रतिरहस्य: असली कोकशास्त्र (पण्डित कोक्कोक - कामकला, दाम्पत्य-जीवन एवं सम्पूर्ण रति-विज्ञान)
Rati Rahasya or Asli Koka Shastra of Kokkoka with Hindi Commentary
पण्डित कोक्कोक (भाषा टीकाकार: पण्डित कन्हैयालाल) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअसली कोकशास्त्र ३१
ओष्ठ सदृश भागों के समान बना हुआ होता है। इसो लिये
इसको भगोष्ठ भी कहते हैं। यह भगोष्ठ भीतरी अवयवों की रक्षा
करती है। इसमें भी सफेद मैल जम जाता है। उसको साफ न
करते रहने से भी अनेक बीमारियाँ पैदा होती हैं। उन भगोष्ठों के
नीचे दो छोटे-बड़े छिद्र होते हैं। जो बड़ा छिद्र होता है, उसी से
पुरुष का वीर्य योनि में जाता है और बच्चा भी उसी मार्ग से बाहर
निकलता है, तथा मासिकधर्म भी उसी छिद्र से होता है।
दूसरा छोटा छिद्र मूत्र-मार्ग है। जो निचले छिद्र से एक डेढ़
इन्च ऊपर होता है।
जिन स्त्रियों की योनि क्षत नहीं हुई होती, उनका योनि-मुख
एक पतली खाल से ढका रहता है। पूरे युवती होने पर मासिक-
धर्म के निकलने से वह द्वार कुछ खुल जाता है। प्रसंग के समय
वह पर्दा फट जाता है। इससे स्त्रियों को दर्द भी होता है और
रक्त भी निकलता है। बाज लोग पर्दे का फटा हुआ होना स्त्री-
मैथुन की साक्षी मानते हैं। किन्तु कभी-कभी चोट लग जाने से
भी पर्दा फट जाता है।
भगोष्ठ ऊपर से मिला और उभरा हुआ होता है। बारह-
तेरह वर्ष की अवस्था में उस पर बाल आने लगते हैं। इन भगोष्ठों
के नीचे और मूत्र-द्वार के ऊपर एक छोटा-सा अंकुर होता है, जिसे
भगनासा कहते हैं। स्त्री का यह अंग पुरुष के शिश्न के समान
होता है। इसमें तीन डंडों के स्थान में दो ही दंड होते हैं और