रतिरहस्य: असली कोकशास्त्र (पण्डित कोक्कोक - कामकला, दाम्पत्य-जीवन एवं सम्पूर्ण रति-विज्ञान)
Rati Rahasya or Asli Koka Shastra of Kokkoka with Hindi Commentary
पण्डित कोक्कोक (भाषा टीकाकार: पण्डित कन्हैयालाल) द्वारा
३१२ असली कोकशास्त्र
१५—थोड़ा-सा छाछ (मट्ठा) का सेवन करना बड़ा ही
लाभदायक है। वैद्यक ग्रन्थों में इसकी बड़ी प्रशंसा लिखी है।
स्वास्थ्य के लिए यह बड़ी ही उपयोगी वस्तु है।
१६—अपनी सुविधा के अनुसार ताजे और आरोग्य फलों
का सेवन किया करो।
१७—सबेरे कुछ रात शेष रहते ही उठने की आदत डालो।
शय्या से उठते ही परमात्मा का ध्यान किया करो। बाद शौचादि
से निवृत्त होकर व्यायाम करो। व्यायाम उतना ही करो, जितने से
थकावट न मालूम हो।
१८—चटपटी, मसालेदार और बाजार की बनी हुई चीजें
(मिठाई पूड़ी आदि) कभी मत खाओ।
१९—मुँह से कभी साँस मत लो। यदि इसकी आदत पड़
गयी हो तो शीघ्र इस दोष से अपना पिण्ड छुड़ाओ। मुँह से साँस
लेना बड़ा ही हानिकारक है। कारण यह कि मुँह के रास्ते से जो
हवा भीतर जाती है, वह छनकर नहीं जाती। अतः वायु में उड़ने
वाले अनेक सूक्ष्म तथा विषैले जीवाणु एवं समन्वित धूलि-कण या
ऐसा ही कोई दूसरा मल शरीर के भीतर चला जाता है जो कि
नाना प्रकार के रोग उत्पन्न करने का कारण होता है; किन्तु नासिका
द्वारा साँस लेने से उक्त चीजें नासिका-द्वार में ही अटक जाती हैं।
मुख द्वारा श्वासन-क्रिया करनेवालों के फेफड़े में रोगों को उत्पन्न
करनेवाले नाना प्रकार के परमाणु एकत्र हो जाते हैं। नासिका के
असली कोकशास्त्र
चित्र नं० ११
द्वितीय सप्ताह
चित्र नं० १२
तृतीय सप्ताह
इस पृष्ठ पर मुद्रित पाठ अत्यधिक जीर्ण-शीर्ण, फीका (faded) तथा जल-क्षतिग्रस्त होने के कारण स्पष्ट रूप से पठनीय नहीं है। पृष्ठ पर केवल अत्यंत धुंधले हरे रंग के रेखाचित्र/मुद्रा (emblem/illustration) और अस्पष्ट अक्षरों के अवशेष मात्र दिखाई दे रहे हैं:
[अत्यधिक धुंधला एवं अपाठ्य पाठ]
[अस्पष्ट शीर्षक/मुद्रा]
[अस्पष्ट पाठ]
[अस्पष्ट पाठ]
असली कोकशास्त्र ३१३
छिद्रों में प्रकृति ने बहुत से बालों की रचना की है । ये बाल हवा
में समन्वित धूलि के कणों को रोगजनक जन्तुओं को तथा ऐसे ही
दूसरे कचरे को फेफड़ों में जाने से रोकते हैं। यह रुका हुआ कचरा
जब मनुष्य वायु को बाहर निकालता है, तब बाहर निकल जाता
है। जो लोग नासिका के भीतर के बालों को कटवाते हैं, वे भारी
भूल करते हैं। इतना ही नहीं, नासिका में एक गुण और भी बड़ा
विचित्र है, वह यह कि शीतकाल में जब बिलकुल ठण्डी हवा
चलती है, तब उसे गर्म करके फेफड़े में पहुँचाती है। इससे फेफड़े
को किसी तरह की हानि नहीं पहुँचती है । किन्तु मुख द्वारा
श्वासन-क्रिया करने से ठण्डी हवा ज्यों की त्यों फेफड़े में जाकर
हानि पहुँचाती है। ठण्डी हवा पहुँचने से कभी कभी फेफड़ों में
सूजन हो आती है । हवा को शुद्ध करने के लिए नासिका एक
प्राकृतिक यन्त्र है, इसका सदा ध्यान रखना चाहिए ।
२०—काम-क्रोध-लोभ-मोह-मद-मात्सर्य आदि विकारों को
प्रतिक्षण दूर रखने के लिए सतर्क रहना चाहिए और दया,
परोपकार, आदि गुणों को धीरे-धीरे अपने हृदय में भरने का प्रयत्न
करना चाहिए ।
२१—भोजन करने के बाद थोड़ा टहल कर चारपाई पर लेटा
करो, किन्तु तुरन्त ही नींद में अचेत न हो जाओ ।
२२—डाक्टर उडली का कहना है कि,—"आरोग्यता प्राप्त
करने के दो मार्ग हैं—(१) ग्राम्य-जीवन, उद्यान-भ्रमण, नियमित
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व्यायाम और स्वच्छ वायु का सेवन (२) सादा तथा हलका
भोजन और निर्मल जल।" ऐसा कौन मूर्ख मनुष्य होगा जो
आरोग्य प्राप्ति के इन प्राकृतिक नियमों को छोड़कर वैद्यों और
डाक्टरों की तरह तरह की औषधियों का सेवन करके धन और
आरोग्य का नाश करेगा।
२३—ऋतु के अनुसार प्रत्येक मनुष्य को आहार-विहार
करना चाहिए। यह सौभाग्य भारतवर्ष को ही प्राप्त है कि यहाँ
ठीक समय पर गर्मी पड़ती है, ठीक समय पर वर्षा होती है और
ठीक समय पर सर्दी पड़ती है। पाश्चात्य देशों में यह बात नहीं
है। वर्ष में छः ऋतुएँ होती हैं, जिनका क्रम इस प्रकार है।
फाल्गुन और चैत—वसन्त ऋतु
वैशाख और ज्येष्ठ—ग्रीष्म ऋतु
आषाढ़ और श्रावण—वर्षा ऋतु
भाद्रपद और आश्विन—शरद ऋतु
कार्तिक और मार्गशीर्ष—हेमन्त ऋतु
पौष और माघ—शिशिर ऋतु
कुछ आचार्यों ने चैत्र-वैशाख को वसन्त ऋतु मानकर छहों
ऋतुओं का उल्लेख किया है; पर इस विपरीतता में कोई खास
बात नहीं है, अतः कुछ लिखने की आवश्यकता नहीं।
ऋतु के अनुसार आहार-विहार करने के लिए उनका ज्ञान
असली कोकशास्त्र ३१५
होना अत्यन्तावश्यक है, इस लिए प्रत्येक ऋतु का संक्षेप में परि-
चय करा देना जरूरी है।
वसन्त
वसन्त ऋतु का दूसरा नाम ऋतुराज है। इस ऋतु में दिशाएँ
निर्मल हो जाती हैं तथा सृष्टि की प्रत्येक वस्तु ही नया रूप धारण
करती है। यह ऋतु स्निग्ध है; अतः कफ की वृद्धि होती है और
उसके द्वारा अन्य रोगों की उत्पत्ति होती है। इस ऋतु में कफ का
प्रकोप होता है, इस लिए कफ का शमन करने वाली वस्तुओं का
सेवन करना लाभदायक है।
पौष और माघ में शीत के कारण कफ सञ्चय होता है और
वही संचित कफ वसन्त ऋतु में सूर्यताप से कुपित हो पाचक
अग्नि को दूषित कर रोग को उत्पन्न करता है। इस लिए इस ऋतु
में वमन-विरेचन द्वारा कफ को बाहर निकाल देना चाहिये। वसन्त
ऋतु में चटपटे, रूखे, कड़वे, कसैले और हलके पदार्थों का सेवन
करना हितकर है। खट्टी, मीठी, चिकनी और कष्ट से पचाने वाली
वस्तुओं का सेवन कदापि न करनी चाहिए।
इस ऋतु में गेहूँ, चावल, मूँग, परवल, बैंगन, शहद, जीरा,
अदरख, मूली आदि खाना तथा सोंठ, मिर्च, पीपर, पीपलामूल,
त्रिफला, असगन्ध और हल्दी का सेवन करना विशेष लाभदायक है।
ग्रीष्म
बैसाख और ज्येष्ठ में गर्मी बहुत अधिक पड़ती है। इस ऋतु
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लेने से पित्त-जन्य रोगों के उत्पन्न होने की आशंका नहीं रहती ।
इन महीनों में भी, चीनी, मिश्री, जौ, गेहूँ, मूँग, चावल, गरम
दूध, आँवला, परवल, धनियाँ, कमलगट्टा, मुनक्का, नारियल, गुड़-
मिश्रित हड़का चूर्ण, गोभी आदि वस्तुएँ विशेष लाभ पहुँचाती हैं।
शिशिर
पोष और माघ ये दोनों महीने शीतल, स्निग्ध, प्रायः सब
पदार्थों को स्वादिष्ट करनेवाले तथा अग्नि को प्रज्ज्वलित करनेवाले
हैं। इन महीनों में कफ संचय होता है और बल की वृद्धि होती है।
शीत होने से वायु का कोप होता है। इस लिए इन महीनों में
चिकने, रूखे, खट्टे और नमकीन रसों का सेवन ही लाभदायक
है। सुश्रुताचार्य का कथन है:—
“ये दोनों महीने ठण्डे और रूखे हैं। इन महीनों में सूर्य्यताप
मन्द रहता है। हवा तेजी से चलती है। सर्दी के कारण वायु
कुपित होता है। वही वायु सर्दी लगने से कोष्ठ के भीतर पिंडिकासा
हो जाता है और शीघ्र रस को सोख लेता है। इस ऋतु में मधुर,
अम्ल, लवण तथा रस-युक्त पदार्थों का ही भोजन करना चाहिए।
इन महीनों में पौष्टिक, बलवर्द्धक, घी, दूध, मक्खन, मलाई, खाँड़ के
बने हुए पदार्थ अत्यन्त लाभदायक हैं। गेहूँ, उर्द, नये चावलों का
भात, शुद्ध और उत्तम बनी हुई मिठाइयाँ, पाक, बादाम, अखरोट
चिरौंजी, आदि पदार्थों का सेवन मनुष्य को अपनी शक्ति के अनु-
असली कोकशास्त्र ३१६
सार करना चाहिए । सूर्य की धूप तथा आग का सेवन करना बड़ा
ही गुणकारी है ।
इस ऋतु में बर्फ, सत्तू, अत्यन्त वायु सेवन, खट्टे, कड़वे,
कसैले, शीतल तथा वातकारी पदार्थ नहीं खाना चाहिए । कसेरू,
सिंघाड़े, उर्द, आलू आदि का सेवन करना हानिकारक है ।
ऋतु के अनुसार आहार करने में एक बात का ध्यान और
रखना चाहिए । वह यह कि कभी-कभी ऋतु के विपरीत समय
रहता है, जैसे मौसम तो वर्षा का है, किन्तु हवा की अधिकता से
तथा अन्यान्य कारणों से सर्दी काफी पड़ने लगती है । ऐसी दशा
में आहार-विहार में परिवर्त्तन करना आवश्यक होता है ।
—:०:—
३२४ असली कोकशास्त्र
से सब तरह के प्रसूत रोग समूल नष्ट हो जाते हैं ।
७—प्रसूत रोग में यह दवा भी बड़ा लाभ पहुँचाती है । प्रसा-
रिणी को पाँच सेर पानी में औटावे । जब तीन सेर पानी रह जाय,
तब उतार कर छान ले । फिर इस क्वाथ में सोंठ, कालीमिर्च,
पीपल, पीपलामूल, चित्रक, सफेद जीरा, काला जीरा, शालपर्णी,
पृष्टपर्णी, मुग्दपर्णी, गोखरू, रायसन, रेंडी वृक्ष की छाल, खरेंटी,
सेंधा नमक, जवाखार और सज्जी इन सब चीजों को एक-एक
तोला लेकर लुगदी बना ले । ऊपर के काढ़े में इस लुगदी को सेर
भर घी ( गाय का ) डालकर पकावे । पक जाने पर उतार कर
छान डाले । इस घी के सेवन से प्रसूत, संग्रहणी आदि कई तरह के
रोग दूर होते हैं । इस घी के सेवन से प्रसूता की जठराग्नि प्रज्ज्वलित
होकर स्तनों का दूध शुद्ध हो जाता है । उदर-रोग भी इससे नष्ट
हो जाता है ।
८—सुहाग सोंठ, विषगर्भ तैल, अथवा मरीचादि तैल भी इस
रोग में बहुत ही फायदा करते हैं । इनके बनाने की रीति नीचे
लिखी जाती है:—
सुहाग सोंठ बनाने की विधि
बैंतरा सोंठ पावभर कूट-छानकर रख ले । बाद डेढ़सेर गाय
का दूध आँच पर चढ़ाकर औटावे ; जब वह जलकर आधा रह जाय,
तब उसमें सोंठ का चूर्ण डाल दे और बराबर चलाता रहे । जब
असली कोकशास्त्र ३२५
खोवा हो जाय, तब पावभर गाय का घी उसमें डालकर भूने। बाद
थाली में निकाल कर रख ले। फिर एक सेर चीनी की चाशनी
करके उसमें भुने खोवे को डाल दे और ऊपर से केशर छः माशे,
कस्तूरी डेढ़ माशे, भोमसेनी कपूर तीन माशे, पिस्ता चार तोला,
छिला बादाम आठ तोला छोड़कर लड्डू बना ले। प्रति दिन गरम
दूध के साथ एक तोला इसे खा लिया करे।
दूसरी विधी—पावभर बैतरा सोंठ का चूर्ण, दही चक्का आध
पाव, छोटी पीपल आधपाव, धतूरे के बीज आधपाव, इन सबको
हाँड़ी में रखकर उसका मुख मजबूती के साथ बन्द कर दे। एक
गढ़े में उसे रखकर ऊपर से कंडी रखकर आग लगा दे। जब वे
कंडे जलकर खाक हो जावें, तब राख को हटाकर फिर पूर्ववत्
कंडी रखकर सुलगा दे। इस प्रकार तीन बार करे। पश्चात् हाँडी
को खूब सावधानी के साथ निकाल कर बाहर कर ले और उसमें
से दवा निकाल कर शीशी में रख काग लगा दे। यह साधारण
मात्रा है। यदि इसको बहुत तीक्ष्ण करना हो तो इसमें सात-सात
पुट अदरख, बँगला पान के पत्ते का रस, थूहर के दूध के क्रम से
दे और फिर ऊपर की भाँति चौदह आँच दे।
तीसरी विधी—बैतरा सोंठ का चूर्ण पाव भर, आधा पाव सज्जी
और छटाँक भर लौंग को थूहर के दुध में पीसकर लुगदी बना ले
और मिट्टी के उतने ही बड़े बर्त्तन में इसे रखे, जिसमें अँट
जाय। बाद ऊपर की भाँति इसे गढ़े में रखकर फूँक दे। जब
३२६ असली कोकशास्त्र
आधे कंडे जल जायँ तब उसमें और कंडे डालकर मिट्टी से आग
को ढंक देना चाहिए। आग देने से आठ पहर पीछे इसे निकाले ।
बाद इनको थूहर के दूध, बँगला पान के रस और भारंगी के रस
में क्रम से आठ-आठ पहर घोंटे। (रस में पानी या छिलका कुछ
भी न रहने पावे।) ज्यों-ज्यों रस सूखता जाय त्यों-त्यों उसमें
रस डालता जाय और खरल करता जाय। पश्चात् फिर मिट्टी के
बर्तन में रखकर ऊपर की भाँति फूँक दे और आठ पहर के बाद
उसे बाइर निकाल दे। पीछे उन्हें पीसकर शीशी में रखकर काग
लगा दे। यदि कमर में दर्द हो अथवा छाती या पेट में दर्द हो तो
छः माशे अदरख के रस में इसे तीन रत्ती डालकर देना चाहिये।
यदि कफ की खाँसो हो तो छः माशे अदरख का रस, छः माशे
शहद, आधी गाँठ छोटी पीपल पीसकर उसमें दो रत्ती यह दवा
मिलाकर दे। इसी प्रकार सन्निपात में छः माशे अदरख का रस
एक पीपल और तोन रत्ती यह दवा पीसकर दे तथा पैरों के तलवे
में अदरख का रस, लहसन का रस और अजवायन को गरम
करके मर्दन करे। सर्दी हुई हो तो तीन माशे शहद में दो रत्ती दवा
चटा दे। हिचकी आती हो तो तीन माशे शहद और तीन माशे
अदरख के रस के साथ डेढ़ रत्ती यह दवा मिलाकर चटावे। इस
प्रकार भिन्न-भिन्न अनुपान के साथ यह दवा देने से अनेक तरह के
रोगों से प्रसूता की मुक्ति होती है।
—:०:—
असली कोकशास्त्र ३२७
विषगर्भ तैल बनाने की विधि
धतूरे की जड़, निर्गुण्डी, कड़वी तूँबी की जड़, अरंड की जड़,
असगन्ध, पमार, चित्रक, सहिजन की जड़, काग लहरी, करिहारी
की जड़, नीम की जड़, बकाइन की छाल, दशमूल, शतावरि,
चिरपोटन, गोरीसर, बिदारीकन्द, थूहर का पत्ता, आक का पत्ता,
सनाय, दोनों कनेर की छाल, अज्जभारा (अपामार्ग या चिरायता
भी इसे कहते हैं) ओर सीप इन सबको तीन-तीन रुपये भर लेकर
कूट डाले। बाद इनके बराबर काले तिल का तेल, उतना ही रेंडी
का तेल और सबका चौगुना पानी एक बर्त्तन में रख उसी में सब
चीजों को छोड़कर मधुर आँच से पकावे। जब पकते-पकते सब
औषधियाँ पानी के सहित जल जायँ—तेल मात्र रह जाय, तब
उतार ले। फिर उसमें सोंठ, मिर्च, पीपल, असगन्ध, रास्ना, कूट,
नागरमोथा, वच, देवदारु, इन्द्रजव, जवाखार, पाँचो नमक, नीला-
थोथा, कायफल, पाढ़, भारंगी, नौसादर, गन्धक, पुष्कर मूल,
शिलाजीत और हरताल इन सब चीजों को आध-आधे पैसे भर ले
और सिंगीमुहरा टकेभर लेकर महीन पीसकर उक्त तेल में मिला
दे। फिर इस तेल का मर्दन करे। इससे वात के सब रोग दूर हो
जाते हैं। यह याद रहे कि प्रसूत रोग वात के ही प्रकोप से होता
है। इसकी मालिश से पीठ जंघा और सन्धियों की सूजन तथा
हड़फूटन, कर्णशूल, गण्डमाला इत्यादि रोग नष्ट होते हैं।
४. परिच्छेद १३-१५: वाजीकरण कल्प, यौवन-सुरक्षा, काम-चिकित्सा एवं ग्रन्थ उपसंहार
३२८ असली कोकशास्त्र
मरिच्यादि तैल बनाने की विधि
काली मिर्च, निसोथ, दातूर्णी, आक का दूध, गोबर का रस,
देवदारु, दोनों हल्दी, छड़, कूट, रक्तचन्दन, इन्द्रायन की जड़,
नागरमोथा, वायविडंग, पमार, सिरस की जड़, कलौंजी, हरताल,
मैनसिल, कनेर की जड़, चित्रक, कलिहारी की जड़, कुड़े की छाल,
नीम की छाल, सतौप की छाल, गिलोय, थूहर का दूध, किरमाला
की गिरी, खैरसार, बावची, वच, मालकांगनी, इन सबको दो-दो
टके भर, सिंघी मुहरा चार टके भर, कड़वा तेल चार सेर, गो-
मूत्र सोलह सेर इन सब चीजों को मधुर आँच से पकावे । जब
तेल मात्र रह जाय, तब उतार कर छान ले । और फिर उसी तेल
की मालिस करे तो प्रसूत रोग अच्छा हो जाता है । यह तेल भी
वायु का नाश करने में एक ही है ।
असली कोकशास्त्र ३२६
प्रसूत ज्वर
यह ज्वर स्त्रियों को प्रसवकाल में असंयम के कारण होता है।
इसमें हड़फूटन होती है, प्यास अधिक लगती है, हरवक्त ज्वर
लगा रहता है, बारम्बार मल-त्याग करना पड़ता है, शरीर भारी
और गरम रहता है। इसके लिए पूर्व लिखित दशमूल का क्वाथ
सबसे अधिक लाभदायक है। अथवा, अजमोदा, जीरा, बंसलोचन
खैरसार, विजयसार, सौंफ, धनियाँ और मोचरस, इन सब चीजों
को बराबर-बराबर लेकर दो-दो तोले की दस पुड़िया बनाकर रख
दे। फिर एक पुड़िया प्रति दिन आधसेर पानी में औटाकर जब
छटाँक भर पानी रह जाय तब छानकर पिलावे। इस दवा का
दस दिन सेवन करने से प्रसूत-ज्वर समूल नष्ट हो जाता है।
यदि गर्भावस्था में ही ज्वर आवे तो रक्तचन्दन, दारवा,
गौरीसर, खस, मुलहठी, महुआ, धनियाँ, नेत्रवाला और मिश्री का
सम भाग लेकर उसका क्वाथ सात दिन तक पिलावे तो ज्वर का
आना बन्द हो जाता है। अथवा मुलहठी, लाल चन्दन, खस,
गौरीसर, कमल की जड़ छः-छः माशे लेकर काढ़ा बनावे और
उसमें शहद और मिश्री मिलाकर सात-आठ दिन तक पिलाने से
ज्वर दब जाता है।
गर्भिणी स्त्री के मस्तक में प्रायः झनझनाहट होती है और
मूर्च्छा सी हो जाया करती है। ऐसी दशा में गर्भिणी को चारपाई
३३० असली कोकशास्त्र
पर चित्त सो जाना चाहिए और सिर के नीचे तकिया न रखना
चाहिए । उसे अपने कपड़ों को भी ढीला कर देना उचित है । मुख
पर ठण्डे पानी के छींटे लगाने से विशेष लाभ होता है ।
एक रोग गर्भिणी को और होता है । यह प्रायः छठे महीने
से लेकर बालक उत्पन्न होने तक होता है । इसमें गर्भिणी की नसें
बनने लगती हैं । इस लिए जब नसों में तनाव मालूम हो, तब
उसे कपड़े से कसकर बाँध देना चाहिए और अफीम के रस से
सेंक कर फिर नमक की पोटली से या बोतल में गरम पानी भर कर
सेंकना उचित है ।
असली कोकशास्त्र ३३१
मूर्च्छा रोग
यह रोग आधुनिक समय में बहुतायत से पाया जाता है ।
इसके लक्षण नाम ही से प्रकट हैं । किन्तु दुःख की बात है कि
आजकल लोग इसे भूत, प्रेत, असुर, चुड़ैल समझने लग गये हैं ।
यद्यपि यह भाव अब दिन पर दिन कम होता जा रहा है, तथापि
इसका प्रचार इतना बढ़ गया था कि अब भी ऐसे लोगों की संख्या
बहुत ही अधिक है । इस रोग के लक्षण ये हैं:—
१—सिर में भारीपन रहता है ।
२—आँखों की भौंहों में इतनी पीड़ा होती है, मानों कोई कील
ठोक रहा है । बिना कारण ही आँखों में आँसू भरे रहते हैं ।
३—मन सदा उदास रहता है, कोई काम करने का जी नहीं
चाहता ।
४—यदि पास में कोई न रहे, तो बहुत ही आराम मिलता
है । किसी से बातें करना जवाल मालूम होता है ।
५—कण्ठ रुक जाता है और उसमें गोला सा जान पड़ता है ।
इसी गोले के उठने से प्रतीत होता है कि मूर्च्छा आनेवाली है ।
६—हृदय में धड़कन हुआ करती है । साँस की गति भी तेज
पड़ जाती है ।
७—बायीं पसली में दर्द होता है ।
८—छाती में बहुत कष्ट मालूम होता है, मानों वहाँ का माँस
३३२ असली कोकशास्त्र
ही गला जा रहा है ।
९—डकारें बहुत आती हैं और पेट में मरोड़ हुआ करता है ।
आँतें सदा गड़गड़ाया करती हैं ।
१०—शरीर की सब नसें दुखती रहती हैं। कभी किसी जगह
पीड़ा रहती है, कभी किसी जगह ।
११—शरीर ऐंठ कर तन सा जाता है ।
१२—कभी-कभी सफेद पेशाब बहुत उतरता है ।
१३—किसी-किसी दिन पेट में अफरा जान पड़ता है और
वायु गड़गड़ा कर आँतों तक आ जाती है । इस समय कण्ठ भी
रुक सा जाया करता है । किसी दिन पेट इतना फूल आता है कि
गर्भ का सा मालूम होने लगता है ।
अच्छी पहचान इस रोग की यह है कि रोगी देव-मन्दिर आदि
में जाने से हिचकता है और यदि चला भी जाता है तो उसका
अपना कण्ठ घुटता सा और छाती गिरती सी जान पड़ती है ।
बाजा इत्यादि के शब्द सुनकर उसे मूर्छा आ जाती है अथवा वह
चिल्लाने लगता है । हवादार जगह में बैठने को जी चाहता है ।
यह रोग अधिकतर उन स्त्रियों को होता है जिनका गर्भ बार-
बार गिर जाता है या जल्दी-जल्दी सन्तान होती है या जिन स्त्रियों
को शोक अधिक रहता है । स्पष्ट रीति से यों समझना चाहिए कि
जिन कारणों से निर्बलता आती है उन्हीं कारणों से यह मूर्छा रोग
भी उत्पन्न होता है ।
असली कोकशास्त्र ३३३
इसका सबसे उत्तम और सरल उपाय यही है कि गर्भाशय को
ठीक करके शुद्ध कर देना चाहिए। यदि रजोधर्म ठीक समय पर न
होता हो तो उसका यत्न करना भी आवश्यक है। यह रोग कभी-
कभी अविवाहिता कन्याओं को भी हो जाता है, किन्तु बहुधा यह
रोग ऐसी स्त्रियों को होता है, जो ब्याही हुई होती हैं और बाँझ
होती हैं। पति-शोकाकुल स्त्री को भी यह रोग हो जाया करता है।
इस रोग में दूध के साथ पान का रस मिलाकर देना बड़ा ही
लाभदायक है। अथवा बादाम को खूब महीन पीस कर दूध में
मिला दे और ऊपर से थोड़ा सा शुद्ध गुलाबजल डालकर पिलावे।
गर्भावस्था में स्त्रियों के मसूड़े और दाँत अक्सर दुखते हैं।
कितनी ही स्त्रियों का प्रत्येक गर्भ में एक दाँत गिरता जाता है।
इसका उपाय यह है कि जब दाँतों में दर्द जान पड़े तब रूई से
कान बन्द कर लेना चाहिये। यदि इससे अच्छा न हो तो लौंग के
तेल में रूई भिगोकर दाँत में रक्खे या मसूड़ों पर पोत दे। मसूड़ों
पर उसी समय लगाना लाभदायक होता है; जब मसूड़े में दर्द हो,
अन्यथा नहीं।
यदि मसूड़े में दर्द हो और पेट में गड़बड़ हो तो फौरन दवा
करनी चाहिये। सबसे पहले पेट को शुद्ध कर लेना चाहिये। पहले
कहा जा चुका है कि शोधे हुए रेंडी के तेल का जुलाब गर्भिणी
और बच्चे के लिए बड़ा ही उपयोगी है। इस लिए जरा भी पेट
की शिकायत मालूम होने पर उसे यही जुलाब लेकर पेट को साफ
३३४ असली कोकशास्त्र
और हल्का कर डालना चाहिये। यहाँ पर पेट शुद्धी के लिए कुछ
ऐसी ओषधियों का लिखना आवश्यक प्रतीत होता है, जिनका
सेवन करके गर्भावस्था में भी पेट को साफ किया जा सके। क्योंकि
यह समय इतना नाजुक होता है कि जल्द कोई वैद्य जुलाब देने का
साहस नहीं करता और बिना जुलाब के पेट की शिकायतें रफा
नहीं होतीं।
१—रेंडी का तेल दूध में मिलाकर पीना चाहिए ।
२—दो तोले दाख, एक तोला गुलाब के फूल, दो अंजीर
इनको पीसकर चटनी बना ले ओर तीसरे-चौथे दिन सुपारी भर
खा लिया करे। यदि आवश्यकता समझे तो सोते समय थोड़ा सा
अधिक खाले।
३—रोटी के साथ शहद या खाँड़ खाने से भी पेट की शिकायत
दूर होती है। क्योंकि खांड़ भी दस्तावर चीज है।
४—पके अंगूर ओर भुने हुए सेब से भी कब्ज दूर होता है ।
५—सुपारी, बड़ी हड़ का छिलका, बबूल की कोंपल, इन सब
को एक-एक तोला लेकर तीन पाव पानी में ओटावे। जब छटाँकभर
पानी रह जाय तब उतार ले जितने दस्त लेना चाहे, उतनी ही
बार कपड़े से इस काढ़े को छानकर पी ले । जितनी बार छाना
जायगा, उतने ही दस्त आवेंगे यह निश्चय है। यह जुलाब सबसे
अच्छा है।
—:*:—
असली कोकशास्त्र ३३५
गर्भिणी की वायु
पाँच या सात बादाम के बीज और एक माशे गेहूँ की चोकर
प्रतिदिन खाने से वायु का कोप गर्भिणी स्त्री को कभी नहीं होता ।
यदि मूत्र न उतरता हो तो दाब की जड़, दूब की जड़ और
काँस की जड़ इनको थोड़ा सा लेकर दूध में औटावे और फिर
उसे पी जाय । इससे गर्भिणी को बिना किसी प्रकार के कष्ट के
पेशाब उतर जाता है ।
—०—
संग्रहणी
यदि भोजन न पचे, खाते ही दस्त हो जाय तो चावल का
सत्तू आम और जामुन के छिलके के काढ़े से खाना चाहिए । इससे
बहुत शीघ्र जठराग्नि ठीक होकर अपना काम करने लगती है ।
—:०:—
गर्भिणी को वमन
जब गर्भाधान हो जाता है, तब बहुधा स्त्रियाँ वमन करने
लगती हैं । इसमें गेरू को आग में गरम करके थोड़े से पानी में
बुझाकर वही पानी पीना चाहिए । या कपूरकचरी को पीसकर मूँग
के बराबर गोली बनाकर सेवन करे अथवा वट-वृक्ष की डाँढ़ी
जलाकर उसकी राख शहद में मिलाकर चाटे ।