रतिरहस्य: असली कोकशास्त्र (पण्डित कोक्कोक - कामकला, दाम्पत्य-जीवन एवं सम्पूर्ण रति-विज्ञान)
Rati Rahasya or Asli Koka Shastra of Kokkoka with Hindi Commentary
पण्डित कोक्कोक (भाषा टीकाकार: पण्डित कन्हैयालाल) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअसली कोकशास्त्र २६
दो मोटे-मोटे ऊपर की ओर और तीसरा भीतर से पोला दोनों के
नीचे की तरफ होता है। यही मूत्र-मार्ग है। तीनों दंडों में छोटे-
छोटे आशय होते हैं, जिनमें उत्तेजना के समय रक्त भर जाता है,
और लिंग ठोस और कड़ा हो जाता है। मैथुन-क्रिया के समाप्त
होते ही आशयों का रक्त शिराओं से वापस लौट जाता है और
फिर लिंग पूर्ववत् मुलायम हो जाता है।
अण्डकोश
जननेन्द्रिय के नीचे एक थैली लगी रहती है। जिसमें दो मांस
की गोलियें रहती हैं। ध्यानपूर्वक देखने से उनमें एक प्रकार की
क्रिया होती दिखलायी देती है। यह क्रिया त्वचा के संकोच-विकाश
से पैदा होती है।
सर्दी और गर्मी के कारण अण्डकोषों में संकोच-विकाश भी
होता है। वृद्ध और निर्बल मनुष्य के अण्डकोष ढीले पड़ जाते
हैं। कई मनुष्यों को एक ही अण्ड होता है और किन्हीं के वह
भी नहीं। अण्ड-हीन मनुष्य सन्तान नहीं पैदा कर सकता। अण्डों
में अधिक श्रम और चोट लगने से सन्तान उत्पन्न करने में बाधा
पड़ती है। यदि बचपन में अण्ड निकाल दिये जायें तो शरीर की
वृद्धि नहीं होगी। और मूंछें भी नही आयेंगी।