रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१३८ रंगनाथ रामायण
विश्वास हो गया है कि मेरा और तुम्हारा प्रेम उचित होगा । इसलिए मै तुम पर
आसक्त हूँ । मै अपनी इच्छा से कोई भी रूप धारण कर सकती हूँ, कही भी जाने की
क्षमता रखती हूँ, किसी भी वस्तु को प्राप्त कर सकती हूँ, कोई भी सुख पहुँचा सकती हूँ ।
अब तुम्हारे साथ जो (स्त्री) है, वह किस काम की है ? मेरा सौंदर्य देखो और मेरा
पाणि-ग्रहण करो । यह (सीता) कुल तथा गुण मे हीन है, विकृतरूपिणी है, यह तुम्हारे
लिए कहाँ योग्य है ? हे राम, मै अभी इसे निगल जाऊँगी और तुम्हारी इच्छा के अनुसार
तुम्हारे साथ रति-क्रीडा में प्रवृत्त हो जाऊँगी ।'
इस प्रकार कहते हुए जब वह राम के पास आने लगी, तब राम ने सीता को
अपने निकट बुला लिया । तरुणी की इच्छा को सुनकर, उसका परिहास करने के उद्देश्य
से उसके रूप को देखकर हँसते हुए बोले—'हे सुदरी, मै पत्नी के साथ रहता हूँ । यह
मेरा विश्वास करके मेरे साथ वन में आई है, इसलिए इसे तुमको सौपना उचित नही है ।
इतना ही नही, तुम सौत के साथ सुख से कैसे रह सकोगी ? अगर यह नही होती, तो
मै पहले ही तुम्हें ग्रहण करता । अब भी कुछ बिगडा नही है । वह देखो, मेरा भाई है,
श्रेष्ठ तपोधन है, वह मुझसे भी अधिक सुदर है । वह सदा अपने लिए अनुकूल,
चंचल तथा विशाल नेत्रवाली स्त्री की अभिलाषा करता रहता है । इसलिए वही तुम्हें
ग्रहण करने में समर्थ है ।'
इस पर शूर्पणखा लक्ष्मण के पास गई और कहने लगी—'हे लक्ष्मण, मै तुम पर
आसक्त होकर तुम्हारे साथ विवाह करने के लिए आई हूँ । मुझे तुम ग्रहण करो ।'
लक्ष्मण समझ गये कि राम के भेजने पर यह मेरे पास आई है । इसलिए वे बोले—
'हे सुदरी, पहले तुमने अपने मन से मेरे भाई से प्रेम किया था । अत, तुम्हें ग्रहण करना
मेरे लिए उचित नही है । सौंदर्य में सीता तुम्हारी समता नही कर सकती । तुम्हारा प्रेम
और तुम्हारे हाव-भाव आदि यदि एक बार और राघव देखेंगे, तो वे सीता को छोडकर
तुम्हें ग्रहण करेंगे । हे रमणी, इसलिए तुम राम से ही प्रार्थना करो ।'
सौमित्र की बातो पर विश्वास करके वह तमोगुण-सपन्न स्त्री, अपने भद्देपन
का विचार न करके पुन राम के पास गई और रति-क्रीड़ा के लिए प्रार्थना करने लगी ।
तब राम ने कहा—'हे सुदरी, तुम उसी (लक्ष्मण) के पास जाओ ।' तब युवती पुन
लक्ष्मण के पास जाकर प्रार्थना करने लगी । इस प्रकार अनुज अग्रज को, अग्रज अनुज को
दिखाने लगे । वह युवती विह्वल मन के साथ बडी अनुचित आशा लिये मन्मथ के सूत्र
के द्वारा नचाई जानेवाली कठपुतली की तरह, यहाँ से वहाँ और वहाँ से यहाँ, आने-जाने लगी ।
अत में वह उन दोनो की रसहीन बातो से तग आकर क्षुब्ध होकर बोली—
'हे मानव, एक अकिंचन स्त्री के समान मुझे तग करना क्या तुम्हारे लिए उचित है ?
अगर मै क्रोध करूँ, तो मानवो की कौन कहे, इंद्रादि देवताओ को भी खा जाऊँगी । अब
मै इस स्त्री के साथ समस्त संसार को पीसकर खा जाऊँगी ।' यो कहती हुई उसने वडा
भयकर रूप धारण कर लिया और मृत्यु के समान अट्टहास करती हुई वह (सीता के)
निकट जाने लगी । तब राघव बोले—'हे सौमित्र, यह जानकी के ऊपर आक्रमण करने