रतिरहस्य: असली कोकशास्त्र (पण्डित कोक्कोक - कामकला, दाम्पत्य-जीवन एवं सम्पूर्ण रति-विज्ञान)
Rati Rahasya or Asli Koka Shastra of Kokkoka with Hindi Commentary
पण्डित कोक्कोक (भाषा टीकाकार: पण्डित कन्हैयालाल) द्वारा
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उत्पत्ति ही वीर्य से होती है। अतः वीर्य-शून्य तो कभी शरीर
रहता ही नहीं और न वीर्य-हीन शरीर जीवित रह सकता है।
पर स्पष्ट रूप से १२—१३ वर्ष की अवस्था से शरीर में वीर्य बनने
लगता है। इससे पहले शरीर में जो वीर्य बनता है, वह सब का
सब शरीर की वृद्धि और उसके विकास में खर्च हो जाया करता
है और किशोरावस्था के आरम्भ में वह दिखलायी पड़ने लगता
हैं। पचीस वर्ष की अवस्था तक पुरुष-शरीर का वृद्धि-क्रम जारी
रहता है। तत्पश्चात् उसमें पुष्टता आती है। इसी अवस्था में
वीर्य परिपक्व भी होता है। जो मनुष्य इस अवस्था से पहले ही
वीर्य-पात करना प्रारम्भ कर देता है, उसका वीर्य कभी भी पुष्ट
नहीं होता और साथ ही उसके शरीर की बाढ़ भी मारी जाती
है। अतएव पचीस वर्ष की अवस्था तक वीर्य का संचय करना
अत्यन्तावश्यक है। सुश्रुताचार्य ने लिखा है—
ऊन षोडशवर्षायामप्राप्तः पंचविंशतिम् ।
यद्याधत्ते पुमान् गर्भं कुक्षिस्थः स विनश्यति ॥
अर्थात्—सोलह वर्ष से कम उम्र की स्त्री और पचीस से कम
अवस्था के पुरुष के रज-वीर्य से जो गर्भाधान होता है वह नष्ट
हो जाता है। अभिप्राय यह है कि उससे जो सन्तान पैदा होती
है, वह सर्वगुण-सम्पन्न और दीर्घायु नहीं होती। यह वीर्य बहुत
ही कम मात्रा में तैयार होता है। कुछ लोगों का कहना है कि ४०