रतिरहस्य: असली कोकशास्त्र (पण्डित कोक्कोक - कामकला, दाम्पत्य-जीवन एवं सम्पूर्ण रति-विज्ञान)
Rati Rahasya or Asli Koka Shastra of Kokkoka with Hindi Commentary
पण्डित कोक्कोक (भाषा टीकाकार: पण्डित कन्हैयालाल) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२० असली कोकशास्त्र
मिल सकते हैं, तब वह मलाई, रबड़ी, लड्डू, पेड़ा आदि अनेकों
प्रकार की मिठाइयाँ क्यों बनाकर खाता है ? सामान्य वस्त्र से
शीत निवारण किया जा सकता है, फिर ऊनी, रेशमी आदि नाना-
विध वस्त्रों की क्या आवश्यकता ? सामान्य कुटिया में गर्मी, सर्दी
की निवृत्ति की जा सकती है, फिर महल-अटारियों की क्या जरूर-
रत ? इससे स्पष्ट प्रकट होता है कि मनुष्य प्रत्येक वस्तु का उप-
भोग बड़ी खूबसूरती के साथ करना चाहता है ।
जब इन छोटे छोटे कामों के लिये इतने विचार की आवश्य-
कता है, तब इस 'काम' जैसे महत्वपूर्ण विषय की उपेक्षा करना
कितनी भारी गलती है। जिस मनुष्य-शरीर के लिये समस्त
दुनियाँ के प्रपंच किये जाते हैं, उसकी रचना के लिये किसी भी
उच्च ज्ञान की आवश्यकता नहीं, ऐसा समझना कितनी अदूरदर्शिता
की बात है !
यही कारण है कि आज छोटे से लेकर बड़े-बड़े घरानों तक
में विषाद ही विषाद दिखायी देता है । एक आलीशान पक्की चित्र-
विचित्र रंगों से रंगी हुई लाखों रुपयों की इमारत के अन्दर एक
सुन्दर नवयौवना विवाहिता स्त्री रहती है, जिसका पति सहस्रों
रुपया माहवारी कमाता है, उस स्त्री की मनमानी मांगों को पूरी
करता है। अर्थात् वस्त्र, आभूषण, खाद्यपदार्थ आदि किसी वस्तु
की त्रुटि नहीं करता । भोजन बनाने के लिये तथा सेवा-शुश्रुषा के
लिये सेविकायें प्रस्तुत रखता है और स्वयं भी रूप-यौवन-संपन्न