रतिरहस्य: असली कोकशास्त्र (पण्डित कोक्कोक - कामकला, दाम्पत्य-जीवन एवं सम्पूर्ण रति-विज्ञान)
Rati Rahasya or Asli Koka Shastra of Kokkoka with Hindi Commentary
पण्डित कोक्कोक (भाषा टीकाकार: पण्डित कन्हैयालाल) द्वारा
पृष्ठ 329, कुल 440 में से
संदर्भ में पढ़ेंअसली कोकशास्त्र ३१५
होना अत्यन्तावश्यक है, इस लिए प्रत्येक ऋतु का संक्षेप में परि-
चय करा देना जरूरी है।
वसन्त
वसन्त ऋतु का दूसरा नाम ऋतुराज है। इस ऋतु में दिशाएँ
निर्मल हो जाती हैं तथा सृष्टि की प्रत्येक वस्तु ही नया रूप धारण
करती है। यह ऋतु स्निग्ध है; अतः कफ की वृद्धि होती है और
उसके द्वारा अन्य रोगों की उत्पत्ति होती है। इस ऋतु में कफ का
प्रकोप होता है, इस लिए कफ का शमन करने वाली वस्तुओं का
सेवन करना लाभदायक है।
पौष और माघ में शीत के कारण कफ सञ्चय होता है और
वही संचित कफ वसन्त ऋतु में सूर्यताप से कुपित हो पाचक
अग्नि को दूषित कर रोग को उत्पन्न करता है। इस लिए इस ऋतु
में वमन-विरेचन द्वारा कफ को बाहर निकाल देना चाहिये। वसन्त
ऋतु में चटपटे, रूखे, कड़वे, कसैले और हलके पदार्थों का सेवन
करना हितकर है। खट्टी, मीठी, चिकनी और कष्ट से पचाने वाली
वस्तुओं का सेवन कदापि न करनी चाहिए।
इस ऋतु में गेहूँ, चावल, मूँग, परवल, बैंगन, शहद, जीरा,
अदरख, मूली आदि खाना तथा सोंठ, मिर्च, पीपर, पीपलामूल,
त्रिफला, असगन्ध और हल्दी का सेवन करना विशेष लाभदायक है।
ग्रीष्म
बैसाख और ज्येष्ठ में गर्मी बहुत अधिक पड़ती है। इस ऋतु