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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 185, कुल 508 में से

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पृष्ठ 185

अरण्यकांड १५५
इन बातो को सुनकर सीता अत्यत भयभीत हुई । किन्तु वे धीरमना थी, इसलिए
एक तृण हाथ में लिये हुए वे उसे सवोधित करके उसकी बातो का उत्तर देने लगी, मानो
वे उस रावण को तृणवत् मानती हो । वे कहने लगी—'क्यो रे, मुझे श्रेष्ठ पतिव्रता
न मानकर, इस प्रकार कहना, क्या तुम्हें उचित है ? तुम्हारी इच्छा ऐसी दुर्लभ है, जैसे
देवताओ को प्राप्त करने योग्य पूर्णाहुति किसी कुत्ते के लिए दुर्लभ है । तुम श्रीरामचन्द्र
को प्राप्त मुझ पर आसक्त होने का साहस करते हो ? चुपचाप तुम अपने नगर को लौट
जाओ । यदि ऐसा न करके तुम कोई दुराचरण करने का विचार करोगे, तो मेरे पति
राघव, जो विविध शस्त्रास्त्रो के प्रयोग में निपुण हैं, जो अनायास ही, देखते-देखते शिव-
धनुष को भग करने में सफल हुए, और खर-दूषण आदि राक्षसो के शिरच्छेदन करनेवाले है,
तुम्हें तथा तुम्हारे वश को नष्ट-भ्रष्ट कर देंगे । तुम्हारे और उन सूर्यवंशी में उतना
ही अतर है, जितना सियार और सिंह में, मशक तथा दिग्गज में, नाले और समुद्र में,
कौआ और गरुड में अतर होता है । इसलिए अब तुम सुबुद्धि के साथ लका लौट जाओ ।'
इन बातो को सुनकर रावण ने अत्यत क्रोधावेश से अभिभूत हो, भयकर दृष्टि से
जानकी को देखा—और कपट रूप तजकर निज रूप धारण किया । उसके मन में मन्मथ
दीप्त हो रहा था और उसकी दस अवस्थाएँ मानो रावण के दस मणिमय जटा-जूटो से
युक्त सिरो के रूप में दिखाई देने लगी । उसकी बीस भुजाएँ ऐसी दीखने लगी, मानो
मन्मथ की दस अवस्थाओ की इच्छाएँ दुगुनी होकर प्रकट हो रही हो । उसके कमल के-से
बीस हाथ ऐसे दीख रहे थे, मानो उसकी (मदन-प्रेरित) इच्छाएँ पल्लवित हो गई हो !
इच्छा के उन पल्लवो में फूलो के समान शस्त्रास्त्र दिखाई देने लगे । उसके शरीर के विविध
आभूषणो की काति मदनाग्नि की ज्वालाओ के समान दीखने लगी । इस प्रकार भयकर आकार
धारण करके खडे हुए रावण को देख सीता का धैर्य छूट गया और वे भयभीत हो मूर्च्छित
हो गईं । तेज आधी के प्रहार से (पेड से अलग हो) नीचे पडी हुई वनलता के समान
पृथ्वी पर पडी हुई चारुलोचनी सीता को, निर्दयी हो दशकंठ ने, अपने रथ पर
ला रखा । सीता की आंखो से अश्रु-धारा बह रही थी, बाहु-लताएँ भय से काँप रही थी,
उनकी वेणी खुल गई थी, कुच हिल रहे थे, रत्न-हार जहाँ-तहाँ टूटकर उसके रत्न
विखर रहे थे, और भय तथा शोक से उनका सारा शरीर काँप रहा था । ऐसी स्थिति में वह
राक्षस सीता को अपने रथ पर बिठाकर आकाश-मार्ग से यो जाने लगा, मानो दैव-प्रेरित
हो मृत्यु-देवता को साथ लिये जा रहा हो । रास्ते में सीता की चेतना लौट आई, तो
उन्होंने आँखें खोलकर देखा और (सूखे हुए) होठो को आर्द्र करती हुई, अपने विखरे
हुए आँचल को ठीक कर लिया और ऊँचे स्वर में शिशु-कोयल की-सी वाणी में विधि को
कोसती हुई, अपने प्राणेश्वर को पुकारती हुई क्रोध तथा विषाद से सतप्त होकर विलाप
करने लगी ।
२०. जानकी का शोक
सीता कहने लगी—'हे राघवेश्वर, हे रामचन्द्र, हे सूर्यवंशी, हाय ! आपकी पत्नी—
मुझे एक अनाथा बनाकर यह कुटिल राक्षस उठाकर ले जा रहा है । आप शीघ्र आकर