रतिरहस्य: असली कोकशास्त्र (पण्डित कोक्कोक - कामकला, दाम्पत्य-जीवन एवं सम्पूर्ण रति-विज्ञान)
Rati Rahasya or Asli Koka Shastra of Kokkoka with Hindi Commentary
पण्डित कोक्कोक (भाषा टीकाकार: पण्डित कन्हैयालाल) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३४ असली कोकशास्त्र
रसाद्रक्तं ततोमांसं मांसान्मेदः प्रजायते ।
मेदस्यास्थिस्ततो मज्जा मज्जायाः शुक्र सम्भवः ।
—सुश्रुताचार्य
अर्थात्—भोजन के पचने पर रस, रस से रक्त, रक्त से मांस,
मांस से मेद, मेद से अस्थि, अस्थि से मज्जा और मज्जा से वीर्य
पैदा होता है। इससे लेकर मज्जा तक प्रत्येक धातु पाँच दिन-रात
और डेढ़ घड़ी तक अपनी अवस्था में रहती है। बाद तीस दिन
रात ओर नौ घड़ी में रस से वीर्य बनता है। ऐसा भोज तथा अन्य
आचार्यों ने लिखा है। स्पष्ट रीति से यों समझना चाहिए कि
मनुष्य जो कुछ आज भोजन करता है, उसका वाय बनने में पूरा
एक महीना लगता है। इसी प्रकार ओर इतने ही समय में स्त्री-
शरीर में रज पैदा होता है। शरीर के बलाबल के अनुसार इस
समय में न्यूनाधिकता भी हो जाती है।
इसी पुरुष-वीर्य और स्त्री-रज के अधीन स्त्री-पुरुष की शारी-
रिक और मानसिक सारी शक्तियाँ रहती हैं। इसी के प्रभाव से
ब्रह्मचारी पुरुषों ओर ब्रह्मचारिणी स्त्रियों का शरीर बल-वीर्य से
पूर्ण, सुन्दर, हृष्ट-पुष्ट तथा पवित्र देखा जाता है। यदि यह न
रहे, तो शरीर एक क्षण भी न टिके। शरीर-स्थिति का मूल-तत्त्व
यही है। अब यहाँ यह प्रश्न किया जा सकता है कि वीर्य की
उत्पत्ति शरीर में किस अवस्था से होती है। यों तो शरीर की