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सर्वकोश
रतिरहस्य: असली कोकशास्त्र (पण्डित कोक्कोक - कामकला, दाम्पत्य-जीवन एवं सम्पूर्ण रति-विज्ञान)

रतिरहस्य: असली कोकशास्त्र (पण्डित कोक्कोक - कामकला, दाम्पत्य-जीवन एवं सम्पूर्ण रति-विज्ञान)

Rati Rahasya or Asli Koka Shastra of Kokkoka with Hindi Commentary

पण्डित कोक्कोक (भाषा टीकाकार: पण्डित कन्हैयालाल) द्वारा

DevanagariHindipublished440 पृष्ठ

पृष्ठ 38, कुल 440 में से

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असली कोकशास्त्र ३७
अधिक मात्रा में एकत्र हो जाता होगा। यदि उसे काम में न लाया
जाय तो अन्ततः वह किस काम आवेगा। इसका साधारण
उत्तर यही है कि आहार किये हुए पदार्थ से रस, रस से रक्त,
रक्त से मांस, मांस से मेदा, मेदा से अस्थि (हड्डी) हड्डी
से मज्जा और फिर उससे वीर्य बनता है। बाद वीर्य की
भी पाचन क्रिया होती है। स्थूल भाग तो वीर्य में रहता है और
सूक्ष्म भाग का 'ओज' बन जाता है। कहने का अभिप्राय
यह है कि सब धातुओं में सर्वश्रेष्ठ वस्तु वीर्य है और वीर्य का
श्रेष्ठ भाग ओज है। इसी ओज का दूसरा नाम बल भी है।
इस ओज की ज्यों-ज्यों वृद्धि होती है, त्यों-त्यों शरीर की वृद्धि
होती है और इसकी न्यूनता से शरीर का नाश होता है।
उत्साह, साहस, धैर्य, लावण्य, संयम, तेज, सौन्दर्य, प्रसन्नता,
बुद्धि आदि इसी ओज की विभूतियाँ हैं। अधिक मात्रा में वीर्य
का नाश करने वालों में ये विभूतियां नहीं रहतीं। यही कारण है
कि हमारे शास्त्रकारों ने सन्तानोत्पत्ति के लिए छोड़कर और किसी
भी अवस्था में वीर्यनाश करने की आज्ञा नहीं दी है।
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