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सर्वकोश
रतिरहस्य: असली कोकशास्त्र (पण्डित कोक्कोक - कामकला, दाम्पत्य-जीवन एवं सम्पूर्ण रति-विज्ञान)

रतिरहस्य: असली कोकशास्त्र (पण्डित कोक्कोक - कामकला, दाम्पत्य-जीवन एवं सम्पूर्ण रति-विज्ञान)

Rati Rahasya or Asli Koka Shastra of Kokkoka with Hindi Commentary

पण्डित कोक्कोक (भाषा टीकाकार: पण्डित कन्हैयालाल) द्वारा

DevanagariHindipublished440 पृष्ठ

पृष्ठ 255, कुल 440 में से

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पृष्ठ 255

असली कोकशास्त्र २४५
समय के लिए रुक जाती है। बाद हलकी सी पीड़ा होकर २५-३०
मिनट तक रहती है इसके बाद अधिक देर तक ठहरनेवाली तीव्र
वेदना आरम्भ हो जाती है ।
यदि गर्भिणी स्त्री खाने-पीने में व्यतिक्रम न करे, कोष्ठशुद्धि पर
हमेशा ध्यान रक्खे और अपनी शक्ति के अनुसार बराबर परिश्रम
करती जाय—आरामतलब न हो, तो उसे अधिक प्रसव वेदना नहीं
हो सकती । यही कारण है कि मजदूरी पेशा करनेवाली स्त्रियों को
प्रसव की पीड़ा बहुत ही कम होती है । अकसर देखने में आया है
कि गर्भिणी मजदूरिन पूरा गर्भ हो जाने पर भी काम किया करती
है और जब उसे प्रसव के चिह्न दिखलायी पड़ते हैं तब वह काम
छोड़कर चली जाती है और दो तीन घण्टे में ही बच्चा पैदा हो
जाता है । प्रसव-वेदना एक रोग है । जिन स्त्रियों में यह रोग नहीं
होता, उन्हें प्रसव-वेदना नहीं के बराबर होती है। चंगड़ों की
स्त्रियाँ चली जाती हैं और मार्ग में ही प्रसव कर लेती हैं। उन्हें
उस काम के लिए दस मिनट से अधिक नहीं ठहरना पड़ता । इसी
प्रकार अफ्रिका की जंगली जातियाँ, जो हमेशा नंगी रहा करती हैं
और जिन्हें असभ्य कहा जाता है, बिना किसी विशेष कष्ट के बड़ी
आसानी से प्रसव कर लेती हैं। इसका कारण विद्वानों ने यहो
बतलाया है कि वे काम-काज किया करती हैं और गर्भाधान हो
जाने के बाद मैथुन एक बार भी नहीं करतीं ।
प्रसव-वेदना के समय मल-मूत्र के वेग को कभी भी न रोकना