रतिरहस्य: असली कोकशास्त्र (पण्डित कोक्कोक - कामकला, दाम्पत्य-जीवन एवं सम्पूर्ण रति-विज्ञान)
Rati Rahasya or Asli Koka Shastra of Kokkoka with Hindi Commentary
पण्डित कोक्कोक (भाषा टीकाकार: पण्डित कन्हैयालाल) द्वारा
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वीर्य का स्थान
वीर्य सारे-शरीर में फैला रहता है—इसके रहने का कोई
विशेष स्थान नहीं है। जिस प्रकार दूध में मक्खन रहता है, उसी
प्रकार शरीर में वीर्य। जिस प्रकार दूध को मथने से मक्खन
बाहर आ जाता है, उसी प्रकार रति करने से सारी शारीरिक
इन्द्रियों का मथन होकर वीर्य अंडकोष में जमा हो जाता है और
'उपस्थेन्द्रिय' द्वारा बाहर निकलता है।
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वीर्य में कौनसे पदार्थ हैं ?
पश्चिमी विद्वानों ने 'सूक्ष्म-दर्शक-यन्त्र' द्वारा वीर्य का निरीक्षण
करके पता लगाया है कि पुरुष-वीर्य में एक प्रकार के अत्यन्त
छोटे जन्तु होते हैं जो कि आँखों से दिखलायी नहीं पड़ते। ये
जन्तु किसी बढ़िया यंत्र से स्पष्ट दिखलायी पड़ते हैं। इन जन्तुओं
के केवल सिर और पूँछ होती है। इनमें सजीव जन्तुओं के समान
संचालन शक्ति और स्त्री-कोष में जाकर बच्चे का जीवन बनाने की
शक्ति होती है। पुरुष-वीर्य इसी प्रकार के जन्तुओं का समूह है।
डाक्टर "टाल" का कहना है कि "अबतक स्पष्टतया यह बात नहीं
मालूम हो सकी है। वीर्य की बनावट जहाँतक रसायनिक क्रिया से
सम्बन्ध है, उसके विषय में मैं केवल अपना अभिप्राय ही देना