सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)
Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra
सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें११२ नामदेव की हिन्दी कविता
सहस्र मणियों में एक सूत्र की भाँति सब में ओत-प्रोत है।१ जिस प्रकार तरंग, फेन
और बुदबुद जल से भिन्न नहीं हैं उसी प्रकार संसार के नाना रूप भी उस एक ही के
रूप हैं जो सब में समाया हुआ है। यह संसार परमात्मा की लीला है। विचार करने
पर भी वह भिन्न सिद्ध नहीं होता। वस्तुतः सब कुछ गोविन्द-मय है। केवल वह एक
मुरारी घट-घट वासी है।२
सर्वत्र राम ही राम है। घट-घट में वही बोल रहा है। स्थावर, जंगम, कीट,
पतंग सब में वही समाया हुआ है। एक ही मिट्टी से हाथी, चींटी तथा नाना प्रकार की
वस्तुएँ बनती हैं। निष्काम की अथवा अनासक्त की दशा उपलब्ध होने पर साम्य भाव
आ जाता है और स्वामी-सेवक भाव जाता रहता है।३
नामदेव का गोविंद (विट्ठल) निराकार एवं सर्वव्यापी है। ब्रह्म ज्ञानी ही इस
बात को समझ सकता है। नामदेव के अनुसार हिन्दू अन्धा है और मुसलमान काना है
(दोनों में यथार्थ को देखने की क्षमता नहीं रह गई है)—इन दोनों में ज्ञानी चतुर है।
हिन्दू मन्दिर में भगवान् को पूजा करता है और तुर्क मसजिद में। नामदेव कहते हैं—
मैं तो ऐसे भगवान् की आराधना करता हूँ जो न मन्दिर में है न मसजिद में।४
१. मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणि-गणा इव। गीता ७, ७।
२. एक अनेक बिआपक पूरक जत देखउ तत सोई।
माइआ चित्र विचित्र बिमोहित, बिरला बूझै कोई॥१॥
सभु गोबिंदु है सभु गोबिंदु है गोबिंदु बिनु नहि कोई।
सूतु एकु मणि सत सहस्र जैमे ओति पोति प्रभु सोई॥२॥
जल तरंग अरु फेन बुदबुदा जलतें भिन्न न होई।
इहु परपंचु पारब्रह्म की लीला, विचरत आन न होई॥३॥
—सन्त नामदेव की हिन्दी पदावली, पद १५०।
३. सभै घट रामु बोले रामा बोलै। राम बिना को बोले रे॥१॥
एकल माटी कुंजर चीटी भाजन हे बहु नाना रे।
असथावर जंगम कीट पतंगम घटि-घटि रामु समाना रे॥२॥
एकल चिंता राखु अनंता अउर तजहु सभ आसा रे।
प्रणवै नामा भए निहकामा को ठाकुर को दासा रे॥३॥
—पंजाबातील नामदेव, पृ० १२१।
४. हिन्दू अन्धा तुरकू काणा दोहाते गियानी सिआणा।
हिन्दू पूजे देहुरा मुसलमाणु मसीत॥
नामे सोई सेविआ जह देहुरा न मसीत॥
—सन्त नामदेव की हिन्दी पदावली, पृ० २०८।