रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
पृष्ठ 172, कुल 508 में से
संदर्भ में पढ़ें१४२ रंगनाथ रामायण
गिरने लगे, योद्धाओ के अंग और रथो के भाग पृथ्वी पर गिरने लगे, गुण-सहित धनुष
तथा कवच चूर-चूर हो गये, रथी और सूत पृथ्वी पर लोटने लगे, श्वेत छत्र और पताकाएं
टूटने लगी, और मांस-खंड छिन्न-भिन्न होकर गिरने लगे । इस प्रकार, युद्ध ने भयंकर रूप
धारण किया ।
सूर्य के प्रकाश से जिस प्रकार अंधकार तितर-बितर हो जाता है, वैसे ही राम के
असमान पराक्रम से नष्ट होने के बाद बची हुई राक्षस-सेना दर्प खोकर खर की शरण
में पहुँची । खर ने उनको प्रोत्साहित किया और दूषण को युद्ध करने के लिए भेजा ।
बची हुई सेना के साथ वह अपनी शक्ति दर्शाते हुए, शीघ्र ही राम के निकट आ पहुँचा
और उनपर ताल, साल (आदि वृक्ष), शिलाएँ तथा विविध अस्त्रो की वर्षा करने लगा ।
(इन अस्त्रो के लगने से) राम के शरीर से रक्त-प्रवाह होने लगा । तब क्रोध से आँखें
लाल किये हुए राम ने उन राक्षसो पर गांधर्व-अस्त्र चलाया । उन शक्ति-संपन्न अस्त्र के
तेज के आगे गज, रथ, तुरग, पदाति राक्षस-सेना टिक न सकी । वह अस्त्र अपने भयकर
तेज से दनुज-वर्ग को नष्ट-भ्रष्ट करके, उनका संहार करने लगा । रण-भूमि में जहाँ देखो,
अश्व तथा गज के धड़, मूंड, आँत, भेजा तथा रक्त का प्रवाह दिखाई पड़ने लगा ।
शाकिनी, भूत, पिशाच, वैताल आदि झुंड-के-झुंड वहाँ पहुँचकर कहने लगे—'यह लो, राम
के युद्ध-रूपी धर्मशाला में हाथियो के शिर-रूपी घट में मोती-रूपी चावल का भात पकाया
गया है । चलो हम सब खायें ।'
वे सब भूत-प्रेत अत्यंत हर्ष से पंक्तियो में बैठ गये; रक्त-चंदन, नवरक्त-अक्षत
रक्त-संकल्पपूर्वक धारण किया; चमड़ा-रूपी केले के पत्ते बिछाये, खोपडी-रूपी दोने
सजाये, शर की अग्नि में पकाये गये मांस को भात, मस्तिष्क को दाल, चर्बी को घृत,
विभिन्न अंगो के मांस को शाक, छोटी आँतो को पायस, हृदय-पिंड को मिठाई, नये रक्त
को मीठा जल मानते हुए, उसे सब प्रकार से विप्रोचित भोजन समझकर छककर खाया ।
भोजनोपरांत सब एकत्रित हुए कुछ ने आशीर्वाद दिये कि—'श्रीरामचन्द्र ! ते विजयोऽस्तु ।'
तो कुछ ने पीछे से कहा—'तथास्तु ।' कुछ भूतो ने हाथियो के दांत छड़ी की तरह हाथ
में धारण कर लिया, तो कुछ ने अस्थियो की मालाएँ कंठाभरणो के रूप में धारण कर ली
और हाथियो की घटिकाओ का ताल देते हुए बड़े आनंद से अपना निंदनीय रूप प्रकट
करना शुरू किया ।
तब मदमत्त वैरियो के लिए भयंकर रूपवाला दूषण अत्यंत दुःखी होकर अपने
समान बलशाली पाँच सहस्र योद्धाओ को राम पर आक्रमण करने के लिए भेजा । उन्होने
तीनों लोको को कँपाते हुए, राम पर आक्रमण किया, तो राम ने अपनी धनुर्विद्या की
कुशलता प्रदर्शित करते हुए, अत्यंते क्रुद्ध दृष्टि धारण किये हुए एक-एक राक्षस पर एक-एक
बाण का प्रयोग कर उन सब का वध कर दिया । कुछ लोगो को एक साथ इकट्ठा करके
भी उनका संहार किया । यह देखकर दूषण अत्यंत क्रोध से राम को कटु वचन कहते हुए,
अपना रथ राम के सम्मुख ले गया और उनपर वज्र तथा काल-नाग की समता करनेवाले
बाणो की वर्षा करने लगा । राम ने उन बाणो को बीच ही में तोड़ दिया, उसके