सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)
Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra
सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा
पृष्ठ 111, कुल 332 में से
संदर्भ में पढ़ेंनामदेव और निर्गुण काव्यधारा ११५
उसे तत, परम तत, परम पद, अभै पद, सहज, अं त, सीव, ब्रह्म आदि कई नाम
दिये हैं।१
कबीर के अनुसार ब्रह्म देश, काल और अवस्था से परे अर्थात् सकल अतीत
है। उसे व्यक्त करने के लिए उन्होंने अनेक प्रकार की चेष्टाएँ कीं किन्तु फिर भी
उन्हें उसमें सफलता नहीं मिली।२
(२) गुरु महिमा—हृदय को शुद्ध रखने के लिए कुछ कार्य विधेय हैं और कुछ
वर्ज्य हैं। संत काव्य में बार-बार हृदय की पवित्रता के लिए विधि निषेध के अंतर्गत
गुण-ग्रहण और दोष परिहार पर उपदेश दिये गये हैं। विधि निषेध का वास्तविक ज्ञान
तब तक नहीं होता जब तक कि गुरु का मार्गदर्शन प्राप्त न हो। निर्गुण संप्रदाय में
गुरु का स्थान सर्वोपरि है। नवीन साधकों के लिए तो गुरु परमेश्वर से भी बड़ा हुआ
करता है क्योंकि गुरु कृपा द्वारा ही शिष्य भगवत्कृपा की ओर उन्मुख होना सीख
पाता है।
जिस प्रकार संपूर्ण संत साहित्य में गुरु को सर्वश्रेष्ठ माना गया है उसी प्रकार
नामदेव ने भी गुरु का स्थान सर्वोपरि माना है। सत्य का अन्वेषण और ज्ञान की
प्राप्ति, बिना गुरु-कृपा के संभव नहीं है। नामदेव के लिए गुरु का शब्द बैकुंठ को सीढ़ी
के समान है।३ वे अपने मन को चेतावनी देते हुए दुःख का कारण भी स्पष्ट कर देते
हैं—तूने अनेक बार पशु होकर मानव देह धारण किया। चौरासी लाख योनी में भ्रमण
करता रहा परन्तु कही भी तुझे शांति नही मिली। सत् गुरु की शरण में जाकर तूने
राम नाम का उच्चार नही किया।४
१. कबीर साहित्य की परख—परशुराम चतुर्वेदी, पृष्ठ ६१।
२. अलख निरंजन लखै न कोई। निरभै निराकार है सोई॥
सुंनि अस्थूल रूप नहीं रेखा, दिस्टि अद्रिस्टि छिप्यो नहीं पेखा॥
वरन अवरन कथ्यौ नहि जाई, सकल अतीत घट रह्यो समाई॥
आदि अंत ताहि नहीं मधे। कथ्यौ न जाई आहि अकथे।
अपरंपार उपजै नहीं बिनसै। जुगति न जानिये कहिये कैसे॥
—कबीर ग्रंथावली, पृष्ठ २३०।
३. गुरू को शब्द बैकुंठ निसरनी। —संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद २६।
४. अनेक बार पसु ह्वै अवतर्यो।
लष चोरासी भरमत फिरयो ॥ १ ॥
पायो नही कही विश्राम।
सत् गुरु सरनि कह्यो नही राम ॥ २ ॥
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद १२४।