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सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra

सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished332 पृष्ठ

पृष्ठ 113, कुल 332 में से

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पृष्ठ 113

नामदेव और निर्गुण काव्यधारा ११०
निमिष मात्र में नर किस प्रकार नारायण हो जाता है यह बात मुझे सद्गुरु ने
बताई ।१
जिन पर सद्गुरु का अनुग्रह हुआ वे सब भव सागर पार हुए ।२
साधना का मार्ग रहस्यमय है । जब तक कोई ऐसा गुरु नहीं मिल जाता जो
साधना में सफलता प्राप्त कर चुका है तब तक कोई भी साधक अपनी साधना को
मर्यादित नहीं कर सकता । इसके अतिरिक्त गुरु के महत्त्व का एक कारण और भी
है । गुरु की आध्यात्मिक शक्ति शिष्य के लिए प्रबल प्रेरणा का कार्य करती है ।
कबीर ने गुरु के महत्त्व का वर्णन मुक्त कण्ठ से किया है । वे कहते हैं कि वे
लोग अंधे है जो गुरु के विषय में कुछ और कहा करते हैं । यदि परमेश्वर रुष्ट हो
जाय तो गुरु हमें बचा सकता है किंतु यदि स्वयं गुरु ही रुष्ट हो जाय तो फिर अपनी
रक्षा की कोई आशा नहीं रह जाती ।३
कबीर के लिए तो गुरु तथा गोविन्द दोनों में कोई भेद नहीं है । गुरु तो
गोविन्द का दूसरा रूप ही है । वे कहते हैं कि गुरु और गोविन्द दोनों मेरे समक्ष खडे
है मैं किसके चरण पकडूं ? मै तो अपने गुरु की ही बलिहारी जाऊँगा जिन्होंने मुझे
गोविन्द के दर्शन कराये ।४
गुरु को परमेश्वर-स्वरूप कहा जाता है । कबीर साहब ने कहा है कि गुरु और
गोविन्द में कोई अन्तर नहीं, केवल आकार मात्र से ही भिन्नता लक्षित होती है । अपने
अहं भाव का त्याग कर के जीते जी मर जाओ तभी तुम्हे वह परमेश्वर प्राप्त होगा ।५
१. नर ते सुर होई जात निमख में सतिगुर बुधि सिखलाई ॥
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद २०५ ।
२. जिह गुरु मिले तिह पारि उतारे ।
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद २१५ ।
३. कबीर ते नर अंध है गुरु को कहते और ।
हरि रूठे गुरु ठोर है गुरु रूठे नहिं ठौर ॥
—कबीर वचनावली, पृष्ठ ३१ ।
४. गुरु गोविंद दोऊ खड़े काके लागों पांव ।
बलिहारी गुरु आपने गोविन्द दियो बताय ॥
—कबीर वचनावली, पृष्ठ ३० ।
५. गुरु गोविन्द तो एक है दूजा यहु आकार ।
आपा मेटि जोवित मरे, ता पावै करतार ॥
—कबीर ग्रन्थावली, पृष्ठ ३ ।