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सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra

सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished332 पृष्ठ

८८ नामदेव की हिन्दी कविता
इस घटना ने नामदेव के जीवन में महान् परिवर्तन उपस्थित किया। उनको
दिव्य दृष्टि प्राप्त हुई। वे अब कहने लगे—'पाषाण की मूर्ति अपने भक्तों के साथ
वार्तालाप करती है, ऐसा कहने वाले तथा सुनने वाले दोनों मूर्ख हैं।' १
गुरु कृपा से नामदेव निर्गुणोपासक हो गये। जो नामदेव विठ्ठल की मूर्ति के
सामने नाचते गाते थकते न थे वे अब कहने लगे—'मे मंदिर की मूर्ति को फूल न
चढ़ाऊँगा क्योकि मंदिर में देवता नही है। परमात्मा की शरण में जाने से आवागौन के
फेर से मेरी मुक्ति हुई।' २
'मैं पत्तो तोड़कर मंदिर की मूर्ति की पूजा न करूँगा। वह पत्ते-पत्ते में है। वह
सर्वव्यापी है।' ३
इस अंतःसाक्ष्य के आधार पर प्रमाणित होता है कि नामदेव के दीक्षा-गुरु
विसोबा खेचर थे। इसमें संदेह नही।
कुछ विद्वान् संत ज्ञानेश्वर को नामदेव का गुरु मानते हैं क्योकि नामदेव ने उनका
नाम बड़ी श्रद्धा से लिया है परन्तु ज्ञानेश्वर उनके दीक्षा-गुरु नही थे। यह निश्चित है
कि ज्ञानेश्वर के सहवास के कारण नामदेव में बड़ा भारी परिवर्तन हुआ। स्वयं नामदेव
ने कहा है—'सत्संग से मुझमें आमूल परिवर्तन हुआ।' ४
नामदेव की समकालीन कवयित्री संत जनाबाई ने सोपानदेव को नामदेव का
गुरु का नाम बताया है। ५
सोपानदेव नामदेव के गुरु थे यह जनाबाई की श्रद्धा की वाणी है, उसमें तथ्य नही
है। नामदेव, ज्ञानेश्वर, निवृत्तिनाथ तथा सोपानदेव आदि को बड़े आदर की दृष्टि से
१. पाषाणचा देव बोलत भक्तांते सांगते ऐकते मूर्ख दोघे ॥
—पांच संत कवी, पृ० १४८।
२. पाती तोड़ि न पूजूं देवा। देवलि देव न होई॥
नामा कहै मैं हरि की सरना। मुनरपि जन्म न होई ॥१॥
सं० ना० हिं० प० पद ३५।
३. पाती तोड़ि न पाहन पूजौ। देवल देव न ध्याऊँगा।
पांति पांति परसोतम राता। ताकूँ मै न सताऊँगा ॥
सं० ना० हिं० प० पद ६६।
४. संत संगे माझी पालट झाली।
नामदेवाचा गाथा अभङ्ग ४५७, पृ० ३६६।
५. नामयाचा गुरु। तोहा सोपान सद्गुरु ॥
—श्री नामदेवाचा गाथा अ० २७५, पृ० ५६६

संत नामदेव : व्यक्तित्व और रचनाएँ ८६
देखते थे । इन तीनों भाइयो पर नामदेव की अपार श्रद्धा को देखकर ही संभवतः जना-
बाई ने सोपानदेव को नामदेव की गुरु कहा होगा ।
नामदेव की यात्राएँ
एक भक्त के नाते नामदेव की कीर्ति दूर तक फैली हुई थी । उनकी कीर्ति सुन-
कर आलंदी के संत ज्ञानेश्वर उनके पास गये और यात्रा पर चलने का उनसे अनुरोध
किया । नामदेव पंढरपुर नहो छोड़ना चाहते थे परन्तु संत ज्ञानेश्वर के सहवास का
लाभ उठाने के लिए वे उनके साथ जाने के लिए तैयार हुए । उन्होंने उनके साथ उत्तर
भारत के तीर्थ स्थानों की यात्रा की । यह उनकी पहली यात्रा थी । 'तीर्थावली' के
अभंगों में नामदेव ने अपनी इस यात्रा का बड़ा ही हृदयग्राही वर्णन किया है ।
श्री देवीसिंह चौहान १ के अनुसार नामदेव की यह प्रथम यात्रा शके १२१६ के
आसपास हुई हो । उन्होंने अपने 'ज्ञानोबाची काशी यात्रा शके १२१६' शीर्षक लेख में
बताया है कि काशी के दशाश्वमेध घाट पर ज्ञानेश्वर मठ है । उसमें काले पाषाण के
चबूतरे पर सात फुट की ऊँचाई का एक स्तंभ है जो ज्ञानेश्वर की काशी यात्रा की
स्मृति में खड़ा किया गया है । इस स्तंभ पर संवत् १३५१ और उसके चार पाँच इंच
नीचे 'ज्ञानोबा' ऐसे अक्षर कँधे हुए हैं । संवत् १३५१ के समानांतर शके १२१६ आता
है । ज्ञानेश्वर के साथ नामदेव जब काशी-यात्रा पर गये थे तब वे यही ठहरे थे ।
'तीर्थावली' के अभङ्ग नामदेव-कृत होने में डॉ० शं० दा० पेंडसे को
संदेह है ।२
यात्रा से लौटने पर संत ज्ञानेश्वर ने शके १२१८ (ई० स० १२९६) में आलंदी
में समाधि ले ली । अपने गुरु-तुल्य परम मित्र के वियोग का नामदेव को अपार दुःख
हुआ । उनका मन अब पढरपुर से उचट गया । वे अकेले ही पंढरपुर से निकले और
सीधे पंजाब पहुँचे । यह उनकी दूसरी यात्रा थी । यदि वे किसी प्रसिद्ध तीर्थस्थान में
रहते तो उनको आशंका थी कि तीर्थ-यात्रा के लिए आये हुए महाराष्ट्रीय संत जन
उनको घर चलने के लिए कहेगे । अतः उन्होंने उनको पूर्णतया अज्ञात घुमान जैसा दूरस्थ
स्थान पसंद किया । यही पर वे अपने जीवन के अंत तक रहे और यही रहते हुए
उन्होंने अपने हिन्दी पदों की रचना की ।
उत्तर के विद्वानों का विचार है कि यद्यपि नामदेव का वास्तव्य प्रमुख रूप से
पंजाब में हुआ फिर भी उन्होंने दूर-दूर की यात्राएँ की—
१. इतिहास आणि संस्कृति ( त्रैमासिक जनवरी १९६६ )
२. ज्ञानदेव आणि नामदेव : डॉ० शं० दा० पेंडसे पृ० ३३५

६० नामदेव की हिन्दी कविता
नामदेव भ्रमणशील व्यक्ति थे ।¹
'तुम्हारे दर्शन की उत्कंठा लगी हुई है चित्त एक स्थान पर रहता नही ।'²
नामदेव ने बद्रिकाश्रम की यात्रा भी की थी ।³
"At the age of fifty he (Namdev) became indifferent to the
world He travelled through the four quarters of India."⁴
"He left home and started on his second pilgrimage which
extended to the holy shrines in Northern India and ultimately
to the Punjab which was destined to be his resting place for
ever."⁵
नामदेव की समाधि
सर्व साधारण मनुष्य की तरह उम्र पूरी होने पर स्वाभाविक रीति से नामदेव
की मृत्यु हुई ऐसा किसी ने नही कहा । नामदेव-भक्तों का विश्वास है कि जिस प्रकार
संत ज्ञानेश्वर ने समाधि ली उसी प्रकार नामदेव भी समाधिस्थ हुए ।
पंजाब में नामदेव की समाधि के बारे में एक विचित्र कथा प्रचलित है—
नामदेव अपना भौतिक शरीर घुमान मे छोड़कर सुरत-स्वरूप पंढरपुर चले गये और
वहाँ समाधिस्थ हुए । घुमान के मंदिर में उनके शरीर पर चादर डाल दी गयी थी ।
उन्होंने अपने शिष्यों से कहा कि यह भेद किसी को ज्ञात न हो । तीन दिन के पश्चात्
शिष्यों ने देखा कि वे पहले ही काल-वश हो चुके हैं । उन्होंने उनकी अंत्य क्रिया की
और समाधि भी बनवाई ।⁶
तीन स्थानों पर नामदेव की समाधियाँ बताई जाती है । उनके बारे में विद्वानों
के मत इस प्रकार हैं—
घुमान की समाधि
'घुमान में नामदेव की समाधि का भव्य मंदिर है ।'⁷
१. परिचयी साहित्य : डॉ० त्रिलोकीनारायण दीक्षित पृ० ८६
२. भेटीची आवडी उत्कंठित चित्त । न राहे निवात एके ठायी ।
सकल संत गाथा, अभङ्ग १५३६
3. Selections from Hindi Literature p. 112
—by Lala Sitaram
4 Shri Swami Nemdev : by Bansidhar Shastri p. 124.
5. Shri Swami Namdev : by Bhagat Ram p. 14-16.
६. जनम साखी
७. श्री नामदेव चरित्र (पुनर्मुद्रण) प्रस्तावना रं० कृ० भाळुंकर पृ० १०१ ।

संत नामदेव : व्यक्तित्व और रचनाएँ ६१
'A Shrine is dedicated to his memory and is still in use at
Dhoman in Gurdaspur district.'¹
'His samadhi (tomb) was built in the same Mandir at Dhoman
by his disciples. The existing temple at Dhoman known as the
Mandir of Shri Swami Namdev is one of the most beautiful
Shrines in the punjab.'²
नरसी की समाधि
नरसी मराठवाड़ा के परभणी जिले में है। गाँव से दो फर्लाङ्ग की दूरी पर
कपाधू नदी के किनारे नामदेव की समाधि है। वहाँ एक छोटा-सा मंदिर भी है।
फाल्गुन वद्य ११ को वहाँ मेला लगता है। स्वयं श्री कोरटकर को अपनी जानकारी
के विश्वसनीय होने में संदेह है।³
पंढरपुर की समाधि
नामदेव के शिष्य परिसा भागवत के एक अभंग४ द्वारा सन् १३५० ई० में
पंढरपुर में ही नामदेव की समाधि लेने की बात पुष्ट होती है।
प्रिन्सिपल दांडेकर के अनुसार नामदेव की समाधि पंढरपुर में महाद्वार के पास
है। उन्होंने आषाढ वद्य १३ शके १२७२ को समाधि ली। नामदेव ने अपने एक अभंग
में अपने आपको सीढ़ी का पत्थर कहा है। इस सीढ़ी के पत्थर को संतों के चरणों का
स्पर्श होने से उनका उद्धार होगा।५ श्री दांडेकर का विचार है कि नामदेव ने सपरि-
वार समाधि ली। उनकी पुत्र वधू लाडाई गर्भवती होने के कारण मायके गई थी। वह
अकेली पीछे रह गई।६

  1. An outline of the Religious Literature of India : by J. N.
    Farquhar p. 299
  2. Shri Swami Namdev : by Bhagat Ram p. 11,
    ३. नामदेवाची नरसी—केशवराव कोरटकर —भ० इ० सं० मंडल त्रैमासिक पत्रिका
    शके १८४८ अंक १-४।
    ४. आषाढ शुक्ल एकादशी। नामा विनवी विठुलासी।
    आज्ञा व्हावी हो मजसी। समाधि विश्रांति जागी॥
    ५. नामा म्हणे आम्ही पायरीचे चिरे। संत पाय हिरे देनी वरी॥
    श्री नामदेवाचा गाथा, पृ० ३८१ अभङ्ग ५३३।
    ६. महाराष्ट्रीय संत : वाङ्मय व जीवन, शं० वा० दांडेकर।

९२ नामदेव की हिन्दी कविता
नामदेव के समाधि स्थानों के बारे में अपना मंतव्य देते हुए डॉ० भगीरथ मिश्र
कहते हैं—
'उक्त स्थानों और घटनाओं में से किसी एक को भी सत्य मानने के लिए
ऐतिहासिक प्रमाण नहीं है। पर यह बात ठीक लगती है कि उन्होंने समाधि घुमान में
ली होगी । इसके लिए पहली बात यह है कि महाराष्ट्र में संत नामदेव के अंतिम काल
का विवरण नहीं प्राप्त होता । दूसरी बात यह है कि जब नामदेव अपने जीवन के अंतिम
दिनों में लगभग बीस वर्ष तक घुमान में रहे तो समाधि लेने के लिए पंढरपुर में आये
हो यह बात संगत नहीं लगती। अधिक संभव है कि नामदेव ने घुमान में ही समाधि
ली हो । उनका कोई शिष्य अस्थि या फूल लेकर पंढरपुर आया होगा और नामदेव की
भक्ति के अनुसार विट्ठल मंदिर के महाद्वार पर रख दिया होगा। उस स्थान पर बाद में
समाधि बनाई गई ।'¹
ऐतिहासिक प्रमाणों के अभाव में डॉ० मिश्र का निष्कर्ष समीचीन जान
पड़ता है ।
नामदेव का व्यक्तित्व
किसी कवि अथवा लेखक का साहित्यिक व्यक्तित्व उसके लौकिक व्यक्तित्व के
जितना ही सत्य तथा महत्त्वपूर्ण होता है । नामदेव की मराठी तथा हिन्दी रचनाओं से
उनके इन दो व्यक्तित्वों का परिचय मिलता है । आत्मनिवेदनपरक शैली में लिखे उनके
अभंगों में उनके आचरण तथा व्यवहार का बड़ा ही मनोज्ञ चित्र अंकित हुआ है ।
नामदेव का बाह्य रूप
नामदेव की देहयष्टि, उनकी शक्ल-सूरत, उनकी पोशाक आदि के संबंध में
विशेष जानकारी उपलब्ध नहीं होती । परंपरा से प्राप्त होने वाले उनके चित्र में
उनको घुटनों तक धोती, माथे पर पगड़ी, एक हाथ में वीणा तथा दूसरे में करताल
लेकर विट्ठल के सामने कीर्तन करते हुए चित्रित किया गया है—
जनाबाई ने नामदेव के बाह्य रूप का वर्णन इस प्रकार किया है—
'रस्सी की करधनी और चीथड़ों की लंगोटी पहने नामदेव चंद्रभागा के रेतीले
मैदान पर कीर्तन करते हैं ।'²
१. संत नामदेव की हिंदी पदावली, पृ० ३६ ।
२. सुंभाचा करदोरा रखटाची लंगोटी ।
नामा वालवंटी । कथा करी ॥ १ ॥
—नामदेवाचा गाथा पृ० ५६७, अभङ्ग २८१।

संत नामदेव : व्यक्तित्व और रचनाएँ ६३
नामदेव का आंतरिक रूप
संत नामदेव एक सीधे-सादे, निष्कपट तथा परम भावुक भक्त थे। वे स्वभाव से
बहुत ही ऋजु थे। वे भ्रमणशील, बहुश्रुत तथा वाक्पटु थे।
(१) भावुकता : संत ज्ञानेश्वर ने स्थान-स्थान पर नामदेव के परम भावुक
होने का वर्णन किया है—
'तुम्हारा अंतःकरण भगवद्भक्ति में आर्द्र है।'१
'तुम पंढरीनाथ के प्रेम भाडारी अर्थात् खजांची हो।'२
'नामदेव तो साक्षात् प्रेम मूर्ति है।'३
नामदेव का मन अतीव संवेदनशील है। ज्ञानेश्वर के समाधिग्रहण के करुण
प्रसंग का वर्णन करते हुए उनका गला रुँध जाता है। वे कहते हैं—'चील आकाश में
उड़ गई और घोसले में आग लग जाने के कारण उसके बच्चे झुलस गये।'४
(२) ऋजुता : ऋजुता नामदेव की उल्लेखनीय विशेषता है। उनकी वृत्ति सरल,
निरागस तथा नम्र है। ज्ञानेश्वर को वे अपना परिचय इन शब्दों में देते हैं—'मैं दीन
तथा मूढ़ मति हूँ। मैं संतों के चरणों का दास हूँ।'५
ज्ञानेश्वर के साथ यात्रा पर जाने में अपनी विवशता बताते हुए वे कहते हैं—
'पंढरपुर के चौक का रंक होकर मैं महाद्वार की रक्षा करूँगा।'६
(३) ग्रंथाध्ययन : नामदेव ज्ञानेश्वर की भाँति व्युत्पन्न नहीं है। उन्होंने अध्यात्म
विषयक ग्रन्थों का विधिवत् अध्ययन भी नहीं किया था। उन्होंने सविनय कहा है—
――――――
१. प्रेमाचा जिव्हाला तुझ्या हृदयो आला।
—सकल संत गाथा, अभङ्ग ६२२।
२. पंढरीरायाचा तूं प्रेम भाडारी।
—सकल संत गाथा, अभङ्ग ६२५।
३. हरिदासामाजी होसी तूं आगला। प्रेमाचा पुतला नामदेव।
—सकल संत गाथा, अभङ्ग १२३६।
४. नामा म्हणे देवा घार गेली उठोन। बाले दानादान पडियेली
—सकल संत गाथा, अभङ्ग १०६७।
५. तरी मी एक दीन मूढ मतिहीन। चरणाचा रज रेणू संतांचिया।
—सकल संत गाथा, अभङ्ग ६३१।
६. रंक होऊनिया पंढरी चौहटा। राखेन दारवंटा महाद्वारी।
—सकल संत गाथा, अभङ्ग ६१५।

'मैं बहुश्रुत नही हूँ तथा ज्ञानशील भी नही हूँ।'१ फिर भी वे चिंतनशील थे।
(४) वाक् चातुर्य : निम्नलिखित प्रसंगो से उनका संभाषण कौशल्य प्रतीत
होता है—
(१) 'तीर्थावली' का ज्ञानेश्वर-नामदेव संवाद
(२) परसा-नामदेव संवाद
(३) नामदेव-गोणाई संवाद
अपनी शांत प्रवृत्ति तथा वाक् चातुर्य से नामदेव ने सर्वसाधारण के अंतःकरण
जीत लिए थे।
(५) भ्रमणशीलता :—नामदेव भ्रमणशील थे। 'नामदेव की यात्राएं' नामक
उप-शीर्षक के अन्तर्गत उनकी भ्रमणशीलता पर विचार किया गया है। नामदेव भागवत
धर्म के प्रभावशाली प्रचारक थे। उनमें एक प्रकार का (Missionary Spirit) था।
जीवन के उत्तरार्ध में उन्होंने पंजाब की यात्रा की।
हिन्दी रचनाओं के आधार पर नामदेव का व्यक्तित्व
हिन्दी रचनाओं के आधार पर नामदेव एक भावुक भक्त नही रहते। वे एक
विचारशील संत ज्ञात होते हैं। विसोबा खेचर से नगुण-निराकार का उपदेश पाकर
नामदेव में महान् परिवर्तन हुआ।
ब्रह्म की सर्व व्यापकता (सर्व खलु इदं ब्रह्म)
जो नामदेव पंढरपुर के विट्ठल और विट्ठल मंदिर को एक क्षण के लिए भी
छोड़ने को तैयार नही थे वे अब कहने लगे :—
'मंदिर मे देवता नही होता अतः मैं उसको फूल न चढ़ाऊँगा।'२
मै जिधर भी देखता हूँ उधर वही एक सर्वव्यापक और सर्वपूरक ईश्वर
दिखाई देता है। सारा विश्व गोविंद-मय है। तरंग, फेन और बुदबुदा जैसे जल से
भिन्न नही है वैसे ही यह प्रपंच (संसार) ब्रह्म की लीला है और उससे अभिन्न है।
नामदेव कहते हैं—रे मानव ! ईश्वर की सृष्टि को अपने हृदय में विचार कर देख।
१. नव्हे बहुश्रुत नव्हे ज्ञानशील।
—सकल संत गाथा, अभङ्ग ६२४।
२. पाति तोड़ि न पूजूं देवा। देवलि देव न होई।
नामा कहै मै हरि की सरना। पुनरपि जन्म न होई॥
—स० ना० हि० प० पद ६५।

संत नामदेव : व्यक्तित्व और रचनाएँ ६५
एक ही ईश्वर घट घट और चराचर में समान रूप से व्याप्त है ।"¹
"उस सनेही राम के मिलते ही पारस के स्पर्श के समान सब कुछ कंचन हो
जाता है । फिर तो 'ठाकुर' व 'जन' तथा 'जन' व 'ठाकुर' एक हो जाते हैं । स्वयं
देव स्वयं मन्दिर व स्वयं पूजन बनकर जल व तरंग की भाँति एक आकार धारण कर
लेते हैं और उनकी भिन्नता केवल नाम मात्र की रह जाती है ।"²
'प्रत्येक जीव में भगवान् है । भगवान् के बिना अन्य कौन उसे प्रेरित कर
सकता है ? हाथी और चींटी एक ही मिट्टी के बने हैं । जड़ चेतन सब में भगवान्
समाया हुआ है । मुझे केवल उसी की चिंता करनी चाहिए । जीवन के निष्काम होने
पर भक्त और भगवान् में कोई अन्तर नही रह जाता । दोनो अद्वैत हो जाते हैं ।'³
इनकी भावुकता इन पदों में इतनी मात्रा में बढ़ी हुई दीख पड़ती है कि ये
अपने एक ही उद्गार को स्पष्ट करते समय अनेक उदाहरण देते भी नहीं अघाते ।
उदार व्यक्तित्व
प्रायः देखा जाता है कि भिन्न-भिन्न धार्मिक संप्रदायों में धार्मिक विचारों तथा
१. सभु गोविंदु है सभु गोविंदु है, गोविंद बिनु नहि कोई ।
जल तरंग अरु फेन बुदबुदा जलतें भिन्न न कोई ॥
इहु परपंचु पारब्रह्म की लीला विचरत आन न होई ।
कहत नामदेउ हरि की रचना देखहु रिदै बिचारी ।
घट घट अंतरि सरब निरंतरि केवल एक मुरारी ॥
— सं० ना० हि० प० पद १५० ।
२. बदहु किन होड माधऊ मोसिऊ
ठाकुरु ते जनु जन ते ठाकुरु खेलु परिउ है तोसिऊ ॥
आपन देउ देहुरा आपन आप लगावै पूजा
आपहि गावै आपहि नाचै आप बजावै तूरा
कहत नामदेऊ तू मेरे ठाकुर जनु ऊरा तू पूरा ॥
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद १६१ ।
३. सभे घट रामु बोले रामा बोले ।
एकल माटो कुंजर चींटी भाजन हैं बहु नाना रे ।
असथावर जंगम कीट पतंगम घटि घटि रामु समाना रे ॥१॥
एकल चिंता राखु अनंता अउर तजहु सभ आसा रे ।
प्रणवै नामा भए निहकामा को ठाकुर को दासा रे ॥२॥

६६ नामदेव की हिन्दी कविता
सिद्धांतो के विषय में उदारता कम होती है। नामदेव इस नियम के अपवाद थे।
उन्होंने जब देख लिया कि सगुण-भक्ति बहुत उपयोगी नही है तो उन्होंने उसका त्याग
किया और निर्गुणोपासना में लगे।
'गंतव्य स्थान पर पहुँचने पर उन्होंने सीढ़ी का त्याग किया।'१
इस प्रकार के परिवर्तन से पता चलता है कि वे दुराग्रही अथवा पूर्वाग्रही नहीं
थे बल्कि एक विचारशील भक्त थे। प्रामाणिक और तर्कसंगत बात को स्वीकार करने
में उनको कोई हिचक नहीं थी। वे कट्टर नहीं बल्कि उदार मना थे। उनको जहाँ से
जो अच्छी चीजें मिलीं उनको उन्होंने ग्रहण किया। कबीर के शब्दों में—
साधू ऐसा चाहिये जैसा सूप सुभाय ।
सार-सार को गहि रहे, थोथा देइ उड़ाय ॥
वे सच्चे साधु थे उन्होंने सार को ग्रहण किया और थोथे को उड़ा दिया।
संत परम्परा में नामदेव का कार्य महान् है। संत मत की स्थापना उनके द्वारा
हुई। उनके द्वारा लगाई इस बेलि को कबीर ने सींचा, विकसित और पुष्ट किया। संत
पीपा ने निर्गुण पंथ तथा संत मत के सम्बन्ध में नामदेव और कबीर दोनों का महत्त्व
समझा। वे कहते हैं—
जे कलि नाम कबीर न होते ।
तो लोक, वेद अरु कलि जुग मिलि करि भगति रसातल देते ॥
हमसे पतित कहाँ क्या कहते कौन प्रतीति मन धरते ।
नाना वरन देखि सुनि सबनी बहुमारग अनुसरते ॥
सगुणी भगति रहित भगवंता बिरला कोई पावै ।
सोइ कृपा करि देहु कृपानिधि नाम कबीरा गावै ॥
अपनी भगति काज हरि आपै, निज जन आप पठाया ।
नाम कबीरा साँच प्रकास्या, तहाँ पीपै कछु पाया ॥
पीपा का उपर्युक्त कथन सचमुच बड़े महत्त्व का है। नामदेव और कबीर ही ऐसे
भक्त हुए जिन्होंने सत्य को प्रकाशित किया। निर्गुण भक्ति के लिए नामदेव और कबीर
का ही नाम लिया जाता है। चूँकि नामदेव कबीर के पूर्व हुए थे इसलिए उनका महत्त्व
कबीर से भी अधिक है।
१. पाया महल तब तजो निसरनी ॥
—सं० ना० हिं० प०, पद ५६।

संत नामदेव : व्यक्तित्व और रचनाएँ ६७
रचनाएँ
कहा जाता है कि नामदेव ने शत कोटि अभंग बनाने की प्रतिज्ञा की थी।१
इससे लगता है कि इनकी रचनाएँ बहुत अधिक होगी। इनके 'शत कोटि' का अर्थ प्रचुर
मात्रा मे लेना ही समीचीन है। आज नामदेव के अभंगो के पाँच छपे हुए गाथा उपलब्ध
है जिनमें लगभग ढाई हजार अभंग इनके नाम पर मिलते है परन्तु नामदेव के नाम से
प्रचलित सभी अभंग नामदेव के नही है। छपे हुए गाथाओ में ऐसे भी पद पाये जाते है
• जिनमे कबीर और कमाल का उल्लेख है जो नामदेव के बाद के है। जैसे 'कबीरा धूम
मचाई' आदि।
इन पाँच गाथाओ में जो ढाई हजार के लगभग अभंग मिलते हैं उनमें से छः
सात सौ अभङ्ग ही मूलतः नामदेव के होगे, शेष सभी प्रक्षिप्त हे। डॉ० तुलपुले के अनु-
सार नामदेव की गाथा मे विष्णुदास नामा के अभङ्गो की प्रचुर मात्रा में जो खिचड़ी
हुई है उसमें से नामदेव के अभङ्ग अलग करने की कोई अचूक तरकीब नही है।२ डॉ०
भगीरथ मिश्र भी डॉ० तुलपुले के मत का समर्थन करते है।३
मराठी गाथा की प्रतियाँ
(१) नामदेवाची आणि त्यांच्या कुटुम्बातील व समकालीन साधूंच्या अभंगांची
गाथा : इसके संकलन-कर्ता हैं श्री तुकाराम तात्या पडत। यह गाथा 'तत्त्व विवेचक प्रेस'
बम्बई से सन् १८६० ई० में प्रकाशित हुई। जैसा कि शीर्षक से ही विदित होता है
इसमें नामदेव, उनके परिवार और तत्कालीन अन्य संतों के मराठी अभङ्ग हैं। इसके
पृ० ६४५ से ६७७ तक 'हिन्दुस्तानी भाषेत अभङ्ग' शीर्षक के अन्तर्गत नामदेव के १०६
हिन्दी पद (पद सख्या २३४५ से २४५० तक) है।
(२) 'नामदेवाची गाथा' (आवृत्ति दूसरी) रा० श्री० गोधलेकर जगद्धितेच्छु
छापाखाना, पुणे सन् १८६६.
(३) 'श्री नामदेवाचा गाथा'। इसके संकलन कर्ता ह० भ० प० विष्णु नरसिंह
जोग है। यह गाथा शक १८४७ में पूना के चित्रशाला प्रेस से प्रकाशित हुई। नामदेव
के नाम से प्राप्त होने वाले सभी मराठी पदों का यह अच्छा सग्रह है। इसके चौथे भाग
१. शत कोटी तुझे करीन अभङ्ग। म्हणे पांडुरंग ऐक नाम्या॥
श्री नामदेवाचा गाथा, पृ० ३१७, अभङ्ग १६२।
२. पाँच संत कवी : डॉ० शं० गो० तुलपुले, पृ० १३८-१३६।
३. संत नामदेव की हिंदी पदावली
—डॉ० भगीरथ मिश्र, पृ० ४०।
७

६८ नामदेव की हिन्दी कविता
में पृ० ४१५ से ४७३ तक 'हिंदुस्तानी पदें' शीर्षक के अन्तर्गत १०२ पद हिन्दी के हैं।
(४) 'श्री नामदेव महाराज यांच्या अभंगाची गाथा' (जनाबाई, नारा, गोंदा,
विठा, परिसा भागवत, गोणाई, राजाई, लाडाई, बाळुबाई तथा निंबाई के अभंगों के
साथ) इसका सम्पादन श्री त्र्यंबक हरी आवटे ने किया है और शक १८३० में यह गाथा
इंदिरा प्रकाशन पूना से प्रकाशित हुई है। इस गाथा में नामदेव के मराठी अभंगों के
अतिरिक्त उनके परिवार तथा समकालीन कुछ अन्य संतों के अभंग भी दिये हैं। गाथा
के आठवें भाग में पृ० ६७८ से ७०० तक (पद संख्या २३२५ से २४२६ तक)
'हिंदुस्तानी पदें' शीर्षक में १०२ हिन्दी पद हैं। रागों के नाम इसमें नहीं हैं।
(५) 'श्री नामदेवरायांची सार्थ गाथा'
इसके संकलन कर्ता, टिप्पणीकार और प्रकाशक हैं श्री प्रल्हाद सीताराम सुबन्ध।
इस गाथा में मूल अभंगों के साथ मराठी अर्थ भी है। अब तक इसके छह भाग प्रकाशित
हो चुके हैं। गाथा के पाँचवें भाग में नामदेव के ६१ हिन्दी पद हैं। ये सभी पद 'श्री
गुरु ग्रंथ साहब' के ही हैं।
नामदेव के मराठी अभंगों का वर्गीकरण इस प्रकार किया जा सकता है—
(१) बाल क्रीड़ा (२) श्री कृष्ण लीला
(३) पंढरी महात्म्य (४) नाम महात्म्य
(५) संत महिमा (६) कलि काल के प्रभाव का वर्णन
(७) निवृत्तिनाथ, सोपानदेव, ज्ञानदेव तथा मुक्ताबाई आदि के समाधि लेने के
प्रसंग के अभंग।
हिंदी की रचनाएँ
अपने जीवन के उत्तरार्ध में उत्तर भारत की यात्रा करते हुए नामदेव ने हिन्दी
में कुछ पदों की रचना की। वास्तविक बात यह है कि संत नामदेव की रचनाओं का
अभी तक हिन्दी संसार को पता ही नहीं था। ग्रन्थ साहब के ६१ पद ही अभी तक
नामदेव की सम्पूर्ण हिन्दी रचना समझी जाती थी। आचार्य विनयमोहन शर्मा ने अपनी
पुस्तक 'हिन्दी को मराठी संतों की देन' में ११ और पद दिये हैं जो ग्रन्थ साहब से भिन्न
हैं। इसके अतिरिक्त संत नामदेव की गाथा में १०३ हिन्दुस्तानी पद हैं जिनमें कुछ ग्रंथ
साहब के हैं और कुछ और दूसरे। किन्तु नामदेव की हिन्दी रचनाएँ इतनी ही नहीं हैं।
इस संदर्भ में डॉ० राजनारायण मौर्य का मत दृष्टव्य है—"मुझे विभिन्न प्रका-
शित और हस्तलिखित प्रतियों से कुल ३०० पद नामदेव के प्राप्त हुए हैं। हस्तलिखित
प्रतियाँ काशी नागरी प्रचारिणी सभा, वाराणसी, सेंट्रल पब्लिक लायब्रेरी पटियाला,
बाबा नामदेवजी का गुरुद्वारा घुमान (गुरदासपुर) पंढरपुर, पूना विश्वविद्यालय आदि

संत नामदेव : व्यक्तित्व और रचनाएँ ६६
स्थानों से प्राप्त हुई है। कुछ प्रतियाँ जयपुर में भी है। रज्जब की 'सवंगी' में भी
नामदेव के ५० से ऊपर पद संग्रहीत है। और भी सन्त वाणियो के अनेक संग्रहों में
नामदेव के पद है ।' १
विभिन्न हस्तलिखित प्रतियो में कुल २३४ के लगभग हिन्दी के पद नामदेव के
नाम पर मिलते हैं जो पूना विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित 'संत नामदेव की हिन्दी पदा-
वली' नामक संकलन में संग्रहीत किये गये है। इस पदावली के सम्पादक है डॉ० भगीरथ
मिश्र तथा डॉ० राजनारायण मौर्य। इनमें से एक दो पद गोरखनाथ के नाम पर प्रसिद्ध है
एक दो कबीर के नाम पर और एक दो अन्य संतो के नाम पर । इन पदो में से लगभग
१७०-१७५ पद अवश्य ही नामदेव के है क्योकि उन पर स्पष्ट रूप से मराठी की
छाप है।
देखना यह है कि इन रचनाओं में प्रामाणिकता कहाँ तक है। नामदेव के सौ
वर्ष बाद के कबीर की रचना और पाठ निर्णय का अभी पहला प्रयास डॉ० पारसनाथ
तिवारी (प्रयाग) द्वारा हो पाया है तब नामदेव की प्राप्त रचनाओ की प्रामाणिकता का
निर्णय और भी कठिन माना जा सकता है।
'गुरु ग्रन्थ साहब' का संकलन सन् १६०४ में हुआ। नामदेव का रचना सम्बन्धी
यही सबसे प्राचीन ग्रन्थ अब तक माना गया है। पाठ की दृष्टि से गुरु ग्रन्थ साहब का पाठ
सबसे भ्रष्ट है। इसके कुछ पद तो अभी तक कही भी प्राप्त नही हुए है। जैसे अन्य संत
कवियों के नाम पर बहुत-सी रचनाएँ प्रसिद्ध हो गई हैं वैसे नामदेव के नाम पर भी है,
इसमें कोई सन्देह नही। पर पाठशास्त्र के आधार पर लगभग १५० पद निश्चित ही
नामदेव के है। ५० पद ऐसे है जो दूसरो के है, ५० ऐसे हैं जो आधे मराठी के और
आधे हिन्दी के है या सम्पूर्ण मराठी के भ्रष्ट रूप में है और शेष ५० अभी तक संदिग्ध
है। उनमें से कुछ गोरखनाथ, कबीर आदि के नाम से भी प्रसिद्ध हैं।
प्राप्त सामग्री के स्रोत
सिक्खो के धर्म ग्रन्थ 'श्री गुरु ग्रन्थ साहब' मे नामदेव के पद मिलते है। इसके
दो संस्करण देखने में आते हैं। 'श्री गुरु ग्रन्थ साहब' का सकलन ई० स० १६०४
(संवत् १६६१) के लगभग सिक्खो के पाँचवें गुरु अर्जुनदेव ने किया। कहा जाता है कि
यह मूल प्रति करतारपुर मे अब भी सुरक्षित है।
१. संत मत के आदि प्रवर्तक : संत नामदेव, पृ० ११६ ।
'हिन्दुस्तानी' (जनवरी-मार्च १९६२)

१०० नामदेव की हिन्दी कविता
(१) 'श्री गुरु ग्रन्थ साहब' (गुरुमुखी लिपि में) यह प्रति गुरुद्वारा प्रबन्धक
कमेटी अमृतसर द्वारा प्रकाशित हुई है। इसमें नामदेव के कुल ६१ पद है। इसमें आये
हुए पदो का पाठ अन्य प्राप्त हस्तलिखित प्रतियो से बहुत ही भिन्न है।
(२) 'श्री गुरु ग्रन्थ साहब' (नागरी लिपि में) यह प्रति सर्व हिन्द सिक्ख मिशन
अमृतसर द्वारा प्रकाशित हुई। यह गुरुमुखी सस्करण का नागरीकरण मात्र है। इसमें
भी नामदेव के ६१ पद हैं।
(३) (Sikh Religion) मेक्स आर्थर मेकालिफ़ द्वारा लिखित इस ग्रन्थ में
सम्पूर्ण ग्रन्थ साहब का अंग्रेजी अनुवाद है। इसके छठे भाग मे 'गुरु ग्रन्थ साहब' के ६१
पदो का भी अनुवाद है। यद्यपि मूल पद नही दिये गये है पर अनुवाद से पदा का परि-
चय मिल जाता है।
(४) 'पजाबातील नामदेव' डाक्टर पुरुषोत्तम जोशी।
श्री जोशी ने इस पुस्तक में 'श्री गुरु ग्रन्थ साहब' के ६१ पदो का मूल सहित
मराठी में अनुवाद दिया है। पदो का क्रम और पाठ 'श्री गुरु ग्रन्थ साहब' जैसा ही है।
(५) 'हिंदी को मराठी संतो की देन' आचार्य विनयमोहन शर्मा।
इस शोध प्रबन्ध में हिन्दी मे रचना करने वाले सभी मराठी संतो की रचनाओं के साथ
नामदेव के ६६ पदों का संग्रह है। इनमें से ६१ पद तो 'गुरु ग्रन्थ साहब' के ही है
तथा ८ और है।
(६) 'शिखांच्या आदि ग्रन्थांतील नामदेव'
लेखक अ० का० प्रियोलकर
इस पुस्तिका में 'श्री गुरु ग्रन्थ साहब' के ६१ पदों का मूल सहित श्री मेकालिफ
द्वारा किया हुआ अंग्रेजी अनुवाद तथा उनका मराठी भाषांतर दिया गया है।
इनके अतिरिक्त श्री वियोगी हरि द्वारा संकलित 'सत सुधा सार' में वेलवेडियर
प्रेस द्वारा प्रकाशित 'सत बानी सग्रह' भाग २ में तथा आचार्य परशुराम चतुर्वेदी द्वारा
सगृहीत 'सत काव्य सग्रह' में भी नामदेव के पद मिलते है।
इन पदों के अतिरिक्त 'श्री गुरु ग्रन्थ साहब' में नामदेव के नाम से निम्नलिखित
तीन साखियाँ मिलती है—
(१) नामा माइआ, कहे त्रिलोचन मीत।
काहे छोपहु छाइलह, राम न लावहु चीत ॥ २१२ ॥
(२) नामा कहे त्रिलोचना मुख ते रामु सम्हालि ।
हाथ पाउ करि कामु सभु चीतु निरंजन नालि ॥ २१३ ॥
(३) ढूँढत डोलई अंध गति अरु चोन्दत नाही सूझ ।
कहो नामा कयो पाइअह बिनु भगतहु भगवंत ॥ २१४ ॥

नामदेव : व्यक्तित्व और रचनाएँ १०१
अन्य सूत्रों से सामग्री प्राप्त होने के संकेत
'संत नामदेव की हिन्दी पदावली' के आशीर्वाद में म० म० दत्त वामन पोतदार
ने कहा है कि 'चालीस वर्ष पूर्व मुझे स्वयं राजवाड़ेजी ने एक हस्तलिखित बाड (ग्रन्थो
का संग्रह) दिया था उसमें नामदेवजू के कुछ पद लिखे मिलते है। बाड में वही पद है
जो गुरु ग्रंथ साहब मे है। यह हस्तलिखित ग्रन्थ 'भारत इतिहास संशोधक मंडल' में है
जिसे शायद इस ग्रन्थ के लेखको ने नही देखा ।'१
इसी प्रकार डॉ० रामचन्द्र मिश्र ने संकेत किया है कि 'पंजाब विश्वविद्यालय के
पाण्डुलिपि विभाग में नामदेव के पद प्राप्त है जो सम्पादको के विचार और विश्लेषण
की सीमा के भीतर नहीं आ सके है और न राजस्थान और पंजाब में अपने नाम के
आगे 'नामा' लगाने वाले नामदेव के अनुयायियो में परम्परा से प्राप्त पदो का आकलन
किया गया है । नामदेव की लोकप्रियता के कारण सम्भव है कि महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश,
उत्तर प्रदेश, पंजाब, राजस्थान, गुजरात आदि के लोक जीवन में भी उनकी पदावली
प्राप्त हो । वस्तुतः नामदेव की पदावली की पूर्णता के लिए इंगित सामग्री का पर्यवेक्षण
भी अपेक्षित है।'२
इस आलोचना का महत्व स्वीकार करते हुए भी यह नही भूलना चाहिए कि
किसी ग्रन्थ के संपादन में इन सारे सूत्रों से सामग्री एकत्र करना बडा कठिन कार्य है,
विशेषतः परवर्ती लेखको-सम्पादकों को शनैः शनैः प्राप्त सामग्री का आरंभिक कार्य-
कर्ता को उपलब्ध हो जाना संभव नही होता ।
जिन सूत्रों की ओर संकेत किया गया है, पर्याप्त खोज करने पर भी 'संत नाम
देव की हिंदी पदावली' में संग्रहीत पदों के अतिरिक्त नामदेव के पद नहीं मिलने । यदि
और कुछ पद मिलते हैं तो वे मराठी अभंगों के रूपान्तर मात्र हैं। डॉ० रामचन्द्र मिश्र
की यह केवल कल्पना है, कहीं नामदेव के पदों का निर्देश नहीं है। यदि भविष्य में
ऐसे पद मिले तो उनका अध्ययन भी प्रस्तुत किया जायगा ।
हिंदी रचनाओं का विषयानुसार विभाजन
नामदेव की हिंदी रचनाओं को विषयानुसार नीचे लिखे वर्गों में विभाजित
किया जा सकता है :-
(१) ईश्वर के नाम स्मरण का आनंद
(२) ईश्वर की सर्वव्यापकता
१. संत नामदेव की हिन्दी पदावली : (आशीर्वचन), पृ० ८ ।
२. संत नामदेव और हिन्दी पद साहित्य, पृ० ६४ ।

१०२ नामदेव की हिन्दी कविता
(३) भक्ति से लाभ
(४) ईश्वर की विशुद्ध भक्ति
(५) स्वयं को तथा दूसरो को चेतावनी
(६) प्रार्थना और नम्रता
(७) संसार की नश्वरता
(८) गुरु और संतो का महत्व
(६) हठयोग
हिंदी पदो में संत नामदेव सर्वात्मवाद और अद्वैतवाद दोनों के अनुसार विचार
रखते हुए जान पड़ते है और उनकी भक्ति का स्वरूप भी शुद्ध निर्गुण भक्ति का ज्ञान
होता है।

तृतीय अध्याय
नामदेव की हिन्दी रचना में निर्गुण काव्य धारा की प्रवृत्तियाँ
(१) निर्गुण संत काव्य—आध्यात्मिक प्रेरणा का काव्य
(२) निर्गुण संप्रदाय के रूप निर्धारण में प्रेरक तत्त्व—
अद्वैतवाद, इस्लाम या सूफ़ी मत
सिद्ध सम्प्रदाय, नाथ पथ, वैष्णव धर्म
(३) निर्गुण काव्य की प्रवृत्तियाँ और नामदेव का हिंदी काव्य
१. निर्गुण भावना
२. गुरु महिमा
३. मूर्ति पूजा तथा बाह्याडम्बर का खण्डन
४. एकेश्वरवाद का प्रतिपादन
५. कथनी तथा करनी में एक रूपता
६. भक्ति और ऐहिक कार्य में एकता
७. सत्सङ्ग की प्रधानता
८. सहज अवस्था
६. हठयोग
१०. उलटवासियां

निर्गुण संत काव्य-आध्यात्मिक प्रेरणा का काव्य
मध्ययुगीन धर्म साधना के क्रमिक विकास को देखते हुए यह तथ्य सहज ही
स्पष्ट हो जाता है कि उसकी अभिव्यक्ति पर उसके पूर्व प्रचलित अनेक विचार धाराओं
के प्रभाव हैं। साथ ही एक लोक सामान्य विद्रोही प्रवृत्ति के फल स्वरूप उस युग में
अनेक मौलिक उद्भावनाएँ भी हुई हैं । हिन्दी का निर्गुण संत काव्य इसका सबसे पुष्ट
प्रमाण है । डॉ० रामकुमार वर्मा का कथन है कि संत काव्य ने प्राचीन परंपराओं की
स्थूल रूप-रेखा ग्रहण कर उसमे जीवन-गत पवित्रता के आधार पर विश्व धर्म की
स्वाभाविक प्रेरणा का रंग भरा है ।१ यदि ऐसा कहा जाय कि संत काव्य ने जन
भाषा का आश्रय लेकर परवर्ती राम और कृष्ण की भक्ति के लिए काव्य का क्षेत्र
प्रशस्त किया तो कोई अतिशयोक्ति न होगी ।
डॉ० हजारीप्रसाद द्विवेदी का मत है कि जहाँ तक उनकी उपासना-पद्धति,
विषय, भाव, भाषा, अलंकार, छंद, पद आदि का संबंध है ये संत सौ फीसदी भारतीय
परंपरा में पड़ते हैं । उनके पारिभाषिक शब्द, उनकी रूढ़ि विरोधिता, उनकी खण्डनात्मक
वृत्ति और उनकी अवखड़ता आदि उनके पूर्ववर्ती साधकों की देन है । परन्तु उनमें
आत्मा उनकी अपनी है । उसमें भक्ति का रस है और वेदांत का ज्ञान है ।२
निर्गुण संत काव्य आध्यात्मिक प्रेरणा का काव्य है इसलिए उसमें अपने इस
मूल भाव के साथ ही लोक समन्वय और स्वदेशी-विदेशी के भेदभ व की प्रतिक्रिया अन्य
क्षेत्रों की तुलना में कम है । यद्यपि यह मुसलमानी प्रतिक्रिया नहीं है तथापि मानवता
के स्तर पर सूफियों की प्रेम पद्धति और एकेश्वर वाद की लोक सामान्य झलक उसमें
भी है किन्तु यह उसका मूल स्वर नहीं बन सका ।
वैष्णव मत के लोकव्यापी विस्तार से जिस समय संपूर्ण देश अभिभूत होकर
भगवान् की भक्ति में अपने आप को तिरोहित कर रहा था उस समय उत्तर भारत में
१. हिंदी साहित्य (द्वितीय खंड) 'संत काव्य', पृ० १८८ ।
२. हिंदी साहित्य की भूमिका ।
—डॉ० हजारीप्रसाद द्विवेदी, पृ० ४२ ।

१०६ नामदेव की हिन्दी कविता
नैतिक जीवन को लेकर साधनात्मक प्रयोगों का बोलबाला था। साधक को अपनी
शुद्धता के लिए गुरु गोरखनाथ का अलौकिक व्यक्तित्व एक देवत्व का पर्याय मात्र रह
गया था।
गुरु गोरख का नाथ संप्रदाय जन भाषा में अपने सिद्धांतों का प्रतिपादन कर
चुका था किंतु उसकी भाषा में दो बातों की कमी थी। पहली यह कि वह भाषा केवल
सिद्धांत-सम्मत थी, उसमें काव्यात्मकता का अभाव था और दूसरी यह कि नाथ
संप्रदाय एक सीमित संप्रदाय होने के कारण अपनी भाषा को व्यापक नहीं बना सका
था। इस प्रकार निर्गुण संप्रदाय की प्रतिष्ठा करते हुए जन-जीवन की स्वाभाविक
अनुभूतियों में सामान्य भाषा के माध्यम से संत काव्य हिन्दी के भक्ति काव्य का एक
महत्त्वपूर्ण अंग बन सका।¹
यहाँ संक्षेप में उन परिस्थितियों तथा प्रेरणाओं पर विचार कर लेना आवश्यक
है जिनका निर्गुण संप्रदाय का रूप निर्धारित करने में महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है।
निर्गुण संप्रदाय का दृष्टिकोण उस बौद्ध धर्म के दृष्टिकोण से मिलता जुलता है,
जो शताब्दियों तक वैदिक धर्म से संघर्ष करता रहा। बौद्ध धर्म से महायान
का विकास हुआ, महायान से मंत्रयान और मंत्रयान से वज्रयान का, जो तांत्रिक
बौद्ध धर्म में परिणत हुआ। इसी वज्रयान की प्रतिक्रिया में नाथ संप्रदाय का विकास
हुआ और नाथ संप्रदाय के प्रेरणा-मूलक तत्वों को ग्रहण कर संत संप्रदाय अवतरित
हुआ। इस प्रकार बौद्धों के शून्यवाद से लेकर नाथ संप्रदाय की अवधूत भावना तक
संत काव्य में सभी विचार सरणियां पोषित होती रही।
बौद्ध धर्म से प्रेरित इस विचार धारा के विकास के कारण ही यह संभव हो
सका कि संत काव्य समस्त वैदिक परंपरा के कर्मकांडों का विरोध कर सका जो काला-
न्तर में वैष्णव धर्म में भक्ति के साधन थे। इसीलिए अवतार, मूर्ति, तीर्थ, व्रत, माला
आदि निर्गुण संप्रदाय के संतों को ग्राह्य नहीं हो सके जो कर्मकाण्ड के प्रतीक बने
हुए थे।
दूसरी ओर शून्य, काया-तीर्थ, सहज समाधि और योग जिसके अंतर्गत इड़ा,
पिंगला तथा सुषुम्ना नाड़ियां, षट् चक्र, सहस्र दल कमल, चंद्र और सूर्य तथा जीवन की
स्वाभाविक और अंतःकरण-जनित श्रद्धा और रागात्मिका वृत्ति की प्रधानता संत काव्य
में हो सकी। अतः यह स्पष्ट है कि संत काव्य अपने मौलिक विचारों की कोटि में
बौद्ध धर्म की परंपरा के अंतर्गत है तथा उसका सम्बन्ध बौद्ध धर्म के परवर्ती सम्प्रदायों
से होता हुआ प्रत्यक्ष रीति से नाथ संप्रदाय से है।
१. हिन्दी साहित्य (द्वितीय खण्ड) पृ० १८८।
—'संत काव्य' शीर्षक डॉ० रामकुमार वर्मा का लेख।

नामदेव और निर्गुण काव्यधारा १०७
बौद्ध धर्म की विचार धारा से संत संप्रदाय का संबंध निरूपित हो जाने पर
यह देख लेना उचित होगा कि वैदिक साहित्य की परंपरा में वैष्णव धर्म का प्रभाव
संत काव्य पर कितनी मात्रा में अथवा किस रूप में पड़ा ।
विक्रम की चौदहवी और पन्द्रहवी शताब्दी में रामानंद का प्रभाव उत्तरी भारत
में व्यापक रूप से पड़ा । भक्ति का स्रोत जो दक्षिण में फूट पड़ा और उत्तर तक
प्रवाहित हुआ उसने समस्त उत्तरी भारत को आप्लावित कर धर्म के क्षेत्र में भक्ति की
ओर आकर्षित किया ।१ यह एक ऐतिहासिक सत्य है कि भक्ति का जन-व्यापी प्रभाव
दक्षिण के अलवार संतों से ही ईसा की छठवीं शताब्दी में आरंभ हो चुका था । इनके
गीत बहुत ही लोकप्रिय हुए । सर्व साधारण जनता के लिए भी वेद-विहित याज्ञिक
अनुष्ठान की अपेक्षा भक्ति का यह रागात्मक रूप अधिक आकर्षक था ।
निर्गुण संप्रदाय के रूप निर्धारण में प्रेरक तत्व
निर्गुण संत मत के सिद्धांतों का विश्लेषण करने पर यह स्पष्ट हो जाता है कि
इस पर भिन्न-भिन्न संप्रदायों और आचार्यों की छाप पड़ी हुई है । संतों ने इन संप्रदायों
की मुख्य-मुख्य तथा उपयोगी बातों को ग्रहण किया । संत मत पर निम्नलिखित
सम्प्रदायों का प्रभाव पड़ा है ।
अद्वैतवाद
संत साहित्य के पीछे जो दार्शनिक प्रेरणा रही है उसके संबंध में विद्वानों ने
प्रायः वेदांत और उपनिषदों में प्रतिपादित निर्गुण ब्रह्मवादी विचार धारा की ओर
संकेत किया है । संत साधक और उनके अग्रणी कबीर को लोगों ने यही समझा है कि
वे जीव, आत्मा, ब्रह्म और प्रकृति संबंधी अपनी मान्यताओं को स्थिर करने में मुख्य
रूप से प्राचीन हिन्दी ग्रन्थों और विशेष रूप से निर्गुण ब्रह्म का प्रतिपादन करने वाले
ग्रन्थों और महात्माओं से अनुप्राणित हुए थे । प्राचीन वैदिक और उपनिषद् काल की
परंपरा तो निर्गुण ब्रह्म के प्रतिपादन के साथ ही अद्वैतवाद का प्रतिपादन समझा जाता
है । शंकराचार्य के अद्वैत दर्शन संबंधी कुछ विशेष वचन जिन्हें महावाक्य२ कहा जाता
१. भक्ति द्राविड़ी ऊपजी लाये रामानंद ।
परगट कियो कबीर सप्त द्वीप नव खंड ॥
२. प्रज्ञान ब्रह्म । (ऐ० उपनिषद्)
तत्वमसि । (छांदोग्य उपनिषद् ६।८।७)
अहं ब्रह्मास्मि । (बृहदारण्यक उपनिषद् १।४।१०)
अयमात्मा ब्रह्म । (छांदोग्य उपनिषद् २)

१०८ नामदेव की हिन्दी कविता
है स्पष्ट रूप से अद्वैतवाद और निर्गुण ब्रह्म के पर्याय को स्वीकार करते हैं। उपनिषदों
और वेदांत में स्पष्ट रूप से ब्रह्म की व्याख्या करते हुए उन लक्षणों का वर्णन किया
गया है जिन्हें हम निर्गुण ब्रह्म में मानते हैं।
संत कवियों ने शंकराचार्य द्वारा प्रतिपादित मायावाद, विवर्तवाद अथवा शुद्ध
ज्ञान वाद को नहीं ग्रहण किया वरन् उपनिषदों के स्वस्थ, यथार्थवादी और लोकरंजक
चिंतन को ग्रहण किया और प्रचारित किया जिसमें हृदय और बुद्धि, ज्ञान और कर्म का
समन्वय किया गया था।¹
इस्लाम या सूफी मत
सूफी संतों का आगमन तो ग्यारहवीं शताब्दी के आस पास से शुरू हो गया
था किंतु हिंदी साहित्य में सूफी मत का प्रतिपादन व्यापक रूप से संत साहित्य में ही
देखने को मिलता है। संतों पर सूफी मत का अधिक प्रभाव पड़ने का एक महत्वपूर्ण
कारण यह भी था कि इसमें बहुत से मुसलमान भी थे और यह स्वाभाविक ही है कि
उनका संपर्क और झुकाव सूफी मत की ओर अधिक हुआ हो। कबीर, दादू, बुल्लेशाह
यारी साहब आदि अनेक मुसलमानों ने संत परंपरा को ग्रहण किया और सूफी धर्म की
'प्रेम की पीर' से अपनी कविता को रस सिक्त और कोमल बनाया। संत साहित्य में
भाव पक्ष की जो कुछ भी सुन्दरता दीख पड़ती है उसका बहुत कुछ कारण सूफी संतों
का दर्द और प्रेम की मधुर और करुण व्यंजना है।
मुसलमान संतों के अतिरिक्त भी जो दूसरे संत थे, वे बहुधा जाति और परम्परा-
गत भाव के कारण धार्मिक और सांप्रदायिक रूढ़ियों से युक्त थे। उन पर भी सूफी धर्म
का रंग गहरा चढ़ा। मलूकदास भी इस प्रेम के रङ्ग में डूबे हुए कहते हैं कि वे गुलाम के
समान उस प्रियतम के दर्शन की लालसा में दरबार में खड़े हैं।²
संत साहित्य पर सूफी मत का प्रभाव तीन रूपों में देखने को मिलता है। प्रायः
सभी कवियों ने प्रेम की महत्ता पर बहुत विस्तार और उत्साह से प्रकाश डाला है।
उन्होंने बतलाया है कि प्रेम जप तप, तीर्थ और साधना सभी से बड़ा है। दूसरा रूप
१ इंडियन फिलासफी भाग २ डॉ० राधाकृष्णन, पृ० २२४-२५।
२ तेरा मैं दीदार दिवाना
घड़ी घड़ी तुझे देखा चाहूँ तुम साहिब रहमाना।
हुआ अलमस्त खबर नहि तन की पिया प्रेम पियासा
ठाड़ होऊँ तो गिर गिर पड़ता तेरे रंग भरवासा॥
—मलूकदास की बानी (बेलवेडियर प्रेस) पृ० ७।