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रतिरहस्य: असली कोकशास्त्र (पण्डित कोक्कोक - कामकला, दाम्पत्य-जीवन एवं सम्पूर्ण रति-विज्ञान)

Rati Rahasya or Asli Koka Shastra of Kokkoka with Hindi Commentary

पण्डित कोक्कोक (भाषा टीकाकार: पण्डित कन्हैयालाल) द्वारा

DevanagariHindipublished440 पृष्ठ

असली कोकशास्त्र २२७
गर्भाधान हो जाने पर पहले महीने में वीर्य जमता है । दूसरे
महीने में उस पर पतली झिल्ली चढ़ती है । तीसरे महीने में शरीर
का आकार बनने लगता है । चौथे में पूरा शरीर बन जाता है ।
पाँचवें महीने में हृदय और जीव पड़ता है । छठे और सातवें महीने
में बालक का शरीर पुष्ट होता है । गर्भस्थ बालक पेट में उकरू बैठा
हुआ दोनों हाथों को पैरों से मिलाये रहता है । उसके दोनों घुटने
छाती और पेट से लगे होते हैं और उसका माथा उन्हीं घुटनों के
बीच में रहता है । यदि पुत्री रहती है, तब तो उसका मुख माँ की
पीठ की ओर होता है और यदि पुत्र होता है तो उसका मुख माँ
के पेट की ओर रहता है । गर्भस्थ बालक अपने हाथों की अँगुलियों
से आँख, कान, नाक और मुख मूंदे रहता है । इसका कारण यह
है कि जिन सात झिल्लियों के भीतर गर्भाशय में बालक रहता है,
उसमें एक प्रकार का ऐसा पानी होता है कि यदि वह बालक की
आँख से छू जाय तो सूर, कान में चला जाय तो बहिरा, मुख में
जाय तो गूँगा, पेट में जाय तो मुर्दा और मस्तक में जाय तो वह
पागल हो जाता है । इसलिए दयालु परमात्मा ने अपने सब छिद्र
मूँद रखने की शक्ति बालक को प्रदान की है ।
बच्चे का कौन-सा अङ्ग पहले बनता है इस विषय में विद्वानों
का कथन भिन्न-भिन्न प्रकार का है । कोई तो कहता है कि शारी-
रिक इन्द्रियों का मूल स्थान मस्तक है और इसकी रचना पहले
होती है ; कोई कहता है, हृदय, बुद्धि और मन है, इसलिए सबसे

२२८ असली कोकशास्त्र
पहले हृदय की रचना होती है। कोई कहता है कि बच्चे का पोषण
नाभि द्वारा होता है, इस लिए पहले नाभि बनती है। भारतीय
चिकित्सकों के आचार्य धन्वन्तरिजी का कहना है कि बालक के
अंग-प्रत्यंग एक साथ ही उत्पन्न होते हैं; किन्तु अधिक सूक्ष्म
होने के कारण लक्ष्य में आना कठिन है। समय पाकर वे यथाक्रम
प्रकट होते हैं। यदि विचार कर देखा जाय तो यही सिद्धान्त युक्ति-
संगत भी मालूम होता है। बड़ी खोज के बाद अर्वाचीन विद्वानों
ने भी इसी सिद्धान्त की पुष्टि की है। गर्भ स्थित होने के समय से
प्रायः नौ महीने में गर्भस्थ बालक की शारीरिक तथा मानसिक
शक्तियों तथा अवयवों की रचना हो चुकती है। इन नौ महीनों को
इस विषय के विद्वानों ने प्राकृतिक नियमानुसार दो भागों में विभक्त
किया है। पहले भाग में छः मास रक्खा है और दूसरे में तीन
मास। पहले भाग में बच्चे के प्रायः सारे शारीरिक अवयव बनते
हैं और दूसरे भाग में मानसिक शक्तियों का विकास होता है।
इस लिए पहले छः महीने में बच्चे की शारीरिक रचना में और
पिछले तीन महीने में उसकी मानसिक शक्तियों में माता अपनी
इच्छा के अनुसार परिवर्त्तन कर सकती है।
तीसरे सप्ताह में गर्भ का आकार बाजरे के दाने के बराबर
हो जाता है। महीना समाप्त होते-होते सिर तथा पैर का आकार
मालूम होने लगता है। लम्बाई भी उस समय चौथाई इञ्च तक
हो जाती है। डेढ़ महीना बीत जाने पर उसका आकार ऐसा हो

असली कोकशास्त्र २२६
जाता है कि जिसे देखने पर यह मालूम किया जा सकता है कि
यह मनुष्य जाति का बच्चा है । इस समय शरीर की अपेक्षा
मस्तक बड़ा होता है । हाथ-पैर ढूठे से रहते हैं, यानी उनमें हथेलों
और तलवे नहीं रहते । आँख, कान, नाक और मुख की जगह
सिर्फ काले दाग मालूम होते हैं । दूसरे महीने के अन्त में प्रायः
सारे अवयव ( अंग ) साफ दिखायी पड़ने लगते हैं । लम्बाई एक
इंच तक हो जाती है ।
तीसरे महीने में आँख की पलकों का आकार बन जाता है ।
बल्कि यों कहना चाहिए कि एक प्रकार से वे तैयार ही हो जाती
हैं । इस समय मुख बन्द रहता है । इसी महीने में स्त्री पुरुष में
भेद बतलाने वाले अंगों की रचना होती है । इस समय तक लंबाई
प्रायः ३।। इंच तक हो गयी रहती है । चौथे महीने में मस्तक
और कलेजे की अपेक्षा दूसरे अवयव अधिक बढ़ते हैं । इस महीने
में बच्चा कुछ कुछ हिलना भी शुरू कर देता है । साढ़े चार महीना
होते होते लम्बाई भी ५-६ इंच तक हो जाती है । पाँचवें महीने
से अन्त तक पुट्ठे वगैरह ठीक ठीक बन जाते हैं । इस समय तक
शरीर की अपेक्षा सिर ही बड़ा रहता है और उस पर कोमल सफेद
( चाँदी के रंग के ) बाल निकल आते हैं । लम्बाई ७-८ इंच तक
और वजन ६ से ८ औंस तक हो जाता है । छठे महीने में चमड़े
की दोनों परतें दिखायी पड़ने लगती हैं, किन्तु वे बहुत ही नाजुक
और रक्तवर्ण होती हैं । लम्बाई १० इंच और वजन लगभग ३।।

२६० असली कोकशास्त्र
पाव हो जाता है । नाखून निकल आते हैं । यदि इस समय बच्चा
पैदा हो जाय तो वह कुछ देर तक अवश्य साँस ले सकता है ।
सातवें महीने में बच्चे के सब अंग बन चुकते हैं । इस समय
बच्चे का सिर नीचे और पैर ऊपर हो जाता है । आँख की पलकें
खुलने योग्य होती हैं । लम्बाई लगभग १३-१४ इंच और वजन
सवा पाँच पाव तक हो जाता है । आठवें महीने में बच्चे के प्रत्येक
अंग की समान रूप से वृद्धि होती है । लम्बाई १६ इञ्च तक और
वजन पौने दो सेर तक हो गया रहता है । इस महीने में ही यदि
बच्चा पैदा हो जाय तो वह जीवित रह सकता है । हाँ थोड़े दिनों
तक कमजोर अवश्य रहेगा । नवें महीने में लम्बाई १८-२० इञ्च
और वजन तीन साढ़े तीन सेर तक हो जाता है ।
कभी-कभी बारह महीने तक भी बच्चे गर्भ में रह जाते हैं,
किन्तु ऐसा बहुत कम होता है । वैद्यक ग्रन्थों में बारह मास तक
गर्भ रह जाने का उल्लेख पाया जाता है । ग्यारह महीने के बाद
बच्चा पैदा होते देखा भी गया है । इस लिए इसकी सत्यता में
सन्देह नहीं है । अस्तु; उत्तम सन्तानोत्पत्ति विषयक नियमों के
साथ गर्भ की वृद्धि का क्रम जानना विशेष प्रयोजनीय है, इसीलिए
उसका संक्षिप्त वर्णन कर दिया गया । अब आगे यह दिखलाया
जायगा कि गर्भ की रक्षा किन किन उपायों से हो सकती है, तथा
कोई उपद्रव खड़ा होने पर किस महीने में कौन-सा यत्न करना
श्रेयस्कर है ।

असली कोकशास्त्र २३१
गर्भिणी स्त्री को कभी दौड़ना, कूदना, या उछलना नहीं
चाहिए। धमक कर सीढ़ी उतरना या असावधानी से सीढ़ी पर
चढ़ना भी गर्भ के लिए हानिकारक है। इन कामों से गर्भ के गिर
जाने या टेढ़ा हो जाने की सम्भावना रहती है । जिससे गर्भ तो
नष्ट हो ही जाता है, साथ ही स्त्री को भी महान पीड़ा भोगनी
पड़ती है। कभी कभी तो इस पीड़ा से स्त्री मर भी जाती है।
भयावह चीजों से गर्भिणी स्त्री को बचाना चाहिए । उसे दूसरी
स्त्री का प्रसव नहीं देखना चाहिए । गर्भिणी के लिए जल में
तैरना, अधिक परिश्रम और झटके का काम करना, वृक्ष के नीचे
अधिक ठहरना, अधिक सोना, अधिक जागना, दूर की वस्तु को
नजर पर जोर देकर देखना, गर्म चीजें (जैसे लाल मिर्च आदि)
खाना, उपवास-व्रत करना, अधिक भोजन करना, जबर्दस्ती भूख
को रोक रखना, सूखी चीजें (जैसे भूना हुआ चना आदि) खाना
पुरुष के साथ सोना, मल-मूत्र के वेग को रोकना, कुचिष्टता (मैले-
पन) से रहना, अधिक जोर से बोलना, सिर में अधिक तेल
लगाना, क्रोध-शोक करना आदि बड़ा ही हानिकारक है। इसलिए
इन कामों से गर्भिणी स्त्री को सदा बचना चाहिए। गर्भिणी स्त्री
को अधिक पौष्टिक भोजन भी नहीं करना चाहिए; क्योंकि पौष्टिक
भोजन करने से बच्चा पैदा होते समय बड़ा कष्ट होता है।
दाल, भात, रोटी, तरकारी, दूध थोड़ा घी आदि खाना गर्भ-
वती के लिए विशेष लाभदायक है। मक्खन का सेवन करना भी

२३२ असली कोकशास्त्र
बड़ा ही उपयोगी है । खासकर दूध का सेवन तो गर्भिणी को
अवश्य करना चाहिए। हाँ दूध की शुद्धता पर ध्यान रखना जरूरी
है। क्योंकि दूध खराब होने से लाभ के बदले हानि करेगा । बीमार
पशु का दूध भूलकर भी न पीना चाहिए । थोड़ा बहुत फलों का
प्रतिदिन सेवन करना इस समय के लिए अमृत-तुल्य है । हमेशा
मुख साफ रखना चाहिए । स्नान करते समय अंग-प्रत्यंग को खूब
अच्छी तरह से धोकर स्वच्छ कर देना उचित है । आजकल बहुधा
स्त्रियाँ एक-दो लोटे पानी से ही नहा-धो लेती हैं । यह बात बहुत
बुरी है। केवल शरीर भिगो देने का नाम स्नान नहीं है; बल्कि
स्नान का मतलब है, समूचे शरीर को मल-रहित करके शुद्ध कर
डालना । प्रचुर जल से मल-मल कर स्नान करना प्रत्येक मनुष्य के
लिए बड़ा ही लाभदायक है । इससे तन्दुरुस्ती में जल्द कोई खराबी
पैदा नहीं होती । गर्भवती के लिए प्रतिदिन थोड़ा परिश्रम अवश्य
करना चाहिए। गृहस्थी का काम-काज अपने अनुकूल देखकर करने
से परिश्रम हो जाता है। मिहनत करने से स्त्री का शरीर फुर्तीला
रहता है, भोजन ठीक से पच जाता है, नींद अच्छी तरह आती है
तथा प्रसव यानी बच्चा पैदा होते समय कम कष्ट होता है ।
सूर्यग्रहण या चन्द्रग्रहण लगने पर गर्भिणी को चाहिए कि
ग्रहण शुरू होने से घण्टा दो घण्टा पहले ही किसी कोठरी में जा
बैठे और जब तक मोक्ष न हो जाय, एकान्त में बैठी उपदेशप्रद
पुस्तक या महात्मा पुरुषों की जीवनी अथवा इन्हीं विषयों का

असली कोकशास्त्र २३३
चिन्तन करती रहे—ग्रहण को न देखे और न उसकी छाया ही
अपने ऊपर पड़ने दे। गर्मी-सर्दी से हमेशा बचकर रहना जरूरी
है। लाल रंग का वस्त्र नहीं पहनना चाहिए। उच्च विचार रखना,
प्रसन्नचित्त रहना, पवित्रता रखना, हृदय में सब पर दया और
प्रेम रखना, गर्भ के बच्चे पर बड़ा ही अच्छा प्रभाव डालता है।
इस लिए इनको गर्भिणी स्त्री कभी न त्यागे।
यहाँ पर दो तीन बातों का उल्लेख कर देना अनुचित न होगा।
यद्यपि वे कोई विशेष आवश्यक तो नहीं हैं, तथापि उनकी जानकारी
रखने से सम्भव है मनुष्य को समय समय पर कुछ सहायता ही
मिले। पहली बात तो यह है सातवें महीने में बच्चे का पैर ऊपर
और सिर नीचे क्यों हो जाता है। बात यह है कि छः महीने तक
तो उसके अंगों की रचना होती है। बाद मानसिक शक्तियों का
विकाश होता है। यह मानी हुई बात है कि भारी चीज हमेशा नीचे
की ओर रहती है। इस लिए बच्चे के सिर का नीचे की ओर रहना
स्वाभाविक है। ईश्वरीय लीला बड़ी विचित्र और रहस्यमय है,
इस लिए यह कहना कठिन है कि उक्त कार्य का केवल यही कारण
है। हाँ यह अवश्य कहा जा सकता है कि और और कारणों में
सम्भव है कि एक कारण यह भी हो। दूसरी बात यह है कि गर्भ
में बच्चे रोते क्यों नहीं ? विद्वानों का कथन है कि गर्भ में बच्चे
का मुख झिल्ली (जरायु) से ढका हुआ रहता है और कण्ठ-द्वार
भी कफ से घिरा रहता है, इसी से वह नहीं रोता। तीसरी बात

२३४ असली कोकशास्त्र
यह है कि माता के पेट में बच्चा मल-मूत्र क्यों नहीं करता ? इसका
कारण यह है कि बच्चे का पोषण नाला द्वारा होता है । इसी के
द्वारा माता के शरीर का रक्त बच्चे के शरीर में पहुँचता है और
उसी से उसकी वृद्धि होती है । यह नाला बच्चे की नाभि में लगा
रहता है । अब यह बात सहज ही में समझी जा सकती है कि
मल-रहित होकर बना हुआ रक्त ही जब बच्चे के शरीर में जाता
है, तब मल-मूत्र तैयार ही कहाँ से हो सकता है ।
गर्भवती स्त्री जो काम करती है, बच्चे का भी वही काम अपने
आप होता जाता है । गर्भिणी के सोने पर पेट का बच्चा भी निद्रित
हो जाता है; उसके जागते ही बच्चा भी जाग पड़ता है । इसी
प्रकार माता के साँस में खींची हुई वायु से बच्चा साँस लेता और
माता के साँस छोड़ने पर वह भी साँस छोड़ देता है । कहने का
तात्पर्य यह कि जो-कुछ माता करती है, उसका प्रभाव बच्चे पर
किस प्रकार पड़ता है, इसका ज्ञान प्राप्त करके गर्भिणी को सदा-
सर्वदा सावधान रहना चाहिए ।
यदि गर्भिणी स्त्री प्रत्येक वस्तु की जानकारी रक्खे और हर
काम में सावधानी रक्खे तो किसी प्रकार का उपद्रव नहीं हो
सकता । सन्तान भी उत्तम, दीर्घायु और हृष्ट-पुष्ट हो सकती है
तथा उसका जीवन भी सुखमय बीत सकता है । मूर्खतापूर्ण कार्य
करने से ही गर्भस्राव और गर्भपात हो जाता है, मरी सन्तान पैदा
होती है तथा बच्चे निर्बल, रोगग्रस्त और अल्पायु होते हैं ।

असली कोकशास्त्र २३५
चार महीने के भीतर जो गर्भ नष्ट हो जाता है, उसे तो गर्भ-
स्राव कहते हैं और उसके बाद नष्ट होने वाले को गर्भपात । इसके
लक्षण ये हैं—
१—यदि गर्भ नष्ट होने को होता है तो अचानक शक्ति क्षीण
हो जाती है, चित्त में व्याकुलता छा जाती है और बेहद ओक
आती है ।
२—जी डूबा-सा जाता है । यह होता है कि कहाँ जाऊँ, क्या
करूँ । पता नहीं चलता कि ऐसा क्यों हो रहा है ।
३—खड़ी होने से सिर घूमने लगता है, चक्कर आ जाता है ।
४—पेट के ऊपर और दोनों जंघों में रह रह कर वेदना होती
है । मूत्रस्थान से तरबूज का सा पानी झरने लगता है ।
५—यदि कमर, जंघा और गुदा में अधिक पीड़ा हो, शूल हो
और रुधिर या रुधिर की डली बाहर आने लगे तो समझना
चाहिए कि गर्भ, गर्भाशय से अलग हो गया है ।
यदि गर्भस्राव के लक्षण दिखलायी पड़ने लगें और पूरा
निश्चय हो जाय कि गर्भस्राव होनेवाला है, तब उसके आरम्भ में
ही यानी पीड़ा ही हो, रुधिर निकलना शुरू न हुआ हो—यह
उपचार करना हितकर है—
१—मुसहठी, देवदारू और दुद्धी इन चीजों के साथ दूध का
सेवन करे ।
२—शतावर और दुद्धी का काढ़ा पीवे ।

२३६ असली कोकशास्त्र
इस प्रकार रुकावट हो जाने पर गो-दुग्ध में गूलर के पके फल
का सेवन शुरू कर दे गर्भवती को ठण्डे स्थान में सुला दे और ठंडा
पानी पिलावे । ठण्डे पानी से प्रसव-द्वार को धो डाले । यदि रुधिर
का निकलना शुरू हो गया हो तो दूध के साथ कसेरू या सिंघाड़ा
अथवा कमल औटाकर ठण्डा हो जाने पर पिलावे । अथवा दो तीन
चावल भर अफीम का सत किसी सूखी वस्तु के साथ खिला देना
चाहिए ।
यदि पहले ही पहल गर्भाधान हुआ रहता है तो गर्भस्त्राव या
गर्भपात छः सात घण्टों में ही हो जाता है, देर नहीं लगती।
किन्तु यदि स्त्री दूसरी या तीसरी बार गर्भ धारण किये रहती है
तो दो तीन दिन लग जाते हैं । जिस स्त्री का गर्भ नष्ट हो जाय,
उसे कम से कम पाँच छः महीने तक पति के पास नहीं जाना
चाहिए । क्योंकि इसके भीतर गर्भ रह जाने से उसके भी नष्ट हो
जाने की आशंका रहती है। जिस स्त्री का गर्भ बराबर नष्ट होता
ही जाय, उसे गर्भ की रक्षा के लिए गर्भिणी होने पर खूब साव-
धानी से रहकर इस प्रकार दवा का सेवन करना चाहिए ।
पहले महीने में मुलहठी, दुद्धी और देवदारु की पोटली बाँधकर
दूध में डाल दे । जब दूध पीने के लायक पक जाय, तब उसे आग
के ऊपर से उतार ले और पोटली को निकाल कर फेंक दे । बाद
उस दूध में मीठा डालकर पिया करे ।
दूसरे महीने में करंजवा, काला तिल, मँजीठ और शतावर की

असली कोकशास्त्र २३७
पोटली डालकर ऊपर की रीति से दूध में पकाकर पिये ।
तीसरे महीने में दुद्धी, कमलगट्टा, सरिवन और साँठी के
चावल की खीर खाया करे ।
चौथे महीने में कटेरी, कम्भारी, दूधवाले वृक्ष की कोंपल दूध
में औटाकर पिये तथा घी या दही से भात खावे ।
पाँचवें महीने में दूध भात खाना बड़ा ही उपयोगी है ।
छठे महीने में पृष्ठपर्णी, सहिजन, गोखरू और गिलोय को
दूध में औटाकर उसे पिये । घी मिलाकर भात खाय दूध की लस्सी
का सेवन करे । गोखरू को घी में पकाकर खाय ।
सातवें महीने में सिंघाड़ा, मुनक्का, केसर, मुलहठी और चीनी
को दूध में औटाकर पिये ।
आठवें महीने में कैथ, कटेरी, बेल, परवल और ईख, इन
सबकी जड़ को दूध में पकाकर पीना चाहिए । या दूध में रेंडी का
तेल और मीठा मिलाकर कभी कभी पी लेना उचित है ।
नवें महीने में मुलहठी और देवदारु दूध में पकाकर सेवन
करना हितकर है ।
दसवें महीने में सोंठ और दुद्धी को दूध में पकाकर पीना चाहिए।
मुलहठी, साल वृक्ष के बीज, देवदारु, नोनिया साग, काले
तिल, राल, शतावर, पीपल, कमल की जड़, जवासा, गौरीसर
बायसुरई, दोनों कटेरी, सिंघाड़ा, कसेरू, दाख और मिश्री तीन
तीन माशे ले और सात महीने तक प्रति मास में सात सात दिन

२३८ असली कोकशास्त्र
सेवन करे तो कभी भी गर्भ नष्ट न हो । यदि गर्भिणी की कोष्ठ
शुद्धि न रहती हो तो थोड़ा-सा शुद्ध किया हुआ रेंडी का तेल
( डाक्टरी दवाखानों में मिलता है ) चीनी मिले हुए दूध में मिला
कर कभी कभी पी लेना चाहिए । यह विरेचन बड़ा ही लाभदायक
है, इसी से गर्भिणी स्त्री के लिए भी लिखा जा रहा है । इसके
सिवा दूसरी विरेचन की दवा कभी नहीं खाना चाहिए । क्योंकि
गर्भिणी स्त्री के लिए वमन और विरेचन निषेध है किन्तु ऊपर की
दवा लेने में कोई हानि नहीं है। इस लिए इसका सेवन करके कोष्ठ-
शुद्धि करने में गर्भिणी स्त्री को किसी बात की चिन्ता नहीं करनी
चाहिए ।
अब इसके बाद हम यह बतलाना चाहते हैं कि यदि गर्भावस्था
में अन्यान्य उपद्रव खड़े हों तो उनके लिए क्या करना उचित है ।
पहला महीना
यदि पहले महीने में किसी प्रकार का कष्ट प्रतीत हो तो
नीलोफर, कमल ककड़ी, सिंघाड़ा और कसेरू को ठण्ढे पानी में
पीसकर गाय के दूध में पीना चाहिए । अथवा मँजीठ, लालचन्दन,
कूट और तगर को बराबर बराबर लेकर दूध में पीसकर दूध ही में
पीना चाहिए ।
दूसरा महीना
तगर, केसर, बेलगिरि और कपूर को समान मात्रा में लेकर
बकरी के दूध में पीसे और उसी के दूध में छानकर पीये । या

असली कोकशास्त्र २३६
सालम मिश्रा, नीलोफर, कसेरू, अदरख, सम मात्रा में लेकर जल
में पोस गाय के दूध में छानकर पीना चाहिए । अथवा सिंघाड़ो,
कसेरू, सफेद् जीरा, बेलपत्र और छुहाड़ा सम मात्रा में ले, पानी
में पीसकर दुध में पिये ।
तीसरा महीना
पद्माख, सफेद् चन्दन, खस और तगर को सम मात्रा में
पानी से पीसे और बकरी के दूध में छानकर पी ले । अथवा खस,
सफेद् चन्दन, नागरमोथा, पद्माख, कमल ककड़ी को पानी में
पीसकर गाय के दूध के साथ पीना चाहिए ।
चौथा महीना
सिंघाड़ा, केले का पत्ता, दाख, अनार की कली और केले के
कन्द को पानी में पोसकर बकरी के दूध में पिये । या खस, कमल-
ककड़ी और केले की जड़ को पानी में पीस बकरी के दूध में पीने
से कष्ट दूर हो जाता है ।
पाँचवाँ महीना
नीलोफर, कमलककड़ी, कमलगट्टा, और नागकेशर को बकरी
के दूध में पीस छानकर पीना चाहिए । या नीलकमल की जड़,
काकमाची, कमलककड़ी को पानी में पीसकर दूध में पिये ।
छठा महीना
बच, इलायची, मुनक्का, नीलोफर और नागकेसर को दूध में
पीस छानकर पीना चाहिए । या पीपल, पीपरामूल, कमल का

२४० असली कोकशास्त्र
फूल और कमल की केशर को पानी में पीस, बकरी के दूध में पीना
उचित और लाभदायक है ।
सातवाँ महीना
सातवें महीने में यदि किसी तरह की पीड़ा हो तो कैथ की
गिरि, मूँगा की शाख, धान की खील और इन्द्र जौ को सम मात्रा
में लेकर दूध में पीस छानकर पीना चाहिए । अथवा कैथ वृक्ष के
फल की गिरी, सालम मिश्री, धान की खील और इन्द्र जौ को
बराबर बराबर लेकर जल में पीस, गाय के दूध में छानकर पीना
चाहिए। या पीपल की जड़, बड़ की जड़, जल भंगरा, सूर्यमुखी
की जड़ और साँठी की जड़ तथा लाल चन्दन को सम मात्रा में
लेकर बकरी के दूध में पीसकर उसी के दूध में पीना भी विशेष
लाभ पहुँचाता है ।
आठवाँ महीना
पदमाख, गजपीपल, कमल का फूल, कमलगट्टे की गिरी
और धनियाँ इन चीजों को सम मात्रा में लेकर पानी में पीस
डालना चाहिए । बाद उसे गाय के दूध में छानकर पीने से सब
तरह के उपद्रव शान्त हो जाते हैं ।
नवाँ महीना
रेंड़ की जड़, काकोली, पलासपापड़ा, इनको सम मात्रा में
ले कूट-छानकर जल के साथ पीने से तत्क्षण आराम हो जाता है ।
या सोंठ, ढाक के पत्ते, इलायची, बायविडंग, सफेद जीरा और

१६ असली कोकशास्त्र २४१
गजपीपल, इनको बराबर बराबर लेकर बकरी के दूध में पीस छान
कर पीने से भी कष्ट दूर हो जाता है और गर्भ नष्ट नहीं होता ।
—:०:—
गर्भिणी की इच्छा पूर्ति
गर्भिणी स्त्री को कभी-कभी कुछ ऐसी चीज खाने की इच्छा
होती है, जिसे वह सुगमता से नहीं पाती । ऐसी दशा में उसकी
जिस चीज पर इच्छा हो, वह चीज उसे अवश्य खिला देनी
चाहिए । कितनो ही स्त्रियाँ मूर्खता के कारण अपनी इच्छा को
प्रकट नहीं करतीं और लज्जा के कारण उसे दबा बैठती हैं, किन्तु
यह बहुत बुरी बात है । इच्छा को रोकने से गर्भस्थ बालक पर
बड़ा ही बुरा असर पड़ता है । ऐसी स्त्रियों की सन्तान बहुत
असन्तोषी होती है । इस बात का हमेशा ध्यान रखना चाहिए कि
गर्भिणी स्त्री को दो हृदय होता है और जो इच्छा उत्पन्न होती है,
वह एक प्रकार से उसके भीतर की माँग होती है। इसी से गर्भिणी
स्त्री को दौहृदिनी कहा गया है ।
—०—

२४२ असली कोकशास्त्र
प्रसवकाल
बच्चा पैदा होने के समय को प्रसवकाल कहते हैं। जिस घर
में बच्चा पैदा होता है, उसे 'प्रसूति गृह' या ग्रामीण भाषा में सौर
कहते हैं और जब बच्चा पैदा हो जाता है, तब उस गर्भिणी स्त्री
का नाम प्रसूता हो जाता है। इस प्रकरण में प्रसवकाल के
सम्बन्ध में कुछ लिखना आवश्यक है। क्योंकि इस समय स्त्रियों
का नया जन्म होता है। जरा भी गलती करने से इस समय अनेक
तरह के रोग, जैसे प्रसूत का दुःख, योनि का बाहर निकल कर
बढ़ आना आदि—हो जाते हैं। इस लिए जब देखे कि गर्भ के
दिन पूरे हो गये, तब किसी चतुर दाई को पहले ही से बुलाकर
घर में रख ले। यदि कोई दाई न मिले तो घर की स्त्रियों को ही
खूब सावधानी से इस काम को करने के लिए तैयार हो जाना
चाहिए।
पहले कहा जा चुका है कि गर्भ में बालक प्रायः नौ महीने के
लगभग रहता है। कभी नौ महीने में कुछ दिन पहले ही वह पैदा
हो जाता है, और कभी दस-पाँच दिन बाद । जब प्रसवकाल
निकट आ जाय, तब गर्भिणी का प्रसूतिका-गृह निश्चय कर लेना
चाहिए। वह घर पवनीक यानी हवादार हो तथा दुर्गन्ध-रहित
हो। प्रकाश भी उस घर में अच्छी तरह होना जरूरी है। उस
कमरे में सील भी न होनी चाहिए। आजकल सूतिका-गृह बहुधा

असली कोकशास्त्र २४३
ऐसा चुना जाता है, जो घर मकान भर में सब कमरों से रद्दी और
खराब होता है । किन्तु ऐसा करना बहुत ही बुरा है । वाग्भट्टजी
ने लिखा है:—
प्राक्चैव नवमात्मास्तात् सूतिका गृहश्रामयेत् ।
देशे प्रशस्ते सम्भारै सम्पन्नं साधकेऽहनि ॥
अर्थात्—नवाँ महीना शुरू होते ही शुभ दिन देखकर अच्छे
स्थान में बने हुए स्थान को सूतिका-गृह चुनना चाहिये । उसमें
सारी आवश्यकीय वस्तुएँ मौजूद रहना जरूरी है । ऐसे ही मकान
में गर्भिणी स्त्री को प्रसव करना चाहिए ।
अब हम यह बतलाना चाहते हैं कि सूतिका-गृह कैसा होना
चाहिए । ऊपर कहा जा चुका है कि इस घर को साफ-सुथरा और
हवादार रहना बहुत जरूरी है । इसके सिवा यह घर कम से कम
८-९ हाथ लम्बा ओर ५-७ हाथ चौड़ा होना चाहिए । इस घर
में बहुत तेज हवा आने की आवश्यकता तो नहीं है पर मन्द मन्द
हवा अवश्य आनी चाहिए । घर में ठण्ड बिलकुल न होनी चाहिए
यदि जाड़े का दिन हो तो इस घर में बिना धुएँ की आग हरवक्त
दहकती रहनी चाहिए । सुबह-शाम कमरे के दरवाजों को बन्द कर
देना उचित है ; इससे कमरे में शीत का प्रवेश नहीं हो पाता। बाकी
समय में जाड़े का दिन होते हुए भी दरवाजों को खुला रक्खे ।
गर्मी के दिनों में दरवाजों को बराबर खुला रखना उचित है । वर्षा
में यदि घटा घिरी हुई हो तो इन्हें बन्द करके थोड़ा-सा खुला रहने

२४४ असली कोकशास्त्र
दे। सौर में सर्दी लगने से मसान आदि रोग हो जाते हैं। घर में
दीपक ऐसे स्थान पर रखना चाहिए जो जच्चा के सम्मुख न हो।
सिरहाने की ओर रखना सबसे उत्तम है। अच्छा हो यदि उस घर
में मिट्टी के तेल का दीपक न जलाया जाय। कारण यह कि इस
तेल में धुआँ होता है और वह धुआँ जीवन के लिए हानिकारक है।
सौर के घर में बहुत-सी स्त्रियाँ न रहने पावें। स्त्री के पति
को तो उस समय वहाँ रहना ही नहीं चाहिए। घर में ऐसी स्त्रियाँ
उस समय रहें जो प्रसूता की प्रेमपात्री हों और प्रिय वचन बोलने
वाली हों—साथ ही इस विषय की जानकार हों। उस समय भय-
युक्त बात भूलकर भी मुख से नहीं निकालना चाहिए। अधिक से
अधिक चार स्त्रियाँ तक प्रसव के समय सूतिका-गृह में रह सकती
हैं। क्यों कि इससे अधिक स्त्रियों के रहने से एक शोर-गुल होता
है दूसरे घर की वायु भी खराब हो जाती है।
इस समय वेदना दो तरह की होती है; एक तो प्रसव की
वेदना और दूसरी किसी अन्य कारण से। प्रसव वेदना के चिन्ह
ये हैं:—कोख में शिथिलता आ जाती है, हृदय बन्धन-रहित जान
पड़ने लगता है, दोनों जाँघों में पीड़ा होने लगती है, कमर या पीठ
के चारों ओर दर्द होती है, प्रसव द्वार से कफ के समान पानी
निकलने लगता है तथा बार बार मूत्र त्याग करने की इच्छा होती
है, पर मूत्र उतरता नहीं। इसके अतिरिक्त प्रसव वेदना रुक रुक
कर होती है। प्रसव वेदना पहले धीरे धीरे होती है और फिर कुछ

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समय के लिए रुक जाती है। बाद हलकी सी पीड़ा होकर २५-३०
मिनट तक रहती है इसके बाद अधिक देर तक ठहरनेवाली तीव्र
वेदना आरम्भ हो जाती है ।
यदि गर्भिणी स्त्री खाने-पीने में व्यतिक्रम न करे, कोष्ठशुद्धि पर
हमेशा ध्यान रक्खे और अपनी शक्ति के अनुसार बराबर परिश्रम
करती जाय—आरामतलब न हो, तो उसे अधिक प्रसव वेदना नहीं
हो सकती । यही कारण है कि मजदूरी पेशा करनेवाली स्त्रियों को
प्रसव की पीड़ा बहुत ही कम होती है । अकसर देखने में आया है
कि गर्भिणी मजदूरिन पूरा गर्भ हो जाने पर भी काम किया करती
है और जब उसे प्रसव के चिह्न दिखलायी पड़ते हैं तब वह काम
छोड़कर चली जाती है और दो तीन घण्टे में ही बच्चा पैदा हो
जाता है । प्रसव-वेदना एक रोग है । जिन स्त्रियों में यह रोग नहीं
होता, उन्हें प्रसव-वेदना नहीं के बराबर होती है। चंगड़ों की
स्त्रियाँ चली जाती हैं और मार्ग में ही प्रसव कर लेती हैं। उन्हें
उस काम के लिए दस मिनट से अधिक नहीं ठहरना पड़ता । इसी
प्रकार अफ्रिका की जंगली जातियाँ, जो हमेशा नंगी रहा करती हैं
और जिन्हें असभ्य कहा जाता है, बिना किसी विशेष कष्ट के बड़ी
आसानी से प्रसव कर लेती हैं। इसका कारण विद्वानों ने यहो
बतलाया है कि वे काम-काज किया करती हैं और गर्भाधान हो
जाने के बाद मैथुन एक बार भी नहीं करतीं ।
प्रसव-वेदना के समय मल-मूत्र के वेग को कभी भी न रोकना

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चाहिए। यदि इनकी रुकावट हो गयी हो तो फौरन यत्न करना
उचित है। यदि इस समय भूख लगे तो गाय का गरम दूध थोड़ा
कुनकुना रहने पर पिलाना चाहिए। प्यास लगने पर ठण्डा पानी
देने में कोई हानि नहीं है। कुछ लोगों का कहना है कि प्रसव का
समय निकट आ जाने पर गर्भिणी को मल तो त्याग आने दे पर
पेशाब लगने पर मूत्रत्याग न करावे—क्योंकि मूत्र को रोकने से
प्रसव में बड़ी सहायता मिलती है। किन्तु हमारे ख्याल से मूत्र
का वेग रोकना भी ठीक नहीं है।
जब लक्षणों से यह निश्चय हो जाय कि वेदना प्रसव की ही
है, तब उसको खूब कसी हुई लम्बी-चौड़ी चारपाई पर सुला देना
चाहिए। यदि तख्ता हो तो और भी अच्छा। गर्भिणी को भूमि
पर कभी न लेटना चाहिए। क्योंकि धूल में हजारों रोगोत्पादक
कीटाणु होते हैं। ये कीटाणु शिशु के ऊपर चढ़ जाते हैं और उसे
रोगी बना देते हैं। प्रसव के समय प्रायः स्त्रियों के लिए फटे, पुराने
और मैले चिथड़े दिये जाते हैं; किन्तु यह ठीक नहीं है। स्वच्छता
की ओर पूरा ध्यान रखना चाहिए। ऐसे कपड़ों से प्रसविरणी और
नव-जात शिशु के बीमार होने की पूरी सम्भावना रहती है। क्योँ
कि यह अवस्था बड़ी ही नाजुक होती है। कभी कभी वस्त्रों की
गन्दगी के कारण भी बच्चों का दम घुटने लगता है और वे मर
जाते हैं।
यदि सूतिका-गृह में रखने वाली चारपाई या तख्ते को गरम