सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)
Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra
सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा
पृष्ठ 107, कुल 332 में से
संदर्भ में पढ़ेंनामदेव और निर्गुण काव्यधारा १११
वैष्णव धर्म में विष्णु और उनके भक्तों के नामों की बड़ी प्रतिष्ठा है । भगवान्
विष्णु के सहस्र नाम बतलाये गये हैं। सन्तों ने अपने निर्गुण ब्रह्म के लिए हरि, गोविंद,
गोपाल, माधो, राम आदि सैकड़ो वैष्णवी अभिधान प्रयुक्त किये हैं। इन समस्त अभि-
धानो में उन्हे राम, गोविंद और हरि विशेष प्रिय थे। सन्तों द्वारा भगवान् के इन
वैष्णवी नामो का प्रयोग उन पर वैष्णव धर्म के प्रभाव के परिणाम-स्वरूप ही है ।
वैष्णव धर्म की सदाचार-प्रियता का सन्तो पर बहुत प्रभाव पड़ा । निर्मलता
तथा सात्विकता की अभिव्यक्ति उन्होंने विविध सद्गुणों के आचरण पर बल देकर की
है ।१ वास्तव में सन्त वैष्णव धर्म की सदाचरण-प्रियता और सात्विकता से बहुत अधिक
प्रभावित थे।
सन्तों ने वैष्णव धर्म के अनुकरण पर भक्ति को अन्य साधनो की अपेक्षा सर्व-
श्रेष्ठ ठहराया है ।२ प्रेम भगति और भाव भगति का उपदेश तो उन्होंने अपनी रचनाओ
में सर्वत्र दिया है ।३ यहाँ पर हम केवल इसी बात पर बल देना चाहते है कि
वैष्णवो की सदाचरण-प्रियता और प्रेम भगति ने सन्तों को अत्यधिक प्रभावित किया है ।
नामदेव की हिन्दी कविता और निर्गुण काव्य की प्रवृत्तियाँ
समस्त निर्गुण काव्य का अनुशीलन और अध्ययन करने पर कुछ सामान्य
विशेषताएं समान रूप से सभी सन्तो मे प्राप्त होती है जिन्हें हम निर्गुण काव्य की
प्रवृत्तियाँ कह सकते हैं। नामदेव की रचनाओ में ये सारी प्रवृत्तियाँ परिलक्षित होती
हैं। नीचे इन्ही का विवेचन संक्षेप में प्रस्तुत किया जा रहा है—
(१) निर्गुण भावना
यह निर्गुण भावना उपनिषद् काल से चली आई है। नामदेव ने भी इसे
अपनाया है। निर्गुण ब्रह्म के स्वरूप का निरूपण करते हुए वे कहते है—
वह निर्गुण ब्रह्म अनेक और एक सब कुछ है। मैं जिधर देखता हूँ उधर वही
है । 'माइया मोहिया' बिरला ही इस बात को समझ सकता है । वह व्यापक राम शत
१. निर्मल तन मन आत्मा निर्मल मनसा सार ।
निर्मल प्राणी पंच करि दादू लंघे पार ॥
—दादू बानी भाग, १ पृ० ४ ।
२. बिना भक्ति थोथे सभी जोग जुक्ति आचार ।
सहजोबाई की बानी, पृ० ३२ ।
३. भाव भगति सूँ हरि न अराधा । जनम मरन की मिटी न साधा ॥
—कबीर ग्रंथावली, पृ० २४४ ।