रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअरण्यकांड १५१
लौ सकें, तो और भी अच्छा होगा । हमारा वनवास तो समाप्त होनेवाला है । हम इस स्वर्ण-
मृग को अपने नगर में ले जायँगे और सासो तथा भरत आदि को इसे दिखाकर उन्हें
आनंद दे सकते हैं ।'
सीता के इन वचनो को सुनकर लक्ष्मण रामचंद्र को देखकर बोले—'हे प्रभु, जब
पृथ्वी पर मृगराज का भी ऐसा (सुन्दर) शरीर नही है, तो भला मृग का ऐसा शरीर
कहाँ हो सकता है ? यह माया-मृग है, इसका विश्वास मत कीजिए । राक्षस मायावी
होते हैं और कदाचित् यह उनकी माया ही है । यही नही, क्या आपने मुनियो के वे
वचन नही सुने कि क्रूर मायावी मारीच इस प्रांत में घूमता रहता है । प्राय वही हमें
भ्रम में डालने के लिए इस प्रकार आ गया है । इस पर आसक्त होकर, उतावले हो आप
इसे पकडने का विचार मत कीजिए । वैदेही तो भोली-भाली है । हे प्रभु, आप भी वैसे
थोडे ही हैं ?'
यह सुनकर रामने सीता का मुख-कमल देखा और हँसते हुए लक्ष्मण को देखकर
बोले—'हे लक्ष्मण, ऐसे विचलित क्यो होते हो ? क्या पृथ्वी पर राक्षसो की माया मेरा
सामना कर सकेगी ? मैं या तो इस मृग को पकडकर ले आऊँगा या इम प्रचड राक्षस
का वध करूँगा ? इन दो बातो को अच्छी तरह जानकर ही मैं इसका पीछा करूँगा और
इसे मारकर, इसका चर्म लाकर जनकजा को दूँगा । इतने दिनो के बाद सीता ने यह
छोटी-सी इच्छा प्रकट की है, तो क्या में इसे भी पूरा न करूँ ? तुम सावधान होकर इस
पर्णशाला का तथा सीता की रक्षा करते रहो ।'
१५ राम का माया-मृग का पीछा करना
इस प्रकार उन्हें यह भार सौंपकर, रघुराम ने उनके हाथ में स्थित धनुप को
लिया और उस पर डोरी चढाकर, ऐसे चल पडे, जैसे पूर्वकाल में यज्ञ-मृग का पीछा करने-
वाला गजासुर-वैरी गया था । वे कही धीरे-धीरे किसी झाडी के पीछे छिपते, कही झुकते,
कही दौडते, फिर खडे होकर देखते, किसी आड में छिपते (मृग का) पीछा करते, उसे
पकडने के लिए आतुर होते और धनुप-बाण को पीछे छिपाकर दवे पाँव चलने लगते ।
वे उस मृग को पकडने के लिए, अवसर देखकर, उसके निकट पहुँचते, 'अव
पकडा, लो, यह आया, अव हाथ में आ गया'—ऐसा सोचते हुए उसका पीछा करते
जाते । वह हिरन भी कभी निकट ही दिखाई पडता, उनके पास पहुँच भी जाता, किन्तु
पकडने का यत्न करते ही भाग निकलता । कभी राम को क्रोध में आया जान (वह)
खडा हो जाता, फिर चारो दिशाओ में मनोहर ढंग से चौकडियाँ भरने लगता । लार के
साथ घास के टुकडो को (वह अपने मुंह से) गिराता, एक छलांग में निकट पहुँच जाता,
तो दूसरी छलाँग में दूर निकल जाता, (जहाँ-तहाँ) सूंघ-सूंघकर चौकडी भरता और
विजली की तरह अपनी जीभ को (एक क्षण के लिए) वाहर निकालकर घुमाता, मानो
कोई मशाल घुमा रहा हो । (वह) कभी कुम्हार के चाक के समान चक्कर काटता, कभी
थके हुए की भाँति, घुटनो के बल खडा रहता, किन्तु निकट पहुँचते ही वाज की तरह
आकाश की ओर छलांग मारकर निकल जाता । थके-मांदे जब राम आश्चर्यचकित होकर