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सर्वकोश
रतिरहस्य: असली कोकशास्त्र (पण्डित कोक्कोक - कामकला, दाम्पत्य-जीवन एवं सम्पूर्ण रति-विज्ञान)

रतिरहस्य: असली कोकशास्त्र (पण्डित कोक्कोक - कामकला, दाम्पत्य-जीवन एवं सम्पूर्ण रति-विज्ञान)

Rati Rahasya or Asli Koka Shastra of Kokkoka with Hindi Commentary

पण्डित कोक्कोक (भाषा टीकाकार: पण्डित कन्हैयालाल) द्वारा

DevanagariHindipublished440 पृष्ठ

पृष्ठ 27, कुल 440 में से

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२६ असली कोकशास्त्र
होते हैं, जिनके पवित्र शरीर में शुद्ध मन आवास करता हो। शरीर
का नाम तो मनुष्य नहीं, शरीर तो उसका निवासस्थान है। मन
और इन्द्रियों का शरीर के साथ इतना घनिष्ट सम्बन्ध है कि एक
के बिगड़ने से दूसरों के बिगड़ने में जरा भी विलंब नहीं लगता।
शरीर को गुलाब के फूल की उपमा दी गयी है, अर्थात् गुलाब का
फूल शरीर है और उसमें रहने वाली गन्ध उसकी आत्मा है।
कागज के बने हुए नकली गुलाब के फूल की उतनी कदर नहीं होती
जितनी कि असली और सुगन्ध-युक्त की। क्योंकि सूँघने पर
निर्गन्ध-पुष्प से सुगन्ध नहीं आयगी, वह केवल देखने की शोभा
मात्र है। उसमें उसका असली तत्त्व गन्ध नहीं है। जिस प्रकार
मनुष्य गन्धहीन पुष्प को पसन्द नहीं करते, प्रत्युत फेंक देते हैं, उसी
प्रकार उस मनुष्य से भी कोई प्रेम नहीं करता जो देखने में तो
ऊपर से अच्छा प्रतीत होता हो और उसके भीतर के व्यवहार अच्छे
न हों। चरित्र-हीन मनुष्य निरोग नहीं होते। जिसका शरीर
स्वस्थ हो वह अवश्य पवित्र-मन होगा। क्योंकि मन के ही अनु-
कूल मनुष्य कर्म करता है उसीका प्रभाव सब शरीर पर पड़ता है।
पाश्चात्य देशों में इस मत का एक पन्थ है। उसका यही सिद्धान्त
है कि जिसका मन शुद्ध होता है उसके शरीर में रोग होते ही नहीं
और यदि हो भी जायँ तो मनोबल के योग से हटा भी दिये जाते
हैं। सार यही है कि आरोग्यता का सबसे बड़ा साधन मन ही है।
अतएव मन की शुद्धि से ही आरोग्यता प्राप्त होती हैं।