रतिरहस्य: असली कोकशास्त्र (पण्डित कोक्कोक - कामकला, दाम्पत्य-जीवन एवं सम्पूर्ण रति-विज्ञान)
Rati Rahasya or Asli Koka Shastra of Kokkoka with Hindi Commentary
पण्डित कोक्कोक (भाषा टीकाकार: पण्डित कन्हैयालाल) द्वारा
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हैं, जबड़े हिला सकते हैं; आँखें बन्द कर सकते हैं।
हम इस पुस्तक में शरीर-सम्बन्धी विशेष ज्ञान का वर्णन नहीं
करना चाहते। केवल समझने योग्य शरीर के मुख्य भागों
पर विचार किया जायगा। सब से मुख्य भाग पाकाशय अथवा
मेदा (कोठा) है। इसके क्षणभर भी आलस्य करने से
हमारा सारा शरीर ढीला और शिथिल हो जाता है। मेदे पर
हम जितना भार डालते हैं उतना सहने की ताकत बड़े-बड़े विक-
राल जन्तुओं में भी नहीं होती। मेदा भोजन को पचाकर उसके
द्वारा शरीर का पोषण करता है। इस भाग से शरीर को वही
सहायता मिलती है जो रेलगाड़ी को एञ्जिन के वैलट से, मेदा पस-
लियों के अन्दर वायों आर होता है। इसमें अनेक क्रियायें होकर
भिन्न-भिन्न प्रकार के रस तैयार होते हैं और भोजन का तत्व
खींचता है। बचा हुआ निकम्मा पदार्थ मल-मूत्र बनकर आंतों के रास्ते
बाहर निकल जाता है। इसके ऊपरी हिस्से में हृदय है। मेदे के
बायीं ओर तिल्ली है। यकृत् पसलियों के अन्दर दाहिनी ओर है।
इसका काम पित्त पैदा करना है। यह पित्त पाचन क्रिया के लिये
बहुत हो उपयोगी होता है।
अब देह के आधाररूप, बहने वाले खून पर विचार करना
चाहिये। खून से हमारा पोषण होता है। वह भोजन में से पोषक
भाग को खींचकर निरुपयोगी भाग को मल-मूत्र के रूप में बाहर
निकाल देता और सारे शरीर को गरम रखता है। खून शरीर के