रतिरहस्य: असली कोकशास्त्र (पण्डित कोक्कोक - कामकला, दाम्पत्य-जीवन एवं सम्पूर्ण रति-विज्ञान)
Rati Rahasya or Asli Koka Shastra of Kokkoka with Hindi Commentary
पण्डित कोक्कोक (भाषा टीकाकार: पण्डित कन्हैयालाल) द्वारा
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अपनी पत्नी के समान ही है। इतना होने पर भी वह सुन्दरी अपने
महल की सुख-शय्या को छोड़कर अंधकारमयी रात्रि में चोर की
भाँति छिप-छिप कर ऐसे पर-पुरुष के पास जाती दिखायी देती है
जो जाति से नीच और आचार-विहीन होता है।
उदाहरण में भर्तृहरीजी को ही ले लीजिये । उनकी रानी को
राजमहलों में किस बात का कष्ट था ? रहने को महल, सेवा के
लिये दास-दासियाँ थीं । स्वयं उसके पति भर्तृहरी भी उसे प्राणों
से अधिक प्यार करते थे। यह किसी से छिपा नहीं है। सब कुछ
रहने पर भी वह रानी एक नीच जाति के सईस के साथ फँस
जाती है और उससे इतना अधिक स्नेह करती है कि जो अमृत-फल
महाराज भर्तृहरी को अमर करने के लिये प्राप्त हुआ था, वह
फल उन्होंने अपनी स्त्री को प्रेम-विह्वल होकर खाने के लिये दे
दिया था। किन्तु वह भी उसने खुद न खाकर सईस को अमर
रखने के लिये दे दिया ।
अब पुरुषों को लीजिये । उन्हीं सर्व-गुण-सम्पन्न अटारियों में
बसनेवाले नौजवान अपनी अपूर्व सुन्दरी आज्ञाकारिणी पत्नी को
छोड़कर रंडियों के कोठे पर जा पहुँचते हैं। वहाँ धन, बल, मान-
मर्यादा का नाश करते हुए उन रंडियों की फटकार, जूतियें खाकर
भी जबतक सर्वनाश नहीं हो जाता तबतक उसका साथ नहीं
छोड़ते ।
इसका क्या कारण ? यह विपरीत गति क्यों दिखायी दे रही