रतिरहस्य: असली कोकशास्त्र (पण्डित कोक्कोक - कामकला, दाम्पत्य-जीवन एवं सम्पूर्ण रति-विज्ञान)
Rati Rahasya or Asli Koka Shastra of Kokkoka with Hindi Commentary
पण्डित कोक्कोक (भाषा टीकाकार: पण्डित कन्हैयालाल) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३२ असली कोकशास्त्र
आकृति में शिश्न से बहुत छोटा होता है। लिंग पर जिस प्रकार
हटने-बढ़ने वाली त्वचा होती है, वैसी ही इस पर भी होती है।
मैथुनकाल में इसकी नालियों में भी रक्त भर जाता है। शिश्न
और भगनासा की रगड़ से स्त्री को वहुत आनन्द मालूम होता है।
मैथुन के बाद शिश्न की भाँति भगनासा का रक्त भी लौट जाता
है और वह शि शिल हो जाती है।
पुरुष की शुक्र-ग्रन्थियों की तरह स्त्री के भी डिम्ब-ग्रन्थियाँ
होती हैं। पुरुष के शुक्र और डिम्ब के मिलने से ही गर्भ स्थिर
होता है। ये डिम्ब ग्रन्थियाँ वस्ति-गह्वर की दाहिनी-बायीं दीवारों
से सटी रहती हैं। ग्रन्थि की शक्ल और तौल कबूतर के अंडे की
तरह होती है और इसकी लम्बाई एक इन्च तथा चौड़ाई पौन इन्च
के लगभग होती है। मोटाई आध इन्च तथा छः से आठ माशे
तक वजन होता है।
योनि का रूप एक नली के समान होता है। उसके ऊपर का
सिरा गर्भाशय की गर्दन के निचले हिस्से में चारो ओर लगा
होता है। उसके भीतर गर्भाशय का बाह्यद्वार रहता है। उस
नली की लम्बाई लगभग तीन-चार इन्च के होती है। उसके सामने
वाली दीवार पिछली दीवार की अपेक्षा कुछ मोटी होती है। योनि का
द्वार तंग होता है। भीतर कुछ फैलाकर फिर गर्भाशय के पास
तंग होता है। योनि-द्वार में बहुत सी शिराएँ होती हैं, जो मैथुन-
काल में रक्त से भरकर मोटी हो जाती हैं।