रतिरहस्य: असली कोकशास्त्र (पण्डित कोक्कोक - कामकला, दाम्पत्य-जीवन एवं सम्पूर्ण रति-विज्ञान)
Rati Rahasya or Asli Koka Shastra of Kokkoka with Hindi Commentary
पण्डित कोक्कोक (भाषा टीकाकार: पण्डित कन्हैयालाल) द्वारा
१३४ असली कोकशास्त्र
खण्डाभ्रक दन्तक्षत
खण्डाभ्रकं स्तनतटे दशनाग्रलेख्यं,
स्यान्मण्डलाकृतियुतं विषमैश्च कूटैः ।
ताम्रान्तरा रदनराजिरखर्वसान्द्रा,
स्यात्कोलचर्वितमिदं स्तनपृष्ठभूषा ॥
स्तनों के नीचे ऊपर दाँतों से क्षत किया हुआ गोल आकार
वाला चिन्ह पड़ जाता है। जो मध्य में लाल, आभायुक्त होता है।
वह बिखरी हुई मणिमाला के समान स्थान-स्थान पर दृष्टिगोचर
होता है। उसको खण्डाभ्रक दन्तक्षत कहते हैं।
—:०:—
असली कोकशास्त्र १३५
देश भेद से नारी रमण
देशसात्म्याच्च योषित उपचरेत ।
प्रत्येक देश की प्रथानुसार स्त्रियों के साथ रमण करना चाहिए।
जो पुरुष तद्देशीय स्त्रियों के समान अपना स्वभाव बनाकर रमण
करता है, वह मनुष्य रति सुख का आनन्द प्राप्त कर लेता है ।
अन्यथा दोनों ही रति-सुख से वंचित रह जाते हैं, और प्रेम के
स्थान में द्वेषभाव उत्पन्न हो जाता है । देशानुसार स्त्रियों के स्वभाव
का आचार्यों ने जिस प्रकार वर्णन किया है, वह नीचे दिखाया
जाता है ।
मध्यदेश की स्त्रियाँ प्रायः आर्य स्वाभाव वाली होती है । जो
पवित्रता के कारण चुम्बन, नखक्षत, दन्तक्षत, आदि से घृणा करती
हैं । ऐसा व्यवहार करने वाले मनुष्य से भी घृणा करती हैं ।
वाह्णीक देश की स्त्रियाँ भी नख, दन्तक्षतादि को अच्छा
नहीं समझतीं ।
उज्जैन देशीया स्त्रियें भी उपरोक्त स्वभाव वाली होती हैं ।
इनका चित्रों में अधिक प्रेम होता है ।
मालव देश की स्त्रियां आलिंगन, चुम्बन, नखक्षत, दन्तक्षत
अधरपान आदि में रुचि रखती हैं । किन्तु अधिक नहीं । प्रहणन
को बहुत चाहती हैं ।
सिन्धु देश की स्त्रियां मुख मैथुन को अधिक पसन्द करती हैं ।
१३६ असली कोकशास्त्र
काठियावाड़ और लाट देश की स्त्रियाँ प्रचण्ड-कामिनी होती
हैं। और मैथुन काल में सीत्कार भी बहुत करती हैं।
बंगाल देश की स्त्रियाँ प्रहरण को अधिक पसन्द करती हैं,
और धातुज लिंग का भी प्रयोग करती हैं।
अन्ध्र देश की स्त्रियाँ, कोमलांगी, सम्भोग प्रिया, अश्लील
विचार रखनेवाली दुराचारिणी होती हैं।
महाराष्ट्र देश की स्त्रियाँ अनेक प्रकार की कलाओं को चाहने
वाली तथा स्वयं उनका ज्ञान रखने वाली, कड़े और गन्दे बचन
पसन्द करने वाली अति काम-विह्वला होती हैं।
पाटलीपुत्र देश की स्त्रियाँ महाराष्ट्र के समान खुला व्यवहार
करने वाली नहीं होतीं। वे एकान्त में ही कलाओं का प्रयोग करने
वाली होती हैं।
द्रविड़ देश की स्त्रियों की योनि से भोग के पहले ही थोड़ा
सफेद रज निकल आता है।
गौड़ देश की स्त्रियाँ मीठा बोलने वाली, कोमलांगी, अधिक
सम्भोग में अनुरागवती होती हैं।
आभीर देश की स्त्रियाँ प्रसन्न चित्त से आलिंगन चाहने वाली,
छाती आदि पर धक्का चाहने वाली, और चुम्बन से विशेष प्रसन्न
होने वाली होती है। नाखून और दाँतों के क्षत को विशेष नहीं
चाहतीं।
मालव देश की स्त्रियों का भी ऐसा ही स्वभाव होता है।
असली कोकशास्त्र १३७
गुजरात देश की स्त्रियाँ फूले हुए केशों को धारण करने वाली,
पतले शरीर वाली, मोटे स्तनों वाली, सुन्दर आँखों वाली, मीठा
बोलने वाली, भीतरी बाहरी दोनों प्रकार के सम्मार्गों को चाहने
वाली होती हैं।
लाट देश की स्त्रियाँ मन्द ताड़न करने से, नखक्षत, दन्तक्षत
आदि से शीघ्र द्रवित होने वाली तथा विशेष आलिंगन चाहने वाली
प्रचण्ड वेगवती कोमल शरीर वाली, रति-काल में विशेष आनन्द
से विभोर होने वाली होती हैं।
अयोध्या की स्त्रियों की योनि में अत्यन्त खुजली होती है।
इस लिए वे बनावटी लिंग से खूब ताड़न किये जाने पर द्रवित होती
हैं। स्त्री राज्य की स्त्रियों के भी यही स्वभाव होते हैं।
कोंकण देश की स्त्रियाँ अपने दोष छिपाने वाली और परदोषों
पर हँसने वाली होती हैं। चुम्बन, नख, दन्त, आदि क्षतों को
सहने वाली, मध्य वेगवती योनि द्वार से वीर्य को चूसने वाली
और अनेक विध रमण करने वाली होती हैं।
कामरू देश की स्त्रियाँ अत्यन्त कोमलांगी, बार-बार द्रवित
होने वाली, स्पर्श मात्र से सम्भोग के लिए तत्पर होने वाली, मधुर
भाषण करने वाली और सच्चरित्रा होती हैं।
उड़ीसा देश की स्त्रियाँ दन्त, नख आदि चिन्हों को चाहनेवाली
होती हैं।
अंग, बंग, कलिंग आदि देशों की स्त्रियाँ भग-भूषण (चमड़े
१३८ असली कोकशास्त्र
का लिंग ) को चाहने वाली नख, दन्त, आदि चिन्हों, मुष्टिकाघात
आदि में रुचि रखने वाली, निरन्तर सम्भोग चाहने वाली, निर्लज्ज
और अधिक अनुरागवती होती हैं।
आसन
आजकल जितने भी वैवाहिक सम्बन्ध होते हैं उनमें कोकशास्त्र
के अनुसार बताये हुए नर-नारियों के चिन्ह मिलान से मिलाकर
नहीं किये जाते। जिस कारण उच्च रत या नीच रत वाले स्त्री पुरुष
का योग नहीं मिल पाता। जिसका परिणाम यह होता है, कि योग्या-
योग्य जोड़ी मिल जाने से किसी की भी तृप्ति नहीं होती। गृहस्थ
सुख का अभाव हो जाने से गृहस्थ एक प्रकार का भार मालूम होने
लगता है। आसनों की व्यवस्था समझ लेने से कैसा भी अनमेल
विवाहित स्त्री-पुरुष क्यों न हो, वह रति-सुख से वंचित नहीं रह
सकता। और सुसन्तान प्राप्त कर वह गृहस्थ को स्वर्ग के समान
देख सकता है। आसन निर्माण का यथार्थ कारण यही है। किन्तु
इस समय लोग उन आसनों का दुरुपयोग कर लाभ के स्थान में
हानि भी उठा बैठते हैं। इसमें आसनों का कोई दोष नहीं। जैसे
वैद्यकशास्त्र में अनेक प्रकार के रोग नाश करने की अनेक विध
औषधियाँ बतलायी गयी हैं, यदि कोई अनाड़ी उनका अनुचित
प्रयोग कर दुःख उठावे तो उसमें आयुर्वेद रचयिता का कोई दोष
असली कोकशास्त्र १३६
नहीं। किस आसन से किस प्रकार का लाभ होता है, इसका
विचार आगे किया जायगा।
यद्यपि शीत का निवारण एक बड़े वस्त्र को शरीर पर लपेट
लेने मात्र से ही हो सकता है किन्तु वह एक वस्त्र अनेक विघ्न
उत्पन्न कर सकता है उसी वस्त्र को काट-छाँट कर कुर्ता, कोट,
पैजामा आदि बनाकर पहन लेने से शीत का निवारण भी हो जाता
है, सुन्दर भी लगता है, और किसी काम में किसी प्रकार की बाधा
भी उपस्थित नहीं होती। मनुष्य प्रत्येक वस्तु को किसी अच्छी
अवस्था में देखना चाहता है—एक ही वस्तु से अनेक उपकार लेना
चाहता है काम भी निकल जाय, और मनोविनोद भी हो, तथा
किसी प्रकार की हानि न हो, ऐसा विचार दूरदर्शी पुरुषों का होता
है। इसलिए विचारशील पुरुष शास्त्रानुसार बतलाये हुए मार्ग से
चलते हैं। क्योंकि वह अनेक प्रकार से अनुभव द्वारा निश्चित किया
हुआ होता है। यथार्थतः इस आसनकला के ज्ञान के बिना आज
सहस्रों स्त्री-पुरुष सन्तानहीन, नर-नारी से विमुख गृहस्थ को शम-
शान के समान किये हुए हैं। इन बातों की शिक्षा किसी भी रूपमें
स्त्री-पुरुषों को नहीं मिलती। इसकी शिक्षा ग्रहण करना एक प्रकार
से बड़ी गन्दी बात मानी जाती है। और इस प्रकार की जो पुस्तकें
लिखी भी जाती हैं, उनको बड़ी हेय दृष्टि से देखते हैं। अनेक
लोगों ने तो आसनों को ही अनुपयुक्त और हेय ठहरा दिया है।
इस लिए उसके सम्बन्ध में वे विचार भी क्यों करने लगे ? वे स्वयं
१४० असली कोकशास्त्र
घृणा करते हैं और दूसरों को भी घृणा का उपदेश देते हैं, वस्तुतः
वे स्वयं ही नहीं समझ पाये, यही समझना चाहिए। इन आसनों
का निर्माण वात्स्यायन मुनि ने किया है। जिन्होंने न्याय-दर्शन पर
भाष्य किया है, जो एक बड़ा जबर्दस्त तार्किक ग्रंथ सुप्रसिद्ध है।
और भी अनेक आचार्यों ने इस विषय पर विचार किया, जिनका
आधार लेकर कोका पण्डित ने कोकशास्त्र का संकलन किया, ऐसे
दूरदर्शी लोकप्रसिद्ध अनुभवी महात्माओं के दिखलाये हुए मार्ग
नुकसान पहुँचाने वाले हों, ऐसा सम्भव नहीं समझा जा सकता।
यह दूसरी बात है कि उन आसनों के प्रयोग को हम भलीभाँति
समझ न सकने से इष्टार्थ लाभ न उठा सकें।
उपरोक्त आसन व्यवस्था जिन स्त्री-पुरुषों के लिये अत्यन्त
आवश्यक होती है, उनका वर्णन पहले किया जाता है।
आरोहपरिरोहाभ्यां षण्णवद्वादशाङ्गुलैः ।
गुह्यैः शशवृषोऽश्वाना हरिण्यश्वेभिकाः स्त्रियः ॥
शश पुरुष की मूत्रेन्द्रिय छः अंगुल लम्बी होती है। वृष संज्ञक
पुरुष की नौ अंगुल लम्बी, तथा अश्व पुरुष की बारह अंगुल लम्बी
इन्द्रिय होती है। इसी प्रकार छः अंगुल लम्बे चौड़े काम-मन्दिर
के परिमाण वाली हरिणी, नौ अंगुल परिमाण वाली अश्वा तथा
बारह अंगुल वाली हस्तिनी होती है।
जिन स्त्री पुरुषों के गुप्तांग परिमाण समान होते हैं, वे समरत
वाले कहलाते हैं। जैसे शश और हरिणी, वृष और अश्वा,
असली कोकशास्त्र १४१
अश्व और हस्तिनी सम-रत वाले समझे जाते हैं। क्योंकि शश छः
अंगुल गुप्तेन्द्रिय वाला और हरिणी छः अंगुल गहरी परिमाण वाली
होती है। इसी प्रकार वृष नौ अंगुल और अश्वा भी नौ अंगुल,
तथा अश्व बारह एवं हस्तिनी भी बारह अंगुल लम्बे परिमाण
वाली होती है।
किन्तु इन्हीं के विषम जोड़ों के योग से उच्चरत, और
नीचरत पैदा होता है। जैसे—हिरणी वृष, बड़वा अश्व, ये दोनों
उच्चरत वाले कहलाते हैं। क्योंकि इन दोनों पुरुषों की इन्द्रियें इन
दोनों स्त्रियों की अपेक्षा बड़ी होती हैं। इस लिए दोनों को रति-सुख
का आनन्द मिलता है। बड़वा शश, हस्तिनी और वृष ये दोनों
नीचरत कहाते हैं। क्योंकि पुरुषों की अपेक्षा इन दोनों स्त्रियों का
काम-मन्दिर गहरा होता है। इस लिए दोनों को किसी प्रकार का
रति-सुख नहीं मिलता। छः अंगुल वाली हरिणी और बारह अंगुल
वाले अश्व का संयोग अति उच्च-रत कहाता है। बारह अंगुल वाली
हस्तिनी और छः अंगुल वाले शश पुरुष का संयोग अति नीचरत
कहाता है इन दोनों को रति का कुछ भी सुख नहीं मिलता।
समान रतों को उत्तम, उच्चरतों को मध्यम और अत्युच्च तथा
अतिनीच रतों को अधम कहते हैं!
समान रत स्त्री-पुरुष दोनों को सुख देनेवाला और तृप्त करने
वाला होता है उसमें आनन्द ही आनन्द मिलता है, दुःख का लेश
भी नहीं। इस लिए उसको उत्तम रत कहा है। उच्च रत में स्त्रियों
१४२ असली कोकशास्त्र
की योनि छोटी होने और पुरुष का लिंग बड़ा होने से स्त्री को दुःख
होता है। उसके मन में हर्ष के स्थान पर क्लेश पैदा होता है।
उनकी मानसिक प्रसन्नता नष्ट हो जाती है और तृप्ति नहीं होती,
केवल पुरुष की दुःख-सुख के साथ अर्ध-तृप्ति होती है इसलिए
उसको मध्यम कहा गया है। अति उच्च और अति नीच रतों में
स्त्री-पुरुषों की इन्द्रियें एक दूसरे की अपेक्षा अत्यन्त छोटी बड़ा
होने से किसी को भी आनन्द प्राप्त नहीं होता। और न किसी की
तृप्ति ही होती है। इस लिए इसको अधम कहा गया है।
इन उत्तम, मध्यम और अधम रतों को समान बनाने के लिये
आसनों के प्रयोग से कुछ उपाय बतलाये गये हैं। जैसे—
रागकाले विशालयन्त्येव जघनं मृगी समविशेदूच्चरते ।
सम्भोग काल में उच्चरत में स्थित स्त्री को उचित है कि वे अपनी
जंघाओं को फैला दे। ऐसा करने से पुरुषेन्द्रिय का प्रवेश बहुत
सरल हो जायगा। मृगी और वृष संज्ञक पुरुष का उच्चरत कहाता
है। यदि मृगी अपनी जंघाओं को फैला दे तो उसके स्मर-मन्दिर
का द्वार इतना फैल जायगा कि वृष पुरुष की गुप्तेन्द्रिय सरलता
पूर्वक प्रविष्ट होकर दोनों को रति-सुख का आनन्द उत्पन्न कर देगी।
वह मृगी जाति की स्त्री यदि अश्व पुरुष के साथ सम्बन्ध करती
हुई अपने जघनस्थल को पूर्ण विस्तृत कर दे तो उसे भी सम-रत के
समान उत्तम सुख प्राप्त हो सकता है। आप पूर्ण तृप्त होती हुई
पुरुष को भी तृप्त कर सकती है।
असली कोकशास्त्र १४३
अवहासयन्तीव हस्तिनी नीचरते ।
यदि हस्तिनी और वृष पुरुष का संयोग हो तो इस नीचरत
में स्त्री को चाहिए कि वह अपनी जंघा को सिकोड़ ले । इससे
स्मर मन्दिर का मुख छोटा हो जायगा और सम-रत के समान
दोनों को पूर्ण सुख प्राप्त होगा ।
न्याय्यो यत्र योगस्तत्र समपृष्ठम् ।
शश मृगी का, वृष बड़वा, और अश्व हस्तिनी का संयोग
समरत कहाता है । क्योंकि इनमें स्वाभाविक रति-सुख प्राप्त होता
है । दोनों की गुप्तेन्द्रिय समान होने के कारण किसी को इन्द्रिय
संकोच-विकाश करने की आवश्यकता नहीं पड़ती ।
प्रत्येक पुरुष को चाहिए कि आसन बाँधते समय स्त्री के
काम-मन्दिर में पुरुष अपनी कामेन्द्रिय का प्रवेश बहुत धीरे-धीरे
करे, जिससे योनि में रहनेवाला स्निग्ध द्रव्य कामेन्द्रिय पर लगकर
वह गीली हो जाय । अन्यथा एकाकि प्रवेश करने से स्त्री को बहुत
कष्ट होता है, ओर कभी-कभी जननेन्द्रिय का चर्म भी उलट जाता
है । जिससे बड़ी भारी हानि पैदा हो सकती है ।
सुख आसन
स्त्री की दोनों जंघाएँ पुरुष अपनी जंघाओं पर रखकर अंग-
प्रत्यंग का मृदु स्पर्श चुम्बनादि करता हुआ सुकर रीति से उत्तान
लेटी हुई रमणी से भोग करता है, इसलिए उसे सुख आसन कहते
हैं । इस सुखआसन का प्रयोग समरत स्त्री पुरुषों में किया जाता है ।
१४४ असली कोकशास्त्र
उत्फुल्लक आसन
करयुग्मधृतत्रिकमूर्ध्वलसज्जघनं
पतिहस्तनिविष्टकुचम् ।
स्फिग्विम्बबहिर्धृ तपाष्णियुगं,
द्यु त्फुल्लकयुक्तमिदं करणम् ॥
स्त्री अपने नितम्ब के ऊपरी भाग को तकिये के सहारे ऊपर
उठाकर पति के नितम्बों को अपने हाथ की हथेलियों के सहारे
ऊपर उठाये रहे, और पुरुष दोनों हाथ से स्त्री के स्तनों का मर्दन
करे इसको उत्फुल्लक आसन कहते हैं ।
विजृम्भितक आसन
यदि तिर्यगुदञ्चितमूरुयुग,
दधती रमते रमणी रमणम् ।
विहिता पसृति र्विवृतोरु भगा,
भुवि जृम्भितमुक्तमिदं करणम् ॥
पुरुष के समान स्त्री अपनी जंघाओं को ऊपर उठाकर पति के
साथ तिरछे होकर भोग करती हुई स्वयं भी आगे-पीछे हिलती है,
उसकी योनि तथा जंघाएँ खुली रहती हैं, उसे विजृम्भितक आसन
कहते हैं ।
१० असली कोकशास्त्र १४५
इन्द्राणिक आसन
निजमूरुयुगं सममादधती,
प्रियजानुनि योजयति प्रमदा ।
यदि पार्श्वत एव चिराभ्यसना-
दिन्द्राणिकमुक्तमिदं करणम् ॥
जब स्त्री दोनों जंघाओं को मिलाकर पति की एक जंघा पर
रखकर भोग करती है, उसको इन्द्राणिक आसन कहते हैं।
तथाच्चतरतस्यापि पारेग्रह ।
उपरोक्त तीनों आसनों में चाहे कैसा भी उच्चरत क्यों न हो,
अत्यन्त सुख के साथ सम्भोग होता है, ओर सभी उच्चरत वालों
को पूर्ण आनन्द मिलता है ।
सम्पुट आसन
सम्पुटेन प्रतिग्रहो नीचरते ।
नीच रत वाले जोड़ों को सम्पुट से आनन्द मिलता है, अर्थात्
बड़वा, हस्तिनी आदि शश के साथ संभोग करते समय अपनी
जंघाओं को सिकोड़ लें । इस प्रकार सम्पुट करने से नीचरत भी
समरत के समान सुख पहुँचाता है ।
एतेन नोचतररतेपि सम्पुटकम् पीडितकम्
वेष्टितकम बाडवकमिति हस्तिन्याः ।
१४६ असली कोकशास्त्र
हस्तिनी के साथ जब शश पुरुष सम्भोग करे तब हस्तिनी को
सम्पुट पीडितक, वेष्टितक, वाडवक संज्ञक योनि संकोचक आसनों
से काम लेना चाहिये ।
सम्पुटक आसन
सरलीकृतजंघमुरौ मिलितौ,
यदि सम्पुटको भवति द्विविधः ।
उत्तानकपार्श्वेशाच्यु वतेः.
स च पीडितमूरुनिपीडनतः ॥
भोग करते समय स्त्री पहले अपने पैरों को फैलाकर तत्पश्चात्
जंघा को ढीला कर दोनों पैरों को मिला दे । इसको सम्पुटक आसन
कहते हैं । इसके दो भेद हैं, यदि स्त्री सीधी लेटी रहे तब उत्तान्
सम्पुट, और यदि तिरछी करवट लेटी रहे तो पार्श्व सम्पुट भेद
हो जाता है । पार्श्व सम्पुट आसन करते हुए पुरुष को स्त्री के
दाहिने तरफ रहना चाहिए । इसमें सब आचार्य एकमत हैं ।
पीडितक आसन
सम्पुट की भाँति सम्भोग करते हुए यदि स्त्री अपनी जंघाओं
को खूब संकुचित करे तो उसे पीडितक आसन कहते हैं ।
वेष्टितक आसन
उत्तान सम्पुट की भाँति भोग करते हुए योनि को अत्यन्त
असली कोकशास्त्र १४७
संकुचित करने के लिये यदि स्त्री अपनी दोनों जंघाओं को आपस
में लिपटा ले तो उसे वेष्टितक आसन कहा जायगा ।
वाडविक आसन
अल्प वीर्य पुरुष की कामेन्द्रिय को स्त्री जब अपने भगोष्ठों से
खूब दबाकर अन्दर की ओर खींचती है, तब उसे वाडविक आसन
कहते हैं।
भुग्नक आसन
सौवर्णनाभास्तू भावप्पूरू उर्ध्वा वितितद्भुग्नकम् ।
स्त्री की जंघाओं को ऊपर उठाकर अधोभाग से जो मैथुन
किया जाता है, उसको भुग्नक आसन कहते हैं।
जृम्भितक आसन
पुरुष स्त्री की जंघाओं को अपने कन्धे पर रखकर जब भोग
करता है, तब उसे जृम्भितक आसन कहते हैं।
ऊरुस्फुटन आसन
स्त्री की दोनों मिली हुई जंघाओं को पुरुष अपने हाथ से पकड़
छाती से लगाकर रमण करे तो उसे ऊरुस्फुटन आसन कहते हैं।
उद्भुग्न आसन
ऊरुस्फुटन आसन के समान ही यह भी आसन किया जाता
है। इसमें केवल जंघा छाती से नहीं लगायी जाती।
१४८ असली कोकशास्त्र
अर्धनिपीड़ित आसन
यदि स्त्री पुरुष के कन्धे पर एक पैर रखकर भोग करे तो उसे
अर्धनिपीड़ित आसन कहते हैं ।
सारित आसन
यदि एक चरण पुरुष के कन्धे पर और दूसरा नीचे की ओर
फैलाकर सम्भोग करे तो उसे सारित आसन कहते हैं ।
वेणुविदारित आसन
स्त्री भोग करते समय पुरुष के कन्धे पर एक पैर को रख दूसरे
को खाट पर पड़ा रहने दे फिर खाट वाले पैर को कन्धे पर और
कन्धे वाले को खाट पर शीघ्र गति से बदले तो उसको वेणुविदारित
आसन कहते हैं ।
शूलचित आसन
यदि स्त्री अपने पैर को पुरुष के सिर पर रखकर दूसरे पैर को
नीचे फैलाकर सम्भोग करे तो उसे शूलचित आसन कहते हैं ।
कर्कटक आसन
स्त्री अपने दोनों पैरों को अपनी नाभि में लगाकर सम्भोग करे
तो उसको कर्कटक आसन कहते हैं ।
असली कोकशास्त्र १४६
प्रेंखा आसन
कर्कटक की भाँति पुरुष से सम्भोग करती हुई नारी मतवाली
होकर जब दोनों पाँव को हाथी के कान के समान हिलाने लगती
है तब उसे प्रेंखा आसन कहते हैं ।
पद्मासन
भोग करते समय जब रमणी अपनी दाहिनी जंघा को बायीं
जंघा पर चढ़ा ले तो उसे पद्मासन कहते हैं ।
अर्ध पद्मासन
यदि रमणी एक जंघा को ऊपर उठाकर दूसरी जंघा उस पर
रख भोग करे तो उसे अर्ध पद्मासन कहते हैं ।
परावृत्तक आसन
भोग करते समय जब स्त्री-पुरुष आपस में आलिंगन करें और
थोड़ी देर बाद स्त्री पुरुष की गोद में पिछली ओर से घूमकर इस
भाँति आगे आ जाय कि पुरुष की इन्द्रिय योनि से बाहर न
निकलने पाये तो उसे परावृत्तक आसन कहते हैं ।
फणिपाश आसन
स्त्री अपनी दोनों जंघाओं को पति के कन्धे के ऊपर से निकाल
कर पति के कण्ठ तक पहुँच जाय और पति भी अपनी भुजाओं से
जकड़ कर उसे बाँध ले तो उसे फणिपाश आसन कहते हैं ।
१५० असली कोकशास्त्र
स्थितरत आसन
स्त्री पुरुष परस्पर एक दूसरे का सहारा लेकर अथवा किसी
दीवार के सहारे खड़े रहकर भोग करें तो उसे स्थितरत आसन
कहते हैं।
अविलम्बितक आसन
खड़े पुरुष के गले में हाथ डाल पुरुष के बाहुपाश में जकड़ी
हुई अपनी जंघाओं में पति को लपेट कर जब रमणी रमण करती
है तब उस आसन को अवलम्बितक आसन कहते हैं।
हिंडोल आसन
अवलम्बितक आसन की भाँति यह आसन भी किया जाता है
इसमें केवल इतना ही अन्तर होता है कि स्त्री हिंडोले की तरह स्वयं
हिलती हुई भोग करती है, इसलिए इसको हिंडोल आसन कहते हैं।
धेनुक आसन
पशु के समान नीचे को मुख कर नायिका जब पीछे से पुरुष से
वृष के समान मैथुन कराती है, तब उसे धेनुक आसन कहते हैं।
कौर्म आसन
पुरुष भुजाओं से भुजाएँ और जंघाओं से जंघाएँ तथा मुख से
असली कोकशास्त्र १५१
मुख मिलाकर सर्वाङ्ग निपीडित करता हुआ जब सम्भोग करता
है, तब वह कौर्म आसन कहाता है ।
ऊर्ध्वगतोरुयुग आसन
कौर्म आसन की भाँति यह भी आसन होता है। इसमें केवल
इतनी विशेषता है ‘कि रमण करते समय पुरुष की टाँगें ऊपर की
तरफ हों तो वह ऊर्ध्वगतोरुयुग आसन कहाता है ।
परिवर्तित आसन
टाँगें ऊपर करते समय यदि स्त्री अपनी योनि का संकोच-
विकाश करे तो उसे परिवर्तित आसन कहते हैं ।
समुद्र आसन
टेढ़ी करवट लेटी हुई स्त्री की जंघा में टेढ़े सोकर जंघा से
जंघा मिलाकर रमण करने को समुद्र आसन कहते हैं ।
परिवर्तनक आसन
स्त्री या पुरुष पहले समुद्रक यन्त्र की विद्या को करके फिर
उलटी तरह फँसाकर रमण करे तो उसे परिवर्तनक आसन कहते हैं ।
युग्म पद्मासन
एक पैर फैलाकर दूसरा सिकोड़ कर बैठी हुई स्त्री के साथ
उसी प्रकार बैठकर पुरुष उसके साथ जकड़ कर आलिंगन चुम्बन
करता हुआ सम्भोग करे तो उसे युग्मपद आसन कहते हैं ।
१५२ असली काकशास्त्र
विमर्दितक आसन
यदि स्त्री की कोहिनी के बीच में अपनी कटिभाग को फेरता
हुआ भोग करे तो उसे विमर्दितक आसन कहते हैं ।
विपरीत आसन
पिय को तिय नीचे करे, पिय सम भाव दिखाय ।
आसन है विपरीत यह, पिय तिय के मन भाय ॥
विपरीतासन का प्रभाव
सा प्रकीर्यमाणकेशकुसुमाश्वासविच्छिन्नहासिनी
वक्त्र संसर्गार्थं स्तनाभ्यामुरः पीडयन्ती पुनः पुनः
शिरो नमयन्ती याश्चेष्टाः पूर्वमसौ दर्शितवांस्ता एव
प्रतिकुर्वीत पानिता प्रतिपातयामीति हसन्ती तर्ज-
यन्ती प्रतिघ्नती च ब्रूयात् पुनश्च व्रीडां दर्शयेच्छ्लूमं
वीरामाभीप्सां च, पुरुषोद्यंसृप्तैरेवोपसर्पेत् ॥
विपरीतासन से ही स्त्री के स्वभाव का पता चलता है । जब
वह पुरुष के ऊपर आ जाती है तब वह जिस प्रकार अनंग की
उत्पत्ति होती है उन-उन उपायों का अवलम्बन करती है । उसे क्या
प्रिय है और वह किस प्रयोग से तृप्त होती है, इस बात का परिचय
भलीभाँति विचारशील पुरुष को लग जाता है । पुरुषारूढ़ होकर
असली कोकशास्त्र
चित्र नं० ४, ५
चित्रणी स्त्री शशक पुरुष