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सर्वकोश
रतिरहस्य: असली कोकशास्त्र (पण्डित कोक्कोक - कामकला, दाम्पत्य-जीवन एवं सम्पूर्ण रति-विज्ञान)

रतिरहस्य: असली कोकशास्त्र (पण्डित कोक्कोक - कामकला, दाम्पत्य-जीवन एवं सम्पूर्ण रति-विज्ञान)

Rati Rahasya or Asli Koka Shastra of Kokkoka with Hindi Commentary

पण्डित कोक्कोक (भाषा टीकाकार: पण्डित कन्हैयालाल) द्वारा

DevanagariHindipublished440 पृष्ठ

पृष्ठ 37, कुल 440 में से

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पृष्ठ 37

३६ असली कोकशास्त्र
ग्रास आहार से १ बूँद रक्त और ४० बूँद रक्त से १ बूँद वीर्य
तैयार होता है। वैज्ञानिकों का मत है कि २ तोला वीर्य के लिए
१ सेर रक्त और १ सेर रक्त के लिए १ मन आहार की आवश्य-
कता होती है।
अब यह बात मालूम हो गयी कि यदि निरोग मनुष्य सेर-
भर अन्न रोज खाये तो ४० दिन में वह ४० सेर अन्न खा सकेगा।
अतएव उसकी ४० दिनकी कमाई दो तोला वीर्य है। इस
हिसाब से ३० दिन की कमाई में केवल डेढ़ तोला वीर्य ही हृष्ट-
पुष्ट मनुष्य को प्राप्त होता है। ऐसे मूल्यवान पदार्थ को शरीर से
निकाल देना कितना अनर्थ है। इस पर लोग पूछ सकते हैं कि
जब यह इतना कम तैयार होता है, तब रात-दिन विषय करने-
वालों के शरीर में यह आता कहाँ से है ? प्रश्न बहुत ही ठीक है।
बात यह है कि मनुष्य के शरीर में वीर्य सदा कुछ-न-कुछ तैयार
रहता है। हम पहले ही कह आये हैं कि वीर्य के बिना शरीर
जीवित नहीं रह सकता। दूसरी बात यह है कि रात-दिन विषय
करने वाले मनुष्य का वीर्य अच्छी तरह से पकने तो पाता नहीं,
वह तो अपने असली रूप में आने से पहले बाहर निकल जाता है;
अतः उनके वीर्य को तो वीर्य कहना ही अनुचित है।
यहाँ पर एक बात का और उल्लेख कर देना आवश्यक है।
वह यह कि बहुत लोग समझते होंगे, यदि वीर्य हमेशा बनता है;
और वह आहार का अन्तिम सार है तो कुछ समय में बहुत