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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

१३८ रंगनाथ रामायण
विश्वास हो गया है कि मेरा और तुम्हारा प्रेम उचित होगा । इसलिए मै तुम पर
आसक्त हूँ । मै अपनी इच्छा से कोई भी रूप धारण कर सकती हूँ, कही भी जाने की
क्षमता रखती हूँ, किसी भी वस्तु को प्राप्त कर सकती हूँ, कोई भी सुख पहुँचा सकती हूँ ।
अब तुम्हारे साथ जो (स्त्री) है, वह किस काम की है ? मेरा सौंदर्य देखो और मेरा
पाणि-ग्रहण करो । यह (सीता) कुल तथा गुण मे हीन है, विकृतरूपिणी है, यह तुम्हारे
लिए कहाँ योग्य है ? हे राम, मै अभी इसे निगल जाऊँगी और तुम्हारी इच्छा के अनुसार
तुम्हारे साथ रति-क्रीडा में प्रवृत्त हो जाऊँगी ।'
इस प्रकार कहते हुए जब वह राम के पास आने लगी, तब राम ने सीता को
अपने निकट बुला लिया । तरुणी की इच्छा को सुनकर, उसका परिहास करने के उद्देश्य
से उसके रूप को देखकर हँसते हुए बोले—'हे सुदरी, मै पत्नी के साथ रहता हूँ । यह
मेरा विश्वास करके मेरे साथ वन में आई है, इसलिए इसे तुमको सौपना उचित नही है ।
इतना ही नही, तुम सौत के साथ सुख से कैसे रह सकोगी ? अगर यह नही होती, तो
मै पहले ही तुम्हें ग्रहण करता । अब भी कुछ बिगडा नही है । वह देखो, मेरा भाई है,
श्रेष्ठ तपोधन है, वह मुझसे भी अधिक सुदर है । वह सदा अपने लिए अनुकूल,
चंचल तथा विशाल नेत्रवाली स्त्री की अभिलाषा करता रहता है । इसलिए वही तुम्हें
ग्रहण करने में समर्थ है ।'
इस पर शूर्पणखा लक्ष्मण के पास गई और कहने लगी—'हे लक्ष्मण, मै तुम पर
आसक्त होकर तुम्हारे साथ विवाह करने के लिए आई हूँ । मुझे तुम ग्रहण करो ।'
लक्ष्मण समझ गये कि राम के भेजने पर यह मेरे पास आई है । इसलिए वे बोले—
'हे सुदरी, पहले तुमने अपने मन से मेरे भाई से प्रेम किया था । अत, तुम्हें ग्रहण करना
मेरे लिए उचित नही है । सौंदर्य में सीता तुम्हारी समता नही कर सकती । तुम्हारा प्रेम
और तुम्हारे हाव-भाव आदि यदि एक बार और राघव देखेंगे, तो वे सीता को छोडकर
तुम्हें ग्रहण करेंगे । हे रमणी, इसलिए तुम राम से ही प्रार्थना करो ।'
सौमित्र की बातो पर विश्वास करके वह तमोगुण-सपन्न स्त्री, अपने भद्देपन
का विचार न करके पुन राम के पास गई और रति-क्रीड़ा के लिए प्रार्थना करने लगी ।
तब राम ने कहा—'हे सुदरी, तुम उसी (लक्ष्मण) के पास जाओ ।' तब युवती पुन
लक्ष्मण के पास जाकर प्रार्थना करने लगी । इस प्रकार अनुज अग्रज को, अग्रज अनुज को
दिखाने लगे । वह युवती विह्वल मन के साथ बडी अनुचित आशा लिये मन्मथ के सूत्र
के द्वारा नचाई जानेवाली कठपुतली की तरह, यहाँ से वहाँ और वहाँ से यहाँ, आने-जाने लगी ।
अत में वह उन दोनो की रसहीन बातो से तग आकर क्षुब्ध होकर बोली—
'हे मानव, एक अकिंचन स्त्री के समान मुझे तग करना क्या तुम्हारे लिए उचित है ?
अगर मै क्रोध करूँ, तो मानवो की कौन कहे, इंद्रादि देवताओ को भी खा जाऊँगी । अब
मै इस स्त्री के साथ समस्त संसार को पीसकर खा जाऊँगी ।' यो कहती हुई उसने वडा
भयकर रूप धारण कर लिया और मृत्यु के समान अट्टहास करती हुई वह (सीता के)
निकट जाने लगी । तब राघव बोले—'हे सौमित्र, यह जानकी के ऊपर आक्रमण करने

अरण्यकांड १३९
आ रही हैं। अब इससे परिहास छोड़कर, इसे दण्ड दो।' तब लक्ष्मण ने बाँबी से
निकलनेवाले विष-ज्वालाओ से युक्त साँप-सा अपना खड्ग म्यान से निकाला और उस
राक्षसी की नाक और कान काट लिये। तब वह रोती-कलपती, विवश हो, टूटे हुए शृंगवाले
लाल पर्वत के सदृश (नाक-कान से) रक्त बहाती हुई, वहाँ से भाग गई। वहाँ
से भागकर वह चतुर्दश सहस्र श्रेष्ठ निशाचरो के निलय, खर के निवास-स्थान में पहुँची।
१२ खर-दूषण का वध
खर ने जब उस (शूर्पणखा)का रूप देखा, तब वह डर गया और पूछा--'किसने
निर्भय होकर तुम्हारा रूप ऐसा विकृत कर दिया है ? काले नाग को जानकर भी किसने
उसे पैर से कुचला हैं ? किसने मृत्यु को इस प्रकार छेड़ा है ? मुझे उसका नाम बताओ।
में शीघ्र उसका रक्त और मास तुम्हें ला दूँगा। इस प्रकार प्रश्नो की वर्षा करनेवाले
खर को देखकर वह स्त्री भर्राई हुई विकृत आवाज में रोती हुई, अत्यधिक लज्जा से सर
झुकाये हुए, इस प्रकार कहने लगी--'वन में जहाँ मैं रहती हूँ, मेरा पुत्र सूर्य के प्रति
अत्यत निष्ठा से तप कर रहा था। तब मुनि-वेशधारी अत्यत साहसी, मोहनाकार राम-
लक्ष्मण नाम के राजकुमारो ने विना भय के उसका वध कर डाला। मैंने अपने पुत्र की
अंत्येष्टि-क्रियाएँ की और वन में रहनेवाले उन सुन्दर आकारवाले राजकुमारो के पास
गई और उनपर मोहित हो गई। उन्होने अपनी अमित शक्ति के प्रताप से मेरी ऐसी
दुर्गति कर दी हैं। मैं दुखी होती हुई तुम्हारे पास आई हूँ। तुम तुरत उनके पास जाओ
और अपनी पूरी शक्ति लगाकर उनका वध करके उनका मास ला दो। इस तरह मेरे
हृदय को शांति पहुँचाओ।'
इन बातो को सुनकर खर ने कहा--'इस छोटी-सी बात के लिए मेरे आने की
आवश्यकता ही क्या है ? उनकी शक्ति ही कितनी है ? में अपने अनुचरो को (तुम्हारे
साथ) भेजूँगा। उन्हें ले जाओ। इस प्रकार कहकर उसने यम के-से उग्र तेजवाले (भटो)
को बुलाकर कहा--'तुम इस शूर्पणखा के साथ जाओ और उन मानवो का वध करके
मेरी बहन शूर्पणखा को उनका रक्त पिला दो।'
वे राक्षस वायु के साथ आनेवाले दुर्वार मेघो के समान, बिजलियो के-से शूल
घुमाते हुए राम और लक्ष्मण-रूपी सूर्य-चन्द्रो पर आक्रमण करने लगे, और घोर गर्जन करने लगे।
तब राम ने अपने दीप्तिमान् धनुष तथा अन्य आयुधो से युक्त हो उनका सामना
किया। उन्होने राक्षसो से फेंकी हुई बिजली तथा शूलो को अपने शस्त्रो से काटकर पृथ्वी
पर गिरा दिया। उसके पश्चात् (राम ने) भयंकर वज्र-से बाणो से उनके कठो को काट
डाला और तब उनके सिर पके हुए फलो के समान गिर पडे और वे अनुपम बाणो के
आघात से सीधी शिलाओ के समान पृथ्वी पर लुढक पडे।
तब शूर्पणखा अत्यत वेग से भागकर सभी लोको को भयभीत करनेवाले खर से
उन राक्षसो की मृत्यु का तथा रघुराम की महिमा-समन्वित युद्ध का समाचार कहा।
आहुति के पडने से उत्तेजित होकर भभक उठनेवाली अग्नि के समान क्रुद्ध होकर खर
अत्यधिक आवेश से भरे दूषण, त्रिशिर आदि चौदह सहस्र बलशाली राक्षस वीरो को साथ

१४० रंगनाथ रामायण

लेकर चला । यह देखकर देवताओ के साथ सारा स्वर्ग काँप गया और सभी पहाड़ो से
युक्त पृथ्वी हिल उठी । खर ने रण-भेरी बजाई और सुमेरु-पर्वत की आभा के समान
दीखनेवाले चितकबरे रंग के अश्वो से युक्त, मणिमय कूबर तथा दस स्वर्णमय चक्रो से
समन्वित, रण में विजय प्रदान करनेवाले, धनुष-बाण और खड्गो से भरे, किंकिणि-ध्वनि से
मुखरित होनेवाले रथ पर चढ़कर वह रण-विद्या-विशारद राम पर आक्रमण के लिए निकल पड़ा ।
(उसके पीछे-पीछे) बाज के पंखो के समान बाणवाला, बिजली की समता रखनेवाला,
त्रिशिर (नामक राक्षस) सभी दिशाओ की काति को मलिन करता हुआ, सूर्य की
कांति के समान उज्ज्वल, श्रेष्ठ गधो के समूह से खीचे जानेवाले स्वर्ण से आच्छादित रथ
पर बैठकर बड़े गर्व के साथ उस महायुद्ध के लिए रवाना हुआ । उसके आगे-आगे मयूर
की छटा को मात करनेवाले, पवन की गति का भी तिरस्कार करनेवाले, काति-युक्त शीघ्र-
गामी अश्व-समूह के द्वारा खींचे जानेवाले उत्तम रथ पर बैठकर, अत्यधिक उत्साह से बड़े
ठाट-बाट के साथ (खर) जा रहा था । पृथुग्रीव, श्येनगामी, विहंगमुख, मेघमाली, महामाली
प्रलयकाल की कालाग्नि की समता करनेवाला सर्पमुखी, कालकार्मुक, दुर्जय, यज्ञ-शत्रु, परुष,
करुणा-रहित, करवीरनेत्र और रुधिराशन नामक बारह प्रतापी राक्षस वीर, बारह आदित्यो
के समान, बड़ी श्रद्धा से खर के पीछे जा रहे थे । त्रिशिर, प्रमाथी, रणकुशल, महाकपाल
और स्थूलाक्ष, (आदि राक्षस) उस रण-मदमत्त सेना के साथ चारो ओर सावधान होकर
चल रहे थे ।
(इस प्रकार जब राक्षस-सेना निकली), तब भयंकर गज-समूहो के चिघाड़ने, घोड़ो
के हिनहिनाने, रथो के चलने तथा पदचरो के हुँकारने की ध्वनि तथा पताकाओ के फड़फड़ाने
की ध्वनि से पृथ्वी धँस गई, दिशाएँ चूर-चूर हो गई, समुद्र उमडने लगे और सभी भूत
थर-थर काँपने लगे । सेना के चलने से जो धूल उडी, उसने आकाश को ऐसा ढक दिया
कि संदेह होने लगा कि रवि-मंडल है या नही । इसी समय खर की पताका पर चील
बैठने लगे । घोड़े घुटने टेकने लगे, रक्त की वर्षा होने लगी, सियार रोते हुए सेना के
बीच से दौड़ने लगे, नक्षत्र टूटने लगे, पक्षियो की ध्वनि चारो ओर सुनाई पड़ने लगी ।
इसी प्रकार के कितने ही उत्पात पृथ्वी और आकाश में होने लगे । फिर भी खर बिना
भयभीत हुए आगे बढ़ता गया और दण्डक-वन में पहुँच गया । अनुपम आकारवाले राम उस
कोलाहल को सुनकर पर्णशाला के बाहर आकर खड़े हुए और पृथ्वी तथा आकाश में दीखने-
वाले अपशकुन को देखकर, शीघ्र अपने अनुज को बुलाया और कहा—'सौमित्र, युद्ध-सूचक
चिह्न कितने ही दिखाई पड रहे है । कदाचित् वह निंद्य और नकटी राक्षसी अपने साथ और
सेना ला रही है । वह सुनो, सेना का रणघोष सुनाई पड रहा है । वहाँ देखो, सेनाओ
के चलने से धूल आसमान में छा रही है । जानकी का अब यहाँ रहना ठीक नहीं ।
इसलिए सावधान होकर तुम शीघ्र ही उन्हे अपने साथ ले जाकर पर्वत की गुफा में ठहरो ।
तब लक्ष्मण ने कहा—'हे सूर्यवंश-तिलक, आपको यहाँ छोड़कर में कैसे जा सकता हूँ ?
आप ही सीताजी के साथ पर्वत की गुफा में जाकर देखते रहिए । मै आपकी कृपा
से इन दुर्वार राक्षसों का वध करूँगा ।' ये बातें सुनकर राम ने कहा—'इनसे युद्ध करना

मेरे लिए कौतुक का विषय होगा । इसलिए तुम यहाँ मत रहो । जानकी को साथ लेकर
जाओ ।' (इन बातो को सुनकर) लक्ष्मण सीता को साथ लेकर पर्वत-गुफा में चले गये ।
तब राम प्रलयकाल के रुद्र के समान क्रुद्ध होकर अपना प्रताप प्रकट करते हुए,
कृपाण, कवच, धनुष-बाण धारणकर, श्रेष्ठ तूणीर-युगल (पीठ पर) बाँधकर और पर्वत
को भी धनुष के आकार में झुकानेवाले शिव की तरह, अपने धनुष पर प्रत्यचा चढाकर,
उस प्रत्यचा की टकार करने लगे । उस धनुष की टकार की ध्वनि सारे आकाश में गूँजने
लगी । इन्द्र, दिक्पाल और अन्य देवता अपने रत्न-खचित विमानो पर आसीन हो यह
देखने की उत्सुकता प्रकट करने लगे कि राम अकेले खर तथा दूषण आदि अत्यन्त पराक्रमी
चौदह सहस्र राक्षसो का वध कैसे करते हैं ? सभी देवर्षि स्वर्ग से कई बार आशीर्वाद
देने लगे कि महात्मा राम इन मायावी राक्षसो का वध करने में सफल हो । राम का तेज
सभी वन, वृक्ष, पृथ्वी तथा आकाश में ऐसा व्याप्त हुआ, मानो दस सहस्र कोटि सूर्यो का
तेज समस्त लोको में व्याप्त हो गया हो ।
इस प्रखर तेज के कारण जडवत् हो, सभी उत्साह को खोकर, आँखें चौंधिया जाने
के कारण अत्यत दीन दीखनेवाले राक्षस-समूह को देखकर, खर ने दूषण से कहा—' (हे
भाई), क्या कारण है कि हमारी सेना की गति मंद पड गई है । क्या शत्रु-सेना ने
उसका सामना किया है ? या कोई नदी बीच में पड़ गई है ?'
तब दूषण ने सारा समाचार जानकर कहा—'हे दनुजेश्वर, राम का उद्दण्ड तेज
सारे संसार में व्याप्त हो गया है । इसलिए हमारी सेना की गति मद पड गई है ।'
यह बात सुनकर खर अत्यत क्रुद्ध हुआ और सेना को डाँट-फटकार बताते हुए,
भयंकर रीति से सारी सेना का सचालन करते हुए वह आगे बढा । अत्यधिक भुजबल,
आटोप तथा पराक्रम से समन्वित उस राक्षस-सेना ने गज, रथ, तुरग आदि से युक्त हो,
अत्यत वेग से काकुत्स्थ-वशज राम को इस तरह घेर लिया, जैसे अग्नि-समूह एक साथ
प्रचण्ड दावानल पर आक्रमण कर दे । (इस प्रकार राम को चारो ओर से घेरकर) वे
उन पर, शर, खड्ग, त्रिशूल, करवाल, भाले, मुद्गर, परशु, गँडासा, गदा, पाश, चक्र आदि
विविध आयुधो की वर्षा करने लगे । देवता भयभीत हो उठे । मेघो से आच्छादित भास्कर
के समान थोडी देर के लिए राम दिखाई भी नही पडे । किन्तु तुरन्त उन्होने ऐन्द्रजालिक
की तरह राक्षसो के द्वारा चलाये गये सभी विविध शस्त्रास्त्रो को नष्ट कर दिया । इससे
हर्षित होकर सभी देवता उनकी प्रशसा करने लगे । अविरल गति से राक्षसो के द्वारा
बरसाये जानेवाले शस्त्रास्त्रो को बीच में ही नष्ट करते हुए (राम ने) परिवेश (मडल)
से घिरे हुए मध्याह्न-सूर्य के समान अपने चारो ओर अपने प्रखर तेज का घेरा बनाये हुए,
कोदण्ड को कुडलाकार में झुकाकर, युद्ध के उत्साह से फडकनेवाली भुजाओ से युक्त हो,
अपने तूणीर के अनगिनत बाणो का एक साथ सधान करके, अपने आगे-पीछे तथा
दोनो पार्श्व-भागो में व्याप्त राक्षस-सेना पर उनका प्रयोग किया । उनके इस शर-प्रयोग से
मत्त हाथी और योद्धा कट मरे, अश्व और घुडसवारो के टुकड़े-टुकड़े हो गये, पदचर
सैनिक और उनके आयुध नष्ट-भ्रष्ट हो गये । शिर और शर उनके सामने कट-कटकर

१४२ रंगनाथ रामायण
गिरने लगे, योद्धाओ के अंग और रथो के भाग पृथ्वी पर गिरने लगे, गुण-सहित धनुष
तथा कवच चूर-चूर हो गये, रथी और सूत पृथ्वी पर लोटने लगे, श्वेत छत्र और पताकाएं
टूटने लगी, और मांस-खंड छिन्न-भिन्न होकर गिरने लगे । इस प्रकार, युद्ध ने भयंकर रूप
धारण किया ।
सूर्य के प्रकाश से जिस प्रकार अंधकार तितर-बितर हो जाता है, वैसे ही राम के
असमान पराक्रम से नष्ट होने के बाद बची हुई राक्षस-सेना दर्प खोकर खर की शरण
में पहुँची । खर ने उनको प्रोत्साहित किया और दूषण को युद्ध करने के लिए भेजा ।
बची हुई सेना के साथ वह अपनी शक्ति दर्शाते हुए, शीघ्र ही राम के निकट आ पहुँचा
और उनपर ताल, साल (आदि वृक्ष), शिलाएँ तथा विविध अस्त्रो की वर्षा करने लगा ।
(इन अस्त्रो के लगने से) राम के शरीर से रक्त-प्रवाह होने लगा । तब क्रोध से आँखें
लाल किये हुए राम ने उन राक्षसो पर गांधर्व-अस्त्र चलाया । उन शक्ति-संपन्न अस्त्र के
तेज के आगे गज, रथ, तुरग, पदाति राक्षस-सेना टिक न सकी । वह अस्त्र अपने भयकर
तेज से दनुज-वर्ग को नष्ट-भ्रष्ट करके, उनका संहार करने लगा । रण-भूमि में जहाँ देखो,
अश्व तथा गज के धड़, मूंड, आँत, भेजा तथा रक्त का प्रवाह दिखाई पड़ने लगा ।
शाकिनी, भूत, पिशाच, वैताल आदि झुंड-के-झुंड वहाँ पहुँचकर कहने लगे—'यह लो, राम
के युद्ध-रूपी धर्मशाला में हाथियो के शिर-रूपी घट में मोती-रूपी चावल का भात पकाया
गया है । चलो हम सब खायें ।'
वे सब भूत-प्रेत अत्यंत हर्ष से पंक्तियो में बैठ गये; रक्त-चंदन, नवरक्त-अक्षत
रक्त-संकल्पपूर्वक धारण किया; चमड़ा-रूपी केले के पत्ते बिछाये, खोपडी-रूपी दोने
सजाये, शर की अग्नि में पकाये गये मांस को भात, मस्तिष्क को दाल, चर्बी को घृत,
विभिन्न अंगो के मांस को शाक, छोटी आँतो को पायस, हृदय-पिंड को मिठाई, नये रक्त
को मीठा जल मानते हुए, उसे सब प्रकार से विप्रोचित भोजन समझकर छककर खाया ।
भोजनोपरांत सब एकत्रित हुए कुछ ने आशीर्वाद दिये कि—'श्रीरामचन्द्र ! ते विजयोऽस्तु ।'
तो कुछ ने पीछे से कहा—'तथास्तु ।' कुछ भूतो ने हाथियो के दांत छड़ी की तरह हाथ
में धारण कर लिया, तो कुछ ने अस्थियो की मालाएँ कंठाभरणो के रूप में धारण कर ली
और हाथियो की घटिकाओ का ताल देते हुए बड़े आनंद से अपना निंदनीय रूप प्रकट
करना शुरू किया ।
तब मदमत्त वैरियो के लिए भयंकर रूपवाला दूषण अत्यंत दुःखी होकर अपने
समान बलशाली पाँच सहस्र योद्धाओ को राम पर आक्रमण करने के लिए भेजा । उन्होने
तीनों लोको को कँपाते हुए, राम पर आक्रमण किया, तो राम ने अपनी धनुर्विद्या की
कुशलता प्रदर्शित करते हुए, अत्यंते क्रुद्ध दृष्टि धारण किये हुए एक-एक राक्षस पर एक-एक
बाण का प्रयोग कर उन सब का वध कर दिया । कुछ लोगो को एक साथ इकट्ठा करके
भी उनका संहार किया । यह देखकर दूषण अत्यंत क्रोध से राम को कटु वचन कहते हुए,
अपना रथ राम के सम्मुख ले गया और उनपर वज्र तथा काल-नाग की समता करनेवाले
बाणो की वर्षा करने लगा । राम ने उन बाणो को बीच ही में तोड़ दिया, उसके

अरण्यकांड १६३
धनुष के टुकड़े-टुकड़े कर दिये । रथ से विहीन होन से दूषण क्रोधोन्मत्त होकर भयंकर,
प्राणान्तक, विजयशील यम की गदा की समता रखनेवाले मुद्गर को घुमाते हुए राम
पर दौड़ा । तब राम ने दो तेज बाणों को चलाकर उसके दोनों हाथ काट डाले और एक
घातक तीर उसके हृदय में मारा । तब वह राक्षस पृथ्वी पर ऐसे गिर पड़ा, जैसे मत्तगज
दांतों के टूटने से ढेर होकर पृथ्वी पर गिरता है । उसको गिरा देखकर प्रमाथी, महा-
कपाल तथा स्थूलाक्ष नामक तीन दण्ड-नायकों ने परशु, कृपाण तथा भाला उनपर चलाये,
तो राम ने उनके अस्त्रों तथा उनके मस्तकों को एक-एक करके गिरा दिया ।
तब खर ने अपने बारह सेनापतियों को उत्तेजित किया । उन बारहौ सेनापतियों ने
अपने दुर्वार शौर्य से वीर राघव पर आक्रमण किया और अलग-अलग उनसे युद्ध करने
लगे । तब राम ने वज्र की धार के समान पैने तथा भयंकर बाणों के प्रयोग से अपनी
शक्ति दरसाते हुए श्येनगामी का अंत कर डाला, कालकार्मुक का वध किया, करवीरने

१४४ रंगनाथ रामायण
सूर्य की दीप्ति मद-सी हो गई और दिशाओ में अंधकार व्याप्त हो गया । न खर
राघव से भीत था, न राघव ही खर से भीत थे । दोनो विजय की आकाक्षा से
दो हाथियो के समान, दो सिंहो के समान और महिष-द्वय के समान आपस में जूझ गये और
अपने बाहुबल को प्रदर्शित करने लगे । तब खर ने एक अर्द्धचंद्राकार बाण से राम के
हाथ के धनुष को काट डाला, उनके कवच को छिन्न-भिन्न कर दिया, और उनके शरीर
को शर-वर्षा से भर दिया । उन बाणो की परवाह किये बिना ही सूर्यवंशी राम ने
अगस्त्य से प्राप्त वैष्णव-चाप का तुरत संधान किया, धनुष की टंकार की और तेज बाण
चलाकर उस राक्षस की पताका को काट डाला । तब उस राक्षस ने राम के हृदय का
विदारण कर सकने की शक्ति रखनेवाले चार बाण चलाये । रक्त-सिक्त अंगो से-राम ने
उस राक्षस को विविध बाणो से पीडित करते हुए एक प्रबल अस्त्र से उसका धनुष
तोड़ दिया, चार बाणो से घोड़ो को मार गिराया और सारथी को मार डाला । उनका धनुष
ऐसा दीखने लगा, मानो वह अपनी बाणाग्नि में रथ की पूर्णाहुति देना चाहता हो । तब
रथ से वंचित हो खर प्रलयकाल के रुद्र की भाँति हाथ में गदा लिये हुए राम की ओर आने लगा
तो पहाड़ो के साथ पृथ्वी काँप गई । उस दुष्ट दैत्य को देखकर रघुराम ने बड़े
दर्प के साथ कहा—'हे राक्षस, हे नीच, अब भी तुम्हारी शूरता किस काम की ? तुम्हारी
सेना नष्ट हो गई; तुम्हारे बंधु कट मरे; तुम्हारी अस्त्र-संपत्ति समाप्त हो चली, इस
दण्डक वन में अपने अद्वितीय शौर्य से बढ़ते हुए, यहाँ के पुण्यात्मा मुनियो को मारनें के
पाप-फल को भोगने का (तुम्हारा) समय आ गया है । उसे अब भोगो, मैं अभी तुम्हारा
वध करता हूँ ।'
इन वचनो को सुनकर खर क्रोध से जलते हुए बड़े घमंड के साथ बोला-
'हे राघव, ऐसा गर्व क्यो करते हो ? युद्ध में कुछ क्षुद्र राक्षसो को मारने से (गर्व से)
फूलकर अपनी प्रशसा आप क्यो कर लेते हो ? कुलीन जन कही अपनी प्रशसा आप करते हैं ?
यह लो, में गदा लिये हुए आया । मुझसे भिड़ो और मेरी शक्ति देखो । देवता तथा
असुर मेरी ओर दृष्टि तक नही उठा सकते, तब क्या तुम मेरे आगे खडे रहने योग्य शूर हो ?
मैं एक-एक करके तुम्हारी मास-पेशियों को काटकर अपनी बहन को दे दूँगा ।'
इस प्रकार कहकर उसने अपनी गदा घुमाकर उसे राम पर फेंका । पवन की शीघ्र
गति, सूर्य का तेज, अग्नि का ताप, और बिजली की कठोरता मानो उस गदा के रूप में
आ रही हो । उस गदा को, अत्यन्त प्रचड वेग से अपनी तरफ आते देखकर राम ने उस
गदा के लंबे काड (भाग) को खड-खड कर दिया और बोले—'क्यो रे, तुम्हारी
गर्वोक्तियाँ तथा घमंड चूर हुए कि नहीं ?' तब उसने (खर) गर्जन करते हुए एक वृक्ष को
उखाड़कर अपने बाहुबल से उसे घुमाकर 'लो, मरो'—कहते हुए राम पर फेंका । राघव ने
तुरत उस वृक्ष को काटकर सूर्य की सहस्र किरणो की आभा के समान उज्ज्वल सहस्र
शरो को उस पर छोड़ा, जिससे वह अत्यत व्याकुल हो उठा । उसके शरीर से रक्त की
धाराएँ बहने लगी । फिर भी वह अपना समस्त साहस एकत्रित करके राम के आगे आया ।
उसे देखकर राम ने, दया त्यागकर, समस्त भुवनो को व्याकुल करते हुए, ऐन्द्रास्त्र का संधान करके

उस पर चलाया । तब वह राक्षस (खर) अपना सारा अकड खोकर वज्रपात से
चूर-चूर होकर पृथ्वी पर गिरनेवाले पर्वत के समान गिर पडा । डेढ मुहूर्त्त
के अंतर (तीन घडियो) में अपने ऊपर आक्रमण करनेवाले खर-दूषणादि चौदह सहस्र
राक्षसो का (राम ने) इस प्रकार वध किया, यह देखकर सुरो ने राम की भूरि-भूरि प्रशसा की ।
मुनियो ने आशीर्वाद दिये, देवताओ ने पुष्प-वृष्टि की । पर्वत की गुफा से शीघ्र
जानकी को साथ लिये हुए लक्ष्मण बाहर आये, राम को प्रणाम किया और उनकी प्रशसा
करते हुए, उनके हाथ में शोभायमान होनेवाले धनुष को ले लिया । हर्ष से भरे हृदय
से जानकीरमण पर्णशाला में गये और युद्ध में मरे हुए राक्षसो का वृत्तात सीता को सुनाते हुए
बडी प्रसन्नता से रहने लगे ।

१३ लंका में अकंपन तथा रावण का वार्त्तालाप

तब अकपन नामक राक्षस प्रकपित हो आर्त्तनाद करते हुए, बडे वेग से लंका गया
और रावण को देखकर कहा—‘हे असुराधिपति, चौदह सहस्र राक्षस वीर तथा खर-दूषण
आदि काकुत्स्थ राम के शरो की अग्नि में भस्म हो गये है । यह सत्य है ।’ यह सुनकर रावण आश्चर्य-
चकित हुआ और उस अकपन को रोषपूर्ण दृष्टि से देखते हुए कहा—‘क्यो रे, कैसी बात
कर रहा है ? कौन है वह राम ? क्या वह कोई कुबेर है, या इद्र है, या यम धर्मराज है ?
वे तीनो मिलकर भी तो हमारे खर-दूषण को जीत नही सकते । ऐसी दशा में वह
अकेले उन प्रतापी वीरो को किस प्रकार जीत सका, स्पष्ट रूप से समझाओ । हम तुम्हें
अभय-दान देते है ।’ तब अकपन निर्भय होकर राघव का वृत्तात, उनके साहस और शौर्य,
खर-दूषण आदि राक्षसों का वध, सौमित्र और जानकी का वृत्तांत आदि से अत तक कह
सुनाया ।
तब रावण अत्यत क्रुद्ध हुआ और युद्ध करने के लिए उद्यत होने लगा । उससे
घनिष्ठ मित्रता रखने के कारण अकपन ने रावण से कहा—‘हे राक्षसराज, रघुराम को
जीतना क्या पक्षिवाहन (विष्णु) या शूलपाणि (शिव) के लिए भी सभव हो सकता है ?
वह निपुण (व्यक्ति) बात-की-बात में आकाश तथा पृथ्वी को जोडने अथवा तोडने की
शक्ति रखता है, दावाग्नि का या पवन का अवरोध करने तथा मुक्त करने में वही समर्थ है ।
सभी लोको का नाश करने या उनका पोषण करने की शक्ति उसी में है, समस्त
ब्रह्माण्ड की रक्षा करने की क्षमता उसी में है, इसलिए में आपको एक उपाय
बताता हूँ । युद्ध की कोई आवश्यकता नही है । उस काकुत्स्थ राम की देवी, लावण्य का
समुद्र (सीता) को यदि आप ला सकें, तो राम उसके वियोग की अग्नि में भस्म हो जायगा ।
यह सुनकर उस राक्षसराज ने उसी को उचित समझकर अकपन की भूरि-भूरि
प्रशंसा की और स्वर्ण-रथ पर आरूढ होकर समुद्र पार किया और धुरंधर मंत्री ताड़का-
पुत्र मारीच के पास पहुँचा । उसने उसे खर-दूषण आदि राक्षसो के वध का वृत्तात सुनाया
और कहा—‘मैं राम की स्त्री सीता को हरकर ले जाने के उद्देश्य से तुम्हारे पास आया हूँ ।’
तब मारीच ने कहा—‘हे रावण, यह कैसी इच्छा है ? किसी अभाव के बिना,
समस्त भोगो का अनुभव करके भी ऐसी दुष्ट बुद्धि तुम में कैसे उत्पन्न हुई ? किस दुष्ट-बुद्धि
१६

१४६ रंगनाथ रामायण
मंत्री ने तुम्हें ऐसा परामर्श दिया है ? तुम उसे अपना शत्रु जानो । मैं तुम्हारा हित
चाहनेवाला मंत्री हूँ, अन्य नहीं हूँ । यह तुम्हारे लिए उचित नहीं है । इस पृथ्वी पर
किसी भी पतिव्रता स्त्री को प्राप्त करने की इच्छा अनुचित ही है । ऐसी इच्छा तुम करोगे
तो तुम्हारे वंश का सर्वनाश हो जायगा । इसलिए हे दानवनाथ, तुम लंका को लौट जाओ
और प्रसन्नता से रहो । अपनी स्त्रियों के साथ सुख-भोग प्राप्त करो ।' मारीच की इन
बातो को सुनकर रावण लंका लौट गया ।
१४ शूर्पणखा का रावण से दीनालाप
खर, दूषण आदि राक्षसो को राम की शर-वह्नि में भस्म हुए देखकर शूर्पणखा
अत्यंत संतप्त होती हुई लंका पहुँची । देव-सभा के बीच चिंतामणि से निर्मित सिंहासन पर
विराजनेवाले इंद्र के समान, सम्माननीय सभा-मंडप के बीच सिंहासन पर आसीन,
गरुड़, उरग, अमर तथा गंधर्व-युवतियों की सेवाएँ प्राप्त करनेवाले, ऐरावत के भयंकर
दाँतो के अग्रभाग से रगड़ खाये हुए उर को श्रेष्ठ आभूषणों से आच्छादित रखनेवाले,
सारे संसार में एकमात्र भीषण आकारवाले, संग्राम में भयंकर रूप से गर्जन करनेवाले,
शत्रुओं का सर्वनाश करनेवाले रावण को देखकर शूर्पणखा रोती हुई हाथ जोड़कर अपने
हृदय के विषाद को व्यक्त करती हुई बोली—'हे असुरेन्द्र, तुम समझते हो कि मैं समस्त
लोको में अद्वितीय शक्तिशाली हूँ, तुम गर्व करते रहते हो कि मैंने तीनो लोको के
शत्रुओं का सर्वनाश किया है । तुम प्रसन्नता से फूले रहते हो कि मेरा राज्य
अकंटक है । वही समस्त लोको का स्वामी कहला सकता है, जो गुप्तचरो के
द्वारा (अन्य) राजाओ का, (उनके) राजकोषों का, उनकी इच्छाओ का, तथा रहस्यो
का पता लगाकर कार्य करता रहता है । तुम्हारी भयंकर मायाओ की शक्ति, तुम्हारा
प्रताप, तुम्हारा बाहुबल और तुम्हारा वैभव—ये सब इसके पहले सफल होते थे, अब
नही । इसका कारण भी सुन लो । भानुकुल का पावन व्यक्ति राम तपस्वी के रूप में
अपने पिता महाराज दशरथ की आज्ञा से अपने प्रिय अनुज लक्ष्मण तथा पत्नी सीता के
साथ दंडक वन में आया है और मुनियों पर दया करके उन्हें अभय-दान देकर पंचवटी में
बड़े आनंद के साथ रहता है । मैं उस पर आसक्त होकर उसके निकट पहुँची, तो क्रोध में
आकर उसने मेरी ऐसी दुर्गति कर दी । मैंने खर से सारा वृत्तांत कहा, तो उसने अत्यंत
क्रुद्ध होकर प्रलयकाल के रुद्र के समान भयंकर रूप धारण कर, दूषण तथा त्रिशिरो के
साथ चौदह सहस्र मानव-भक्षक वीर राक्षस-सैनिको के सहित राम पर आक्रमण किया और
रघुराम के बाण-रूपी अग्नि-शिखाओ में भस्मीभूत हो गये । इसलिए अब मेरे अपमान
को दूर करनेवाले तुम्हारे सिवा और कौन है ? मेरे मुख की विकृति देखो और मेरा
दुःख तुम अपना दुःख मानो ।'
उसकी बातें सुनकर दानवनाथ विस्मित हुआ और (थोड़ी देर तक) सोचने के
बाद उस राक्षसी से कहा—'मैंने अपने जातियों का वध तथा तुम्हारे वहाँ पहुँचने आदि
का समाचार सुना है । उसे रहने दो । तुम तो मुझे यह बताओ कि उस राम की शक्ति
कैसी है ? उसका कैसा रूप है ? उसकी क्या अवस्था है ? उसका आकार कैसा है ? उसके

अरण्यकांड १४७
भाई का रूप कैसा है ? उसकी स्त्री सीता का रूप कैसा है ? तुम अपनी देखी हुई बातो
का पूरा विवरण दो, तो मै उनकी रक्त-धाराओ से तुम्हारी प्यास बुझाऊँगा ।'
तब शूर्पणखा बडी प्रसन्नता से यो कहने लगी—'रामचन्द्र उन्नत वक्षवाला,
श्यामालोत्पल वर्णवाला, सभी लोको में श्रेष्ठ रूपवान्, सूर्य-मडल के तेज को परास्त करनेवाला
तेजस्वी, धीर, आजानुबाहु, महान् पराक्रमी और कमलो के समान नेत्रवाला है । उसी योद्धा ने
अकेले खर, दूषण आदि राक्षसो को परास्त किया था । सौमित्र हेमवर्णवाला है और
दूसरी बातो में अपने भाई के समान ही सभी गुणो से सपत्र है । उसी ने मेरी ऐसी गति
कर दी है । अब सीता की सुदरता के सबध में भी जान लो । मैने देवताओ की स्त्रियो को,
राक्षस-स्त्रियो को, किन्नर-अंगनाओ को, भोगिनी कामिनियो को, गधर्व-पत्नियो को,
यक्ष-काताओ को अच्छी तरह देखा है । मैने पार्वती, लक्ष्मी, सरस्वती तथा रति को भी
देखा है । मैने रभा, शची तथा त्रिभुवनो में रहनेवाली सभी स्त्रियो को देखा है, मुनि-
पत्नियो को देखा है और ब्राह्मण-स्त्रियो को भी देखा है । किन्तु वैसे कुच, वैसी आँखें,
वैसी मधुर बोली, वैसे कपोल, वैसी नाक, वैसा सौदर्य, वैसे चिकुर, वैसे कटाक्ष, वैसे उरु,
वैसे हाव-भाव, वैसी मद हँसी, वह मद-गमन, और वह विवेक किसी भी स्त्री में नही
देखा । मै कैसे सीता की प्रशसा करूँ ? वह स्त्री सभी लोको पर राज्य करनेवाले तुम्हारे
जैसे पति के लिए ही योग्य है, अन्यो के लिए योग्य नही है । वह चन्द्रमुखी, वह
चकोराक्षी, वह नवयुवती, वह कुद-सम दाँतवाली, वह गजगामिनी, वह नवल-लतिका, वह
मानिनीमणि, वह पुष्पगधि, वह स्त्री, तुम्हारी स्त्री होकर रहे, तो हे दनुजैश, तुम्हारे राज्य
की शोभा बढेगी ।'
१५ रावण का पुनः मारीच के पास जाना
कामातुर रावण ने जब देखा कि इस स्त्री की बातो तथा अकपन की बातो में
कितनी समानता है, तो वह अत्यत विस्मित हुआ । उसने राजसभा स्थगित कर दी और
भाग्य से प्रेरित होकर एकान्त में चला गया और सारथी को बुलाकर रथ लाने की आज्ञा दी ।
सारथी के रथ लाते ही वह सूर्य-किरणो के सदृश अनुपम आयुधो से परिपूर्ण उस
रथ पर आरूढ होकर करोड सूर्यो की दीप्ति से विलसित होते हुए आकाश-मार्ग से समुद्र
के मध्यभाग से जाते, विविध वस्तुओ को देखते समुद्र पार कर गया और पूगीफल, मिर्च,
अगरु, नारिकेल, साल, हरेणु, रसाल, विशाल आदि वनो को बडे कौतुक के साथ देखता
हुआ चला । पहले, गरुड के सुधा-कलश को लाने के लिए जाते समय, गज-कच्छपो को
खाने के लिए, जिस वृक्ष पर अपना पैर रखा था, उस वृक्ष को, तथा उस पर पक्षीद्र के
द्वारा कृत चिह्न को और शत योजनो तक फैली हुई शाखाओ से विलसित, मुनियो से घिरे
हुए सुभद्र नामक वटवृक्ष को बडी प्रसन्नता से देखा और महान् महिमा-समन्वित
आसुचन्द्र आश्रम में जटा-वल्कल धारण किये हुए, शात चित्त तथा सौम्य भाव मे अत्यधिक
तपोनिष्ठा से रहनवाले मारीच के पास पहुँचा और उससे आदर-सत्कार प्राप्त करने के
पश्चात्, अत्यत दीन होकर उससे अपने आगमन का कारण यो कहने लगा—'हे मारीच,
तुम मेरे अतरग मत्री हो, इसलिए मै यहाँ आया हूँ । सूर्यवंशी रामचन्द्र अपने पिता की

१४८ रंगनाथ रामायण
आज्ञा से अपने अनुज तथा पत्नी के साथ तपस्वी की तरह जीवन बिताने के लिए दंडक-वन
में आया है और अपने सहज स्वभाव के कारण यहाँ के मुनियों को अभय-दान देकर यहीं
रहने लगा है । उसने निर्भय होकर अकारण ही हमारी शूर्पणखा की नाक और कान काट
लिये हैं तथा खर-दूषण आदि राक्षसों का वध किया है । उस युद्ध में मरे हुए चौदह सहस्र
राक्षस-बंधुओं का प्रतिशोध लिये बिना मेरे मन की पीड़ा दूर नहीं होगी । तुमने इसके
पहले मुझे अच्छा उपदेश तो दिया था, किन्तु उसका अनुसरण करने से मेरा मान-भंग
होगा । इसलिए मैं उस रामचंद्र की स्त्री का माया से अपहरण करके ले जाने के लिए
जा रहा हूँ । मैंने एक उपाय सोचा है । यदि तुम चाहो, तो वह सिद्ध होगा । तुम अत्यधिक
प्रयत्न से उस आश्रम के पास जाना और माया-मृग का रूप धारण करके विचरण
करते रहना । सीता तुम्हें देखकर तुम्हारे प्रति आकृष्ट होगी और राम तथा लक्ष्मण से
तुम्हें लाकर देने की प्रार्थना करेगी । तुम मृग-सुलभ कौशल से उन्हें भुलाते हुए घने वन
के मध्यभाग में ले जाकर अंतर्धान होकर अपने आश्रम में पहुँच जाना । मैं यहाँ सीता
को बड़े हर्ष से लंका ले जाऊँगा । मैं चाहता हूँ कि राम सीताजी की विरहाग्नि में ही
भस्म हो जाय । इसलिए तुम ऐसा करो, मैं अपना आधा राज्य तुम्हें दे दूंगा ।”
१६ मारीच का पुनः उद्बोधन
उस नीच के वचनों को सुनकर मारीच अत्यंत भयभीत हुआ और दुःख-सागर
की लहरों में डूबते-उतराते सौजन्य छोड़कर कहा—"हे दनुजेश्वर, ऐसा विचार तुम्हें कैसे
उत्पन्न हुआ ? ऐसा अनुचित मार्ग तुम्हें कैसे शोभा देगा ? किसने तुम्हें ऐसा उपदेश दिया ?
सुख-चैन से रहनेवाले तुम, अपने सभी बंधु-मित्रों के साथ क्यों मरना चाहते हो ?
न जाने तुमने कुटिल राक्षस-वंश का नाश करनेवाले राम को क्या समझ रखा है ?
मैं उनकी बाल्यावस्था का थोड़ा-सा हाल जानता हूँ । वे नित्य कल्याणगुण-संपन्न हैं,
असमान साहसी हैं । विश्वामित्र के यज्ञ की रक्षा करने के लिए जब वे आये और
यज्ञ की रक्षा कर रहे थे, तब मैं और सुबाहु ने अपनी समस्त शक्ति के साथ उनसे युद्ध
किया था । तब उन्होंने क्रुद्ध होकर एक ही शर से सुबाहु का वध कर दिया और दूसरे
बाण से मुझे समुद्र के मध्य में फेंक दिया । अस्त्रहीन होते हुए भी, बालक होते हुए भी
बाल्यावस्था में ही उस अकलंक साहसी ने वैसा शौर्य दिखाया था । आज वे प्रबल अस्त्रों
से सुसज्जित शौर्यनिधि हैं । आज उनके प्रताप के आगे कौन टिक सकता है ?
उनके वर्त्तमान शौर्य का भी थोड़ा-सा हाल मैं जानता हूँ, तुम अवश्य सुनो । पहले
की शत्रुता से प्रेरित होकर मैं दो और भयंकर राक्षसों के साथ बाघ का रूप धारण किये हुए,
उनके तप में अपने-आपको नष्ट करने के उद्देश्य से गया । तब की बात कैसे कहूँ ?
उन्होंने तीन बाणों से हम तीनों को गिरा दिया । किन्तु हममें से दो ही मरे । न जाने
मेरी शेष आयु की कितनी शक्ति है ? मैं यहाँ आकर गिरा और अपने-आपको सजीव
पाया । तब से राम के अतुल पराक्रम का विचार करके मैंने अपना समस्त पौरुष त्याग
दिया और 'रकार' ('र' ध्वनि) से प्रारंभ होनेवाले—रव, रथ, रमणीय, रवि, रति, रत्न
आदि शब्दमात्र के सुनने से उनका स्मरण करके भयभीत होता हुआ इस प्रकार तपस्वी

अरण्यकांड ९४६
का जीवन व्यतीत कर रहा हूँ । हे रावण, तुम राम की शक्ति को नहीं जानते । हमारी
शूर्पणखा अपने भद्दे रूप का विचार नहीं करती, अपनी दशा के बारे में नहीं सोचती ।
उन अनुपम गुणधाम, अभिराम, रामचन्द्र पर यो फूली-फूली आसक्त होना क्या उचित था ?
उसने स्वयं ही (अपने अपराध से ही) अपना रूप ऐसा विकृत करवा लिया । इसपर
क्रुद्ध होकर खर और दूषण रघुराम पर आक्रमण करने गये और उनकी वाणाग्नि की
ज्वालाओ में दग्ध हो गये । उनके कारण तुम क्यो मतिभ्रष्ट हो राम का शत्रु बनकर
अपने को नष्ट करना चाहते हो । यह न उचित है, न नीतिसगत है । इसलिए तुम
अपना विचार छोड़ दो और लका लौटकर प्रसन्नता से रहो । किसी भी प्रकार तुम विचार
करो, यह अनुचित कार्य ही है । यदि मै प्रयत्न करके जाऊँ भी, तो राम के बाण से मेरे
प्राण नहीं बचेंगे । मैं तुम्हारा अपकार कभी नही करूँगा । मैं अपने मन में कभी तुम्हारे
अहित की इच्छा नहीं करता । इसलिए तुम अवश्य मेरी बात मानो । मैं जो कहता हूँ,
उसे हित-वचन मानो । तुमने तो कहा था कि यदि तुम यह कार्य करोगे, तो मै अपना आधा
राज्य दूंगा । किन्तु कौन कह सकता है कि रघुराम को छेड़कर मै जीवित लौट आ सकूँगा ?"
मारीच के इन वचनों को सुनकर रावण क्रोध-विवश होकर बोला—'एक साधारण
मानव को तुम लोकरक्षक, तीनो लोको को भयभीत करनेवाला, तथा मुझसे श्रेष्ठ बतलाते हो ।
तुम अपने प्राणों के भय से ऐसा प्रलाप कर रहे हो और मुझे भयभीत करने के
लिए बातें बना रहे हो । तुम नहीं सोचते कि मैं राजा हूँ । मेरी आज्ञा की तुम अव-
हेलना करते हो । अब मुझे तुम्हारी आवश्यकता ही क्या है । साथ कर लेने
के लिए तुम्हें बुलाया भी, तो मेरी ऐसी दशा हुई ।'
इस प्रकार कहकर रावण मारीच का वध करने के लिए उद्यत हुआ । उसका
क्रोध देखकर मारीच ने मन-ही-मन सोचा—'इस नीच के हाथ से मरने की अपेक्षा उस
राम के हाथो से मरना ही भला है ।' इसके पश्चात् उसने राक्षसराज को देखकर
कहा—'उचित बात कहने पर तुम ऐसा क्रोध क्यों करते हो ? अच्छा उपदेश देनेवाले
मंत्रियो का वध करनेवाले राजा कही हो सकते हैं ? ठीक है, तुम जो कहो, मैं उसके
अनुसार करूँगा ।' तब रावण ने बडे स्नेह से उसको क्षमा कर दिया और उसे अपने
रथ पर बैठाकर अत्यंत वेग से उसके साथ पंचवटी में पहुँच गया । कामातुर की बुद्धि
ऐसी ही होती है । बुरे मार्ग को वह क्यों त्यागने लगा ?
१७ मारीच का माया-मृग के रूप में आना
मारीच रथ से उतर गया और उस राक्षसराज की प्रार्थना के अनुसार, (स्वयं
मायावी होने के कारण) अच्छी तरह सोच-विचारकर राक्षस-शक्ति के प्रभाव से सुंदर
माया-मृग का रूप धारण किया । उस माया-मृग का शरीर सुनहला था, उसका विशाल
नेत्रयुग्म इन्द्रनील मणि के समान था, उसकी भौहें प्रवाल की-सी और कान उज्ज्वल वज्र
के-से थे, नीले खड्ग के समान उसके मरकत के सींग थे, मोतियो का-सा उसका पृष्ठ-
भाग था, रत्न-बिंदुओ के समान (उसके शरीर पर) धब्बे थे, नव पद्मराग के समान
उसका उदर था, और उसके खुर रजत के समान चमकते थे । वह मृग ऐसा प्रतीत होता था

१५० रंगनाथ रामायण
मानो रोहणाचल का समस्त सौंदर्य मृग का रूप धारण किये हुए पृथ्वी पर विचर रहा हो,
अथवा अकेले राहु से भीत होकर चंद्रमंडल पृथ्वी पर घूम रहा हो, अथवा
राक्षस-क्षय करने के हेतु ब्रह्मा ने समस्त सौंदर्य को एकत्रित करके मृग का निर्माण किया हो
और उसे कपट (मन) से भेजने पर यहाँ वह आ गया हो, अथवा जानकी ने
अपनी कुटिल वेणी से इन्द्रनील मणियो का, ‘ दाँतो से मोतियो का, अरुण ओष्ठो से
प्रवालो का, कपोलो से वज्रो का, शरीर की कांति से वैडूर्य का, उदर के ऊपर की रोम-
राजि से मरकत-मणियो का, पाणि-द्युति से पद्मरागो का, और नख-द्युति से गोमेदको का
परिहास किया था । इसलिए सभी रत्न, रत्नगर्भा की पुत्री-रूपी रत्न को सताने के लिए
मृग का रूप धारण करके आये हो, अथवा रघुराम ने सीता के लिए मेरा धनुष तोडा था।
अब में उन्हें व्याकुल करूँगा—यो सोचकर हर के भेजने पर उनके हाथ का हिरन
इस प्रकार आया हो, अथवा सीता के मुख की कांति से पराजित होकर, चंद्र के भेजने
पर आया हुआ माया-मृग हो । इस प्रकार का वह हिरण चित्र-विचित्र वर्णों की कांति
से समन्वित हो, कपट-रूप धारण किये हुए, अनुपम सौंदर्य को प्रकट करते हुए, ढूँढ़-ढूँढ़-
कर तृण चरने लगा । कभी वह अपनी पूंछ की रमणीय कांति से वन के मयूरो को
नचाता, कभी अपने शरीर की कान्ति को विकीर्ण करके सारे वन को सुनहला बना देता था,
तो कभी चौकड़ी भरकर इन्द्रधनुष का-सा दृश्य प्रस्तुत करता था, कभी तो आकाश
की ओर उछलकर विद्युल्लता की-सी ज्योति उत्पन्न कर देता, तो कभी अपने पार्श्वभाग
की कांति से चंद्रकांत मणि को लज्जित कर देता; कभी मृगो के झुंडो के साथ मिलकर
चरने लगता, तो कभी उन्हें डराता, कभी छिप जाता, तो कभी प्रकट हो जाता, कभी
अति निकट पहुँच जाता, फिर इतने में डरकर चौकड़ी भरकर दूर निकल जाता, कभी
पेड़ो की छाया में चला जाता, कभी पर्णशालाओ में घुस जाता, कभी सिकुड़ता, फिर
तुरत ही छलाँग मारकर निकल जाता, कभी वह पृथ्वी को सूँघने लगता, पूंछ हिलाता,
कान खड़े करके कुछ सुनता और तुरत अत्यंत वेग से दौड़ने लगता । कभी निकट पहुँचता,
सिकुड़े हुए अपने शरीर को हिलाता, घास पर लेट जाता, और बड़े स्नेह से मुनियो के
निकट चला जाता, कभी अपने खुरो से अपने कानो को खुजलाता और सींगो से पुष्प-
लताओ को हिलाकर उनके सभी फूलो को गिरा देता । इस प्रकार वह हिरण उस सुन्दर
पर्णशाला के आगे बड़े आनंद से विविध कौतुक करने लगा ।
उसी समय सीता फूल चुनने के लिए आई और उस पर्णशाला की सुंदर भूमि
को अपने मंजुल नूपुरो की मृदु ध्वनि मे भरती हुई, सौरभ मे महकनेवाली पुष्प-लताओ की
झाड़ियो के निकट पहुँचकर फूल चुनने लगीं । तब वह मन को आश्चर्यचकित कर
देनेवाले उस हिरन को देखकर विस्मित हुई और सूर्यवंशाधिप राम को देखकर बोली—
‘हे नाथ, यह देखिए निकट ही एक अद्भुत मृग दीख रहा है । हमने इतने वर्णों का,
ऐसा सुंदर मृग अबतक किसी भी वन में नहीं देखा । इसके चर्म पर सुख से शयन
करने की बड़ी इच्छा हो रही है । इसलिए हे प्राणेश, इसका पीछा कीजिए और इसे मारकर
मुझे इसका चर्म ला दीजिए । नहीं, नहीं, किसी भी उपाय से इसे जीवित ही पकड़कर

अरण्यकांड १५१
लौ सकें, तो और भी अच्छा होगा । हमारा वनवास तो समाप्त होनेवाला है । हम इस स्वर्ण-
मृग को अपने नगर में ले जायँगे और सासो तथा भरत आदि को इसे दिखाकर उन्हें
आनंद दे सकते हैं ।'
सीता के इन वचनो को सुनकर लक्ष्मण रामचंद्र को देखकर बोले—'हे प्रभु, जब
पृथ्वी पर मृगराज का भी ऐसा (सुन्दर) शरीर नही है, तो भला मृग का ऐसा शरीर
कहाँ हो सकता है ? यह माया-मृग है, इसका विश्वास मत कीजिए । राक्षस मायावी
होते हैं और कदाचित् यह उनकी माया ही है । यही नही, क्या आपने मुनियो के वे
वचन नही सुने कि क्रूर मायावी मारीच इस प्रांत में घूमता रहता है । प्राय वही हमें
भ्रम में डालने के लिए इस प्रकार आ गया है । इस पर आसक्त होकर, उतावले हो आप
इसे पकडने का विचार मत कीजिए । वैदेही तो भोली-भाली है । हे प्रभु, आप भी वैसे
थोडे ही हैं ?'
यह सुनकर रामने सीता का मुख-कमल देखा और हँसते हुए लक्ष्मण को देखकर
बोले—'हे लक्ष्मण, ऐसे विचलित क्यो होते हो ? क्या पृथ्वी पर राक्षसो की माया मेरा
सामना कर सकेगी ? मैं या तो इस मृग को पकडकर ले आऊँगा या इम प्रचड राक्षस
का वध करूँगा ? इन दो बातो को अच्छी तरह जानकर ही मैं इसका पीछा करूँगा और
इसे मारकर, इसका चर्म लाकर जनकजा को दूँगा । इतने दिनो के बाद सीता ने यह
छोटी-सी इच्छा प्रकट की है, तो क्या में इसे भी पूरा न करूँ ? तुम सावधान होकर इस
पर्णशाला का तथा सीता की रक्षा करते रहो ।'
१५ राम का माया-मृग का पीछा करना
इस प्रकार उन्हें यह भार सौंपकर, रघुराम ने उनके हाथ में स्थित धनुप को
लिया और उस पर डोरी चढाकर, ऐसे चल पडे, जैसे पूर्वकाल में यज्ञ-मृग का पीछा करने-
वाला गजासुर-वैरी गया था । वे कही धीरे-धीरे किसी झाडी के पीछे छिपते, कही झुकते,
कही दौडते, फिर खडे होकर देखते, किसी आड में छिपते (मृग का) पीछा करते, उसे
पकडने के लिए आतुर होते और धनुप-बाण को पीछे छिपाकर दवे पाँव चलने लगते ।
वे उस मृग को पकडने के लिए, अवसर देखकर, उसके निकट पहुँचते, 'अव
पकडा, लो, यह आया, अव हाथ में आ गया'—ऐसा सोचते हुए उसका पीछा करते
जाते । वह हिरन भी कभी निकट ही दिखाई पडता, उनके पास पहुँच भी जाता, किन्तु
पकडने का यत्न करते ही भाग निकलता । कभी राम को क्रोध में आया जान (वह)
खडा हो जाता, फिर चारो दिशाओ में मनोहर ढंग से चौकडियाँ भरने लगता । लार के
साथ घास के टुकडो को (वह अपने मुंह से) गिराता, एक छलांग में निकट पहुँच जाता,
तो दूसरी छलाँग में दूर निकल जाता, (जहाँ-तहाँ) सूंघ-सूंघकर चौकडी भरता और
विजली की तरह अपनी जीभ को (एक क्षण के लिए) वाहर निकालकर घुमाता, मानो
कोई मशाल घुमा रहा हो । (वह) कभी कुम्हार के चाक के समान चक्कर काटता, कभी
थके हुए की भाँति, घुटनो के बल खडा रहता, किन्तु निकट पहुँचते ही वाज की तरह
आकाश की ओर छलांग मारकर निकल जाता । थके-मांदे जब राम आश्चर्यचकित होकर

१५२ रंगनाथ रामायण

खड़े हो जाते, तब उनके पार्श्वभाग में ही दिखाई पड़ता और तुरंत छल करके दूर
हो जाता । जब राम तंग आकर उसपर बाण चलाने के लिए सन्नद्ध हो जाते, तब वह अदृश्य
हो जाता । इस प्रकार वह माया-मृग राम को थकाते हुए, वहाँ से दूर घने वन में जा
पहुँचा और उनकी आँखों से ओझल होने का यत्न करने लगा । अब राम समझ गये कि
वह माया-मृग है और मन-ही-मन कहने लगे—'दिखाई देकर अब कैसे बचोगे ?' उन्होंने
ब्रह्मास्त्र का संधान किया, और पर्वतों को कँपाते हुए, समुद्र को आंदोलित करते हुए, सभी
लोकों को भयभीत करते हुए और दिशाओं को थर्राते हुए, उस अस्त्र को मृग पर चलाया ।
वह माया-मृग अपना कपटरूप छोड़कर, असुर का दीर्घ आकार धारण किये हुए 'हाय
लक्ष्मण' का आर्तनाद से दिशाओं को गुँजाते हुए, प्राण छोड़कर पृथ्वी पर ऐसे गिरा, मानो
राक्षसों की लक्ष्मी ही नष्ट हो गई हो, रावण का ही सर्वनाश हुआ हो, अथवा लंकापुरी ही
विध्वस्त हो गई हो । उस माया-मृग को पृथ्वी पर गिरते देख,

तव धरणिजा (जानकी) ने रोषाग्नि से जलते हुए सौमित्र की निंदा करते हुए
कहा—"हे लक्ष्मण, तुम तो रामचन्द्र के परम भक्त हो, आज तुम इतने नीच कैसे हो
गये ? श्रीराम के पुकारते रहने पर भी भयंकर शत्रु के समान तुम चुप क्यों हो ?
क्या यह तुम्हारे लिए उचित है ? 'मेरा अनुज बुद्धिमान् है, उत्तम हैं', यो सोचकर, तुम्हारा
विश्वास करके, जब तुम्हारे भाई यहाँ से गये हैं, तुम ऐसा पापमय व्यवहार क्यो करते हो ?
हाँ, मैं जानती हूँ, असुरो की माया से राम का वध होगा, इसे अच्छी तरह जानकर
अनुचित बुद्धि से, नि शक हो, अपने भाई को दिये हुए वचन की अवहेलना करते हुए मुझे
प्राप्त करने का विचार कर रहे हो, या कदाचित् यह सोचते हो कि मै इसको कैकेयी-
सुत को सौप दूंगा । अपने इस शरीर में मुझे अब प्राणो को रखना उचित नही प्रतीत होता ।
मै तुरत गोदावरी में डूबकर अपना प्राण-त्याग करूँगी । अब अन्य वातो से कोई
प्रयोजन नही है ।"
सीता के ऐसे कठोर वचन कहने पर लक्ष्मण अत्यत क्षुब्ध हो गये । उन्होने राम
का नाम लेते हुए अपने कर्णपुटो पर हाथ रखे तथा चारो ओर देखते हुए बोले—'हे वन-
देवताओ, क्या तुम लोग सुन रहे हो ? सीता कठोर होकर मुझे कैसे पापपूर्ण कटु वचन
सुना रही है ।' इस प्रकार कहकर उन्होने आंखो में आंसू भरे हुए, अब यहाँ रहना
अनुचित समझकर, सीता से कहा—'माता, मै अभी जा रहा हूँ । मैं आपके पति को शीघ्र
ही लिवा लाऊँगा । आप दुखी मत होइए ।'
इसके पश्चात् उन्होने पर्णशाला के चारो ओर सात रेखाएँ खींच दी और कहा—
'माता, इन रेखाओ को पार करके वाहर मत जाइए । यदि कोई इन रेखाओ को पार
करेगा, तो उसका सिर उसी क्षण चूर-चूर हो जायगा ।' तव उन्होने अनल से प्रार्थना की
और उन्हें सीता की रक्षा का भार सौपकर, जानकी को वडी भक्ति से प्रणाम करके वहाँ
से राम की खोज में चल पडे ।
१९. भिक्षुक के वेश में रावण का सीता के पास आना
उसी अवसर की प्रतीक्षा में, अत्यत उद्विग्न होकर रहनेवाला रावण कपट सन्यासी
का वेश धारण करके वहाँ आया । उसके हाथ में दंड और कमडल थे । विशाल ललाट
पर तिलक था, उंगलियो में कुश की पवित्री थी, विशाल उर पर जनेऊ था, दायें हाथ
में रुद्राक्ष की माला थी, और वह गेरुए रंग के वस्त्र पहने हुए था । कई प्रकार की
जपमालाएँ धारण करने से उसकी गरदन एक ओर झुकी हुई थी । उसका गात्र कृश था
और उसके हाथ में एक जीर्ण छत्र था । उसकी वँधी हुई शिखा पीछे की ओर लटक
रही थी । सन्यासी का ऐसा छद्म-वेश धरकर वह उगलियो को गिनता हुआ, कुछ मत्रो को गुन-
गुनाता हुआ, कही मुनि उसे पहचान न जायें, ऐसा मन-ही-मन भयभीत होता हुआ, जरा-
पीडित वृद्ध के समान सिर को किंचित् हिलाता हुआ, थके हुए के समान जहाँ-तहाँ ठहरता
हुआ 'हरि-हरि' शब्द का उच्चारण करके मानो शांति प्राप्त करता हुआ-सा, धीरे-धीरे
पर्णशाला के निकट पहुँचा । वनदेवताओ ने जब देखा कि जगद्रोही वहाँ पहुँच गया है,
तव वे अत्यत भयभीत होकर एक ओर सटककर रह गई ।
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१९४ रंगनाथ रामायण
पर्णशाला के सम्मुख खड़े हुए उस कपटवेशधारी को देखकर सीता ने उसे एक
संयमी मुनि समझा । तुरंत अत्यंत भक्ति-युक्त हो, कर-कमलों को जोड़कर उसे प्रणाम किया
और सौमित्र की खींची हुई रेखाओं को पारकर बड़ी भक्ति के साथ उस अभ्यागत का
पूजन-सत्कार किया । तब उस कल्याणी सीता को देखकर उसने कहा—'हे सुंदरी, तुम
ऐसे दुर्गम कानन में किस प्रकार अकेली रहती हो ? पता नहीं, तुम रति हो, या लक्ष्मी
हो, या भारती हो ? नहीं तो पृथ्वी तथा स्वर्गलोक की स्त्रियों में ऐसा सौंदर्य कहाँ ?
तुम्हारा मुख पूर्ण चंद्र की राका का उपहास कर रहा है, तुम्हारे अधर पद्मराग मणियों
को परास्त कर रहे हैं; तुम्हारा शरीर विद्युल्लता को लज्जित कर रहा है, तुम्हारी वाणी
सुधा से भी अधिक पवित्र है, तुम्हारी वेणी जलद की वेणी को परास्त कर रही है,
तुम्हारे सौंदर्य का वर्णन करना मेरे लिए असंभव है । हे तरुणी, तुम्हारे आलिंगन-पाश में
बंधकर सुख-भोग करनेवाला व्यक्ति ही पुरुषों में श्रेष्ठ है । तुम्हारा साहचर्य
प्राप्त करनेवाला व्यक्ति ही पूर्णकामी तथा नित्यकल्याणसंपन्न है । हे कमलाक्षी, तुमको
यहाँ रहते देखकर, हमें आश्चर्य तथा दुःख हो रहा है । हे सुंदरी, तुम कौन हो ? इस
कानन में किस लिए तुम रहती हो ? हमें सारा समाचार कहो ।'
तब सीता ने बड़ी भक्ति से कहा—"हे अनघ, मैं रघुराम की पत्नी हूँ । मेरे
पिता महाराज जनक हैं । महाराज दशरथ मेरे ससुर हैं । मेरा नाम सीता है । उन्नत
कीर्तिवान् रामचंद्रजी अपने पिता की आज्ञा के अनुसार गृह त्यागकर वनवास के लिए
आये, तो मैं और लक्ष्मण उनके साथ चले आये हैं । इस आश्रम में हम तीनों तपस्वियों का-सा जीवन
व्यतीत करते हैं । आज हमने अपने आश्रम के सामने एक स्वर्ण-मृग को चौकड़ी भरते देखा, तो मैंने
अपने पति से उसे किसी तरह ला देने के लिए कहा । इसी हेतु वे गये हैं । उसके पश्चात्,
'हाय लक्ष्मण' का आर्तनाद शूल की तरह मेरे कानों को चुभाते हुए सुनाई पड़ा । भयभीत हो
मैंने लक्ष्मण को भेजा । वह गया हुआ है, किन्तु न जाने अब तक वह क्यों नहीं लौटा ।”
इतना कहकर, उन्होंने उस कपट मुनि को संबोधित करके कहा—'हे अनघ, आपका
शुभ नाम क्या है ? और आप यहाँ क्यों आये हैं ?' तब लंकाधिपति ने अपना कपट
तजकर उनसे कहा—'हे वनजाक्षी, मैं समुद्र के मध्य में स्थित लंका का राजा हूँ । राक्षसों
में श्रेष्ठ हूँ, विश्रवसु का पुत्र हूँ, यक्षेश का अनुज हूँ, दिग्विजयी हूँ । मेरा नाम रावण हैं,
युद्ध में देवता तथा राक्षसों में किसी को भी मारने की क्षमता रखता हूँ । हे सुन्दरी,
मैंने तुम्हारे रूप-सौंदर्य की प्रशंसा सुनी थी, इसलिए बड़े हर्ष से तुम्हें देखने आया हूँ ।
इस अकिंचन मानव के साथ तुम इन घोर वनों में क्यों रहती हो ? हे विशालाक्षी, तुम
अपनी इच्छा से शासन करती हुई अपनी मनोज्ञता को प्रकट करती हुई, अत्यधिक आदर
के साथ, पुष्पक आदि विमानों तथा ऊँची अट्टालिकाओं में सुर, गरुड़, उरग, असुर तथा
सिद्धों की श्रेष्ठ कन्याओं की सेवाएँ प्राप्त करती हुई निवास करो । तुम्हारे चरणों की
कांति मेरे महलों का मणिमय कुट्टिम (फर्श) बन जाय । हे सुंदरी, तुम्हारे कटाक्ष की शोभा
मेरे अंतःपुर की कुमुदिनियों के साथ होड़ लगावे । तुम्हारा मंद हास प्रतिदिन मेरे प्रेम-सागर
के लिए चंद्रिका बन जाय । तुम मेरी लंकापुरी को चलो ।'

अरण्यकांड १५५
इन बातो को सुनकर सीता अत्यत भयभीत हुई । किन्तु वे धीरमना थी, इसलिए
एक तृण हाथ में लिये हुए वे उसे सवोधित करके उसकी बातो का उत्तर देने लगी, मानो
वे उस रावण को तृणवत् मानती हो । वे कहने लगी—'क्यो रे, मुझे श्रेष्ठ पतिव्रता
न मानकर, इस प्रकार कहना, क्या तुम्हें उचित है ? तुम्हारी इच्छा ऐसी दुर्लभ है, जैसे
देवताओ को प्राप्त करने योग्य पूर्णाहुति किसी कुत्ते के लिए दुर्लभ है । तुम श्रीरामचन्द्र
को प्राप्त मुझ पर आसक्त होने का साहस करते हो ? चुपचाप तुम अपने नगर को लौट
जाओ । यदि ऐसा न करके तुम कोई दुराचरण करने का विचार करोगे, तो मेरे पति
राघव, जो विविध शस्त्रास्त्रो के प्रयोग में निपुण हैं, जो अनायास ही, देखते-देखते शिव-
धनुष को भग करने में सफल हुए, और खर-दूषण आदि राक्षसो के शिरच्छेदन करनेवाले है,
तुम्हें तथा तुम्हारे वश को नष्ट-भ्रष्ट कर देंगे । तुम्हारे और उन सूर्यवंशी में उतना
ही अतर है, जितना सियार और सिंह में, मशक तथा दिग्गज में, नाले और समुद्र में,
कौआ और गरुड में अतर होता है । इसलिए अब तुम सुबुद्धि के साथ लका लौट जाओ ।'
इन बातो को सुनकर रावण ने अत्यत क्रोधावेश से अभिभूत हो, भयकर दृष्टि से
जानकी को देखा—और कपट रूप तजकर निज रूप धारण किया । उसके मन में मन्मथ
दीप्त हो रहा था और उसकी दस अवस्थाएँ मानो रावण के दस मणिमय जटा-जूटो से
युक्त सिरो के रूप में दिखाई देने लगी । उसकी बीस भुजाएँ ऐसी दीखने लगी, मानो
मन्मथ की दस अवस्थाओ की इच्छाएँ दुगुनी होकर प्रकट हो रही हो । उसके कमल के-से
बीस हाथ ऐसे दीख रहे थे, मानो उसकी (मदन-प्रेरित) इच्छाएँ पल्लवित हो गई हो !
इच्छा के उन पल्लवो में फूलो के समान शस्त्रास्त्र दिखाई देने लगे । उसके शरीर के विविध
आभूषणो की काति मदनाग्नि की ज्वालाओ के समान दीखने लगी । इस प्रकार भयकर आकार
धारण करके खडे हुए रावण को देख सीता का धैर्य छूट गया और वे भयभीत हो मूर्च्छित
हो गईं । तेज आधी के प्रहार से (पेड से अलग हो) नीचे पडी हुई वनलता के समान
पृथ्वी पर पडी हुई चारुलोचनी सीता को, निर्दयी हो दशकंठ ने, अपने रथ पर
ला रखा । सीता की आंखो से अश्रु-धारा बह रही थी, बाहु-लताएँ भय से काँप रही थी,
उनकी वेणी खुल गई थी, कुच हिल रहे थे, रत्न-हार जहाँ-तहाँ टूटकर उसके रत्न
विखर रहे थे, और भय तथा शोक से उनका सारा शरीर काँप रहा था । ऐसी स्थिति में वह
राक्षस सीता को अपने रथ पर बिठाकर आकाश-मार्ग से यो जाने लगा, मानो दैव-प्रेरित
हो मृत्यु-देवता को साथ लिये जा रहा हो । रास्ते में सीता की चेतना लौट आई, तो
उन्होंने आँखें खोलकर देखा और (सूखे हुए) होठो को आर्द्र करती हुई, अपने विखरे
हुए आँचल को ठीक कर लिया और ऊँचे स्वर में शिशु-कोयल की-सी वाणी में विधि को
कोसती हुई, अपने प्राणेश्वर को पुकारती हुई क्रोध तथा विषाद से सतप्त होकर विलाप
करने लगी ।
२०. जानकी का शोक
सीता कहने लगी—'हे राघवेश्वर, हे रामचन्द्र, हे सूर्यवंशी, हाय ! आपकी पत्नी—
मुझे एक अनाथा बनाकर यह कुटिल राक्षस उठाकर ले जा रहा है । आप शीघ्र आकर

१५६ रंगनाथ रामायण
इसका नाश कीजिए और मेरी लाज बचाइए और मेरी रक्षा कीजिए । अरे राक्षस, यह
निंदा तुम अपने ऊपर क्यो लेते हो ? तुम स्वयं अपनी लका को क्यो भस्म कर देना
चाहते हो ? तुम्हारे लिए यह भयकर अन्याय उचित नही है । क्रोध में राघव तुम्हारा
वध कर डालेंगे । हाय, मैने स्वर्ण-मृग देखा ही क्यो ? मैने अपने प्राणेश को क्यो जाने के
लिए कहा ? (लक्ष्मण के) मना करने पर मैने उसकी वात क्यो नही मानी ? प्रभु मृग
लाने के लिए क्यो गये ? मैने उनकी शक्ति का विचार क्यो नही किया ? लक्ष्मण को
कोसकर जाने के लिए मैने उससे क्यो कहा ? हाय ! होनहार मुझे क्यो चुप रहने देगा ?
इन बातो से क्या प्रयोजन है ? हे भाई लक्ष्मण, तुम अभिमान-धनी हो, मुझे माता के
समान माननेवाले उन्नत गुणवान् हो । सौजन्य की मूर्त्ति हो । ऐसे तुम्हें जो अपशब्द मैने कहे,
उनका फल में अब भोग रही हूँ । क्रोध तज दो और शीघ्र आकर मेरी रक्षा करो ।
हाय कैकेयी ! आपने जो वर माँगे, वे आगे चलकर सफल होगे । आप अपने पुत्र के
हाथ एकछत्राधिकार का अनुभव करते हुए राजभोग कीजिए ।'
इस प्रकार सीता उस राक्षसराज की निंदा करती हुई, रामचंद्र को पुकारती हुई,
भगवान् को कोसने लगी । वह काकुत्स्थवंशी लक्ष्मण की प्रशंसा करती और कैकेयी की
निंदा करती हुई अत्यधिक शोक से कहने लगी—'में मिथलेश्वर की पुत्री, दशरथ की
पुत्र-वधू और राम की पत्नी हूँ, ऐसी मुझे रक्षा करनेवाले जहाँ अनुपस्थित हैं—उस
स्थान से एक राक्षस मुझे उठाकर ले जा रहा है । हे वृक्षो, हे मेरे सहोदरो, आप धरणी-
श्वर (राम) से सारा वृत्तांत कह सुनाइए । हे सुरो, आप सुरवैरी का सामना करके
किसी उपाय से मुझे कैद से छुड़ाइए । हे गोदावरी, बडी भक्ति के साथ में आपके आश्रय
में रहती थी, अब आपको मेरी रक्षा करना उचित है । कम-से-कम आप जाकर भूपति
से यह वृत्तांत सुनाइए । में दुष्ट के हाथो में फँसकर विपत्ति में पड़ी हूँ । हे माता, क्या
आपको मेरी रक्षा नही करनी चाहिए ? हे भूमाता, आप रघुराम भूपालमणि से मेरी
इस दुरवस्था का समाचार बतलाइए । सब प्रकार के लोगो को पुकारते हुए मेरा कठ
सूख रहा है; धैर्य छूट रहा है, प्राण दुःखी हो रहे है । हे किन्नरो, हे पुण्यात्माओ, हे
महात्माओ, हे तपस्वियो, हे खेचरो, हे व्रतियो, हे यतियो, हे वन-पक्षियो, हे सिंहो, हे गधर्वो,
हे नरो, हे सुरो, हे नागेंद्रो, आप (सब) मेरी रक्षा कीजिए ।'
भूसुता विविध प्रकार से व्यर्थ ही शोक करने लगी । पृथ्वी भी काँप उठी, गौतमी
(गोदावरी) ने अपनी गति रोक दी । समस्त प्राणी शोकाकुल हुए । मुनि लोग 'यह अन्याय है,
अन्याय है,' कहते हुए, कपट सन्यासी रावण का स्वभाव जानकर, परिताप करने लगे
और शोकाश्रु बहाने लगे । मृग उनका (आर्त्तनाद) सुनते हुए चरना भूल गये, पक्षी क्रन्दन
करन लगे, पवन की गति मद पड गई; वृक्ष सूखने लगे, सारा आकाश क्षुब्ध हो उठा,
धर्म-देवता यह सोचकर कि अब मेरी रक्षा कौन करेगा, दु खी हुए, वन-देवता शोक-सतप्त हुए,
साधुजन जानकी को देख रोने लगे ।
२१. जटायु और रावण का युद्ध
उस समय अरुण का पुत्र, पक्षिराज तथा महान् साहसी जटायु ने एक पहाड़ पर से

अरण्यकांड १५७
'हाय रघुराम' का आर्त्तनाद स्पष्ट रूप से सुना । यह आर्त्तध्वनि सुनकर उसने भय तथा
आश्चर्यचकित हो, सिर उठाकर सारे आकाश तथा सभी दिशाओ में अपनी दृष्टि दौड़ाई
और मन-ही-मन कहने लगा—'दया-रहित हो रावण उस राम की पत्नी को अपने यहाँ
ले जा रहा है । उस दिन जब से मुझे राम ने देखा, तब से वे मेरे साथ घनिष्ठ मित्रता
का व्यवहार कर रहे हैं । अब इस राक्षस के दुष्कर्मों को सहना ठीक नही है । अपना
शौर्य दिखाकर मै अकेले ही इस राक्षस का वध करूँगा और वैदेही को छुड़ा लाऊँगा या
सूर्यवंशाधिप राघव के लिए युद्ध में अपने प्राण छोड़ दूंगा ।'
ऐसा निश्चय करके, उसने अपने सुदृढ शरीर को बढाकर आकाश की तरफ ऐसे
उछल पडा, जैसे वज्र के वार का सहन न कर सकने के कारण महापर्वत आकाश में उड़
रहा हो । (उसके उड़ते समय) पर्वत-श्रृंग (उसके पैरो का टक्कर खाने से) चूर-चूर
हो गये । उसने अपने मुंह में रखे हुए मास-खंडो को पृथ्वी पर थूक दिया । भयंकर रूप
से उसके नखो में फँसे हुए करि, सिंह, शरभ आदि मृगो के सिर (उसके पैरो से छूटकर
पृथ्वी पर) लुढ़कने लगे । उसकी बलिष्ठ चोंच की दीप्ति तथा पंखो की आभा (चारो
ओर) विकीर्ण होने लगी । अत्यधिक क्रोध से उसकी आँखें प्रचंड दीखने लगी, पंखो के
द्वारा उत्पन्न पवन से पर्वत-शिखरो पर रहनेवाले वृक्ष टूटकर दिशाओ को भरने लगे ।
वह रावण की ओर इस प्रकार आने लगा, मानो रावण के (मन के) तम को दूर करने
के लिए आनेवाला मध्याह्न का सूर्य हो, या बली रावण-रूपी सूर्य को निगलने के लिए
बडे भयंकर रूप से आनेवाला राहु हो, या रावण-रूपी राहु को निगलने के लिए अत्यधिक
वेग से आनेवाला तार्क्ष्य (एक मुनि) हो । जटायु कहने लगा—'हे कुटिल राक्षस, ठहर,
ठहर, आगे मत बढ । तू रघुराम नृपचन्द्र की देवी को कहाँ लिये जा रहा है ? अब कहाँ
ले जा सकेगा ? कहाँ जायगा ? किम ओर जायगा ? यदि तू जाना भी चाहे, तो जाने
न दूंगा, तुझे मै मारूँगा, काटूँगा, खंड-खंड कर दूंगा, दंड दूंगा और पोली लकडी के समान
(तेरे) सिरो को काट दूंगा ।' इसके पश्चात् वह सीता को देखकर कहने लगा—'हे देवी,
दुःखी मत होइए । इस भयंकर राक्षस का वध करके मै आपको इसके हाथो से छुड़ाऊँगा ।'
भयंकर निदाघ के मध्य बादलो का गर्जन जैसे मयूरो को प्रसन्नता पहुँचाता है,
वैसे ही इन वचनो से सीता को कुछ सांत्वना मिली । कुम्हलाये हुए मुंह से, अत्यत दुख
से कुढती हुई सीता बोली—'हे जटायु ! हे भाई ! देखो यह सुरवैरी राम-लक्ष्मण को वंचित
करके घमंड से मुझे उठाकर ले जा रहा है ।' इन बातो को सुनकर अरुणनंदन (गरुड)
क्रोधोन्मत्त होकर रथ के आगे आकर खडा हो गया और प्रलय-काल के बादलो के निर्घोष
की भाँति कठोर वचनो से बार-बार दशकंठ को डाँटते हुए अत्यधिक साहस के साथ कहने
लगा—'हे रावण, तू परम पवित्र ब्रह्मा का पोता है, पुण्यात्मा विश्रवसु का पुत्र है,
कुबेर का भाई है और दानवश्रेष्ठ है, क्या तेरे लिये ऐसा काम उचित है ? तू जगदेकपति
नृप राम की पत्नी को बलात् लिये जा रहा है, यह उचित नहीं है । तुझे तो राम
से लडकर उसके पश्चात् उनकी स्त्री को लाना चाहिए था । उनको धोखा देकर, उनकी
स्त्री को इस प्रकार लाया है । क्या यह कोई शूरता है ? अरे, राम की क्रोधाग्नि तुझे