रतिरहस्य: असली कोकशास्त्र (पण्डित कोक्कोक - कामकला, दाम्पत्य-जीवन एवं सम्पूर्ण रति-विज्ञान)
Rati Rahasya or Asli Koka Shastra of Kokkoka with Hindi Commentary
पण्डित कोक्कोक (भाषा टीकाकार: पण्डित कन्हैयालाल) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअसली कोकशास्त्र २२७
गर्भाधान हो जाने पर पहले महीने में वीर्य जमता है । दूसरे
महीने में उस पर पतली झिल्ली चढ़ती है । तीसरे महीने में शरीर
का आकार बनने लगता है । चौथे में पूरा शरीर बन जाता है ।
पाँचवें महीने में हृदय और जीव पड़ता है । छठे और सातवें महीने
में बालक का शरीर पुष्ट होता है । गर्भस्थ बालक पेट में उकरू बैठा
हुआ दोनों हाथों को पैरों से मिलाये रहता है । उसके दोनों घुटने
छाती और पेट से लगे होते हैं और उसका माथा उन्हीं घुटनों के
बीच में रहता है । यदि पुत्री रहती है, तब तो उसका मुख माँ की
पीठ की ओर होता है और यदि पुत्र होता है तो उसका मुख माँ
के पेट की ओर रहता है । गर्भस्थ बालक अपने हाथों की अँगुलियों
से आँख, कान, नाक और मुख मूंदे रहता है । इसका कारण यह
है कि जिन सात झिल्लियों के भीतर गर्भाशय में बालक रहता है,
उसमें एक प्रकार का ऐसा पानी होता है कि यदि वह बालक की
आँख से छू जाय तो सूर, कान में चला जाय तो बहिरा, मुख में
जाय तो गूँगा, पेट में जाय तो मुर्दा और मस्तक में जाय तो वह
पागल हो जाता है । इसलिए दयालु परमात्मा ने अपने सब छिद्र
मूँद रखने की शक्ति बालक को प्रदान की है ।
बच्चे का कौन-सा अङ्ग पहले बनता है इस विषय में विद्वानों
का कथन भिन्न-भिन्न प्रकार का है । कोई तो कहता है कि शारी-
रिक इन्द्रियों का मूल स्थान मस्तक है और इसकी रचना पहले
होती है ; कोई कहता है, हृदय, बुद्धि और मन है, इसलिए सबसे