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रतिरहस्य: असली कोकशास्त्र (पण्डित कोक्कोक - कामकला, दाम्पत्य-जीवन एवं सम्पूर्ण रति-विज्ञान)

Rati Rahasya or Asli Koka Shastra of Kokkoka with Hindi Commentary

पण्डित कोक्कोक (भाषा टीकाकार: पण्डित कन्हैयालाल) द्वारा

DevanagariHindipublished440 पृष्ठ

असली कोकशास्त्र ३६१
खींच कर पानी पीना, लपलपा कर नहीं, जन्मते ही आँखों का
खुलना, बन्द रहना । इन दोनों पशुओं में कितना भारी अन्तर है ।
इस तुलना से देखे कि वह निरामिषभोजियों की समता रखता
है या आमिषभोजियों की । इस प्रकार मिलान करनेसे स्पष्ट मालूम
हो जायगा कि मनुष्य निरामिषियों का ही सहयोगी है आमिषियों
का नहीं । इस लिए उसे मांस अवश्य त्याग देना चाहिए ।
शास्त्रविधि से भी निषेध पाया गया और ईश्वरीय रचना से
भी यही सिद्ध हो रहा है कि मनुष्य की खुराक मांस नहीं । योरुप
आदि देशों के अनुभवी डाक्टर भी इसका निषेध कर रहे हैं और
स्पष्ट आदेश कर रहे हैं कि यह बहुत हानि पहुँचाने वाला है। अब
हम एक दूसरी विधि से भी प्रकाश डालना चाहते हैं जो हमारे इस
प्रकृत विषय से सम्बन्ध रखता है—
स्वास्थ्य और मांस
माँस स्वास्थ्य के लिये कैसा है ? विचार करने से यह मालूम
होता है कि माँस खाने से जितनी बड़ी और जल्दी बीमारी पैदा
होती है उतनी और किसी से नहीं। जिस प्रकार से मनुष्य को
संक्रामक रोग होते हैं उसी प्रकार पशु-पक्षियों को भी होते हैं।
मानिये किसी तपेदिक के रोगी ने कफ थूका या दमे के रोगी ने
थूका; उस कफ को मुर्गा-मुर्गी ने खाया जो प्रायः गली कूचों और
कतवारखानों में ढूँढ़-ढूँढ़ कर खाया करते हैं। और उसका विषैला

३६२ असली कोकशास्त्र
असर उस जानवर के माँस में प्रविष्ट हुआ । उस जीव को जो कोई
भी खायगा उसे बीमारी क्यों न होगी। लोग यह कहते हैं कि मुर्गी
को वह रोग क्यों नहीं हुआ ? सम्भव है मुर्गी उस रोग से पीड़ित
हो या न हो। किन्तु उसका असर उसके माँस में तो अवश्य रह
सकता है। इसका प्रतिवाद कोई नहीं कर सकता। जिसका अकाट्य
प्रमाण आगे दिया जाता है। जिस चील्ह ने मरा हुआ सर्प खाया
हो, उसकी बीठ कुत्ता खा लेने से पागल हो जाता है और वह
कुत्ता जिस-जिस को काटता है, यदि उसकी यथोचित औषध न की
जाय तो वह अवश्य मर जाता है।
इस उदाहरण में देखा जाता है कि खाये हुए सर्प के विष से
चील्ह और गीध नहीं मरते और न पगलाते ही हैं। किन्तु उसकी
बीठ खाने वाले कुत्ते स्यार आदि जीव पगलाते और मरते भी हैं।
क्या बीठ मात्र में उसके विष का असर खतम हो जाता है। उत्तर
स्पष्ट है नहीं, क्योंकि देखा जाता है, चील्ह का मांस कोई जीव
नहीं खाता और न गलाने से गलता ही है। इसका क्या कारण ?
इसका कारण है सर्प के विष का असर है, क्योंकि देखा जाता है
जिस मनुष्य को सर्प काट लेता है उसे भी कोई जीव या जल-जन्तु
नहीं खाते। इससे स्पष्ट हो गया कि सर्प का विष ही इसका कारण
है, जो मनुष्य और सर्पाहारी जीवों के शरीर में व्याप्त होता है।
—o—

असली कोकशास्त्र ३६३
प्राणायाम का फल
वायु में बड़ी शक्ति है। जब वह मोटर के टायर में भर दी
जाती है तब वह कितने वजन को कितनी आसानी से हवा की तरह
उड़ा ले जाती है, यह बात किसी से छिपी नहीं। प्रो० राममूर्त्ति
इसी के बल पर अस्सी मन का पत्थर छाती पर रखते थे और हाथी
को पीठ पर चढ़ाते थे। वायु का शरीर में संग्रह प्राणायाम से ही
होता है। प्राणायाम कहते हैं, प्राण के आयाम अर्थात् प्राण की
लम्बाई को। प्राण के लम्बा बढ़ा लेने से योगियों की आयु बढ़
जाती है। इस लिए जो भी प्राणायाम करेगा वह अवश्य स्वस्थ
ताक़तवर होगा और उसकी जीवन-शक्ति बढ़ेगी।
प्राणायाम में तोन क्रियायें करनी पड़ती हैं। पहली क्रिया पूरक
अर्थात् प्राणवायु को अत्यन्त धीरे-धीरे नासिका द्वारा अन्दर
खींचने का नाम पूरक है। दूसरी क्रिया कुम्भक अर्थात् भीतर
खींची हुई वायु को, खींचने के दुगुने तिगुने काल तक अन्दर रोक
रखने का नाम कुम्भक है। तीसरी क्रिया रेचक अर्थात् भीतर ली
हुई वायु को अत्यन्त धीरे-धीरे बाहर निकालने का नाम रेचक है।
पहली ओर तोसरी क्रिया करने में वायु के जाने का शब्द अपने को
भी सुनायी नहीं देना चाहिए।
धीरे-धीरे प्राणायाम का काल बढ़ाना चाहिए, एक साथ
बढ़ाने से लाभ के स्थान में हानि होने की सम्भावना है।

३६४ असली कोकशास्त्र
जल
जल हमारे बहुत काम में आता है। इसके बिना हमारा एक
भी काम नहीं चलता, आटा सानने दाल, भात, तरकारी आदि
सभी खाद्य वस्तुओं के बनाने तथा पीने के काम में आता है। हमारे
शरीर तथा भोजन में सत्तर फीसदी जल का अंश माना गया है।
इस लिए जल के दूषित होने से भी हमारा स्वास्थ्य बहुत शीघ्र
खराब हो सकता है। हलका जल मधुर तथा स्वादिष्ट है और
वह हमारे लिए स्वास्थ्यप्रद् भी है। भारी पानी नहीं। वह पीने में
खारी होता है। उसे यदि पीना पड़े तो औटाकर पीना चाहिए, तब
कोई हानि नहीं पहुँचायगा। जल हमेशा मोटे कपड़े से छानकर
पीना चाहिए। मनुष्य को प्रतिदिन दिनभर में अन्न से अठगुना
जल पीना चाहिए। ऋतु अनुसार कमोवेश भी किया जा सकता है।
जब नगर में रोग फैल जाता है अथवा फैलने की सम्भावना
होती है तब प्रायः बराबर देखने में आता है कि म्युनिसिपैलिटी की
ओर से नगर के सभी कुओं में लाल बुकनी डाली जाती है। इसका
प्रयोजन केवल रोगकारक कीटाणु मारकर जल साफ करना होता
है। अनेक स्थानों पर बिना बुझा चूना भी डालते हैं, उससे भी
यही लाभ होता है।
—०—

असली कोकशास्त्र ३६५
सिगरेट और बीड़ी
यह दोनों चीजें बहुत ही विषधर हैं, बीड़ी की अपेक्षा सिगरेट
में दुने नशे का प्रयोग किया जाता है। एक तमाखू दूसरा अफीम,
तमाखू के पत्तों पर अफीम का पानी छिड़का जाता है यदि नशा
अधिक तेज करना हो तो अफीम के पानी में पत्ते भिगो दिये जाते
हैं जो नशा बहुत लाते हैं। “नीम चढ़े करेले” की तरह इनका
असर होता है। इनका पीनेवाला यदि इन्हें छोड़ना चाहे तो कठि-
से छोड़ पाता है। बीड़ी, तमाखू, सिगरेट, भाँग, चाय, काफी,
कोको, आदि नशीली चीजों पर अब हम विशेष और कुछ अधिक
न लिखकर सर्व देश प्रसिद्ध महात्मा गाँधी के लिखे आनुभविक
भोजन विषयक लेख का कुछ अंश यहाँ नीचे उद्धृत कर देते हैं ।
“हमें कौन सी चीज खानी चाहिए, इसके पहले यह देख लेना
आवश्यक है कि हमें कौन सी चीज न खानी चाहिए । मुख की
राह से शरीर के अन्दर जाने वाली चीजों की गिनती यदि हम
अनाज शब्द में करें तो शराब, बीड़ी, तम्बाकू, भाँग, चाय, काफी
कोको और मसाला इत्यादि भी अनाज ही है ।
मुझे अनुभव से मालूम हुआ है । यह सब चीजें छोड़ने के
लायक हैं, इनमें से कुछ चीजों का अनुभव तो खुद ही किया है,
और कुछ के सम्बन्ध में दूसरों के अनुभव से लाभ उठाया है ।
शराब और भाँग को हर धर्म दूषित ठहराया गया है। फिर

३६६ असली कोकशास्त्र
भी शायद ही कोई इनके पीने से परहेज करता हो । शराब से
हजारों घर धूल में मिल गये । लाखों आदमियों का सत्यानाश हो
चुका । शराबी को किसी बात का ज्ञान नहीं रहता । प्रायः वह
माता, स्त्री और लड़की का भेद तक भूल जाता है । शराब से मनुष्य
का मेदा जल जाता है अन्त में वह पृथिवी का भार हो जाता है ।
शराबी मोरियों में पड़े नजर आते हैं अच्छा मनुष्य भी शराब से
कौड़ी का तीन हो जाता है । इस व्यसन से घिरे मनुष्य, होश-
हवास ठीक होते भी निकम्मे देख पड़ते हैं । मन पर उनका अधि-
कार नहीं होता, सदा शेखचिल्लियों के से मनसूबे बाँधा करते हैं ।
इस लिए शराब और इसी की सगी बहन भाँग दोनों चीजें बिलकुल
त्यागने योग्य हैं; इसमें दो मत नहीं हो सकते । कुछ लोग कहते हैं,
दवा की भाँति शराब पीने में कोई हर्ज नहीं । परन्तु असल में इतनी
की भी जरूरत नहीं । यूरोप—जो शराब का घर है—उन डॉक्टरों
की भी यही राय है । पहले अनेक बीमारियों में शराब काम में
आती थी, परन्तु वहाँ अब बिलकुल बन्द हो गई है । असल में तो
दवा की दलील ही निराधार है । शराब के पक्षपाती दिखाना चाहते
हैं कि जब शराब दवा के काम में आ सकती है, तब उसे पीने के
काम में लाना क्या बुरा है । परन्तु विष भी तो दवा की भाँति काम
आता है तो भी कोई उसे खुराक की भाँति बरतने का विचार
तक नहीं करता । हो सकता है, कुछ बीमारियों में शराब से लाभ
पहुँचे, पर हानि इतनी हो चुकी है कि विचारवान मनुष्य को चाहिए

असली कोकशास्त्र ३६७
कि जान जाने दें, पर शराब दवा की भी न ले। शराब से इस
शरीर की भलाई होने में जहाँ सैकड़ों मनुष्यों को बुरा होता है वहाँ
ऐसे शरीर की रक्षा न कर उसे नष्ट ही हो जाने देना चाहिए।
हिन्दुस्तान में लाखों मनुष्य ऐसे हैं जो वैद्य के कहने पर भी शराब
न पीवेंगे। वे शराब पीकर वा अपनी समझ में बुरी चीजों का
प्रयोग कर जीना नहीं पसन्द करते। अफीम का विचार भी शराब
के साथ ही करना चाहिए। अफीम का नशा शराब से भिन्न है;
फिर भी उससे शराब से कम बुराई नहीं होती। अफीम के फेर में
पड़कर चीन जैसे बड़े राष्ट्र की प्रजा पायी हुई स्वतन्त्रता खो बैठी।
हमारे जागीरदार भी अफीम के चंगुल में पड़कर अपनी-अपनी
जागीरों से हाथ धो बैठे।
शराब भाँग और अफीम की बुराइयाँ तो साधारण पाठकों
की समझ में तुरन्त आ जाती हैं, और बीड़ी तम्बाकू की नहीं
आतीं। बीड़ी और तम्बाकू ने मनुष्य जाति पर अपना ऐसा असर
जमा रखा है कि उसके मिटने में एक जमाना लगेगा। छोटे-बड़े
सभी इसके फेर में पड़े हैं। अच्छे भलेमानस भी बीड़ी सिगरेट का
व्यवहार करते हैं। इनके पीने में कोई शरम नहीं समझी जाती।
मित्रों की खातिर का यह एक महान् साधन बन गई है। दिन-दिन
इनका प्रचार बढ़ता जाता है सर्वसाधारण को इस बात की खबर
नहीं कि सिगरेट का व्यसन बढ़ाने के लिए सिगरेट के व्यापारी
लोग उसकी बनावट में हजारों तरकीबें लड़ाते हैं। जर्दे तम्बाकू में

३६८ असली कोकशास्त्र
अनेक प्रकार के सुगन्धित तेजाब छिड़कते हैं और अफीम का पानी
मिलाते हैं। इससे सिगरेट हम पर अधिकाधिक अधिकार जमाती
जाती है। उसके लिए नोटिसबाजों में हजारों पौंड खर्च किये जाते
हैं। यूरोप में सिगरेट कम्पनियाँ अपने छापेखाने चलातीं, वायस-
कोप खरीदतीं, अनेक प्रकार की इनाम बाँटतीं, लाटरियाँ निकालती
और नोटिसबाजी में पानी की तरह पैसा बहाती है। फल यह हुआ
कि स्त्रियों तक को सिगरेट की आदत लग गई है। सिगरेट पीने पर
कविताएँ भी बनायी गई है, इनमें सिगरेट को “गरीब, नेवाज”
( दीनबन्धु ) की उपमा दी गई है।
सिगरेट तम्बाकू से होने वाली हानियों की गिनती नहीं हो
सकती। सिगरेट पीने वाले मनुष्य का व्यसन इतना अधिक बढ़
जाता है कि वह बिना किसी का परवा किये दूसरे के घर में बिना
इजाजत ही सिगरेट का धुआँ उड़ाने लगता है, किसी की शरम
नहीं रखता।
देखा गया है कि सिगरेट और तम्बाकू पीने वाला मनुष्य

असली कोकशास्त्र १६६
सिगरेट पर स्वर्गीय टालस्टाय ने लिखा है कि एक मनुष्य के
मन में अपनी स्त्री के खून करने का विचार आया। छुरा निकाल,
चलाने को तैयार हुआ, पछताया और पीछे हट गया। फिर सिगरेट
पीने बैठा, सिगरेट के जहर से अक्ल पर पर्दा पड़ गया; तब
उसने खून किया। मि० टालस्टाय तम्बाकू को एक सूक्ष्म प्रकार का
और कई अंशों में शराब से भी खराब नशा मानते थे।
सिगरेट का खर्च भी कुछ कम नहीं। कुछ मनुष्यों को चुरुट
के पीछे हर महीने ५ पौंड अर्थात् ७५) रुपये तक खर्च करते मैंने
अपनी आँखों देखा है।
सिगरेट से पाचनशक्ति कम हो जाती है। भोजन का स्वाद
नहीं मिलता। अन्न फीका मालूम होता है, इस लिए उसमें मसाला
इत्यादि डालना पड़ता है। सिगरेट पीने वाले की साँस से बदबू
निकलने लगती है। उसका धुआँ हवा को बिगाड़ता है। कितनी
ही बार मुँह में फफोले पड़ आते हैं। मसूड़े और दाँत काले या
पीले पड़ जाते हैं इससे कितनी ही लोगों को बड़ी ही भयंकर
बीमारियाँ हो जाती हैं। समझ में नहीं आता कि शराब के निन्दक
सिगरेट क्यों पीते हैं ? सिगरेट का जहर सूक्ष्म है, शायद इसीसे
उसका प्रयोग करते हैं। जो निरोग रहना चाहते हैं उन्हें सिगरेट
पीना जरूर छोड़ देना चाहिए।
शराब, तम्बाकू, बीड़ी और भाँग इत्यादि व्यसन हमारे शरीर
का आरोग्य हर लेते हैं; मन और धन के आरोग्य का भी हरण

४०० असली कोकशास्त्र
करते हैं। इनसे हमारे आचरण का नाश होता और हम व्यसनों
के गुलाम बन जाते हैं।
लोगों के मन में यह बैठाना बहुत कठिन जान पड़ता है कि
चाय, काफी और कोको बुरी चीजें हैं। पर, चाहे जो हो कहना
ही पड़ता है कि ये सब चीज बुरी है। इनमें एक विशेष प्रकार का
नशा होता है। यदि चाय और काफी के साथ दूध शक्कर न हो तो
इनमें एक भी पुष्टिकारक पदार्थ नहीं। केवल चाय और काफी पर
जीवन निर्वाह करके कितने ही प्रयोग किये गये। सिद्ध यही हुआ
कि इनमें खून बढ़ाने वाली चीजें बिलकुल नहीं हैं। हम लोग कुछ
वर्ष पहले साधारण तौर पर चाय और काफी नहीं पीते थे, कहीं
किसी विशेष अवसर पर या दवा में इन्हें पी लेते थे, परन्तु अब
नई रोशनी के कारण चाय और काफी साधारण वस्तु बन गई है।
अब तो हम केवल मिलने आने वाले मेहमानों तक को ये चीजें
पिलाते हैं। चाय की पार्टियाँ देते हैं। लार्ड कर्जन के शासनकाल
से तो चाय ने और भी हाथ-पैर फैला दिये हैं। इन साहब बहादुर
ने चाय के व्यापारियों को उत्तेजना दे देकर चाय का प्रचार घर-
घर करा दिया और लोग जहाँ पहले आरोग्यकारक चीजें पीते थे
वहाँ अब रोगकारी चाय पीने लग गये हैं।
कोको बहुत नहीं फैला, क्योंकि वह चाय से कुछ महँगा है।
सौभाग्य से हम लोगों को इसका परिचय बहुत कम है, फिर भी
फैसनेबुल घरों में उसकी पूर्ण सत्ता है।

! "स्त्रियाँ और"!
Now look at line 20:
"हजारों [glyph] के ज्ञान" -> wait, what is after the glyph?
It is: [glyph] + [matra i] + य + ाँ = "स्त्रियाँ के"!
Wait, does it say "स्त्रियाँ के" or "स्त्रियों के"?
Look at line 20:
It is 'स्त्रियाँ' (there is a chandrabindu, though faint, or is it 'स्त्रियों' with a matra 'ो'? No, it has an 'ा' bar, not 'ो'!). But wait, is there a chandrabindu on line 20? No, wait, look above: it has no 'े' or 'ो' matra. It says "स्त्रियाँ के" or "स्त्रियों के"? Wait, actually it looks like "स्त्रियों के" or "स्त्रियाँ"? Wait, let's look at the letter:
After [glyph+i] is 'य' and 'ा'. Wait, is there an anusvara? In Hindi, people often write "स्त्रियों" or "स्त्रियों" - wait, in line 20, look at: "हजारों स्त्रियाँ के" or "स्त्रियों"?
Wait, look at line 20:
"हजारों" -> र + ों (with anusvara and matra).
Then: "स्त्रियों"? No, the letter has NO top slant! It has an 'ा' stem: "स्त्र

४०२ असली कोकशास्त्र
आरोग्य को कितनो हानि पहुँचती है। काफी के सम्बन्ध में एक
दोहा प्रचलित है:—
“कफ छांटे, बादी हरे, करे धातु बल छीन ।
रक्तहिं पानी सम करे, दो गुन अवगुन तीन ॥”
यह दोहा बिल्कुल ठीक मालूम होता है। निःसन्देह काफी में
कफ और बादी हरने की शक्ति है। पर अन्य चीजों में भी यह
शक्ति मौजूद है। इन कारणों से काफी पीने वाले अदरख का रस
पीयें तो काफी की आवश्यकता पूरी हो जायगी। याद रहे कि धातु
जैसी अमूल्य चीज को जिस वस्तु से हानि पहुँचे, जिससे बल का
क्षय हो, जो रक्त को पानी कर दे, उसे त्यागने ही में कल्याण है।
कोको में भी ये सब दोष हैं। चाय के समान इसमें वह तत्त्व
मौजूद है जो चमड़े को बिल्कुल संज्ञाशून्य बना देता है।
जो लोग आरोग्य में नीति का समावेश करते हैं उनके सामने
इन तीनों वस्तुओं के सम्बन्ध में नीचे लिखी दलीलें पेश की जा
सकती हैं। चाय काफी और कोको अधिकांशतः उन मजदूरों के द्वारा
उत्पन्न की जाती है जो शर्त्तबँधे कुली बनकर चाय के बगीचों में जाते
हैं। जहाँ कोको की उपज होती है वहाँ मजदूरों पर होते हुए जुल्मों
को यदि अपनी आँखों से देख लें तो उसके ग्रहण की जरा भी
इच्छा न करें। कोको के खेतों में होने वाले जुल्मों पर बड़ी-बड़ी
पुस्तकें लिखी जा चुकी हैं। यदि हम सब अपनी खुराक की उत्पत्ति
के विषय में पूरा ज्ञान प्राप्त करें तो १०० में से ९० वस्तुओं का

असली कोकशास्त्र ४०३
त्याग अवश्य कर दें।
इन तीन वस्तुओं के बदले नीचे लिखे ढंग से निर्दोष ओर पुष्टि-
कर चाय बन सकती है। इसे चाय के नाम पर मजे में पी सकते
हैं। काफी ओर निर्दोष चाय के स्वाद में इतना कम अन्तर है कि
उसे काफी पीने वाले भी नहीं समझ सकते। पहले गेहूँ को साफ
तवे या कड़ाही में या चूल्हे पर भूनना चाहिए। खूब लाल होकर
कलछाने लगने पर उतार लिए जायँ ओर दाल दलने की छोटी
चक्की में साधारण तौर पर बारीक दल लिए जायँ। इसमें से एक
चम्मच भर कर पियाले में डालकर उस पर उबलता हुआ पानी
डाल दें। यदि इसे एक मिनट तक चूल्हे पर चढ़ा रहने दें तो
भी अच्छा हो। आवश्यकता जान पड़े तो दूध और शक्कर भी इसमें
मिला ली जाय। दूध और शक्कर के बिना भी इसे पी सकते हैं।
पाठक इसका प्रयोग करके देख सकते हैं। इसे ग्रहण कर जो लोग
चाय, काफी और कोको छोड़ देंगे उनके पैसे बचेंगे और स्वास्थ्य-
रक्षा भी होगी।
जिन पाश्चात्य देशों में इन नशीले द्रव्यों का सेवन अधिक
रूप से होता था उन्हीं में हार्टफेल का रोग होता था। अब जब
से भारतवर्ष में नशों का आधिक्य हुआ है तब से यहाँ पर भी हृत्कंपना-
वरोध (हार्टफेल) का रोग फैल गया है। चलता-फिरता मनुष्य
मार्ग में ही लेट जाता है और किसी से कुछ नहीं कह पाता। यह
भयंकर रोग फेफड़ों की कमजोरी से, रक्त साफ न होने के

४०४ असली कोकशास्त्र
कारण विषाक्त होकर हृत्कंपन को रोक देता है। इस लिए यदि
जीवन चाहते हों और वह भी स्वास्थ्यप्रद, तो आज से ही इन
नशीले प्राणघातकी द्रव्यों का सेवन छोड़ दें, उसी में सब का
कल्याण है।
—*—
नकछिकनी
दूसरी है नकछिकनी जिसे लोग सुँघनी कहते हैं। यह पिसी
हुई तमाखू होती है। यह इतनी बारीक होती है कि नाक के पास
आते ही स्वास के साथ दिमाग में चढ़ जाती है, जिससे छींक पर
छींक आने लगती है और आँख नाक से पानी निकलने लगता है।
कई मनुष्यों को इसका इतना अभ्यास बढ़ जाता है कि वे प्रतिक्षण
नासदानी हाथ में लिए रहते हैं और उनकी नाक के नथुने बराबर
भरे रहते हैं। यह वह हालत हुई कि “गये थे नमाज पढ़ने और
रोजे गले लग गये” लगे थे सर्दी दूर करने और दूसरा रोग पीछे
लग गया। नांस लेने वाले के हाथ हमेशा गन्दे रहते हैं और सुर्र-
सुर्र हमेशा नाक बहा करती है। नास वाले को शिर के सभी रोग
हो जाते हैं। नेत्रों से जल गिरता रहता है स्मरणशक्ति घट जाती
है। इसको सुँघनी न कहकर नकछिकनी ही कहना उचित है क्यों
कि-“यथा नाम तथा गुणः” जैसा नाम वैसे ही गुण भी है।
इस वस्तु को भी विचारवान पुरुषों को छोड़ देना चाहिए क्योंकि

असली कोकशास्त्र ४०५
शिर की कोई भी इन्द्रिय इसे स्वीकार नहीं करती बल्कि प्रत्यक्ष
रो रो कर आँसू बहाती हैं और इस बात का संकेत करती हैं कि
अय मनुष्य ! इस बला को जबरदस्ती न ठूँस, नहीं तो आखिर को
तुम्हे हमसे हाथ धोना पड़ेगा ।
शौच
प्रातःकाल रात्रि के चौथे प्रहर में अर्थात् चार बजे उठकर
सबसे पहिले बिस्तर पर बैठकर पाँच मिनट तक ईश्वर का ध्यान
और फिर कुल्ला कर बासी मुँह डेढ़ पाव या आधसेर पानी पीकर
टहले इससे पाखाना अच्छी तरह साफ आवेगा और कब्ज नहीं
होगी । पहिले-पहल सर्दी हो जाने का डर है । किन्तु उसकी परवाह
न करनी चाहिए, वह स्वयं अच्छी हो जायगी । शौच होकर
आवदस्त ले लेने पर मूत्रेन्द्रिय की खाल हटाकर ठण्डे पानी से
अच्छी तरह धो डालना चाहिए । इसके बाद दतौन, स्नान आदि
करना चाहिए । तत्पश्चात् सन्ध्या सूर्य उदय से पूर्व तारों की छाया
में समाप्त कर देनी चाहिए इतने काम सूर्य उदय के पूर्व अवश्य
हो जाने चाहिएँ ।

४०६ असली कोकशास्त्र
लघुशङ्का
प्राचीनकाल से यह बात चली आती है कि जब कोई पेशाब
जाता है तब एक पात्र में जल ले जाता है। पेशाब हो लेने के बाद
इन्द्रिय को पानी से धो डालता है। कोई-कोई गमछे का एक
किनारा भिगोकर ले जाते हैं उसी से धो देते हैं। गमछे में जल ले
जाना अच्छा नहीं, क्योंकि वह पानी हाथ की गरमी से गरम हो
जाता है। ठण्ढे पानी से ही धोना हितकर है। यह एक प्रकार का
जल-चिकित्सा का एक भाग है। यह बड़ा ही लाभदायक है।
किन्तु आजकल लोगों ने इसे केवल शुद्धि का ही हेतु समझ रक्खा
है। मुसलमान लोग एक मिट्टी का ढेला जहाँ-तहाँ से उठा लेते
हैं वे भी पेशाब के बाद इन्द्रिय के मुँह पर लगा लेते हैं और कहते हैं
कि पेशाब का कतरा कपड़े पर गिरने से कपड़ा नापाक न हो जाय ।
उन्होंने भी शुद्धि के लिए मानकर ऐसा किया। यह उनकी भूल
है। क्योंकि जो ढेला वे उठाते हैं वह पहले किसी ने इस्तेमाल किया
या नहीं, इसका पता उन्हें नहीं लग सकता, इस लिए सम्भव हो
सकता है कि किसी गर्मी, सुजाक वाले मरीज ने उसे पहले इस्ते-
माल किया हो। ऐसे ढेले के व्यवहार से क्या हानि होगी यह आप
भलीभाँति समझ सकते हैं। दूसरे शुष्क मिट्टी के सम्बन्ध से वह
फल हासिल नहीं हो सकता जो जल से है। देखा-देखी नकल और
वह भी उल्टी करना अच्छा नहीं। वहाँ प्रयोजन केवल स्वच्छता

असली कोकशास्त्र ४०७
ही नहीं प्रत्युत रोग नाश भी है । “एकाक्रिया द्व्यर्थकरी प्रसिद्धा”
“आम के आम और गुठली के दाम” इसी को कहते हैं अर्थात्—
शुद्धता की शुद्धता और रोग का भी नाश !
—०—
तैल मर्दन
तैल खाने की अपेक्षा शरोर पर मर्दन करने में घी खाने से भी
कई गुणा अधिक शक्ति प्रदान करता है शरीर पर कान्ति, खाल
पर चमक और मजबूती के साथ मुलाइमियत लाता है । स्फूर्ति,
हलकापन और नैरोग्यता प्रदान करता है । देह में खसरा, खुजली
आदि रोगों को उत्पन्न नहीं होने देता । अंगों को मोटा और सुडौल
करता है । बुढ़ापे तक अंगों को जकड़ने नहीं देता । चाहे कितना
भी परिश्रम किया हो उसकी थकावट क्षणों में दूर करता है ।
तैल की मालिश करने, के लिए दो आदमियों की आवश्यकता
है, एक तेल मलने वाला और दूसरा मालिश कराने वाला । किसी
अच्छे स्वच्छ खुले स्थान में बैठकर जहाँ तेज हवा न आती हो
मालिश करें । मालिश में कड़ुआ तेल काम में लाना चाहिए । शुद्ध
कड़ुआ सरसों का तेल छटाँक डेढ़ छटाँक लेकर साफ कपड़े से
छान ले । तत्पश्चात् मालिश करने वाला दोनों हाथों में लगाकर
जिसके मालिश करनी हो उसके सिर में और तालू पर लगाकर
हाथ की दोनों हथेली से घर्षण करे । इसी प्रकार जल्दी-जल्दी

४०८ असली कोकशास्त्र
हाथ बदलता जाय जिससे हाथ गरम न होने पाये और तेल रमता
जाय हाथों की तली गरम होने से दोनों को नुकसान है अर्थात्
मस्तक में गरमी पहुंचने से बुद्धि की हानि और बालों के संघर्ष से
एक प्रकार की विद्युत पैदा होती है जो हाथ की हथेलियों के मार्ग
से मर्दनकर्त्ता के मस्तक में हानि पहुँचाती है। कनपुटियों को अँगु-
लियों के अग्रभाग से मर्दन करे। तत्पश्चात् गर्दन और बाँहों को
पहले धीरे-धीरे जब गरम हो जाय तब बलपूर्वक मर्दन करे। इसी
प्रकार सब अंगों में सब तेल रमा दे। डेढ़-दो घण्टे के बाद जब
अच्छी प्रकार ठण्डा हो जाय तब साबुन से स्नान करे। इस प्रकार
मर्दन किया हुआ तैल अपूर्व फल देता है।
—०—
मञ्जन
दाँतों में कीड़ा नहीं लगेगा, मुँह से बदबू नहीं आयेगी। पाचन-
शक्ति बढ़ जायगी, पेट का कोई रोग नहीं होगा। कारण यह कि
प्रतिक्षण मुँह में थूक आता रहता है और दाँतों की जड़ों में से
होकर ओठों से टकरा भीतर लौट जाता है। फिर वह कण्ठ से नीचे
उदर में पहुँच जाता है तथा भोजन के हजम होने में बड़ी सहायता
करता है। साफ कहना चाहिए कि वही लार मुख में दाँतों की रगड़
के संसर्ग से अमृत बन जाती है और अमृत-कूप जहाँ उस लार के
ठहरने का स्थान है वहाँ पहुँच जाती है। यथार्थतः जो कण्ठ में

असली कोकशास्त्र ४०६
नासारन्ध्र के समीप अमृत-कूप है, उसमें जो जल, तत्व का दन्त-
श्रेणी के संघर्ष से मधुरामृतमय भाग तैयार होता है वह जाकर
ठहरता है। जिससे वह कूप सदैव भरा रहता है। योगी लोग जब
जबान को लौट कर उस अमृत-कूप के पास ले जाते हैं तब उन्हें
अमृत-कूप से गिरी हुई मधुर अमृतमयी बूँद के स्वाद का आनन्द
मिलता है।
जो लोग वैसा अभ्यास करते हैं उन लोगों को भी उपरोक्त
आनन्द का अनुभव होता है। हम लोगों के पेट में वह बराबर बूँद
बूँद होकर टपकता रहता है जो खाये हुए पदार्थ के लिए अमृत
होता है। यदि दाँतों की सफाई नहीं रक्खी जायगी तो वही अमृत,
विष हो जायगा। क्योंकि दाँतों में सड़े हुए बदबूदार मैल से लग-
कर लार में विष उत्पन्न हो जाता है और वह अमृतकूप को विष-
कूप बनाती हुई पेट में पहुँच कर कीड़े, अजीर्णता आदि अनेक रोग
पैदा कर देती है। इस लिए स्वास्थ्य चाहने वाले मनुष्यों को हमेशा
दाँत साफ रखने चाहिएँ । ताजी दतौने का रस मसूड़ों को पुष्ट
करता है।
पेट की कब्ज जबान से देख ली जाती है। जब पेट में अनुचित
मल का भाग होता है, तब जबान पर मैल जम जाता है। पेट के साफ
रहने पर नहीं रहती। इसी लिए वैद्य लोग जबान देखते हैं। दाँत और
जबान साफ रखने वाले का कभी पेट गन्दा नहीं रह सकता ।
दतौन के साथ यदि दन्त-मञ्जन भी प्रयोग कर लिया करें तो

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सोने में सुगन्ध का काम हो जाय। अर्थात् सफेद सेंधा नमक खूब
बारीक पीसकर शुद्ध सरसों के थोड़े तेल में मिला लें और दतौन
की कूची के साथ अथवा अँगुली द्वारा दाँतों तथा मसूड़ों पर रगड़े।
इससे मसूड़ों का कोई रोग नहीं होता और सफाई बहुत जल्दी
होती है। नमक विष-हर है। जिनके मसूड़ों से खून जाता हो वे
अवश्य इस मंजन का प्रयोग करें उन्हें तत्काल इसका लाभ मालूम
होगा और कुछ दिन प्रयोग करने पर यह रोग सदैव के लिए
चला जायगा।
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नेत्र स्नान
दन्तधावन करने के बाद मुँह में पानी भरकर, एक लोटे में
पानी ले और दूसरे हाथ की अँजली भर कर आँख खोल उसमें छींटे
दे, एक लोटा पानी खतम हो जाने पर मुँह का पानी निकाल दे
और फिर उसी प्रकार दुबारा मुख में पानी भर कर आँखों में छींटे
दे। इस प्रकार कम से कम दस सेर पानी काम में लाना चाहिए।
इसका फल यह होगा कि नेत्रों की ज्योति बढ़ेगी और गयी हुई
रोशनी भी फिर से लौट आयेगी। मस्तक की स्मरण-शक्ति बढ़ेगी,
सिर दर्द आदि सिर के सभी प्रकार के रोग नष्ट होंगे। सिर के
काले बाल असमय में सफेद न होने पायेंगे। यदि सफेद हो गये
हों तो इसके कुछ वर्ष लगातार प्रयोग से फिर काले हो जायेंगे।