रतिरहस्य: असली कोकशास्त्र (पण्डित कोक्कोक - कामकला, दाम्पत्य-जीवन एवं सम्पूर्ण रति-विज्ञान)
Rati Rahasya or Asli Koka Shastra of Kokkoka with Hindi Commentary
पण्डित कोक्कोक (भाषा टीकाकार: पण्डित कन्हैयालाल) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअसली कोकशास्त्र ३२७
विषगर्भ तैल बनाने की विधि
धतूरे की जड़, निर्गुण्डी, कड़वी तूँबी की जड़, अरंड की जड़,
असगन्ध, पमार, चित्रक, सहिजन की जड़, काग लहरी, करिहारी
की जड़, नीम की जड़, बकाइन की छाल, दशमूल, शतावरि,
चिरपोटन, गोरीसर, बिदारीकन्द, थूहर का पत्ता, आक का पत्ता,
सनाय, दोनों कनेर की छाल, अज्जभारा (अपामार्ग या चिरायता
भी इसे कहते हैं) ओर सीप इन सबको तीन-तीन रुपये भर लेकर
कूट डाले। बाद इनके बराबर काले तिल का तेल, उतना ही रेंडी
का तेल और सबका चौगुना पानी एक बर्त्तन में रख उसी में सब
चीजों को छोड़कर मधुर आँच से पकावे। जब पकते-पकते सब
औषधियाँ पानी के सहित जल जायँ—तेल मात्र रह जाय, तब
उतार ले। फिर उसमें सोंठ, मिर्च, पीपल, असगन्ध, रास्ना, कूट,
नागरमोथा, वच, देवदारु, इन्द्रजव, जवाखार, पाँचो नमक, नीला-
थोथा, कायफल, पाढ़, भारंगी, नौसादर, गन्धक, पुष्कर मूल,
शिलाजीत और हरताल इन सब चीजों को आध-आधे पैसे भर ले
और सिंगीमुहरा टकेभर लेकर महीन पीसकर उक्त तेल में मिला
दे। फिर इस तेल का मर्दन करे। इससे वात के सब रोग दूर हो
जाते हैं। यह याद रहे कि प्रसूत रोग वात के ही प्रकोप से होता
है। इसकी मालिश से पीठ जंघा और सन्धियों की सूजन तथा
हड़फूटन, कर्णशूल, गण्डमाला इत्यादि रोग नष्ट होते हैं।