रतिरहस्य: असली कोकशास्त्र (पण्डित कोक्कोक - कामकला, दाम्पत्य-जीवन एवं सम्पूर्ण रति-विज्ञान)
Rati Rahasya or Asli Koka Shastra of Kokkoka with Hindi Commentary
पण्डित कोक्कोक (भाषा टीकाकार: पण्डित कन्हैयालाल) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअसली कोकशास्त्र २३१
गर्भिणी स्त्री को कभी दौड़ना, कूदना, या उछलना नहीं
चाहिए। धमक कर सीढ़ी उतरना या असावधानी से सीढ़ी पर
चढ़ना भी गर्भ के लिए हानिकारक है। इन कामों से गर्भ के गिर
जाने या टेढ़ा हो जाने की सम्भावना रहती है । जिससे गर्भ तो
नष्ट हो ही जाता है, साथ ही स्त्री को भी महान पीड़ा भोगनी
पड़ती है। कभी कभी तो इस पीड़ा से स्त्री मर भी जाती है।
भयावह चीजों से गर्भिणी स्त्री को बचाना चाहिए । उसे दूसरी
स्त्री का प्रसव नहीं देखना चाहिए । गर्भिणी के लिए जल में
तैरना, अधिक परिश्रम और झटके का काम करना, वृक्ष के नीचे
अधिक ठहरना, अधिक सोना, अधिक जागना, दूर की वस्तु को
नजर पर जोर देकर देखना, गर्म चीजें (जैसे लाल मिर्च आदि)
खाना, उपवास-व्रत करना, अधिक भोजन करना, जबर्दस्ती भूख
को रोक रखना, सूखी चीजें (जैसे भूना हुआ चना आदि) खाना
पुरुष के साथ सोना, मल-मूत्र के वेग को रोकना, कुचिष्टता (मैले-
पन) से रहना, अधिक जोर से बोलना, सिर में अधिक तेल
लगाना, क्रोध-शोक करना आदि बड़ा ही हानिकारक है। इसलिए
इन कामों से गर्भिणी स्त्री को सदा बचना चाहिए। गर्भिणी स्त्री
को अधिक पौष्टिक भोजन भी नहीं करना चाहिए; क्योंकि पौष्टिक
भोजन करने से बच्चा पैदा होते समय बड़ा कष्ट होता है।
दाल, भात, रोटी, तरकारी, दूध थोड़ा घी आदि खाना गर्भ-
वती के लिए विशेष लाभदायक है। मक्खन का सेवन करना भी