रतिरहस्य: असली कोकशास्त्र (पण्डित कोक्कोक - कामकला, दाम्पत्य-जीवन एवं सम्पूर्ण रति-विज्ञान)
Rati Rahasya or Asli Koka Shastra of Kokkoka with Hindi Commentary
पण्डित कोक्कोक (भाषा टीकाकार: पण्डित कन्हैयालाल) द्वारा
३६६ असली कोकशास्त्र
भी शायद ही कोई इनके पीने से परहेज करता हो । शराब से
हजारों घर धूल में मिल गये । लाखों आदमियों का सत्यानाश हो
चुका । शराबी को किसी बात का ज्ञान नहीं रहता । प्रायः वह
माता, स्त्री और लड़की का भेद तक भूल जाता है । शराब से मनुष्य
का मेदा जल जाता है अन्त में वह पृथिवी का भार हो जाता है ।
शराबी मोरियों में पड़े नजर आते हैं अच्छा मनुष्य भी शराब से
कौड़ी का तीन हो जाता है । इस व्यसन से घिरे मनुष्य, होश-
हवास ठीक होते भी निकम्मे देख पड़ते हैं । मन पर उनका अधि-
कार नहीं होता, सदा शेखचिल्लियों के से मनसूबे बाँधा करते हैं ।
इस लिए शराब और इसी की सगी बहन भाँग दोनों चीजें बिलकुल
त्यागने योग्य हैं; इसमें दो मत नहीं हो सकते । कुछ लोग कहते हैं,
दवा की भाँति शराब पीने में कोई हर्ज नहीं । परन्तु असल में इतनी
की भी जरूरत नहीं । यूरोप—जो शराब का घर है—उन डॉक्टरों
की भी यही राय है । पहले अनेक बीमारियों में शराब काम में
आती थी, परन्तु वहाँ अब बिलकुल बन्द हो गई है । असल में तो
दवा की दलील ही निराधार है । शराब के पक्षपाती दिखाना चाहते
हैं कि जब शराब दवा के काम में आ सकती है, तब उसे पीने के
काम में लाना क्या बुरा है । परन्तु विष भी तो दवा की भाँति काम
आता है तो भी कोई उसे खुराक की भाँति बरतने का विचार
तक नहीं करता । हो सकता है, कुछ बीमारियों में शराब से लाभ
पहुँचे, पर हानि इतनी हो चुकी है कि विचारवान मनुष्य को चाहिए
असली कोकशास्त्र ३६७
कि जान जाने दें, पर शराब दवा की भी न ले। शराब से इस
शरीर की भलाई होने में जहाँ सैकड़ों मनुष्यों को बुरा होता है वहाँ
ऐसे शरीर की रक्षा न कर उसे नष्ट ही हो जाने देना चाहिए।
हिन्दुस्तान में लाखों मनुष्य ऐसे हैं जो वैद्य के कहने पर भी शराब
न पीवेंगे। वे शराब पीकर वा अपनी समझ में बुरी चीजों का
प्रयोग कर जीना नहीं पसन्द करते। अफीम का विचार भी शराब
के साथ ही करना चाहिए। अफीम का नशा शराब से भिन्न है;
फिर भी उससे शराब से कम बुराई नहीं होती। अफीम के फेर में
पड़कर चीन जैसे बड़े राष्ट्र की प्रजा पायी हुई स्वतन्त्रता खो बैठी।
हमारे जागीरदार भी अफीम के चंगुल में पड़कर अपनी-अपनी
जागीरों से हाथ धो बैठे।
शराब भाँग और अफीम की बुराइयाँ तो साधारण पाठकों
की समझ में तुरन्त आ जाती हैं, और बीड़ी तम्बाकू की नहीं
आतीं। बीड़ी और तम्बाकू ने मनुष्य जाति पर अपना ऐसा असर
जमा रखा है कि उसके मिटने में एक जमाना लगेगा। छोटे-बड़े
सभी इसके फेर में पड़े हैं। अच्छे भलेमानस भी बीड़ी सिगरेट का
व्यवहार करते हैं। इनके पीने में कोई शरम नहीं समझी जाती।
मित्रों की खातिर का यह एक महान् साधन बन गई है। दिन-दिन
इनका प्रचार बढ़ता जाता है सर्वसाधारण को इस बात की खबर
नहीं कि सिगरेट का व्यसन बढ़ाने के लिए सिगरेट के व्यापारी
लोग उसकी बनावट में हजारों तरकीबें लड़ाते हैं। जर्दे तम्बाकू में
३६८ असली कोकशास्त्र
अनेक प्रकार के सुगन्धित तेजाब छिड़कते हैं और अफीम का पानी
मिलाते हैं। इससे सिगरेट हम पर अधिकाधिक अधिकार जमाती
जाती है। उसके लिए नोटिसबाजों में हजारों पौंड खर्च किये जाते
हैं। यूरोप में सिगरेट कम्पनियाँ अपने छापेखाने चलातीं, वायस-
कोप खरीदतीं, अनेक प्रकार की इनाम बाँटतीं, लाटरियाँ निकालती
और नोटिसबाजी में पानी की तरह पैसा बहाती है। फल यह हुआ
कि स्त्रियों तक को सिगरेट की आदत लग गई है। सिगरेट पीने पर
कविताएँ भी बनायी गई है, इनमें सिगरेट को “गरीब, नेवाज”
( दीनबन्धु ) की उपमा दी गई है।
सिगरेट तम्बाकू से होने वाली हानियों की गिनती नहीं हो
सकती। सिगरेट पीने वाले मनुष्य का व्यसन इतना अधिक बढ़
जाता है कि वह बिना किसी का परवा किये दूसरे के घर में बिना
इजाजत ही सिगरेट का धुआँ उड़ाने लगता है, किसी की शरम
नहीं रखता।
देखा गया है कि सिगरेट और तम्बाकू पीने वाला मनुष्य
असली कोकशास्त्र १६६
सिगरेट पर स्वर्गीय टालस्टाय ने लिखा है कि एक मनुष्य के
मन में अपनी स्त्री के खून करने का विचार आया। छुरा निकाल,
चलाने को तैयार हुआ, पछताया और पीछे हट गया। फिर सिगरेट
पीने बैठा, सिगरेट के जहर से अक्ल पर पर्दा पड़ गया; तब
उसने खून किया। मि० टालस्टाय तम्बाकू को एक सूक्ष्म प्रकार का
और कई अंशों में शराब से भी खराब नशा मानते थे।
सिगरेट का खर्च भी कुछ कम नहीं। कुछ मनुष्यों को चुरुट
के पीछे हर महीने ५ पौंड अर्थात् ७५) रुपये तक खर्च करते मैंने
अपनी आँखों देखा है।
सिगरेट से पाचनशक्ति कम हो जाती है। भोजन का स्वाद
नहीं मिलता। अन्न फीका मालूम होता है, इस लिए उसमें मसाला
इत्यादि डालना पड़ता है। सिगरेट पीने वाले की साँस से बदबू
निकलने लगती है। उसका धुआँ हवा को बिगाड़ता है। कितनी
ही बार मुँह में फफोले पड़ आते हैं। मसूड़े और दाँत काले या
पीले पड़ जाते हैं इससे कितनी ही लोगों को बड़ी ही भयंकर
बीमारियाँ हो जाती हैं। समझ में नहीं आता कि शराब के निन्दक
सिगरेट क्यों पीते हैं ? सिगरेट का जहर सूक्ष्म है, शायद इसीसे
उसका प्रयोग करते हैं। जो निरोग रहना चाहते हैं उन्हें सिगरेट
पीना जरूर छोड़ देना चाहिए।
शराब, तम्बाकू, बीड़ी और भाँग इत्यादि व्यसन हमारे शरीर
का आरोग्य हर लेते हैं; मन और धन के आरोग्य का भी हरण
४०० असली कोकशास्त्र
करते हैं। इनसे हमारे आचरण का नाश होता और हम व्यसनों
के गुलाम बन जाते हैं।
लोगों के मन में यह बैठाना बहुत कठिन जान पड़ता है कि
चाय, काफी और कोको बुरी चीजें हैं। पर, चाहे जो हो कहना
ही पड़ता है कि ये सब चीज बुरी है। इनमें एक विशेष प्रकार का
नशा होता है। यदि चाय और काफी के साथ दूध शक्कर न हो तो
इनमें एक भी पुष्टिकारक पदार्थ नहीं। केवल चाय और काफी पर
जीवन निर्वाह करके कितने ही प्रयोग किये गये। सिद्ध यही हुआ
कि इनमें खून बढ़ाने वाली चीजें बिलकुल नहीं हैं। हम लोग कुछ
वर्ष पहले साधारण तौर पर चाय और काफी नहीं पीते थे, कहीं
किसी विशेष अवसर पर या दवा में इन्हें पी लेते थे, परन्तु अब
नई रोशनी के कारण चाय और काफी साधारण वस्तु बन गई है।
अब तो हम केवल मिलने आने वाले मेहमानों तक को ये चीजें
पिलाते हैं। चाय की पार्टियाँ देते हैं। लार्ड कर्जन के शासनकाल
से तो चाय ने और भी हाथ-पैर फैला दिये हैं। इन साहब बहादुर
ने चाय के व्यापारियों को उत्तेजना दे देकर चाय का प्रचार घर-
घर करा दिया और लोग जहाँ पहले आरोग्यकारक चीजें पीते थे
वहाँ अब रोगकारी चाय पीने लग गये हैं।
कोको बहुत नहीं फैला, क्योंकि वह चाय से कुछ महँगा है।
सौभाग्य से हम लोगों को इसका परिचय बहुत कम है, फिर भी
फैसनेबुल घरों में उसकी पूर्ण सत्ता है।
! "स्त्रियाँ और"!
Now look at line 20:
"हजारों [glyph] के ज्ञान" -> wait, what is after the glyph?
It is: [glyph] + [matra i] + य + ाँ = "स्त्रियाँ के"!
Wait, does it say "स्त्रियाँ के" or "स्त्रियों के"?
Look at line 20:
It is 'स्त्रियाँ' (there is a chandrabindu, though faint, or is it 'स्त्रियों' with a matra 'ो'? No, it has an 'ा' bar, not 'ो'!). But wait, is there a chandrabindu on line 20? No, wait, look above: it has no 'े' or 'ो' matra. It says "स्त्रियाँ के" or "स्त्रियों के"? Wait, actually it looks like "स्त्रियों के" or "स्त्रियाँ"? Wait, let's look at the letter:
After [glyph+i] is 'य' and 'ा'. Wait, is there an anusvara? In Hindi, people often write "स्त्रियों" or "स्त्रियों" - wait, in line 20, look at: "हजारों स्त्रियाँ के" or "स्त्रियों"?
Wait, look at line 20:
"हजारों" -> र + ों (with anusvara and matra).
Then: "स्त्रियों"? No, the letter has NO top slant! It has an 'ा' stem: "स्त्र
४०२ असली कोकशास्त्र
आरोग्य को कितनो हानि पहुँचती है। काफी के सम्बन्ध में एक
दोहा प्रचलित है:—
“कफ छांटे, बादी हरे, करे धातु बल छीन ।
रक्तहिं पानी सम करे, दो गुन अवगुन तीन ॥”
यह दोहा बिल्कुल ठीक मालूम होता है। निःसन्देह काफी में
कफ और बादी हरने की शक्ति है। पर अन्य चीजों में भी यह
शक्ति मौजूद है। इन कारणों से काफी पीने वाले अदरख का रस
पीयें तो काफी की आवश्यकता पूरी हो जायगी। याद रहे कि धातु
जैसी अमूल्य चीज को जिस वस्तु से हानि पहुँचे, जिससे बल का
क्षय हो, जो रक्त को पानी कर दे, उसे त्यागने ही में कल्याण है।
कोको में भी ये सब दोष हैं। चाय के समान इसमें वह तत्त्व
मौजूद है जो चमड़े को बिल्कुल संज्ञाशून्य बना देता है।
जो लोग आरोग्य में नीति का समावेश करते हैं उनके सामने
इन तीनों वस्तुओं के सम्बन्ध में नीचे लिखी दलीलें पेश की जा
सकती हैं। चाय काफी और कोको अधिकांशतः उन मजदूरों के द्वारा
उत्पन्न की जाती है जो शर्त्तबँधे कुली बनकर चाय के बगीचों में जाते
हैं। जहाँ कोको की उपज होती है वहाँ मजदूरों पर होते हुए जुल्मों
को यदि अपनी आँखों से देख लें तो उसके ग्रहण की जरा भी
इच्छा न करें। कोको के खेतों में होने वाले जुल्मों पर बड़ी-बड़ी
पुस्तकें लिखी जा चुकी हैं। यदि हम सब अपनी खुराक की उत्पत्ति
के विषय में पूरा ज्ञान प्राप्त करें तो १०० में से ९० वस्तुओं का
असली कोकशास्त्र ४०३
त्याग अवश्य कर दें।
इन तीन वस्तुओं के बदले नीचे लिखे ढंग से निर्दोष ओर पुष्टि-
कर चाय बन सकती है। इसे चाय के नाम पर मजे में पी सकते
हैं। काफी ओर निर्दोष चाय के स्वाद में इतना कम अन्तर है कि
उसे काफी पीने वाले भी नहीं समझ सकते। पहले गेहूँ को साफ
तवे या कड़ाही में या चूल्हे पर भूनना चाहिए। खूब लाल होकर
कलछाने लगने पर उतार लिए जायँ ओर दाल दलने की छोटी
चक्की में साधारण तौर पर बारीक दल लिए जायँ। इसमें से एक
चम्मच भर कर पियाले में डालकर उस पर उबलता हुआ पानी
डाल दें। यदि इसे एक मिनट तक चूल्हे पर चढ़ा रहने दें तो
भी अच्छा हो। आवश्यकता जान पड़े तो दूध और शक्कर भी इसमें
मिला ली जाय। दूध और शक्कर के बिना भी इसे पी सकते हैं।
पाठक इसका प्रयोग करके देख सकते हैं। इसे ग्रहण कर जो लोग
चाय, काफी और कोको छोड़ देंगे उनके पैसे बचेंगे और स्वास्थ्य-
रक्षा भी होगी।
जिन पाश्चात्य देशों में इन नशीले द्रव्यों का सेवन अधिक
रूप से होता था उन्हीं में हार्टफेल का रोग होता था। अब जब
से भारतवर्ष में नशों का आधिक्य हुआ है तब से यहाँ पर भी हृत्कंपना-
वरोध (हार्टफेल) का रोग फैल गया है। चलता-फिरता मनुष्य
मार्ग में ही लेट जाता है और किसी से कुछ नहीं कह पाता। यह
भयंकर रोग फेफड़ों की कमजोरी से, रक्त साफ न होने के
४०४ असली कोकशास्त्र
कारण विषाक्त होकर हृत्कंपन को रोक देता है। इस लिए यदि
जीवन चाहते हों और वह भी स्वास्थ्यप्रद, तो आज से ही इन
नशीले प्राणघातकी द्रव्यों का सेवन छोड़ दें, उसी में सब का
कल्याण है।
—*—
नकछिकनी
दूसरी है नकछिकनी जिसे लोग सुँघनी कहते हैं। यह पिसी
हुई तमाखू होती है। यह इतनी बारीक होती है कि नाक के पास
आते ही स्वास के साथ दिमाग में चढ़ जाती है, जिससे छींक पर
छींक आने लगती है और आँख नाक से पानी निकलने लगता है।
कई मनुष्यों को इसका इतना अभ्यास बढ़ जाता है कि वे प्रतिक्षण
नासदानी हाथ में लिए रहते हैं और उनकी नाक के नथुने बराबर
भरे रहते हैं। यह वह हालत हुई कि “गये थे नमाज पढ़ने और
रोजे गले लग गये” लगे थे सर्दी दूर करने और दूसरा रोग पीछे
लग गया। नांस लेने वाले के हाथ हमेशा गन्दे रहते हैं और सुर्र-
सुर्र हमेशा नाक बहा करती है। नास वाले को शिर के सभी रोग
हो जाते हैं। नेत्रों से जल गिरता रहता है स्मरणशक्ति घट जाती
है। इसको सुँघनी न कहकर नकछिकनी ही कहना उचित है क्यों
कि-“यथा नाम तथा गुणः” जैसा नाम वैसे ही गुण भी है।
इस वस्तु को भी विचारवान पुरुषों को छोड़ देना चाहिए क्योंकि
असली कोकशास्त्र ४०५
शिर की कोई भी इन्द्रिय इसे स्वीकार नहीं करती बल्कि प्रत्यक्ष
रो रो कर आँसू बहाती हैं और इस बात का संकेत करती हैं कि
अय मनुष्य ! इस बला को जबरदस्ती न ठूँस, नहीं तो आखिर को
तुम्हे हमसे हाथ धोना पड़ेगा ।
शौच
प्रातःकाल रात्रि के चौथे प्रहर में अर्थात् चार बजे उठकर
सबसे पहिले बिस्तर पर बैठकर पाँच मिनट तक ईश्वर का ध्यान
और फिर कुल्ला कर बासी मुँह डेढ़ पाव या आधसेर पानी पीकर
टहले इससे पाखाना अच्छी तरह साफ आवेगा और कब्ज नहीं
होगी । पहिले-पहल सर्दी हो जाने का डर है । किन्तु उसकी परवाह
न करनी चाहिए, वह स्वयं अच्छी हो जायगी । शौच होकर
आवदस्त ले लेने पर मूत्रेन्द्रिय की खाल हटाकर ठण्डे पानी से
अच्छी तरह धो डालना चाहिए । इसके बाद दतौन, स्नान आदि
करना चाहिए । तत्पश्चात् सन्ध्या सूर्य उदय से पूर्व तारों की छाया
में समाप्त कर देनी चाहिए इतने काम सूर्य उदय के पूर्व अवश्य
हो जाने चाहिएँ ।
४०६ असली कोकशास्त्र
लघुशङ्का
प्राचीनकाल से यह बात चली आती है कि जब कोई पेशाब
जाता है तब एक पात्र में जल ले जाता है। पेशाब हो लेने के बाद
इन्द्रिय को पानी से धो डालता है। कोई-कोई गमछे का एक
किनारा भिगोकर ले जाते हैं उसी से धो देते हैं। गमछे में जल ले
जाना अच्छा नहीं, क्योंकि वह पानी हाथ की गरमी से गरम हो
जाता है। ठण्ढे पानी से ही धोना हितकर है। यह एक प्रकार का
जल-चिकित्सा का एक भाग है। यह बड़ा ही लाभदायक है।
किन्तु आजकल लोगों ने इसे केवल शुद्धि का ही हेतु समझ रक्खा
है। मुसलमान लोग एक मिट्टी का ढेला जहाँ-तहाँ से उठा लेते
हैं वे भी पेशाब के बाद इन्द्रिय के मुँह पर लगा लेते हैं और कहते हैं
कि पेशाब का कतरा कपड़े पर गिरने से कपड़ा नापाक न हो जाय ।
उन्होंने भी शुद्धि के लिए मानकर ऐसा किया। यह उनकी भूल
है। क्योंकि जो ढेला वे उठाते हैं वह पहले किसी ने इस्तेमाल किया
या नहीं, इसका पता उन्हें नहीं लग सकता, इस लिए सम्भव हो
सकता है कि किसी गर्मी, सुजाक वाले मरीज ने उसे पहले इस्ते-
माल किया हो। ऐसे ढेले के व्यवहार से क्या हानि होगी यह आप
भलीभाँति समझ सकते हैं। दूसरे शुष्क मिट्टी के सम्बन्ध से वह
फल हासिल नहीं हो सकता जो जल से है। देखा-देखी नकल और
वह भी उल्टी करना अच्छा नहीं। वहाँ प्रयोजन केवल स्वच्छता
असली कोकशास्त्र ४०७
ही नहीं प्रत्युत रोग नाश भी है । “एकाक्रिया द्व्यर्थकरी प्रसिद्धा”
“आम के आम और गुठली के दाम” इसी को कहते हैं अर्थात्—
शुद्धता की शुद्धता और रोग का भी नाश !
—०—
तैल मर्दन
तैल खाने की अपेक्षा शरोर पर मर्दन करने में घी खाने से भी
कई गुणा अधिक शक्ति प्रदान करता है शरीर पर कान्ति, खाल
पर चमक और मजबूती के साथ मुलाइमियत लाता है । स्फूर्ति,
हलकापन और नैरोग्यता प्रदान करता है । देह में खसरा, खुजली
आदि रोगों को उत्पन्न नहीं होने देता । अंगों को मोटा और सुडौल
करता है । बुढ़ापे तक अंगों को जकड़ने नहीं देता । चाहे कितना
भी परिश्रम किया हो उसकी थकावट क्षणों में दूर करता है ।
तैल की मालिश करने, के लिए दो आदमियों की आवश्यकता
है, एक तेल मलने वाला और दूसरा मालिश कराने वाला । किसी
अच्छे स्वच्छ खुले स्थान में बैठकर जहाँ तेज हवा न आती हो
मालिश करें । मालिश में कड़ुआ तेल काम में लाना चाहिए । शुद्ध
कड़ुआ सरसों का तेल छटाँक डेढ़ छटाँक लेकर साफ कपड़े से
छान ले । तत्पश्चात् मालिश करने वाला दोनों हाथों में लगाकर
जिसके मालिश करनी हो उसके सिर में और तालू पर लगाकर
हाथ की दोनों हथेली से घर्षण करे । इसी प्रकार जल्दी-जल्दी
४०८ असली कोकशास्त्र
हाथ बदलता जाय जिससे हाथ गरम न होने पाये और तेल रमता
जाय हाथों की तली गरम होने से दोनों को नुकसान है अर्थात्
मस्तक में गरमी पहुंचने से बुद्धि की हानि और बालों के संघर्ष से
एक प्रकार की विद्युत पैदा होती है जो हाथ की हथेलियों के मार्ग
से मर्दनकर्त्ता के मस्तक में हानि पहुँचाती है। कनपुटियों को अँगु-
लियों के अग्रभाग से मर्दन करे। तत्पश्चात् गर्दन और बाँहों को
पहले धीरे-धीरे जब गरम हो जाय तब बलपूर्वक मर्दन करे। इसी
प्रकार सब अंगों में सब तेल रमा दे। डेढ़-दो घण्टे के बाद जब
अच्छी प्रकार ठण्डा हो जाय तब साबुन से स्नान करे। इस प्रकार
मर्दन किया हुआ तैल अपूर्व फल देता है।
—०—
मञ्जन
दाँतों में कीड़ा नहीं लगेगा, मुँह से बदबू नहीं आयेगी। पाचन-
शक्ति बढ़ जायगी, पेट का कोई रोग नहीं होगा। कारण यह कि
प्रतिक्षण मुँह में थूक आता रहता है और दाँतों की जड़ों में से
होकर ओठों से टकरा भीतर लौट जाता है। फिर वह कण्ठ से नीचे
उदर में पहुँच जाता है तथा भोजन के हजम होने में बड़ी सहायता
करता है। साफ कहना चाहिए कि वही लार मुख में दाँतों की रगड़
के संसर्ग से अमृत बन जाती है और अमृत-कूप जहाँ उस लार के
ठहरने का स्थान है वहाँ पहुँच जाती है। यथार्थतः जो कण्ठ में
असली कोकशास्त्र ४०६
नासारन्ध्र के समीप अमृत-कूप है, उसमें जो जल, तत्व का दन्त-
श्रेणी के संघर्ष से मधुरामृतमय भाग तैयार होता है वह जाकर
ठहरता है। जिससे वह कूप सदैव भरा रहता है। योगी लोग जब
जबान को लौट कर उस अमृत-कूप के पास ले जाते हैं तब उन्हें
अमृत-कूप से गिरी हुई मधुर अमृतमयी बूँद के स्वाद का आनन्द
मिलता है।
जो लोग वैसा अभ्यास करते हैं उन लोगों को भी उपरोक्त
आनन्द का अनुभव होता है। हम लोगों के पेट में वह बराबर बूँद
बूँद होकर टपकता रहता है जो खाये हुए पदार्थ के लिए अमृत
होता है। यदि दाँतों की सफाई नहीं रक्खी जायगी तो वही अमृत,
विष हो जायगा। क्योंकि दाँतों में सड़े हुए बदबूदार मैल से लग-
कर लार में विष उत्पन्न हो जाता है और वह अमृतकूप को विष-
कूप बनाती हुई पेट में पहुँच कर कीड़े, अजीर्णता आदि अनेक रोग
पैदा कर देती है। इस लिए स्वास्थ्य चाहने वाले मनुष्यों को हमेशा
दाँत साफ रखने चाहिएँ । ताजी दतौने का रस मसूड़ों को पुष्ट
करता है।
पेट की कब्ज जबान से देख ली जाती है। जब पेट में अनुचित
मल का भाग होता है, तब जबान पर मैल जम जाता है। पेट के साफ
रहने पर नहीं रहती। इसी लिए वैद्य लोग जबान देखते हैं। दाँत और
जबान साफ रखने वाले का कभी पेट गन्दा नहीं रह सकता ।
दतौन के साथ यदि दन्त-मञ्जन भी प्रयोग कर लिया करें तो
४१० असली कोकशास्त्र
सोने में सुगन्ध का काम हो जाय। अर्थात् सफेद सेंधा नमक खूब
बारीक पीसकर शुद्ध सरसों के थोड़े तेल में मिला लें और दतौन
की कूची के साथ अथवा अँगुली द्वारा दाँतों तथा मसूड़ों पर रगड़े।
इससे मसूड़ों का कोई रोग नहीं होता और सफाई बहुत जल्दी
होती है। नमक विष-हर है। जिनके मसूड़ों से खून जाता हो वे
अवश्य इस मंजन का प्रयोग करें उन्हें तत्काल इसका लाभ मालूम
होगा और कुछ दिन प्रयोग करने पर यह रोग सदैव के लिए
चला जायगा।
—*-—
नेत्र स्नान
दन्तधावन करने के बाद मुँह में पानी भरकर, एक लोटे में
पानी ले और दूसरे हाथ की अँजली भर कर आँख खोल उसमें छींटे
दे, एक लोटा पानी खतम हो जाने पर मुँह का पानी निकाल दे
और फिर उसी प्रकार दुबारा मुख में पानी भर कर आँखों में छींटे
दे। इस प्रकार कम से कम दस सेर पानी काम में लाना चाहिए।
इसका फल यह होगा कि नेत्रों की ज्योति बढ़ेगी और गयी हुई
रोशनी भी फिर से लौट आयेगी। मस्तक की स्मरण-शक्ति बढ़ेगी,
सिर दर्द आदि सिर के सभी प्रकार के रोग नष्ट होंगे। सिर के
काले बाल असमय में सफेद न होने पायेंगे। यदि सफेद हो गये
हों तो इसके कुछ वर्ष लगातार प्रयोग से फिर काले हो जायेंगे।
असली कोकशास्त्र ४११
दाँत मजबूत होंगे। नेत्रों का दुखना, जल गिरना, या सुर्खी आ
जाना, धुँधला, झायीं, माड़ा, फुल्ली आदि एक भी रोग न होने
पायगा और जिनके ये रोग हों यदि वे भी इसका निरन्तर प्रयोग
करें तो उनको भी अवश्य फायदा होगा
स्नान
नेत्र-स्नान के बाद सम्पूर्ण देह का स्नान कर डालना चाहिए।
स्नान कुएँ के ताजा जल से करना चाहिए क्योंकि वह ऋतु अनु-
सार गरम सर्द बना रहता है। जैसे लिखा है—
कूपोदकं वटच्छाया नारीणञ्चपयोधरम् ।
शीतकाले भवेदुष्णमुष्णकाले च शीतलम् ।
अर्थ—कुएँ का जल, बटवृक्ष की छाया तथा स्त्री-पयोधर उष्ण-
काल में स्वभाव से शीतल और शीतकाल में गरम हो जाते हैं।
इस लिए कुएँ के जल से खूब मल-मल कर नहाना चाहिए। सबसे
पहले शिर पर जल डालकर उसे अच्छी प्रकार धोना चाहिए और
फिर हाथ कमर और पेट पर पानी डालकर मले। तत्पश्चात् शेष
अंगों पर। इस प्रकार स्नान करने से शिर आदि सब अंगों की
गरमी पाँव की राह से नीचे को निकल जाती है। उसके विपरीत
करने पर उलटा परिणाम होता है अर्थात् निरोग के स्थान पर रोग
आ घेरते हैं। क्योंकि पाँव और उदर आदि की गरमी मस्तक पर
४१२ असली कोकशास्त्र
आ चढ़ती है जिससे शिर-दर्द बुद्धि-मान्द्य आदि शिरोरोग हो जाते
हैं। यदि किसी नदी में स्नान करना हो तो वहाँ भी किनारे पर
पहले सिर धोकर क्रमशः सब अंगों को भिगोवे, तब नदी में उतर
जाय फिर कोई हानि नहीं होगी। उसके बाद मोटा गमछा या
तौलिया को भिगोकर शरीर के सब अवयवों पर मलने से मैल
अच्छा साफ होता है। यह ध्यान रखना चाहिए कि बाल न टूटने
पाये। स्नान के बाद गमछा निचोड़ कर शरीर पोंछ डालना
चाहिए। जिससे कहीं पानी न रहने पाये, अन्यथा पानी रहने पर
दाद होने का डर रहता है। इस प्रकार स्नान करने से शरीर के
रोमकूपों के छिद्र खुल जाते हैं। जिससे पसीना अच्छी तरह अन्दर
से बाहर निकल सकता है जो शरीर को सुन्दर और रोगहर बनाता है।
महीने में दो-चार बार अच्छे साबुन से स्नान कर लेना चाहिए।
अच्छे साबुन के माने जो शरीर की त्वचा को फाड़ न दे और न
इतना रूखा ही हो कि शरीर पर सिमटन पड़ जायँ। चरबी का
साबुन कभी न लगाना चाहिए, क्योंकि वह शरीर के छिद्रों को
खोलता नहीं प्रत्युत् उन्हें और बन्द कर देता है। जिससे पसीने का
आना बन्द हो जाता या बहुत ही कम हो जाता है। लगाने वाले
समझते हैं कि साबुन बहुत अच्छा है। यथार्थ में वह बहुत ही
नुकसान देने वाला है। ऐसी राय डाक्टरों की हैं। और दूसरा अप-
वित्र भी है, बिना जानवरों के मारे चर्बी नहीं मिलती। चर्बी के
लिए जानवर मारे जाते हैं। इस लिए चर्बी का साबुन व्यवहार
असली कोकशास्त्र ४१३
करने वालों को उन पशुओं की हत्या का भागी बनना पड़ेगा।
अतएव चर्बी का साबुन सब तरह से वर्जित है।
शृङ्गार
स्त्री को चाहिए प्रातःकाल स्नान कर लेने के बाद शृङ्गार करे।
शृंगार में विशेष आभूषण पहनने की आवश्यकता नहीं, सामान्य
आभूषण ही पर्याप्त हैं। विशेष आभूषण गृहस्थी काम करने में
रुकावट डालते हैं और गिरने-पड़ने टूटने का भी भय रहता है।
शृंगार क्या है ? शरीर की सजावट। वह भी दो प्रकार की
होती है। एक असली और दूसरी नकली। असली वह है जो
शरीर की स्वाभाविक रूप-लावण्य और सुन्दरता में अर्थात्—सदा-
चार, संयम तथा ब्रह्मचर्य से प्राप्त होती है। उस पर स्वच्छ
सामान्य वस्त्र तथा केशविन्यास (बालों का सँवारना) ही सोने में
सुगन्ध का काम करता है। किन्तु जहाँ स्वाभाविक सुन्दरता नहीं
वहाँ नकली की आवश्यकता पड़ती है। इसी लिए चौंसठ कलाओं
का विधान किया गया है। जो सांसारिक कार्यों में बड़ी सहायक
होती हैं और जिनसे स्त्री पुरुष को प्रसन्न करने के लिए उन साधनों
से काम ले सके। उनमें से क्रियोपयोगी कुछ कलाएँ नीचे दी
जाती हैं।
४१४ असली कोकशास्त्र
केश विन्यास
सिर के बालों की अनेक विध रचना जिससे सौन्दर्य की विशेष
झलक आ जाय । उनमें सोने के कांटे और आभूषणादि भी सजाये
जाते हैं ।
नेत्र-रञ्जन
नेत्रों में अंजन आदि लगाना । जो नेत्रों के रोग नाश करने
वाला भी हो ।
करपदोपराग
हाथ और पाँव में मेंहदी से नाना प्रकार रचना करना । अथवा
आलता से रंगना । मेंहदी से हाथ पाँव की जलन भी नष्ट होती
है, जो स्त्रियों के लिए बहुत हितकर है ।
दशन-राग
दाँतों को खूब मोती के समान चमकदार बनाना । जिनमें
किसी प्रकार का मैल न रहे ।
मुख-विलास
जिह्वा को अच्छी प्रकार साफ कर मुख में इलायचो पान आदि
सुगन्धित वस्तु रखना । जो स्वास्थ्य के लिए भी हितकर हो ।
मस्तकाभ
माथे में सिन्धूर या ईङ्गुर आदि का विन्दु लगाना, और मुख
पर सौन्दर्यवर्द्धक वस्तु का प्रयोग करना । किन्तु ध्यान रहे वह
किसी प्रकार का रक्त विकार न उत्पन्न करती हो ।
असली कोकशास्त्र ४१५
पुष्पवेणि-बन्धन
बेला, चमेली, जूही आदि कलियों की माला बनाकर उससे
सिर के बालों को गूँथना। किन्तु ध्यान रहे कलियें मुरझाते ही
मालायें उतार डालनी चाहिएँ, नहीं तो दुर्गन्ध हो जाने से लाभ
के स्थान में हानि हीं पैदा हो जायगी।
केशरंजन
सिर को धोकर कंघी से साफ करना और सुगन्धित तेल
लगाना। सिर में तेल वही लगाना चाहिए जो फूलों से बसाया
हुआ हो। जो सेंटेड अर्थात् विलायती सेन्ट से मिलाकर बनाया
जाता है, वह कभी न लगाना चाहिए। क्योंकि उसके लगाने से
बाल बहुत जल्दी सफेद हो जाते हैं। आजकल लोग गरी का तेल
लेकर उसमें सेन्ट मिला लेते हैं जो बहुत किफायत पड़ता है किन्तु
यह उनकी भारी भूल है। गरी का तेल हमेशा बिना खुशबू का
सादा ही व्यवहार करना चाहिए। क्योंकि बाजार में भी वह सेन्ट
मिलाकर ही बेचा जाता है उसमें फूल नहीं बसाये जाते और न
उसमें फूल बस सकते हैं।
अलङ्कार
कान, नाक, गले और हाथों में पहनने के गहने सोने के और
पाँव तथा कमर में चाँदी के हलके नक्कासीदार होने चाहिएँ। हाथ
में चूड़ी, कान में कर्णफूल, गले में सिकड़ी, नाक में लौंग, पाँव में
बिछुआ पायजेब और कमर में करधनी होनी चाहिए। हाथ की