रतिरहस्य: असली कोकशास्त्र (पण्डित कोक्कोक - कामकला, दाम्पत्य-जीवन एवं सम्पूर्ण रति-विज्ञान)
Rati Rahasya or Asli Koka Shastra of Kokkoka with Hindi Commentary
पण्डित कोक्कोक (भाषा टीकाकार: पण्डित कन्हैयालाल) द्वारा
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लघुशङ्का
प्राचीनकाल से यह बात चली आती है कि जब कोई पेशाब
जाता है तब एक पात्र में जल ले जाता है। पेशाब हो लेने के बाद
इन्द्रिय को पानी से धो डालता है। कोई-कोई गमछे का एक
किनारा भिगोकर ले जाते हैं उसी से धो देते हैं। गमछे में जल ले
जाना अच्छा नहीं, क्योंकि वह पानी हाथ की गरमी से गरम हो
जाता है। ठण्ढे पानी से ही धोना हितकर है। यह एक प्रकार का
जल-चिकित्सा का एक भाग है। यह बड़ा ही लाभदायक है।
किन्तु आजकल लोगों ने इसे केवल शुद्धि का ही हेतु समझ रक्खा
है। मुसलमान लोग एक मिट्टी का ढेला जहाँ-तहाँ से उठा लेते
हैं वे भी पेशाब के बाद इन्द्रिय के मुँह पर लगा लेते हैं और कहते हैं
कि पेशाब का कतरा कपड़े पर गिरने से कपड़ा नापाक न हो जाय ।
उन्होंने भी शुद्धि के लिए मानकर ऐसा किया। यह उनकी भूल
है। क्योंकि जो ढेला वे उठाते हैं वह पहले किसी ने इस्तेमाल किया
या नहीं, इसका पता उन्हें नहीं लग सकता, इस लिए सम्भव हो
सकता है कि किसी गर्मी, सुजाक वाले मरीज ने उसे पहले इस्ते-
माल किया हो। ऐसे ढेले के व्यवहार से क्या हानि होगी यह आप
भलीभाँति समझ सकते हैं। दूसरे शुष्क मिट्टी के सम्बन्ध से वह
फल हासिल नहीं हो सकता जो जल से है। देखा-देखी नकल और
वह भी उल्टी करना अच्छा नहीं। वहाँ प्रयोजन केवल स्वच्छता