रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१५६ रंगनाथ रामायण
इसका नाश कीजिए और मेरी लाज बचाइए और मेरी रक्षा कीजिए । अरे राक्षस, यह
निंदा तुम अपने ऊपर क्यो लेते हो ? तुम स्वयं अपनी लका को क्यो भस्म कर देना
चाहते हो ? तुम्हारे लिए यह भयकर अन्याय उचित नही है । क्रोध में राघव तुम्हारा
वध कर डालेंगे । हाय, मैने स्वर्ण-मृग देखा ही क्यो ? मैने अपने प्राणेश को क्यो जाने के
लिए कहा ? (लक्ष्मण के) मना करने पर मैने उसकी वात क्यो नही मानी ? प्रभु मृग
लाने के लिए क्यो गये ? मैने उनकी शक्ति का विचार क्यो नही किया ? लक्ष्मण को
कोसकर जाने के लिए मैने उससे क्यो कहा ? हाय ! होनहार मुझे क्यो चुप रहने देगा ?
इन बातो से क्या प्रयोजन है ? हे भाई लक्ष्मण, तुम अभिमान-धनी हो, मुझे माता के
समान माननेवाले उन्नत गुणवान् हो । सौजन्य की मूर्त्ति हो । ऐसे तुम्हें जो अपशब्द मैने कहे,
उनका फल में अब भोग रही हूँ । क्रोध तज दो और शीघ्र आकर मेरी रक्षा करो ।
हाय कैकेयी ! आपने जो वर माँगे, वे आगे चलकर सफल होगे । आप अपने पुत्र के
हाथ एकछत्राधिकार का अनुभव करते हुए राजभोग कीजिए ।'
इस प्रकार सीता उस राक्षसराज की निंदा करती हुई, रामचंद्र को पुकारती हुई,
भगवान् को कोसने लगी । वह काकुत्स्थवंशी लक्ष्मण की प्रशंसा करती और कैकेयी की
निंदा करती हुई अत्यधिक शोक से कहने लगी—'में मिथलेश्वर की पुत्री, दशरथ की
पुत्र-वधू और राम की पत्नी हूँ, ऐसी मुझे रक्षा करनेवाले जहाँ अनुपस्थित हैं—उस
स्थान से एक राक्षस मुझे उठाकर ले जा रहा है । हे वृक्षो, हे मेरे सहोदरो, आप धरणी-
श्वर (राम) से सारा वृत्तांत कह सुनाइए । हे सुरो, आप सुरवैरी का सामना करके
किसी उपाय से मुझे कैद से छुड़ाइए । हे गोदावरी, बडी भक्ति के साथ में आपके आश्रय
में रहती थी, अब आपको मेरी रक्षा करना उचित है । कम-से-कम आप जाकर भूपति
से यह वृत्तांत सुनाइए । में दुष्ट के हाथो में फँसकर विपत्ति में पड़ी हूँ । हे माता, क्या
आपको मेरी रक्षा नही करनी चाहिए ? हे भूमाता, आप रघुराम भूपालमणि से मेरी
इस दुरवस्था का समाचार बतलाइए । सब प्रकार के लोगो को पुकारते हुए मेरा कठ
सूख रहा है; धैर्य छूट रहा है, प्राण दुःखी हो रहे है । हे किन्नरो, हे पुण्यात्माओ, हे
महात्माओ, हे तपस्वियो, हे खेचरो, हे व्रतियो, हे यतियो, हे वन-पक्षियो, हे सिंहो, हे गधर्वो,
हे नरो, हे सुरो, हे नागेंद्रो, आप (सब) मेरी रक्षा कीजिए ।'
भूसुता विविध प्रकार से व्यर्थ ही शोक करने लगी । पृथ्वी भी काँप उठी, गौतमी
(गोदावरी) ने अपनी गति रोक दी । समस्त प्राणी शोकाकुल हुए । मुनि लोग 'यह अन्याय है,
अन्याय है,' कहते हुए, कपट सन्यासी रावण का स्वभाव जानकर, परिताप करने लगे
और शोकाश्रु बहाने लगे । मृग उनका (आर्त्तनाद) सुनते हुए चरना भूल गये, पक्षी क्रन्दन
करन लगे, पवन की गति मद पड गई; वृक्ष सूखने लगे, सारा आकाश क्षुब्ध हो उठा,
धर्म-देवता यह सोचकर कि अब मेरी रक्षा कौन करेगा, दु खी हुए, वन-देवता शोक-सतप्त हुए,
साधुजन जानकी को देख रोने लगे ।
२१. जटायु और रावण का युद्ध
उस समय अरुण का पुत्र, पक्षिराज तथा महान् साहसी जटायु ने एक पहाड़ पर से