रतिरहस्य: असली कोकशास्त्र (पण्डित कोक्कोक - कामकला, दाम्पत्य-जीवन एवं सम्पूर्ण रति-विज्ञान)
Rati Rahasya or Asli Koka Shastra of Kokkoka with Hindi Commentary
पण्डित कोक्कोक (भाषा टीकाकार: पण्डित कन्हैयालाल) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअसली कोकशास्त्र ४११
दाँत मजबूत होंगे। नेत्रों का दुखना, जल गिरना, या सुर्खी आ
जाना, धुँधला, झायीं, माड़ा, फुल्ली आदि एक भी रोग न होने
पायगा और जिनके ये रोग हों यदि वे भी इसका निरन्तर प्रयोग
करें तो उनको भी अवश्य फायदा होगा
स्नान
नेत्र-स्नान के बाद सम्पूर्ण देह का स्नान कर डालना चाहिए।
स्नान कुएँ के ताजा जल से करना चाहिए क्योंकि वह ऋतु अनु-
सार गरम सर्द बना रहता है। जैसे लिखा है—
कूपोदकं वटच्छाया नारीणञ्चपयोधरम् ।
शीतकाले भवेदुष्णमुष्णकाले च शीतलम् ।
अर्थ—कुएँ का जल, बटवृक्ष की छाया तथा स्त्री-पयोधर उष्ण-
काल में स्वभाव से शीतल और शीतकाल में गरम हो जाते हैं।
इस लिए कुएँ के जल से खूब मल-मल कर नहाना चाहिए। सबसे
पहले शिर पर जल डालकर उसे अच्छी प्रकार धोना चाहिए और
फिर हाथ कमर और पेट पर पानी डालकर मले। तत्पश्चात् शेष
अंगों पर। इस प्रकार स्नान करने से शिर आदि सब अंगों की
गरमी पाँव की राह से नीचे को निकल जाती है। उसके विपरीत
करने पर उलटा परिणाम होता है अर्थात् निरोग के स्थान पर रोग
आ घेरते हैं। क्योंकि पाँव और उदर आदि की गरमी मस्तक पर