रतिरहस्य: असली कोकशास्त्र (पण्डित कोक्कोक - कामकला, दाम्पत्य-जीवन एवं सम्पूर्ण रति-विज्ञान)
Rati Rahasya or Asli Koka Shastra of Kokkoka with Hindi Commentary
पण्डित कोक्कोक (भाषा टीकाकार: पण्डित कन्हैयालाल) द्वारा
३३६ असली कोकशास्त्र
गर्भिणी के पैरों की सूजन
यदि पैर फूल आवें तो थोड़ा-थोड़ा चलने-फिरने का अभ्यास
डालना चाहिए।
—:०:—
दूध बढ़ाने का यत्न
यदि स्तन में दूध कम हो तो भाड़ में गेहूँ कहलवा कर उसीके
बराबर अखरोट के परो मिला गाय के घी में उसकी पूड़ी बनावे
और सात दिन गाय के घी के साथ ही खाया करे। अथवा—गाय
के दूध में थोड़ी सी शतावर और खाँड़ मिलाकर पिया करे।
—:०::०:—
स्तन-रोग
माता के दूध में विकार रहने से बच्चों का स्वास्थ्य बिगड़ जाता
है; इस लिए दूध की परीक्षा कर लेना बालक की रक्षा के लिए
अत्यन्तावश्यक है। दूषित दूध की पहचान यह है:—जिस स्त्री का
दूध पानी में न डूबे, खट्टा या कड़वा हो, काला या पीला हो,
जिसको गार कर रख देने पर उसमें मलाई सी न पड़े, या जिसमें चींटी
डालने से मर जाय—जीती हुई तैरकर निकल न आवे, ऐसे लक्षणों
से युक्त दूध दूषित होता है। शुद्ध दूध पतला और नीलापन लिए
२२ असली कोकशास्त्र ३३७
हुए होता है। निर्दोष दूध मीठा होता है और उसमें मलाई पड़
जाती है। इस प्रकार दूध की परीक्षा करने पर यदि वह दूषित
प्रमाणित हो तो उसे औषधियों द्वारा शुद्ध करने की चेष्टा करनी
चाहिए और जब तक वह पूर्ण रीति से शुद्ध न हो जाय तब तक
बालक को स्तन-पान न करावे। किसी अच्छी शुद्ध दूध वाली दाई
का दूध पीने का प्रबन्ध कर दे। दाई ऐसी ही होनी चाहिए जिसकी
गोद में उतने ही दिनों का बालक हो, जितने दिन के बच्चे को दूध
पिलाना हो। दस-पाँच दिन न्यूनाधिक की तो बात दूसरी है, पर
अधिक दिनों का अन्तर रहना ठीक नहीं। कारण यह कि ज्यों-ज्यों
दिन बीतता जाता है त्यों-त्यों दूध गाढ़ा होता जाता है। इस लिए
यदि बच्चा दो महीने का हो और दूध पिलाने वाली दाई को छः
सात महीने प्रसविणी हुए हो गये हों तो उसका दूध पिलाने से
बच्चा बीमार पड़ जाता है; क्योंकि उतना गाढ़ा दूध पचाने की शक्ति
उसमें नहीं रहती। ईश्वर की बड़ी ही विचित्र लीला है। वह बच्चे
के बलाबल के अनुसार ही माता के स्तनों में गाढ़ा पतला दूध पैदा
करते हैं। जब बच्चा जन्म लेता है, तब माता का दूध बहुत ही
पतला होता है, फिर ज्यों-ज्यों उसमें ताकत आती जाती है और
पाचनशक्ति बढ़ती जाती है, त्यों-त्यों दूध भी गाढ़ा होता जाता है।
इस लिए इस बात पर ध्यान देना बड़ा ही आवश्यक है। किन्तु
इतना करने से सब काम समाप्त नहीं हो जाता। जब बच्चे का
दूध पीना छुड़ा दिया जाय, तब माता का कर्त्तव्य है कि वह प्रति
३३८ असली कोकशास्त्र
दिन अपने स्तनों का दूध निचोड़ कर गिरा दिया करे । क्योंकि
स्तन में दूध रह जाने से स्तन पक जाते तथा और भी अनेक तरह
के रोग उत्पन्न हो जाते हैं। जब दूध स्तन में रह जाता है, तब
माता को बड़ा ही कष्ट होता है। अतएव इसके निचोड़ने में
ढिलाई नहीं करनी चाहिए ।
अब हम दूषित दूध को शुद्ध करने का कुछ यत्न बतलाते हैं ।
मूँग का जूस पीना चाहिए । अथवा भारंगी, दारुहल्दी, वच,
अतीस तीन-तीन माशे पानी में घोटकर पिये । या पाढ़, मूर्वा,
मोथा, चिरायता, देवदारु, इन्द्रजव, कुटकी, इनका काढ़ा पिया करे ।
—०—
थनैला
जो स्त्रियाँ बालकों को दूध पिलाती हैं, उनके स्तनों में कई
कारणों से गाँठ पड़कर फोड़े हो जाते हैं और स्तन पक जाते हैं ।
जैसे, बालक के सिर की चोट लग जाने से गाँठ पड़ जाती है ।
स्तन गीले रहने से फट जाते हैं । रुधिर खराब होने से फोड़ा
निकल आता है । इस लिए यदि बालक के सिर की चोट लग
जाय तो गरम पानी में रुई डालकर सहने लायक गरम रहने पर
धीरे-धीरे सेंक देना चाहिए । स्तनों को गीला न रखना चाहिए ।
यह रोग बड़ा ही कष्टदायक होता है, अतः पहले से ही इसका
इलाज करना चाहिए ।
असली कोकशास्त्र ३३६
यदि थनैला हो जाय तो नागरमोथा और मेथी को बकरी के
दूध में पीसकर लगाना चाहिए । या रेंडी के पते का रस निकाल
कर उसमें कपड़ा भिगो भिगोकर बारम्बार लगाना चाहिए ।
अथवा गुलाब की पत्ती, सेब की पत्ती, मेंहदी की पत्ती और अनार
की पत्ती बराबर-बराबर लेकर खूब बारीक पीस डाले और आग
पर किंचित् गरम करके दिन भर में चार-पाँच बार स्तनों पर
लगाया करे । या सहिजन के पत्त पीसकर लेप किया करे ।
यदि स्तन तड़क गये हों या स्तनों में पीड़ा हो तो ग्लैसरिन
लगा देना चाहिए । अथवा घी में मोम मिलाकर लगा देना चाहिए
अथवा सुहागा दो तोले, गेहूँ का सत सात तोले, पीस-छानकर
स्तन पर मल दे । इस दवा से बालक के मुख में पड़े हुए फफोले
भी जाते रहते हैं ।
—०—
नेत्र रोग
आँखें लाल रहती हों तो छः माशे बकरी के दूध में चार रत्ती
अफीम पीसकर नेत्र के ऊपर लगाना उचित है; किन्तु यह भीतर
जरा भी न जाने पावे, नहीं तो बड़ा कष्ट होगा । या दो रत्ती फिट-
किरी को एक तोले पानी में पीसकर चार-पाँच बूँद आँखों में सुबह-
शाम टपका दिया करे । इससे भी लालिमा मिट जाती है ।
यदि आँखों से पानी गिरता हो और किसी-किसी समय
३४० असली कोकशास्त्र
धुँधला दिखलायी पड़ता हो तो शाम को मिट्टी के नये बर्त्तन में
कुएँ का पानी छानकर रख दे और तड़के उठकर शौचादि से निवृत्त
हो, उसी जल से आँखों पर खूब छींटा लगावे । कम से कम दो-
तीन सेर पानी का छींटा लगाना जरूरी है। घड़ा प्रतिदिन बदलने
की आवश्यकता नहीं। महीने भर के सेवन से नेत्र निरोग हो जाते
हैं और ज्योति भी ठीक हो जाती है। यह दवा हमारी आजमायी
हुई है।
रतौंधी होने पर गाय का घी, मिश्री और काली मिर्च का नित्य
सबेरे सेवन करना चाहिए। यह रोग निर्बलता के कारण मस्तक में
आयी हुई कमजोरी से उत्पन्न होता है; अतः मस्तक की पुष्टि का
इलाज करने से यह रोग दूर होता है। देशी स्याही दवात में से
निकाल कर तीन-चार दिन अंजन लगाने से भी रतौंधी बन्द हो जाती
है। या पान के रस की तीन-चार बूँदें आँखों में टपका देने के
बाद साफ पानी से धो डालने पर भी यह रोग दूर हो जाता है। यह
दवा कम से कम दस-बारह दिन में काम करती है, घबड़ा कर
छोड़ नहीं देना चाहिए ।
—०—
असली कोकशास्त्र ३४१
कान्तिबर्द्धक उबटन
पीली सरसो एक सेर, सफेद चन्दन का चूर्ण एक छटाँक,
बालछड़ एक छड़, नेत्रवाला आधी छटाँक, आम की छाल एक
छटाँक, केशर रुपये भर, चिरौंजी तीन छटाँक, इन सबको कूट-
छानकर रक्खे ओर इसे थोड़ा सा लेकर दुध में पीसकर शरीर में
लगाया करे। इस उबटन से शरीर सुगन्धित रहता है, कांति बढ़ती
है, स्वच्छता रहती है ओर शीघ्र कोई चर्म-जन्य रोग नहीं होता।
—०—
फोड़ा-फुन्सी
रक्त-विकार से ही शरीर में फोड़े-फुन्सियों का निकलना शुरू
होता है। इस लिए सबसे उत्तम बात तो यह है कि रक्त को ही
शुद्ध करने की चेष्टा करनी चाहिए। रक्त के शुद्ध हो जाने पर फोड़े
फुन्सियों की जड़ ही कट जाती है। इसे शुद्ध करने का सबसे सरल
ओर उत्तम उपाय तो यह है कि कोष्ठ-शुद्धि पर विशेष ध्यान रक्खे;
क्योंकि पेट को गड़बड़ी से ही सारे रोगों की उत्पत्ति होती है;
भोजन हल्का, शुद्ध और पचने पर करे। इससे रक्त धीरे-धीरे शुद्ध
हो जाता है। अथवा इसे करते हुए चैत के महीने में शुद्ध मधु का
एक महीना सेवन करे। या उसी महीने में नीम की मुलायम पत्ती
खाकर ऊपर से गाय का धारोष्ण दुध पिये और खट्टी-मीठी तथा
३४२ असली कोकशास्त्र
तिक्त चीजें न खाय । इस प्रकार महीना भर नीम का पत्ती का
सेवन करने से भी रक्त-वि कार दूर हो जाता है ।
यदि फोड़ा निकल आया हो तो तूतमलंगा पानी में फेंट कर
बाँधना चाहिए । यही परीक्षित दवा है । फोड़े को बैठाने में एक
ही चीज है। दिनभर में तीन-चार बार इसकी पुलटिस बदलनी
चाहिए। इसके बांधने से दर्द तो रात भर में ही रफा हो जाती है।
कितना ही बड़ा फोड़ा उभड़ता हो, यदि उभड़ते ही इसकी
पुलटिस बाँधी जाय तो फौरन वह दब जायगा—बढ़ नहीं सकता
और न पीड़ा ही दे सकता है।
यदि छोटी छोटी फुन्सियाँ निकलती हों तो क्यूटीक्यूरा साबुन
लगाकर धोना चाहिए और फिर भेड़ का मक्खन ( सौ पानी से
धोए हुए , में कालीमिर्च फेंटकर लगाना चाहिए । इससे फुन्सियाँ
अच्छी हो जाती हैं और खाज नहीं चलती ।
—:०:—
बवासीर
यह रोग खूनी और बादी दो तरह का होता है । खूनी में
पाखाने के साथ खून गिरता है और बादी में मस्से जोकि गुदा द्वार
पर होते हैं, सूज आते हैं । खूनो में छोटे-छोटे लाल रंग के मस्से
होते हैं, उन्हीं से खून गिरता है । मल त्यागने में बड़ा कष्ट होता
है । कभी-कभी मल त्याग के समय लाल रंग की भीतर की आँत
असली कोकशास्त्र ३४३
भी बाहर निकल आती है। खूनी में मनुष्य निर्बल बहुत हो जाता
है, परन्तु बादी की अपेक्षा इसमें पीड़ा कम होती है। दोनों तरह
के बवासीर होने के मूल कारण हैं, कब्ज रहना, अधिक बैठना,
तिक्त और गरिष्ठ चीजें खाना तथा खाने-पीने और मल-त्याग आदि
में व्यतिक्रम करना।
सूजे हुए मस्सौं के लिए अखरोट के तेल में रुई भिगोकर गुदा
में रखना लाभदायक है। इससे मस्से जल जाते हैं और इस रोग
से छुटकारा मिलता है।
गेंदे की पत्ती, काली मिर्च के साथ घोंटकर पीने से भी
बवासीर अच्छा हो जाता है।
थूहर-वृक्ष का दूध ६ छटाँक और हल्दी ३ छटाँक, इन दोनों
को बारीक पीसकर मरहम बना लेना चाहिए। अर्श रोगी मंगल
से शुक्रवार तक, यानी चारो दिन इसी का लेप करे तो नयी पुरानी
बवासीर नष्ट हो जाता है। बवासीर की यों तो सैकड़ों ओषधियाँ
वैद्यक ग्रन्थों में लिखा हैं, पर परीक्षित न होने के कारण व्यर्थ
उनका यहाँ उल्लेख करना हम उचित नहीं समझते।
अस्तु; खास रोगों की कुछ ओषधियाँ लिख दी गयीं। अब
इस प्रकरण को समाप्त करके आगे के प्रकरण में बच्चों के सम्बन्ध
में काम की बातें लिखी जायँगी।
─:०:─
३४४ असली कोकशास्त्र
बालरोग चिकित्सा
माता की लापरवाही या मूर्खता के कारण बच्चे बहुधा रोग-
ग्रस्त हो जाते हैं और कभी-कभी मर भी जाते हैं। इस लिए इस
प्रकरण में साधारण घरेलू चिकित्सा की मोटा-मोटी बातें लिख
देना माताओं के लिए बहुत ही उपयोगी होना सम्भव है । यद्यपि
बालक के रोगों की चिकित्सा करना बड़ा ही असाधारण काम है
और वह हम लोगों के समान मनुष्यों का काम भी नहीं है तथापि
यह विषय इस पुस्तक का मुख्य अंग होने के कारण प्राचीन ग्रन्थों
के आधार पर कुछ बातें लिखी जा रही हैं ।
सबसे पहले बालक का रोग समझना आवश्यक होता है ।
आयुर्वेद शास्त्र में दो खण्ड हैं; एक निदान खण्ड है और दूसरे का
नाम चिकित्सा खण्ड है । निदान खण्ड में रोग पहचानने की
विधियाँ, रोगों के लक्षण आदि हैं और चिकित्सा खण्ड में रोगों
के प्रतिकार के उपाय बतलाये गये हैं । आयुर्वेद की इस प्रणाली
से मालूम होता है कि पहले निदान है और पीछे चिकित्सा । ऐसे
भी देखने से निदान ही पहली वस्तु मालूम होती है । यदि यही न
मालूम होगा कि रोग क्या चीज है, तो फिर इलाज क्या किया जा
सकता है ? इस लिए माताओं का कर्तव्य है कि पहले वे बच्चे का
रोग खूब सावधानी से जानने की चेष्टा करें। आजकल की मातायें
बहुधा बच्चों के बीमार पड़ते ही दवा देने की ओर ध्यान न देकर
असली कोकशास्त्र
चित्र नं० १३
पहला महीना
चित्र नं १४
दूसरा महीना
(इस पृष्ठ पर कोई मुद्रित अथवा सुपाठ्य पाठ उपलब्ध नहीं है। यह एक रिक्त पृष्ठ/फ्लाईलीफ है।)
असली कोकशास्त्र ३४५
टोना , नजर, ग्रह, भूत, प्रेत आदि के भ्रम में पड़ जाती हैं । परि-
णाम यह होता है कि ठीक उपचार न होने के कारण वे बच्चे से
हाथ धो बैठती हैं । भला भूख लगी हो और कै होने की दवा दी जाय,
यह कहाँ की बुद्धिमानी है ? हमारे देश में ऐसे ही अट-सट यत्न
किये जाते हैं । किन्तु यह बात उचित नहीं है । सुश्रुत आदि मह-
र्षियों ने स्पष्ट लिखा है कि किसी प्रकार के असुख का मूल कारण
जानकर उसकी दवा करनी चाहिए । सब रोग औषधियों से ही
शान्त होते हैं ।
सुश्रुत संहिता में लिखा है कि अधिकार अपवित्रता के कारण
ही बच्चे रोग के शिकार बनते हैं । कारण यह कि उसका स्वभाव
अत्यन्त सुकुमार होता है, अतएव मामूली गन्दगी भी उनके रोग
का कारण हो जाती है । इसीसे आचार्यों ने इस बात पर बारम्बार
जोर दिया है कि बच्चों की सफाई की ओर पूरा ध्यान रखना
चाहिए । सौर में नीचे लिखी बातों पर यदि ध्यान रक्खा जाय तो
बच्चे जल्द बीमार नहीं पड़ सकते ।
१—गन्दी हवा न जाने दे तथा सोर के घर में किसी प्रकार
की गन्दगी न करे । शुद्ध वायु को रोके भी न
२—बहुत ही सावधानी से नालोच्छेदन किया जाय, ताकि
उसमें कोई रोग उत्पन्न होने की सम्भावना न रहे ।
३—बालक पैदा होने के बाद ही उसको एक दस्त कराया
जाय और उसके अंग-प्रत्यङ्ग की सफाई बहुत ही सावधानी से
३४६ असली कोकशास्त्र
कर डाली जाय ।
४—सूतिका को भोजन पीछे के लिखे अनुसार दिया जाय
और बच्चे को बासी दूध कभी न पिलाया जाय ।
इन्हीं बातों पर ध्यान न देने के कारण बालकों को बहुधा ये
रोग हो जाते हैं:—
उनका शरीर शिथिल पड़ जाता है और नींद नहीं आती दस्त
पतले होने लगते है। बार-बार दूध डाल देते हैं; वे स्तन-पान नहीं
करते। हिचकी, खाँसी, अतिसार, उल्टी, ज्वर आदि रोग हो जाते
हैं। रंग पीला पड़ जाता है, कम्प होता है, गले में घरघराहट होता
है, शरीर में दुर्गन्ध पैदा हो जाती है। मूर्ख-स्त्री-पुरुष इनको भूत-प्रेत
का उपद्रव जानकर झाँड़-फूँक कराने लगते हैं।
बालक को स्वस्थ और निरोग रखने का सहज उपाय यही है
कि जन्मते ही उसकी हर प्रकार की सफाई पर पूरा-पूरा ध्यान
रक्खा जाय और नीचे लिखे काढ़ों से पाँचवें-सातवें दिन उसे
नहला दिया करे ।
गोरखमुण्डी और खस को पानी में पका डाले। बाद ठण्डा हो
जाने पर (विशेष जलने न लगे) छानकर उसी जल से स्नान
करावे। उसके अंगों को खूब हल्के हाथ से धो दे, जिसमें मैल न
लगी रह जाय ।
हल्दी, चन्दन, कूट उनको पीसकर उबटन की भाँति बालक के
शरीर पर लगाकर छुड़ा दे, फिर स्नान करावे ।
असली कोकशास्त्र ३४७
पीपल, पीपलामूल और कटेरी का क्वाथ बनाकर फिर उसे घी
में पकावे। जब सब पानी जल जाय और घी रह जाय, तब उसे
उतार कर किसी बर्तन में रख ले और वही घी बालक के शरीर में
मलकर उसे स्नान करावे।
यदि बालक रोने लगे, तब समझना चाहिए कि उसे किसी
प्रकार का कष्ट हो रहा है। बड़े लड़के तो अपना दुःख-सुख कुछ
कह सुनाते हें, पर छोटे लड़के न बोल सकने के कारण अपने दुःखों
को रोकर ही जाहिर करते हैं। बालक के दुःखों को जानने की
रीति यह है:—
यदि बालक रोता हो, मुख में झारा आती हो, तो जानना
चाहिए कि उसके कपड़ों में जूँ है और उसीक काटने से बच्चा रो
रहा है। फिर उसको ढूँढ़कर निकाल डालना चाहिए। और बच्चे
के शरीर में जहाँ-जहाँ उसने काट खाया हो, वहाँ-वहाँ जरा घी
मल देना चाहिए। तुरन्त बालक चुप हो जायगा।
यदि बालक बार-बार अपने पैरों को पेट की ओर समेटे और
पेट को दबाने से प्रसन्न न हो. रोता ही रहे तो समझना चाहिए
कि उसके पेट में दर्द है। पेट-दर्द दूर करने के लिए निम्न-लिखित
उपाय काम में लाना चाहिए:—
१—हाथ को आग पर सेंक-सेंक कर सहता हुआ बालक का
पेट सेंके। इस बात का ध्यान रहे कि बच्चे का शरीर बहुत ही
कोमल होता है। अधिक गरम हाथ पड़ने से कहीं जल न जाय।
३४८ असली कोकशास्त्र
२—गुलरोगन को जरा सा गरम करके पेट पर मल देने से भी
भी पेट की पीड़ा शान्त हो जाती है ।
३—नमक को खूब महीन पीसकर गरम करे और उसे बालक
के पेट पर मले। खूब महीन नमक रहे, नहीं तो बालक के पेट का
चमड़ा छिल जायगा और उसे महान दुःख होगा ।
४—छोटो इलाइची को दो बीज, सौंफ के दो दाने, माँ के दूध में
पीसकर पिला देने से भी पेट का दर्द मिट जाता है ।
सो कर उठने पर यदि बालक रोने लगे, जीभ निकाले और
इधर-उधर दूध की खोज में माथा हिलावे तो समझना चाहिए कि
बच्चा भूखा है ।
अधिक देर तक एक ही करवट के बल सोने से या किसी वस्तु
के चुभने, चींटी अथवा मच्छर के काटने से भी बच्चा रोने लगता
है । इस लिए सबसे पहले इन बातों का निरीक्षण भली प्रकार कर
लेना आवश्यक है ।
यदि बालक बराबर रोता ही रहे, चुप न हो, तो जानना चाहिए
कि उसे कोई दुख हो रहा है । जहाँ या जिस अंग में पीड़ा होती
रहती है, बालक बार-बार उसी को छूता है ओर दूसरे का उस
स्थान पर हाथ लगने से रोता है ।
मस्तक में पीड़ा होने पर बच्चा अपनी आँखें मूँद लेता है ।
गुदा में दर्द होने पर बच्चे को प्यास अधिक लगती है । साथ ही
मूर्च्छा भी हो जाती है मलकोष्ठ में दर्द होने पर मल-मूत्र रुक
असली कोकशास्त्र ३४६
जाता है और मुख धुँधला पड़ जाता है; साँस अधिक चलती है
और आँतों से आवाज निकलती है।
बच्चों को खाने की दवा तीन प्रकार से दी जाती है। दूध पीने
वाले बच्चे को यदि दवा देनी होती है तो दूध पिलाने वाली को दवा
दी जाती है, जिससे उसका असर दूध में आ जाता है और स्तन-
पान करने वाला बच्चा निरोग हो जाता है। दूध और अन्न दोनों से
जो बच्चे निर्वाह करते हैं, उनकी यदि चिकित्सा करनी होती है तो
माँ बच्चे दोनों को दवा दी जाती है। बालकों को दवाएँ माता के
दूध या शहद में घिसकर दी जाती हैं, इसका सदा ध्यान
रखना चाहिए।
बच्चों को बहुधा नीचे लिखे रोग होते हैं:—
नाल पकना
यदि नाल खींचने के कारण पक जाय तो मोम का मरहम
कपड़े पर लगाकर या कपड़े को कड़वे तेल या नारियल के तेल में
भिगोकर लगा देना चाहिए। यदि नाल में सूजन हो तो पीली
मिट्टी को आग में गरम करके दूध डालकर बाफ देना उचित है
अथवा साफ और नयी रुई से सेंक दे। अथवा बकरी की लेंड़ी
जलाकर उसकी राख को नाभि पर चिपका देना चाहिए। या हल्दी
लोध, मेहँदी, मुलहठी इनको तेल में पका कर नाभि पर लगाना
चाहिए।
—:०:—
३५० असली कोकशास्त्र
मूत्र रुकना
पीपल, कालीमिर्च, इलायची छोटी, और सेंधा नमक—इनका
चूर्ण शहद में मिलाकर चटाने से बालकों का रुका हुआ मूत्र
खुल जाता है ।
—-o-—
बहुत रोने पर
पीपल और त्रिफला के चूर्ण को घी और मधु में मिलाकर
चटाने से बालक का रुदन बन्द हो जाता है ।
—-o-—
दूध फटकना
अपने पेट के विकार से अथवा माता के दूध में दोष होने से
बालक दूध पीकर फटक देता है। चक्की पीसकर या रोटी बनाकर
अथवा और कोई परिश्रम का धन्धा करके तुरन्त-स्तन पान कराना
बड़ा ही हानिकारक है। माता को उचित है कि वह अपने शरीर
को अच्छी तरह से शान्त करने के बाद बच्चे को स्तन-पान करावे ।
यदि माता को अजीर्ण रहता हो तो उसे शीघ्र पचने वाला हल्का
भोजन करना चाहिए और किसी अच्छे पाचक चूर्ण का भी सेवन
करना चाहिए—ताकि जठराग्नि ठीक हो जाय। काकड़ासिंगी,
अतीस, मोथा और पीपल पीसकर शहद में चाटना उत्तम है ।
असली कोकशास्त्र ३५१
आम की गुठली, धान की खील और सेंधा नमक पीसकर शहद में
चाटना भी लाभदायक है । आम वा कटेरी के फूल का रस, पीपल,
पीपलामूल, चित्रक और सोंठ पीसकर घी और शहद के साथ
सेवन करना चाहिए ।
यदि बालक दूध न पीता हो तो पहले यह जानना चाहिए कि
इसे किसी प्रकार की पीड़ा तो नहीं हो रही है । कारण जानकर
फिर उसका इलाज करना चाहिए ।
—०—
आँख दुखना
जब बच्चे की आँखें दुखने लगें तब तीन दिन तक कोई दवा
नहीं करनी चाहिए । कारण यह कि दवा करने से उसका वेग रुक
जाता है इससे पीछे बच्चे को अधिक कष्ट भोगना पड़ता है । आँख
दुखने के बहुत से कारण हैं। गर्मी से, दाँत निकलते समय, माता
की आँखें दुखने से बालक की आँखों में दर्द होता है । इसके लिए
नीचे दवाएँ लिखी जाती हैं: —
२—बच्चे के कान में कड़वा तेल डाल दे और तलवे में भी
कड़वा तेल मल दे ।
२—रसोत का पानी आँखों में टपका देना चाहिए
३५२ असली कोकशास्त्र
क्योंकि इससे भी बालक को हानि पहुँचती है ।
४—यदि आँखें दाँत निकलने के कारण दुखती हों तो शान्ति
से काम लेना उचित है । ऐसे समय में उठने वाली आँख जरा
देर में अच्छी होती है । इस लिए घबड़ा कर अंट-संट दवा करना
उचित नहीं है ।
५—आँवले और लोध को गाय के घी में भून डाले, फिर
पानी में पीस कर लगावे ।
६—पोस्ते का फल (ढोंढ़) लेकर उसका दाना निकाल डाले ।
बाद छिलके को गुड़ के गरम पानी में भिगोकर सहता हुआ आँखों
पर बांध दे या बार-बार उससे आँखें तर करके योंही छोड़ दे ।
७—अमचूर को लोहे पर पीसकर आँख पर लेप कर दे ।
इससे भी आंख की पीड़ा शान्त हो जाती है ।
८—बकरी के दूध का फाहा लगाना भी लाभदायक है ।
—:o:—
खाँसी
यह कई तरह की होती है । सूखी खाँसी, जुकाम की खाँसी,
कुकुर खाँसी आदि । इसके लिए नीचे की दवाएँ काम में लानी
चाहिए:—
१—छोटी पीपल, पीपलामूल और सोंठ को पीस-कपड़छान
कर शहद में मिलाकर बालक को चटाने से कास-श्वास रोग बहुत
२३ असली कोकशास्त्र ३५३
शीघ्र दूर हो जाता है ।
२—बंसलोचन शहद में चटाने से भी खांसी नष्ट हो जाती है ।
३—पीपल, काकड़ासिंगी और मूली के बीज इन सब चीजों
को शहद के साथ चटाने से बालकों की खांसी अच्छी हो जाती
है। अथवा केवल काकड़ासिंगी ओर मूली के बीज ही घी या
शहद के साथ खांसी रोग में चटाना चाहिए ।
४—अनार का छिलका और नमक पीसकर चटाना भी बालक
की खांसी को दूर करता है ।
५—सुखी खांसी में मुलहठी का सत बालक के मुख में डाल
रखना बहुत ही लाभदायक है ।
६—काकड़ासिंगी और मिश्री बराबर-बराबर लेकर चूर्ण करे ।
सेवनविधि यह है—जितने मास का बालक हो उतनी ही रत्ती मधु
के साथ सायं-प्रातः दो बार दे । स्वास, खांसी और ज्वर छूटकर
बालक चंगा हो जायगा ।
७—पान के रस में एक रत्ती जायफल घिसकर देने से भी
खांसी अच्छी हो जाती है ।
—:०:—