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सर्वकोश
रतिरहस्य: असली कोकशास्त्र (पण्डित कोक्कोक - कामकला, दाम्पत्य-जीवन एवं सम्पूर्ण रति-विज्ञान)

रतिरहस्य: असली कोकशास्त्र (पण्डित कोक्कोक - कामकला, दाम्पत्य-जीवन एवं सम्पूर्ण रति-विज्ञान)

Rati Rahasya or Asli Koka Shastra of Kokkoka with Hindi Commentary

पण्डित कोक्कोक (भाषा टीकाकार: पण्डित कन्हैयालाल) द्वारा

DevanagariHindipublished440 पृष्ठ

पृष्ठ 28, कुल 440 में से

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पृष्ठ 28

असली कोकशास्त्र २७
तामस भाव, आलस्य और बहरापन ये सब रोग के ही
लक्षण है; कई-एक डाक्टर चोरी आदि को भी रोग ही मानते हैं।
विलायत में अनेक धनिक-स्त्रियाँ भी छोटी-छोटी चोरी करती पायी
गयी हैं। जिनकी डाक्टरी परीक्षा करायी जाने पर, डाक्टरों ने
“क्लेप्टेनिया” की बीमारी बतलायी। कोई मनुष्य स्वभाव से ही
खूँखार होते हैं। उन्हें बिना खून किये चैन नहीं पड़ता। यह भी
एक प्रकार का रोग है।
अब यह कहा जा सकता है कि जिनका शरीर सब इन्द्रियों से
पूर्ण है अर्थात् आँख, नाक कान आदि सभी पूर्ण है और उनमें
किसी प्रकार का विकार नहीं, अंग-प्रत्यंग सुडौल सुन्दर जिनसे
किसी प्रकार की बदबू नहीं आती और मन स्वाधीन है वे ही निरोग
हैं। स्वास्थ्य प्राप्त कर लेने पर भी उसका भोगना सरल नहीं।
माता-पिता का रोगी होना भी हमारे रोग का कारण है। माता-
पिता यदि निरोग होकर सन्तान पैदा करें तो उनको सन्तान उनसे
कहीं अधिक स्वस्थ और बलवती हो। विकासवादी इस बात को
मुक्तकण्ठ से स्वीकार करते हैं कि रोग-रहित पुरुष को मृत्यु का
भय नहीं लगता। मृत्यु से हमारा अत्यन्त डरना, यह सिद्ध करता
है कि हम रोगी हैं। इस लिये ऊपर दिखाये हुए स्वास्थ्य लाभ
करने का प्रयत्न हमको सदैव करना चाहिये। क्योंकि वह हमारा
परम कर्त्तव्य है।
स्वास्थ्य लाभ से ही प्रकृत जीवन प्राप्त होता है, यह नियम-