
१३६ नामदेव की हिन्दी कविता
जो जितना ही हरि के भक्तो से दूर रहेगा वह हरि (परमात्मा) से भी उतना
ही दूर रहेगा । नामदेव कहते हैं कि हरि के उस दास अथवा भक्त की मुक्ति कैसे
होगी ?१
जो अंधे के समान स्थान स्थान पर टटोलता है और संतो को पहचानता नहीं,
नामदेव कहते हैं कि बिना हरि के भक्तो से परिचित हुए वह भगवान को कैसे पा
सकता है ?२
नामदेव कहते हैं कि सब से 'निरवेरता' रखने वाला साधु पूजने योग्य होता है ।३
हीन जाति में पैदा होने की बात नामदेव को खटकती थी ।४ अपने एक पद
में वे कहते हैं—हे परमात्मा ! मेरी जाति हीन है वह किसी से सही नहीं जाती ।५
मैने छीपे के घर जन्म लिया । मुझे गुरु का उपदेश मिला । साधु संतो के
प्रसाद से मुझे भगवान के दर्शन सुलभ हो गये ।६
जे जन राम नाम रंगि राता, छाड़ि करम की आसा ।
घे जन रामे राम समाने, प्रणवत नामदेव दासा ॥
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद ८२
१. जेता
नामदेव और निर्गुण काव्यधारा १३७
मुझे भला जाति-पाँति से क्या लेना-देना ? मैं तो दिन-रात राम नाम जपता
हूँ । मेरी सोने की सुई और चाँदी का धागा है । नामदेव कहते हैं कि मेरा चित्त
भगवान में लगा हुआ है ।१
कबीर भी इस सत्संग के पुरस्कर्त्ता थे । इस साधन को उन्होंने विशेष महत्त्व
दिया है । वे कहते हैं कि यह शरीर मन के साथ रहता है अर्थात् यह पंछी हो रहा है ।
जहाँ पर मन हो वही शरीर उड़ जाता है । वास्तव में जो जिस संगति में रहता है उसे
उसी प्रकार का फल भी मिलता है ।२ एक अन्य स्थान पर वे कहते हैं कि सत् पुरुष के
समीप बैठना कभी निष्फल नहीं होता । चंदन का वृक्ष यदि छोटा भी हो तब भी उसको
कोई नीम नहीं कह सकता ।३
कबीर साहब कहते हैं कि यह संसार काजल की कोठरी के समान है । इसमें
पैठ कर जो बिना कालिख लगाये बाहर निकल आये उसकी बलिहारी है ।४
अगर तुझे प्रेम की पीर की अनुभूति करना है तो पक्के साधु की संगति कर ।
कच्ची सरसों को कोल्हू में पेलकर क्या फायदा ? उससे न खली मिलती है न तेल ।५
यों तो उन्होंने स्थान स्थान पर साधुओं के गुणों का वर्णन किया है किंतु एक
स्थल पर अत्यन्त संक्षेप में उसकी विशेषताएँ निर्देशित कर दी हैं—ये (संत) 'निरवैरी'
अर्थात् किसी से किसी प्रकार की शत्रुता न रखने वाले होते हैं, 'निहकाम' होने के
१. का करो जाती का करौं पाती । राजाराम सेऊँ दिन राती ।
सुइने की सुई रुपे का धागा । नामे का चितु हरि सू लागा ॥
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद १८
२. कबीर तन पंछी भया जहाँ मन तहां उड़ि जाइ ।
जो जैसी संगति करे सो तैसे फल खाई ॥
—कबीर ग्रंथावली, पृष्ठ ४८
३. कबीर संगति साध की कदे न निष्फल होइ ।
चंदन होसी बावना, नींब न कहसी कोइ ॥
—कबीर ग्रंथावली, पृष्ठ ४६
४. काजल केरी कोठरी, तैसा यहु संसार ।
बलिहारी ता दास की पैसि ज निकसणहार ॥
—संक्षिप्त संत-सुधा-सार, पृष्ठ ७३
५ तोहि पीर जो प्रेम की, पाका सेती खेल ।
काँची सरसों पेरिके खली भया ना तेल ॥
—संक्षिप्त संत-सुधा-सार, पृष्ठ ७३
१३८ नामदेव की हिन्दी कविता
कारण किसी वस्तु की कामना न रखते हुए नि:स्वार्थ होते हैं, उन्हें 'साईं सेती नेहु'
अर्थात् परमात्मा के प्रति पूर्ण प्रेम की भावना रहा करती है और वे सारे 'विषिया सू
न्यारा' अथवा अलग रहने के कारण निर्लिप्त व अनासक्त रहा करते हैं। १
सहज अवस्था
सहज समाधि की स्थिति में भाव-भगति से ओत-प्रोत स्वभाव को कबीर ने
'सहज सील' की संज्ञा दी है और बतलाया है कि किस प्रकार उक्त श्रेणी तक पहुँचे
हुए महापुरुष की प्रवृत्ति एक निराले ढंग की हो जाती है, जिसमें कुछ विशिष्ट गुणों का
समावेश रहा जाता है।
नामदेव ने कई बार 'सहज' शब्द का प्रयोग किया है। उनके अनुसार बाह्य
कर्म काण्डों से कोई लाभ नही। बिना प्रभु पर पूर्ण विश्वास किये तीर्थ व्रत आदि व्यर्थ
हैं। अत लोगो के आडम्बर पर उनको क्षोभ होता है। वे सहज कर्म करना चाहते हैं।
नामदेव सहज साधना को ईश्वर प्राप्ति का सबसे उत्तम मार्ग बतलाते थे।
सहज से उनका अभिप्राय उस निष्काम भक्ति में था जो बिना किसी साधना और कर्म
के तथा बिना पाखंड के सच्चे और सरल हृदय से की जाती है। हृदय में ईश्वर-प्रेम
की सच्ची अनुभूति ही साधक की सहज अवस्था कही जाती है।
नामदेव कहते है—हे परमात्मा ! वेणु बजती है और सारा आकाश गूंज उठता
है, जिससे अनहद-नाद उत्पन्न होता है। लोग अपने आप को नही पहचानते और भ्रम
में डोलते रहते हैं। चन्द्र और सूर्य नाड़ी को सम कर जीव ब्रह्म से मिल सकता है। मैं
सुषुम्ना को तारा मण्डल में लाता हूँ और तृष्णा पर काबू करता हूँ। बिना सायास के
मुझे गगन-मण्डल में स्थान मिला है। अन्तर ध्वनि पर में अपने मन को केन्द्रित करता
हूँ। यह स्थान किसी योगी को बड़ी कठिनाई से मिल सकता है। मैं फूलों तथा पत्तियों
से हरि की पूजा न करूँगा क्योकि वह मन्दिर में नही है। मैने हरि के चरणों पर अपने
आपको समर्पित कर दिया है, अब मेरा पुनर्जन्म न होगा।२
——————————————————
१. निरवैरी निष्कामता साई सेती नेहु।
विषिया सू न्यारा रहै, संतन का अंग एह ॥
—साध, साषीभूत को अंग, कबीर ग्रंथावली, पृ० ५०
२ देवा बेनु बाजै गगन गाजै। सबद अनाहद बोलै।
अंतरि गति की जाने नाही। मूरिख भरमत डोलै ॥ टेक ॥
गगन मडल मै रहनि हमारी। सहजि सुनि गृह मेला।
अंतरि धुनि मै मन बिरमाऊँ। कोई जोगी गम लहैला ॥
नामदेव और निर्गुण काव्यधारा १३६
'पतंग आकाश में उड़ी तब मैने उसे न देखा। जब तक मनुष्य जय-अपजय की
बात सोचता है तब तक उसको परमात्मा की प्राप्ति नही होती। कहना-सुनना जब
समाप्त हो जाता है तभी उसका परिचय मिलता है। जिन्होंने उसका गुणगान किया वे
गये। जो इस संसार को छोड़कर चले गये उनका दूसरो ने गुणगान किया। मैं ऐसे
प्रभु का गुण गाता हूँ जिसका गुण अब तक किसी ने नही गया। नामदेव कहते है—मैं
निष्काम होकर सदा सहज समाधि में मग्न रहता हूँ।''
योगी का शासन युग-युग तक चलता है। वह श्वास का निरोध करता है। वह
अमृत का पात्र भर कर उसका पान करता है। जब योगी ने इस अमृत को प्राप्त करने
का प्रयत्न किया तो उसके पिता ने उसको ऐसा करने से परावृत्त किया और उसकी
माता वियोग से मर गई। नातेदारो ने उससे जो अपेक्षाएँ रखी थी वे पूरी न होने के
कारण उन्होने उसका त्याग किया। योगी अपने चर्मचक्षु बन्द कर अन्त:चक्षु से देखने
लगा। निष्काम होकर वह पंचेन्द्रियों के दासत्व से मुक्त हुआ। नामदेव कहते हैं—योगी
ने सहज समाधि लगा कर निरंजन की सेवा की।२
'परमात्मा सारे संसार में व्याप्त है अतः लोग उसके बारे मे कुछ कह तथा सुन
सकते हैं। उसको अभेद-रूप समझने से अभेद रूप में तथा भेद-रूप समझने से भेद रूप
पाठी तोड़ि न पूजूं देवा। देवलि देव न होई।
नामा कहै मै हरि की सरना। पुनरपि जन्म न होई॥
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद ६५।
१. देवा गगन गुडी बैठी मै नाही तब दीठी॥ टेक॥
जब लगि आस निरास विचारे तब लगि ताहि न पावै॥ १ ॥
कहिबौ सुनिबौ जब गत होइबौ तब ताहि परचौ आवै॥ २ ॥
गाये गये गये ते गाये अगई कूँ अब गाऊँ॥ ३ ॥
प्रणवत नामा भए निहकामा, सहजि समाधि लगाऊँ॥ ४ ॥
संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद ६६
२. जोगी जन न्याइ जुगे जुगि जीवे।
आकास बांधि पाताल चलावै, आप भरे भरि पीवै॥ टेक॥
अमृत पात पिता परबोध्यौ माइ मुँई करि सोय।
भाई बंध की आस न पूगी भाजि गए सब लोग॥ १ ॥
बाहिली मूँदिले माहिली चौंधिले पंच की बास मिटाइ रे।
भणत नामदेव सेवि निरंजन सहज समाधि लगाइ रे॥ २ ॥
संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद ६७
१४० नामदेव की हिन्दी कविता
में उसकी प्राप्ति होती है । उसको सहज रूप समझने से वह सहज प्राप्त हो सकता है ।
उसको सुख अथवा दुख रूप समझने से सुख अथवा दुख में उसकी प्राप्ति हो सकती है ।
ज्ञान तथा ध्यान रूप समझने से वह ज्ञान तथा ध्यान रूप में प्राप्त हो सकता है । नाम-
देव कहते है—'यदि मैं कहूँ कि मैंने उसका साक्षात्कार कर लिया तो मैं झूठा और यदि
मैं कहूँ कि मैंने उसे नहीं देखा तो मेरा कथन सत्य से दूर होगा । जब मैं कहता हूँ कि
वह अगम है तो उसकी खोज निरर्थक है । तब उसके बारे में पूछना न पूछने के बराबर
ही है ।'¹
नामदेव अपनी मुक्तावस्था का वर्णन इस प्रकार करते हैं—'हे देव ! तुम्हारा
डंका बजा । पखावज, वीणा आदि वाद्यों के मेल से एक ही सुर निकला । मेरे पैरों में
लोहे की बेड़ी पड़ी है । भव सागर का भय दूर हुआ । मुक्ति मेरी दासी हुई है । बकरी
जब सिंह को खाने लगी तब वह पीठ दिखाकर भागा । नामदेव कहते हैं कि मैंने बाहर
जाते हुए भीतर देखा और इस प्रकार अपनी भक्ति निभाई ।'²
संतों की दृष्टि में सहजशील की साधना ही उनके मत का सार है । इस सहज-
[
नामदेव और निर्गुण काव्यधारा १४१
सद्गुरु के प्रसाद अथवा अपार कृपा पर निर्भर है ।१
सब प्रकार की समाधियो में सहज समाधि को सर्वोत्तम एवं उत्कृष्ट कहा गया
है क्योकि इसमें साधक को आसन, मुद्रा, प्राणायाम, ध्यान, धारणा आदि क्लिष्ट साधना
करने की आवश्यकता नही होती । योग-युक्ति के द्वारा मन को अन्तर्मुखी किया जाता
है । मन केन्द्रीभूत हो जाने पर अपने विकारों से शून्य हो जाता है । केन्द्रीभूत मन
सहजवृत्ति में परिवर्तित हो जाता है । मन साधना की उत्कृष्ट अवस्था सहज समाधि है ।
इसमे मन की सभी वृत्तियां अन्तर्मुखी होकर अन्तर्निहित हो जाती हैं ।
संतों के अनुसार जिस साधना के लिए विशेष प्रयत्न नही करना पडता वही
साधना सहज साधना है ।२
दादू इस सहज साधना के लिए सुमिरन का मार्ग बताते हैं ।३
कबीर कहते है कि ईश्वर प्राप्ति को सभी सरल बताते है लेकिन उस सरल को
जानता कोई नही । जिन भक्तो को सरलतापूर्वक ईश्वर की प्राप्ति हो जाती है उसी को
वास्तविक सहजावस्था कहते है ।४
कबीर अच्छी तरह जानते थे कि यह देनंदिन व्यवहार की दुनिया और साधारण
मानव जीवन कितना ही तुच्छ और हेय क्यो न हो यदि आत्मा-विस्मृतकारी परम
उल्लासमय साक्षात्कार किया जा सकता है तो इसी के द्वारा किया जा सकता है । वे
सगुण और निर्गुण के झगड़े को व्यर्थ बताते हैं । वे कहते हैं—हे संतो ! मे धोखे की
बात किस सें कहूँ ? गुण मे ही निर्गुण है और निर्गुण में गुण । इस सीधे रास्ते को
छोड़कर कहाँ बहता फिरता जाय ?५
१. सती संतोपी सावधान सबद भेद सुविचार ।
सतगुरु के प्रसाद थें, सहजसील मत सार ॥
--कबीर ग्रन्थावली, पृष्ठ ६३ ।
२. कहि कबीर राम नाम न छोड़ी सहजे होइ सु होइ रे ।
कबीर ग्रन्थावली, पृ० २६६ ।
३. साँसै साँस सम्हालना, इक दिन मिलि है आई ।
सुमिरन पेड़ा सहज का सतगुरु दिया बताय ॥
संत वाणी संग्रह भाग १, पृ० ७८ ।
४. सहज सहज सबको कहै, सहज न चीन्हे कोई ।
जिन्ह सहजैं हरिजी मिले, सहज कहीजै सोइ ॥
कबीर ग्रन्थावली, पृ० ४२ ।
५. संतों धोखा कासूं कहिये ।
गुण मे निरगुण निरगुंण मे गुंण है बाट छांड़ि क्यो बहिये ।
कबीर ग्रन्थावली, पद १८०, पृ० १४६ ।
१४२ नामदेव की हिन्दी कविता
कबीर ने सहज समाधि को सर्वोत्तम बताया है। आँखें मूंदे बिना, कान बन्द
किये बिना ही इसकी सिद्धि हो जाती है। सहजभाव के साथ खुली आँखों से भगवान्
को देखना ही सहज समाधि है। एक बार यदि यह सिद्ध हो जाय तो साधक निरन्तर
परमानन्द का रस पान करने में तल्लीन रहता है ।१
यहाँ कबीर ने उन्मनि रहनी को सहज समाधि कहा है। इस स्थिति में द्वैत का
भाव नष्ट हो जाता है। यह अद्वैतावस्था है, सम्पूर्ण विश्व आत्ममय हो जाता है। जीवन
के सभी क्षेत्रों में सहज रूप से आत्म दर्शन उपलब्ध होता रहता है। योगी परिपूर्ण हो
जाता है। उसका मन विकार-रहित होकर केन्द्रीभूत हो जाता है।
हठयोग की साधना
संतों की साधना पद्धति के विषय में विद्वानों ने भिन्न-भिन्न प्रकार के अनुमान
किये हैं। आचार्य परशुराम चतुर्वेदी के अनुसार संतों की साधना को वस्तुत आत्मविचार
की साधना कहना उपयुक्त होगा।२ संतों की साधना के स्वरूप निर्धारण में संत कबीर
का प्रमुख हाथ है। डॉ० त्रिगुणायत का अनुमान है कि संत कबीर ने योग के क्षेत्र में
प्रचलित समस्त योग साधनाओं की परीक्षा करके अपना स्वानुभूतिमूलक सहज योग
प्रतिपादित किया जिसका पर्यवसान प्रवृत्तिमूलक भक्ति योग में हुआ।३
संतों ने जिस आत्मविचार को प्रधानता दी है उसके साथ ही अनेक परम्परागत
साधनाओं को भी अपने अन्दर पल्लवित पाया है जिनका प्रभाव मध्य-युग की साधना
पद्धति पर विशेष रूप से था। ये साधनाएँ मुख्यतः हठयोग की साधनाएँ तथा तान्त्रिक
१. सन्तो सहज समाधि भली।
साँई तै मिलन भयो जा दिन ते, सुरत न अंत चली॥
आँख न मूंदूँ कान न रूँधूँ, काया कष्ट न धारूँ।
खुले नैन में हँस हँस देखूं सुन्दर रूप निहारूँ॥
जँह जँह जाऊँ सोइ परिकरमा, जो कुछ करूँ सो सेवा।
जब सोऊँ तब करूँ दंडवत, पूजूं ओर न देवा॥
शब्द निरन्तर मनवा राता, मलिन वचन का त्यागी।
कहै कबीर यह उनमनि रहनी, सो परगट करि गाई।
सुख दुख के इक परे परम सुख, तेहि में रहा समाई॥
—संक्षिप्त संत-सुधा-सार, पृ० ४१।
२. कबीर साहित्य की परख, पृ० ६६।
३. कबीर की विचारधारा, पृ० २६८।
नामदेव और निर्गुण काव्यधारा १४३
उपासनाएँ थी। तांत्रिक उपासनाएँ लोकविरोधी होने के कारण संतों को कभी ग्राह्य न
न हो सकी। इसका कारण सम्भवतः यही है कि संत अपनी मूल विचारधारा में समस्त
धर्म साधनाओ के विकृत एवं जटिल रूप को बाह्याचार ही समझते थे। डॉ० हजारी-
प्रसाद द्विवेदी ने कबीर की साधना पद्धति पर दृष्टिपात करते हुए एक स्थल पर ठीक ही
लिखा है कि कबीर यौगिक क्रियाओ को भी बाह्याचार ही मानते थे। वे उन सारी
क्रियाओं को सहजावस्था की प्राप्ति का कारण नही मानते थे।¹ यही कारण है कि संत
योग की साधनाओ को अपनी साधना का मूल हेतु न मान सके। स्वयं कबीर अनहद का
बजना स्वीकार तो करते है पर वही एक परम सत्य नहीं है, सत्य है उसे बजाने
वाला।²
संतो मे हठयोग का क्लिष्ट रूप नही मिलता। ऐसा प्रतीत होता है कि हठयोग
के जटिल रूप का वर्णन केवल परम्परा निर्वाह मात्र है। यथार्थ में तो मन, वायु तथा
बिंदु की साधना में से किसी एक ही साधना को जब नाथ पंथियो ने स्वीकार कर लिया
तब संतों ने चंचल मन को प्राणायाम की क्रियाओं से अपने अधीन करने के लिए योग
की मूल स्थिति को स्वीकार कर लिया। योग की परिभाषा भी चित्तवृत्तियों के निरोध
को लेकर चलती है।³
हठयोग की भावना संतों में बहुत पहले से चली आई है। नामदेव ने भी इसे
अपनाया है। योगो विसोबा खेचर से दीक्षा लेने के उपरांत प्रतीत होता है कि नामदेव
कुंडलिनी योग साधना में प्रवृत्त हुए और तभी से उनके पदो तथा अभंगो में उसका
उल्लेख होने लगा। नामदेव कहते है—
जहाँ ब्रह्मनाद रूपी सूर्य का प्रकाश है वहाँ संसार के सूर्य, चन्द्रमा आदि दीपक
धूमिल हो जाते है, गुरु-कृपा से मैने उसको जान लिया है। नामदेव कहते है कि इसके
फलस्वरूप मुझ जैसा भक्त भगवान के सहज रूप में समा गया है।⁴
१. कबीर—डॉ० हजारीप्रसाद द्विवेदी, पृ० ६३ ।
२. वाजे जंत्र नाद धुनि होई। जो बजावै सो औरे कोई।
बाजो नाचै कौतिग देखा। जो नचावै सो कितहु न पेखा॥
—कबीर ग्रन्थावली, पृ० २३१।
३. योगश्चित्तवृत्ति निरोधः । योग दर्शन १, २।
४. जह अनहत सूर उजारा। तह दीपक जले छंछारा।
गुरु परसादी जानिआ। जनु नामा सहज समानिआ॥
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद २००।
१४४ नामदेव की हिन्दी कविता
इडा, पिंगला और सुषुम्ना नाड़ियो से सम्बन्धित प्राणायाम को मैं रोक रखूँगा।
चन्द्र और नाड़ियो को सम कर मैं ब्रह्म की ज्योति में मिल जाऊँगा। १
योगी दीर्घ-जीवी होते हैं। उनका शासन दीर्घ काल तक चलता है। वह सांस
का निरोध कर उसको नीचे के भाग तक ले जाता है। और लबालब भरे हुए अमृत पात्र
से अमृत प्राशन करता है। नामदेव कहते हैं कि हे साधक ! तू सहज समाधि लगाकर
निरंजन की सेवा कर । २
अपने दिव्य अनुभव का वर्णन करते हुए नामदेव कहते हैं। कि हे परमात्मा !
गुड्डी (पतंग) उडी और आकाश में समा गई। बोलने वाला डोरी में समा गया।
आवागमन का फेर मिट गया। यह गुडी कागज़ की नही है। उसने सहज आनंद की
प्राप्ति होती है। ३
हे विट्ठल ! भौंरे को कमलिनी प्राप्त नही होती अतः वह जनम जनम ठगा जाता
है। मेंढक कुमुदिनी के पास रहता है उसको उसका बुरा-भला कोई स्वाद नही मिलता।
पुष्प की सुगंध पर लुब्ध भ्रमर सो योजन का चक्कर काट कर आता है। पचासो
विषयो का त्याग करने पर भक्ति उत्पन्न होती है और फिर जन्म नही लेना पड़ता। ४
१. इडा पिंगला सुषमनि नारी। पवना भंषि रहाउँगा।
चंद सूर दोउ समि करि राखूँ। ब्रह्म ज्योति मिलि जाऊँगा।
—सत नामदेव की हिंदी पदावली, पद ६६।
२. जोगी जन ग्याइ जुगे जुगि जीवै।
आकाश बाँधि पाताल चलावै आप भरे भरि पीवै ॥ टेक ॥
भणत नामदेव सेवि निरंजन सहज समाधि लगाइ रै॥
—संत नामदेव की हिन्दी पदावली, पद ६७।
३. देवा आज गुडी सहज उडी, गगन माँहि समाई।
बोलनहारा डोरी समांना। नही आवै नही जाई।
कागद थैं रहित गुडी। सहज आनन्द होई॥
संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद ७७।
४. वीठला भैंवरा कँवल न पावै। ताथै जन्म जन्म डहरूावै ॥ टेक ॥
दादुर एक बसै पहवणितलि। स्वाद कुस्वाद न पावै।
पहप वास का लुब्धौ भौरा। सो जोजन फिरि आवै ॥ १ ॥
उपजी भगति पचीसूँ परिहरि। बहोरि जन्म नही आवै।
अखंड मंडल निराकार मैं। दास नामदेव गावै ॥
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद ७८।
नामदेव और निर्गुण काव्यधारा १४५
साक्षात्कार परमार्थ सोपान की अंतिम सीढ़ी है। साक्षात्कार होने के पहले
साधक बहुत बेचैन रहता है, व्याकुल रहता है। उसकी आँखो के सामने अँधेरा छा
जाता है। इसी को ईसाई साधको मे Dark night of the Soul कहा जाता है।
साक्षात्कार की परम उल्लासमयी घड़ी का वर्णन करते हुए नामदेव कहते हैं कि जहाँ
वह दिव्य कांति झिलमिल झिलमिल चमक रही है, जहाँ तूर ढोल, दमामे आदि बाजो
के बजने पर अनहद नाद सुनाई देता है, जहाँ कोटि सूर्यों की तेजोरशि प्रकाशित हो
रही है वहाँ दास नामदेव का मन निश्चल होता है।¹
यद्यपि चित्त की वृत्तियों का निरोध एक कठिन कार्य है फिर भी संतों के लिए
योग का आकर्षण सदैव बना रहा है। संत कबीर इड़ा-पिंगला के माध्यम से गगन
मंडल में घर बनाने की बात करते हैं।² धर्मदास ने हठयोगजनित शून्य महल में
झरनेवाले रस को अपनी साधना का एक अंग माना था।³
वास्तव मे योग मार्ग भी भक्ति मार्ग के ही आश्रित है। यदि भक्ति नही है तो
योग मार्ग वृथा ही है।⁴
यद्यपि संतों ने हठयोग और कुण्डलिनी योग की चर्चा की है किन्तु वह उनका
लक्ष्य नही है। ऐसा प्रतीत होता है कि हठयोग की क्रियाओ का संतो के आविर्भाव
काल में विशेष प्रभाव था। परंपरागत रूप में हठयोग की क्रियाएँ उत्तर भारत में
व्याप्त थीं। संतों में भी इनका निर्वाह मात्र हुआ है। हठयोग का यही रूप हमें संतो
१. झिलिमिलि झिलिमिलि नूरा रे । जहँ बाजे अनहद तूरा रे ॥ टेक ॥
ढोल दमामां बाजै रे । तहाँ शब्द अनाहद गाजै रे ॥ १ ॥
फिर राया जोति प्रकासी रे । जहाँ आपै आप अविनासी रे ॥ २ ॥
जहाँ सूरिज कोटि प्रकासा रे । तहाँ निश्चल नामदेव दासा रे ॥ ३३ ॥
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद १७० ।
२. अवधू गगन मंडल घर कीजै ।
अमृत झरै सदा सुख उपजै बंकनालि रस पीजै ॥
—कबीर ग्रंथावली, पृष्ठ ११० ।
३. झरि लागे महलिया गगन घहराय खन गरजै खन बिजुली चमकै ।
लहर उठै शोभा बरनि न जाय । सुन्न महल से अमृत बरसें ॥
—संत काव्य पृष्ठ २४६ ।
४. हिरदै कपट हरि सूं नाही साचौं ।
कहा भयौ जे अनहद नाचौ ।
—कबीर ग्रन्थावली, पृष्ठ १८२ ।
१०
१४६ नामदेव की हिन्दी कविता
की वाणियो में मिलता है।
उलटवासियाँ
'उलटवासी' की व्युत्पत्ति का ठीक पता नही चलता । इसकी रचना का प्रमुख
उद्देश्य किसी बात का किसी विपरीत वा असाधारण कथन के द्वारा वर्णन करना है ।
तदनुसार 'उलटवासी' शब्द को भी 'उलटा' तथा 'वास' जैसे दो शब्दो को जोडकर
बनाया गया, माना जा सकता है। इस दशा में इसका तात्पर्य उस रचना से होगा
जिसमे किसी न किसी अश में उलटी बातें मिलती हो ।
नामदेव की अधिकांश आध्यात्मिक उक्तियाँ उलटवासियो के रूप में अभिव्यक्त
हुई हैं। उलटवासियो की शैली के कारण उनकी शुष्क और नीरस दार्शनिक उक्तियो में
एक विचित्र चमत्कार का समावेश हो गया है। चमत्कार काव्य का प्राण माना जाता
है। नामदेव की उलटवासियो में व्यंजना के विविध रूप भी परिलक्षित होते हैं। प्राय
सभी उलटवासियो मे एक विशेषता पाई जाती है। उनमें विरोध भावना के साथ
प्रतीक शैली और रूपक शैली का सुन्दर समन्वय दिखाई देता है।
अपनी एक उलटवासी में कहते है—'कितने अचरज की बात है कि पतुरिया
बज रही है और मादल नामक वाद्य नाच रहा है। अग्नि जल में डूब गया। छोटी
ब्याई और उसने हाथी को जन्म दिया। यह देखकर मुझे अचभा हुआ। मदमत्त हाथी
को तुरत काबू मे लाया गया। पंछी बिना पख के उड़ा और कुमुदिनी की डाली पर
जा बैठा। कड़वी निबोरी मुझे मीठी लगती है। मक्खी अपनी आँखों में अंजन आजने
लगी। नामदेव कहते हैं कि गुरु कृपा से जो खोजता है वह पाता है।'१
१. देवा पातुर बाजै मादल नाचे । येवढा अचभा दीठा ।
पूछौ पड़िया पडिता । जल बैसंदर बूठा ॥ टेक ॥
छोटी ब्याई हस्ती जाया । येवढा अचभा पाया ।
ऊभी ऊभी नाथीला । मैमत घूमत आया ॥ १ ॥
पांइन पषि बिनाहो उड़िया । कैर ढाली बैठा ।
नीव सदाफल सुफल फलिया । सो मोहि लागे मीठा ॥ २ ॥
ससे खोग मधे पुरी । भेड तडका काना ।
माषी काजन सारन लागी । ऐसा ब्रह्म गियन्ता ॥ ३ ॥
गाई बियाई बछो जाई । गाई बछो कूं धावै ।
प्रणवत नामदेव गुरु परसादे । जो खोजे सो पावै ॥ ४ ॥
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद १०१ ।
नामदेव और निर्गुण काव्यधारा १४७
एक ऐसो आश्चर्यजनक घटना घटी कि जिसका वर्णन नही किया जा सकता ।
चोटी की आँखो में गजेन्द्र समा गया । कोई कहता है कि वह (परमात्मा) पास ही है
तो कोई कहता है कि दूर । पानी में रहने वाली मछली खजूर के पेड़ पर चढ सकती
है ? कोई कहता है कि वह इंद्रियों के अधीन है तो कोई कहता है कि यह मुक्त है ।
मूर्ख को वह सहज समाधि द्वारा प्राप्त नही हो सकता । कोई वेद पुराणा का स्मरण
करने के लिए कहता है । सद्गुरु ने निर्वाण पद का वर्णन किया । नामदेव कहते है कि
जिस परम तत्त्व की रूपरेखा नहीं है उसका वर्णन मै कैसे कर सकता हूँ ?'१
'पंडितो इस पद का अर्थ बताओ । मै जब सात वर्ष का था तब मेरी माता पाँच
वर्ष की थी । अगम्य तथा अलक्ष्य का विचार कर देखो । खरगोश ने कुत्ते को छिराया ।
जल की मछली आकाश पर चढ़ गई । गाय बाघ का पीछा कर रही है । बूंद मे
समुद्र नाचता है और बूंद समुद्र में समा गई । नामदेव का एकमात्र सहारा तू ही है ।
तू अलक्ष्य है । मुझे देखा नही जा सकता ।'२
'आहिस्ता आहिस्ता भोजन कैमे किया जाय, यह कहा नही जा सकता । हम
खायें और निर्मल होवें । पहले मै अपनी माता को ही खा गया । तत्पश्चात् सगे जामात
को खा गया । सूर्य को निगल गया तब चंद्र को उगल दिया । फिर मैं श्वशुर को खा
जाऊँगा । तत्पश्चात् पंच लोक निगल जाऊँगा । नामदेव कहते हैं कि यह सिद्धो का
योग है ।'३
१. अदबुद अचंभा कथ्या न जाई । चोटी के नेत्र कैसे गजिंद्र समाई ।
कोई बोले नेरे कोई बोले दूरि । जल की मछली कैसे चढ़ै पजूरि ॥ १ ॥
कोई बोले इंद्री बाध्या कोई बोले मुक्ता । सहजि समाधिन चीन्हे मुगधा । २ ।
कोई बोले वेद सुमृत पुराना । सतगुरु कथीया पद निरवाना ॥ ३ ॥
कहै नामदेव परम तत है ऐसा है । जाके रूष न रेख वरण कहो कैसा ॥४॥
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद ७६ ।
२. पांडे एह अरथि लगाई ।
सात वरस को मांहि हो । तब पाँच वरस की माई ॥ टेक ॥
अगम अलेप विचारि देषौ । ससु स्वान छिपाई ।
मीन जलको गगन चढीयी । बाघ पेदे गाई ॥ १ ॥
समंद भीतरि बूँद जावै । बूँद समंद समाई ।
नामदेव के एक सोई । अलप लख्यो न जाई ॥ २ ॥
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद १०४ ।
३. धोरे धीरे पाइबो कचन न जेवो । आपन पैबो तब नूमल ह्वै बो ॥
पहली पेह्रौं आई माई । पीछे पेह्रौं सगा जंवाई । १ ॥
!
Line 30:
"सटबयो आछे सांगीला। ताद्यै मोक्ष न मुक्ती ॥ ४ ॥"
Wait, let's look at each word in line 30:
Word 1: 'सटबयो' or 'सटवयो'? स + ट + ब/व + य + ो. It looks like 'सटबयो' or 'सटवयो'.
Word 2: 'आछे' (आ + छ + े).
Word 3: 'सांगीला' (स + ा + ं + ग + ी + ल + ा) or 'सांगिला'? There is a matra 'ी' on 'ग': 'सांगीला'।
Word 4: 'ताद्यै' or 'ताथै' or 'ताद्यै'?
Look at the prose: "उसको मोक्ष अथवा मुक्ति नहीं।"
"ताथै" or "ताद्यै"?
Look at line 32: "ताथै जनमि जनमि भटकाये".
In line 30, the word is: त + ा + ध + ् + य + ै ? Or त + ा + थ + ै ?
Wait, look at line 30, fourth word:
It has: त, ा, then a letter with a tail/loop like 'द्य' or 'थ'? In line 32, "ताथै": त, ा, थ, ै.
In line 30, it