रतिरहस्य: असली कोकशास्त्र (पण्डित कोक्कोक - कामकला, दाम्पत्य-जीवन एवं सम्पूर्ण रति-विज्ञान)
Rati Rahasya or Asli Koka Shastra of Kokkoka with Hindi Commentary
पण्डित कोक्कोक (भाषा टीकाकार: पण्डित कन्हैयालाल) द्वारा
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है ? इससे साफ प्रतीत होता है कि उन दोनों की कामेच्छा पूर्ण न
होने से उन्हें जहाँ-तहाँ टक्करें मारनी पड़ती हैं। अब यहाँ यह
प्रश्न उत्पन्न होता है कि स्त्रियों का काम पुरुष से आठ-गुणा अधिक
होने से पुरुष उसकी तृप्ति किस प्रकार कर सकता है। कहा है—
‘काम अष्टगुणः स्मृतः ।’
इस वाक्य का अर्थ समझने में भारी भूल है। इसका यह
अर्थ नहीं कि एक स्त्री आठ पुरुषों से रति कर सकती है। स्त्री की
रति पूरी होने पर वह भी पुरुष के समान तृप्त हो जाती है। फिर
वह आठ से तो क्या, तृप्ति हो जाने पर, तृप्त पुरुष के समान फिर
एक से भी रति नहीं कर सकती।
उपरोक्त वाक्य का अर्थ यह है कि स्त्री पुरुष से अष्ट गुणा
अधिक बलवती होती है, अर्थात् आठ पुरुषों की रति के बराबर
बल लग जाने पर एक स्त्री की रति पूर्ण होती है। इतना बल
किसी विशेष ही पुरुष में होता है। अतएव स्त्री को तृप्त करने के
लिये सामान्य से सामान्य पुरुष को किन उपायों का अवलम्बन
करना चाहिये, जिससे हर पुरुष हर स्त्री को रति-सुख से तृप्त
करके सुसन्तान प्राप्त करा सके इसका परिज्ञान कराना इस कोक-
शास्त्र लिखने का प्रयोजन है। रति-सुख के सुगम से सुगम उपाय
इसमें बतलाये गये हैं।
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