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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

१९८ रंगनाथ रामायण
यहाँ चले आये। आपके दुख में तड़पते हुए सातवें दिन महाराज दशरथ ने अपन प्राण
छोड़ दिये। मैं पितृ-कर्मों क्रो पूरा करके आपके दर्शनार्थ यहाँ आया हूँ।'
यह समाचार राम को वज्र के संमान लगा, और वे तुरत मूर्च्छित होकर पृथ्वी पर
गिर पड़े। सीता तथा लक्ष्मण भी मूर्च्छित होकर पृथ्वी पर गिर गये। थोड़ी देर के पश्चात्
राम कुछ संभले और वार-वार विलाप करने लगे। तब उन्हें देखकर भरत ने कहा—
'हे देव, धीर होते हुए भी जड़ के समान इस प्रकार विलाप करना आपको शोभा
नही देता। आप, लक्ष्मण तथा सीता महाराज की परलोक-क्रिया विधिवत् पूरा कीजिए। यही
उचित है।'
तब राम मदाकिनी नदी के तट पर पहुँचकर, स्नान आदि से निवृत्त होकर वडी
निष्ठा से अपने पिता की तिलोदक-क्रिया की, पिंड-दान किया और अत्यधिक शोकाकुल
चित्त से पर्णशाला में लौट आये। उस समय वसिष्ठ, कौसल्या आदि अवरोध-जन (रानवास
की स्त्रियाँ), नगरवासी, नातेदार, सुशील मत्री आदि के साथ पर्णशाला में पहुँच गये।
शोकाग्नि से सतप्त होनेवाले राम, सीता तथा लक्ष्मण के साथ उनके चरणो में गिरे और
रोने लगे। यह देखकर वे सब भी रोने लगे। तब वसिष्ठ ने सात्वना के शब्दो से उन्हें
शांत किया।
तब वनवास के कारण विवर्ण दीखनेवाली सीता को देखकर कौसल्या मन-ही-मन
विधि को कोसती हुई अत्यत दुःखी होने लगी। उसी समय उस पर्वत पर रहनेवाली
किंनर, यक्ष, गरुड, उरग तथा अमर-कामिनियाँ वहाँ आ पहुँचीं और कौसल्या से कहने
लगीं—'राम की पत्नी, दशरथ की बहू, महाराज जनक की पुत्री (यहाँ) विविध सकटो
का अनुभव कर रही है। विधि-विधान के लिए कोई वात असंभव नहीं है।'
उसके पश्चात् राम ने सीता के साथ अनघ वसिष्ठ के चरणो की वंदना की, मुनियो
माताओ, नातेदारो, मित्रो तथा मत्रियो को कुशासनो पर बिठाया और आप भी कुशासन
पर बैठ गये। तब भरत की वेश-भूषा देखकर राम बोले—'हे वत्स, तुम जटाएँ तथा
वल्कल क्यो धारण किये हुए हो? राजा की आज्ञा का पालन करते हुए तुम शीघ्र जाकर
राज्य-भार ग्रहण करो।' इन वचनो को सुनकर भरत ने राम के मुख-कमल को देखते हुए
हाथ जोडकर कहा—'हे देव, हे राघव, कैकेयी ने असहनशीला हो, आपके महत्त्व से
अनभिज्ञ हो, आपको वन जाने का आदेश देकर महान् पाप किया, तो क्या आपको यह
उचित था कि आप तुरत यहाँ चले आये? आपके वियोग से दुःखी हो, महाराज दशरथ
भी स्वर्ग सिधारे। मेरी माता ने ऐसे घोर पाप किये हैं। क्या इसके कारण वे नरक-कूप
में नहीं गिरेंगी? राज्य आपका है। मैं उसे सँभालने में असमर्थ हूँ। आज ही आप
अयोध्या को लौट चलिए और शुद्ध मन से राज्य-भार ग्रहण कीजिए। पति को खोकर
अत्यधिक शोक से पीड़ित होनेवाली माताओ को सात्वना दीजिए। मित्रो, मत्रियो, वधुओ
तथा प्रजा-जन पर कृपा दृष्टि रखते हुए उनको अपनाइए। हे दयामय, मैं आपका दास हूँ,
मुझे अपनाकर मेरी विनती को स्वीकार कीजिए।' इस प्रकार कहते हुए भरत राम के
चरणो पर गिर पडे।

अयोध्याकांड ११९
राम अपने भाई को उठाकर हृदय से लगाते हुए बोले—“हे भरत, यह कैसी बात है
कि तुम बालको की तरह धर्म-मार्ग को छोड़ने की सलाह दे रहे हो ? माता कैकेयी
को अपशब्द क्यो कह रहे हो ? अब तुम स्वंय पिता की मृत्यु के लिए क्यो दुख
कर रहे हो ? मिट्टी, मिट्टी में मिल गई है । ऋणानुबंध (पूर्वजन्म का ऋण) रूप में
पुत्र, मित्र, कलत्र प्राप्त होते तथा बिछुड़ते रहते हैं। मनुष्य के लिए पृथ्वी पर जन्म लेते
ही मृत्यु निश्चित है । यह जानकर जो नर अपने कुलोचित धर्म के मार्ग में प्रवृत्त रहता है,
वह परम भव्य होता है । हमारे पिता ने सत्यनिष्ठा से नीतिनय-सपन्न होकर महान्
यज्ञ-दान आदि कितने ही सत्कार्य किये, राजभोग का प्रचुर अनुभव किया, हम जैसे पुत्रो
का मुंह जी भरकर देखा, और तब वे प्रजा की प्रशसा प्राप्त करते हुए स्वर्ग सिधारे है ।
उनके लिए शोक करना उचित नही है ।, उनके आदेश को ठुकराना ठीक नही है ।
पितृ-वचन का पालन करना पुत्र का प्रिय धर्म होना चाहिए । जो पुत्र ऐसा करता है,
वही विख्यात होता है । पिताजी ने मुझे चौदह वर्ष तक वन में रहने तथा तुम्हें राजसुख
का भोग करने का आदेश दिया है । अत, हम वैसे ही रहें । इसके विरुद्ध तुम और कुछ
भी न कहो ।”
तबतक सूर्यास्त हो चला था । रात्रि अत्यंत प्रीति से कटी । दूसरे दिन प्रात काल
ही सध्या आदि से निवृत्त होकर रघुराम कुशासन पर विराजमान हुए । वसिष्ठ आदि मुनि
तथा अन्य मंत्री चारो ओर बैठे । सभा में भरत उठे और हाथ जोडकर बोले--“हे देव,
आपकी आज्ञा को शिरोधारण कर पिता के वचन के अनुसार सारा राज्य-भार मैंने ग्रहण
कर लिया है । मैं अपना वह राज्य आपको दे रहा हूँ । अब आप और कुछ न कहें ।
समस्त पृथ्वी का भार अपने सिर पर धारण करने की क्षमता आदिशेष को हो सकता है,
किन्तु जल-सर्प का बच्चा उसे कैसे वहन कर सकता है ? मै वैसा ही एक बालक हूँ ।
इतनी विशाल पृथ्वी का भार कहाँ और मै कहाँ ? क्या सत्पुरुषो की रक्षा का भार मै
सँभाल सकता हूँ ? बालारुण से सुशोभित होनेवाले उदयाचल पर जुगनू का प्रकाश जैसा
दिखाई देगा, आप श्रीनिधि के सिंहासन पर मेरा बैठना भी वैसा ही दिखाई देगा ।
इसलिए, आप मुनि-वेश को त्यागकर अयोध्या लौट चलिए और अपने शील से राज्य करते
हुए सारी प्रजा की इच्छा पूर्ण कीजिए । आप इसके विरुद्ध कुछ मत कहिए । यदि आप
इसे स्वीकार नही करेंगे, तो मै आपके सम्मुख ही प्राण-त्याग कर दूंगा या सौमित्र की तरह
आपकी सेवा करते हुए यही रह जाऊँगा ।” इस प्रकार कहते हुए भरत दर्भासन पर (प्राण
त्याग करने को) लोट गये ।
राघव ने अपने अनुज को उठाकर कहा--“भरत, यह कैसी बात है ? ऐसा कहना
क्या तुम्हारे लिए उचित है ? अपने पिताजी की आज्ञा का विचार तुम बिलकुल करना
नही चाहते हो ? महाराज दशरथ के साथ तुम्हारी माता का विवाह करते समय तुम्हारे
नाना ने महाराज से यह वचन माँगा था कि आप मेरी पुत्री द्वारा उत्पन्न संतान को ही
राजा बनायेंगे । राजा के वचन देने पर ही विवाह संपन्न हुआ था । उस वचन को दृष्टि
में रखकर ही कैकेयी ने देवासुर-युद्ध में राजा के द्वारा दिये गये वरो को माँगा । तुम्हें

१२० रंगनाथ रामायण
पृथ्वी और मुझे वनवास देनेवाले राजा ने अपनी सत्यनिष्ठा की रक्षा करने के लिए ही
ऐसी व्यवस्था दी है । इससे उनकी कीर्त्ति शाश्वत हो गई । इसलिए हम भी महाराज की
आज्ञा का पालन करते हुए महान् यश को प्राप्त करें । सभी पिता इसीलिए पुत्र प्राप्त
करते हैं कि वह गया की यात्रा करे, कन्यादान करे और वृषभ छोड़े । पुन्नाम नरक से
(पितरो की) रक्षा करनेवाला होने से ही वह पुत्र कहलाता है । यदि मैं ही अपने पिता के
वचन का पालन नही करूँगा, तो इस पृथ्वी पर पिता के आदेश का पालन कौन करेगा ?
'यथा राजा तथा प्रजा' वाली उक्ति के अनुसार प्रजा भी हमारे समान ही आचरण
करेगी । मैंने जो व्रत लिया है, उसको पूरा करके लौटूंगा । तुम हठ का त्याग करो ।
मेरी बातें मानो और मेरे कथन के अनुसार राजा बनो । अब तुम नगर को लौट जाओ।”
तब सभा म उपस्थित मुनि, सुर तथा ब्राह्मणो ने (मन-ही-मन) निश्चय कर
लिया कि अब युद्ध में रावण की मृत्यु निश्चित है । ऐसा सोचकर उन्होने भरत से कहा—
'हे उज्ज्वल धर्म-निरत भरत, तुम राम के आदेश का पालन करो ।'
३०. श्रीराम को जाबालि का उपदेश
तब मुनि जाबालि ने राम को देखकर कहा—'यह तुम्हारा कैसा व्यर्थ विचार है ?
तुमने मुनि-वेश धारण किये, नृप-वेश छोड़ दिया, राजभोग त्याग दिया और नियमो का
पालन करते हुए इस ढंग से जीवन व्यतीत करते हो ? कहाँ के माँ-बाप और कहाँ के
पुत्र ? कहाँ का सत्य और कहाँ का पुत्र-धर्म ? यह सब मिथ्या हैं । माता-पिता अपने
सुख के लिए आपस में मिलते हैं । शुक्र तथा रक्त के संयोग से मनुष्य-का जन्म होता है।
पिता केवल बीज का दान देता है । बहुत क्यो, बुझे हुए दीप में तेल देना जितना
निरर्थक है, वेद-विधि से परलोक-क्रियाएँ करना भी उतना ही निरर्थक है । इसलिए मेरी
बात मानकर तुम अयोध्या लौट जाओ और राज्य ग्रहण करो ।'
जाबालि के इन वचनो को सुनकर रघुवीर ने क्रोध में आकर कहा—'हे मुनींद्र,
ऐसे नास्तिकतापूर्ण विचार आप किसी दूसरे को समझावें । हमारे लिए वही आचरणीय हैं
जिसे हमारे पूर्वजो ने किया है। सब धर्म सत्य के आधार पर निर्भर हैं । सत्य से
बढकर दूसरा धर्म और क्या हो सकता है ? ऐसे सत्य का पालन करने के लिए मेरे
पिताजी ने मुझे वन में भेजा है । यदि उनके आदेश का तिरस्कार करूँ तो मुझसे बढ़कर
नीच और कौन हो सकता है ? ज्ञानियो का कहना है कि सत्य, धर्म, शम, दम, भूत-दया,
नीति, विक्रम, प्रिय वचन तथा देव-पितृ-पूजन स्वर्ग के साधन है । इन सब को मिथ्या
घोषित करनेवाले आप अग्रजन्मा कैसे कहला सकते हैं ? आपको क्यो दोष दूँ ? आप
जैसे नास्तिक का आदर करनेवाले मेरे पिता ही दोषी थे ।
राम के वचनो को सुनकर जाबालि ने बड़े स्नेह से कहा—'हे राजन्, मैने आपको
नास्तिक मानकर ऐसा विचार इसलिए प्रकट किया है, कि आप किसी प्रकार भी अयोध्या
लौट चलिए । इसलिए आप धैर्य धारण करें ।'
३१. पादुका-दान
तब संयमी वसिष्ठ ने इक्ष्वाकु से सूर्यवंश तक के सभी राजाओ - की चर्चा

अरण्यकाण्ड एवं किष्किन्धाकाण्ड

अयोध्याकांड १२१
करते हुए कहा—'हे अनघ, तुम्हारे वंश में ऐसा कभी नही हुआ कि अग्रज के रहते हुए अनुज
राजा बने । पूर्वजो की परंपरा के अनुसार तुम्हारा राज्य ग्रहण करना ही उचित है ।
किन्तु पिता के आदेश का उल्लघन न करने का तुम्हारा दृढ सकल्प है, तो जैसे भरत प्रेम
से तुम्हारी सेवा करता रहा है, वैसे वह तुम्हारी पादुकाओ की पूजा करते हुए शाति से रह
सकेगा । अत, तुम अपनी पादुकाएँ उसे प्रदान करो ।'
तब माता, मित्र, आश्रित, मत्री, प्रजा आदि सबने कहा—'हे राम, ऐसा
करना ही उचित है ।' तुरत भरत ने स्वर्ण-विलसित पादुकाएँ राम के सामने रख दी ।
तब राम ने उत्फुल्ल अरुण कमल के गर्भ के वैभव को भी परास्त करनेवाले मुनि-वधू के शाप
का मोचन करनेवाले, सृति-शिरोभाग पर विलसित होनेवाले, सतत सनकादि मुनिजनो के
विवाद के कारणभूत, अपने चरण उन पादुकाओ पर रखकर उन्हें भरत को दे दिया ।
उन दोनो को सिर पर धारण किये हुए भरत राघव से बोले—'हे देव, नृप-वेश त्याग
करके, मुनि-वेश धारण किये हुए, राज्य का भार इन पादुकाओ पर रखकर, में चौदह वर्ष
तक राज्य की रक्षा करूँगा । आपके चरणो की सौगध खाकर कहता हूँ कि यदि अवधि
के समाप्त होते ही आप अयोध्या नही लौटेंगे, तो मै अग्नि में प्रवेश करूँगा ।' यो कहकर
उन्होने अत्यत भक्ति से अपने अग्रज को प्रणाम किया । राम ने उन्हें हृदय से लगाकर
आशीर्वाद दिया । उसके पश्चात् उन्होने अपनी माताओ को सात्वना दी और पुण्यात्मा
मुनि-पुगवो, मित्रो, मत्रियो, वधु-बाधवो तथा सभी प्रजा को बडे प्रेम से विदा किया ।
अत्यधिक उमडते हुए शोकाकुल हृदय से भरत ने पादुकाओ की परिक्रमा की, उन्हें भद्रगज पर
प्रतिष्ठित किया और आप तथा शत्रुघ्न छत्र-चामर लिये हुए उसके पार्श्व में खडे हो गये ।
सब लोग वहाँ से रवाना हुए । भद्रगज के चारो ओर सेना चलने लगी ।
भरत इस प्रकार चित्रकूट से चलकर भरद्वाज मुनि के आश्रम में पहुँचे । वहाँ
उन्होने भरद्वाज मुनि को प्रणाम करके सारा वृत्तात उन्हें कह सुनाया । उनकी आज्ञा लेकर
आगे चले और गगा नदी पार करके शृगवेरपुर पहुँचे । बडे आदर से वहाँ गुह को
विदा करके, वे अयोध्या नगर पहुँच गये । रनवास में माताओ को छोडकर उन्होने अत पुर
की रक्षा के लिए सेना रख दी । मणि-रहित रत्न-मजूषा की तरह तथा सूर्य-रहित दिन की
तरह रामचन्द्र-रहित शून्य अयोध्या को देखकर उन्हें उस नगर में रहने की किंचित् भी
इच्छा नही रह गई थी । इसलिए वे नदीग्राम में जाकर निवास करने लगे । रघुराम की
पादुकाओ पर समस्त राज्य-भार रखे हुए, राम के समान ही उनकी सतत सेवा करते हुए, वल्कल
तथा जटाएँ धारण किये हुए, राघव के पुनरागमन की कामना करते हुए और उनके सद्गुणो
की प्रशसा करते हुए सरस सज्जन मत्रियो के परामर्श से भरत राज-काज सँभालने लगे ।
यह् अयोध्याकाड समस्त लोक में विख्यात होते हुए विद्वज्जनो की प्रशसा का पात्र
बन जाय । आध्र-भाषा के अधीश्वर, विमलचेता, आचारवान्, अनुपम धीमान्, भूलोकनिधि
गोनबुद्ध राजा ने, कमनीय गुण तथा धैर्य में मेरुपर्वत, शत्रु के लिए भैरव-रूप, महात्मा,
अपने पिता विट्ठल-नरेश के नाम पर आचद्रार्क ससार में पूज्य रहने योग्य रीति से,
असमान भाव तथा ललित शब्दार्थों से युक्त रामायण के अयोध्या-काड की रचना की ।
१६

१२२
रंगनाथ रामायण

ऋषि-आदिकाव्य और रसिकजनो के लिए आनंददायक होकर पृथ्वी पर विलसित इस
पुण्य-चरित्र को जो पढ़ते हैं, या सुनते हैं, उन्हें साम आदि बहुवेदो का धाम, रामनाम-
रूपी चिंतामणि की महिमा से समस्त भोग, परहित बुद्धि, उदार विचार, परिपूर्ण शक्ति,
साम्राज्य, विमल यश, नित्य सुख, धर्मनिष्ठा, दान में प्रेम, चिरायु, ऐश्वर्य तथा स्वास्थ्य,
अक्षय कल्याण, पापो का क्षय, श्रेष्ठ पुत्रो की प्राप्ति, शत्रु-नाश और धन-धान्य-समृद्धि
आदि प्राप्त होगे । उन्हें बिना किसी विघ्न-बाधा के लावण्यवती स्त्रियो का प्रेम तथा पुत्रो
के साथ जीवन प्राप्त होगा । उनके सब संकट दूर होगे । नातेदारो से उनका प्रेमपूर्ण
मिलन होता रहेगा और उनकी सब कामनाएँ पूर्ण होगी । उनके गृहो में देवता तथा
पितृ-देवताओ की तृप्ति होती रहेगी । यह (रामायण) मोक्षसाधक है, पापनाशक है,
दिव्य है, भव्य है, श्रीकर है । इसके रचयिता की श्रेष्ठ तथा शुभ उन्नति होगी और वे
इंद्र-भोगादि को प्राप्त करेंगे । जबतक कुल-पर्वत, नक्षत्र, रवि, चन्द्र तथा दिशाएँ रहेंगी,
जबतक वेद रहेंगे, पृथ्वी तथा समस्त लोक रहेंगे, तबतक यह कथा अक्षय आनंद-समूह
को देने में समर्थ होगी ।

: अयोध्याकांड समाप्त :

श्रीरंगनाथ रामायण
(अरण्यकांड)

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१. चित्रकूट से प्रस्थान
चित्र-विचित्र वस्तुओ के आगार 'चित्रकूट' में निवास करते हुए और मुनियो की
प्रशसा प्राप्त करते हुए राम ने भरत के आगमन की बात सोचकर निश्चय किया कि अब
मुझे यहाँ निवास नही करना चाहिए । वे सोचने लगे कि अगर मै यहाँ रहूँ, तो अयोध्या-
वासी यहाँ पर अक्सर आते रहेंगे । अब भी गज, रथ तथा अश्वो के आने से वन का
बहुत-सा भाग नष्ट हो गया है । इसके अतिरिक्त परम सयमी मुनि मुझसे अनुरोध कर
रहे है कि मै खर-दूषण आदि राक्षस-समूह के अत्याचार दूर करूँ । (इसलिए मेरा यहाँ
से चला जाना आवश्यक है ।)
इस प्रकार सोचकर दूसरे दिन उन्होने चित्रकूट के मुनियो की आज्ञा प्राप्त की और
वहाँ से चलकर अत्रि मुनि के आश्रम में पहुँच गये । मुनि ने अपने शिष्यो के साथ बडे
स्नेह से राम की अगवानी की और उन्हें आश्रम में ले जाकर कई प्रकार से उनका आदर-
सत्कार किया । मुनि-पत्नी अनसूया ने बडे प्रेम से सीता का आतिथ्य किया । उन्होने
सीता को पातिव्रत्य-धर्म का उपदेश किया, अपने सगे-सबंधियो को छोडकर पति के साथ
वन में रहने के उनके निश्चय की प्रशसा की । इसके पश्चात् अनसूया ने सीता को विभिन्न
प्रकार के अगराग, कभी न मुरझानेवाले फूल और कभी मैले न होनेवाले वस्त्र दिये ।

१२६ रंगनाथ रामायण
फिर उन्होंने सीता से कहा—'हे रमणी, तुम मुझे यह बताओ कि स्वयंवर में राघव ने
तुम्हें कैसे प्राप्त किया।' तब (सीता) अपने पति की ओर देखकर व्रीड़ा से अभिभूत हुई
और मंद-मंद मुस्कुराती हुई बोली—'हे माता, सुनिए। मिथिला के अधिपति जनक के,
यज्ञ-शाला के लिए भूमि जोतते समय मेरा जन्म हुआ। इस कारण मेरा नाम सीता पड़ा।
संतानहीन होने के कारण राजा ने बड़े स्नेह से मेरा पालन-पोषण किया। युवावस्था
को प्राप्त होनेवाली मुझे देखकर उन्होंने सोच-विचारकर घोषित किया कि हमारे
घर में स्थित शिव-धनुष का जो संधान करेगा, उसी के साथ मैं इस कन्या-रत्न का विवाह
करूँगा। इस समाचार के पाते ही अनेक राजा वहाँ आये, किन्तु वे शिव-धनुष को उठाकर
उसका संधान न कर सकने के कारण वापस चले गये। कुछ दिनों के पश्चात् विश्वामित्र
की सेवा करने के उपरान्त राघव वहाँ आय। उन्होंने शिव-धनु को इस प्रकार तोड़ दिया,
जैसे हाथी ईख को तोड़ डालता है। तब उन्होंने मेरा पाणि-ग्रहण किया।'
इस प्रकार सीता के अपने विवाह का वृत्तांत सुनाने पर अनसूया हर्षित हुईं।
तबतक रवि पश्चिम समुद्र में डूबने लगा। राम ने संध्या आदि नित्य-कर्मों को पूरा किया
और अत्रि का सत्कार ग्रहण किया तथा उनकी सत्संगति में रात वहीं बिताई।
२. राम का दण्डक-वन की यात्रा करना
दूसरे दिन प्रातःकाल ही संध्या आदि कर्मों से निवृत्त हो अत्रि की आज्ञा लेकर
राम ने उस दण्डक-वन में प्रवेश किया, जो सरल ताल, तमाल, साल, कपिला, कुरवक,
अगर, कुटज आदि वृक्षों से भरा हुआ था, जो सूर्य के समान तेजस्वी मुनियों का निवास-
स्थान था और जो गेंडा, सिंह, हाथी, नीलगाय जैसे मृगों तथा 'गंड भेरुण्ड' (दो शिरो-
वाला एक पक्षी) जैसे पक्षियों से पूर्ण था। ऐसे वन में प्रवेश करके वेद-घोष से प्रति-
ध्वनित होनेवाली तथा हवनकुंडों से पवित्र पर्णशालाओं में पवन, जल तथा सूखे पत्तों
का आहार करते हुए तपश्चर्या में लीन मुनियों के निवासों तथा तपस्वियों के आश्रमों
के दर्शन करते हुए, राम अपने अनुज के साथ मुनियों का आतिथ्य ग्रहण करते हुए यात्रा
करते रहे।
३. विराध का वध
इस प्रकार उस दण्डक-वन में जाने समय, पर्वत के समान आकार, भयंकर आँखें,
बड़ा मुंह और नासिका तथा दीर्घकाय विराध नामक भयंकर राक्षस, अपने अट्टहास से सारे
आकाश को कँपाते हुए और वन को चीरते हुए आया और अपनी बलिष्ठ तथा पैनी चोंच
तथा बाहुओं में कुंचित केशोंवाली सीता को इस प्रकार आकाश की ओर उड़ा ले गया, जैसे
गरुड पक्षी सँपोले को उड़ा ले जाता है। फिर, जानकी की दशा देखकर दुःखी होनेवाले
राम तथा लक्ष्मण को संबोधित करके उसने कहा—'क्यों रे, तुम्हारा कितना साहस है कि
तुम वीरों की तरह निर्भय होकर धनुष-बाण धारण किये इस वन में विचर रहे हो, जिसमें
मैं रहता हूँ। आखिर तुम्हारा भुजबल कितना है? मेरी माता शतह्रद है और मेरे
पिता जय हैं। किसी भी आयुध से न मरने का वर मैंने पहले ही ब्रह्मा से प्राप्त किया है।'

आरण्यकांड १२७
में ब्राह्मणों को खानेवाला हूँ । मेरा नाम विराध है । में क्रोध में आता, हूँ, तो इन्द्र आदि
देवताओ को भी निगल जाता हूँ; फिर मनुष्यो की क्या बात ? अब तुम्हारा कुशल इसी में है
कि इस रमणी को मुझे सौंपकर, तुम यह वन छोड़कर चले जाओ । अन्यथा मेरे हाथ के
शूल के वार की प्रतीक्षा करो ।'
सौमित्र ने सीता की भीति, तथा राक्षस का गर्व देखकर कहा—'हे राक्षस, ये
पृथ्वी की पुत्री, पुण्यवती, साध्वी, राम की पत्नी हैं, उन्हें ले जाना तुम्हारे लिए उचित नही है ।
अब तुम ले भी कहाँ जा सकते हो ? मैं अभी तुम्हें पकड़कर तुम्हारा वध कर डालूँगा ।'
इस प्रकार कहते हुए उन्होंने क्रोध से धनुष पर बाण-संधान करके उसके
वक्ष स्थल पर चलाया । तब विचित्र ढंग से अट्टहास करते हुए बड़े क्रोध से उसने शूल को
घुमाकर उनपर फेंका । घने बादलो से छूटकर नीचे गिरनेवाली बिजली के समान
आनेवाले उस शूल को राम ने अपने दो बाणो से काट दिया । इसपर और भी क्रुद्ध होकर
उसने सीता को पृथ्वी पर गिरा दिया । उस राक्षस के हाथो से मुक्त होकर बादलो से
निकलकर आकाश-मार्ग से पृथ्वी की ओर बिजली की तरह आनेवाली छटपटाती हुई सीता
को राम ने गरुड-अस्त्र की सहायता से पृथ्वी पर उतार लिया ।
इसके पश्चात् राम ने उस राक्षस पर कई बाण चलाये, किन्तु वह उनकी जरा
भी परवाह न करके अट्टहास करने लगा । वह बड़े वेग से आया और अपने हाथो से
राम और लक्ष्मण को उठाकर अपनी पीठ पर लादकर वहाँ से शीघ्रता से जाने लगा ।
जानकी यह देखकर विलाप करने लगी । राम और लक्ष्मण ने अत्यत क्रोध से बिजली के
समान चमकनेवाले अपने खड्गों को म्यान से निकालकर उसके दोनो हाथो को काट डाला ।
तब धराशायी होनेवाले पहाड़ की तरह वह राक्षस पृथ्वी पर लोटने लगा । फिर भी
उसे जीवित देखकर राम-लक्ष्मण ने अपने पदाघात तथा मुष्टियो के प्रहार से उस राक्षस
को चूर-चूर कर दिया । (यह देखकर) सभी मुनि साधुवाद देते हुए उनकी प्रशंसा
करने लगे ।
इसके पश्चात् राक्षस गंधर्व का रूप धारण किये हुए विमान में बैठकर राम से
बोला—'मैं गंधर्व हूँ, मेरा नाम तुम्बुरु है । रंभा के साथ रति-क्रीड़ा में तल्लीन रहने हुए,
कुबेर की सभा में उपस्थित न हो सकने के कारण कुबेर ने मुझे राक्षस का जन्म लेने का
शाप दिया था । आपके बाहुबल के प्रताप से मेरा शाप-मोचन हुआ । अब मैं जा रहा हूँ ।
आप मेरे शरीर को यही गाडकर शरभंग मुनि के आश्रम में जाइए ।'
इस प्रकार कहकर प्रणाम करके वह वहाँ से चला गया । उसके शरीर को वही
गाड़कर श्रीराम ने सीता को बड़े स्नेह से गले लगा लिया और उनका भय दूर किया ।
उसके पश्चात् उन्होने अपने अनुज से कहा—'क्या इस पृथ्वी में ऐसे दुर्गम वन कही हो
सकते हैं ? हमें शीघ्र ही सीता को लिये हुए इस वन को पार कर जाना चाहिए ।
४. श्रीराम का शरभंग के आश्रम में पहुँचना
इस प्रकार सोचकर, शरभंग के दर्शन करने की अभिलाषा से राम उनके आश्रम
की ओर चले । उस समय उन्होने उस आश्रम के ऊपर से उदित सूर्य की भाँति प्रकाशमान

१२८ रंगनाथ रामायण
अश्वो से युक्त, श्वेत छत्र से आवेष्टित, देवताओ से भरे एक विमान को चारो ओर उज्ज्वल
मणियो की आभा विकीर्ण करते जाते हुए देखा । उस विमान में विराजमान कल्याणगुण-
सपन्न व्यक्ति को देखने की इच्छा से राम तेजी से आगे बढ़े, किन्तु इतने में वह विमान
आँखो से ओझल हो गया ।
राम ने मुनि के आश्रम में पहुँचकर, मुनि को प्रणाम किया और मुनि का सत्कार
ग्रहण करने के पश्चात् बड़े प्रेम से मुनि को देखकर पूछा—'हे मुनीश्वर आपके दर्शनार्थ
हमारे आते समय एक विमान अपना प्रखर तेज विकीर्ण करते हुए यहाँ से निकल गया था ।
वह यहाँ क्यो आया था और कहाँ चला गया है ? उस विमान में कौन विराजमान थे ?
आप कृपया बतावें ।'
तब मुनि बोले—'हे देवेन्द्र-शत्रु । वह देवेन्द्र था । हे देव, ब्रह्मलोक जाने का
आमंत्रण देने के लिए वह देवताओ के साथ देवलोक से यहाँ आया था । हे रामचंद्र,
मुझे मालूम था कि आप यहाँ पधारेंगे । आपका पूजा-सत्कार करने के पश्चात् जाने का
निश्चय करके मैने उससे कह दिया कि मै अभी नही आऊँगा । तुम चाहो तो जा सकते हो ।
इन्द्र भी बहुत दुःखी होकर, वनवास (के दुःख) से खिन्न आपको न देख सकने के
कारण, यहाँ से चला गया है । इतने में आप भी यहाँ आ पहुँचे । हे राजन्, आपके
प्रसाद से मैने बड़ी निष्ठा से, अपना तप निर्विघ्न समाप्त किया है । यज्ञ भी सफल हुआ ।
मै आपके दर्शन कर सका । आप अब सयमी सुतीक्ष्ण के दर्शन करके उनके यहाँ रहिए ।
मै अब ब्रह्मलोक में जाऊँगा ।' इस प्रकार कहने के पश्चात् उस मुनीश्वर ने राम के
सम्मुख ही अपने शरीर को मत्र-रत करके, अग्नि में दहन कर दिया और इन्द्र आदि
देवताओ की सेवाएँ प्राप्त करते हुए ब्रह्मलोक को चले गये ।
तब उस आश्रम के निवासी संयमी, वायुसेवी, वैखानस, मौनव्रती, पर्णशाला-विहीन,
भूमिशायी, मननशील, उदात्त मुनि, एकांतवासी, अनशनव्रती और पंचाग्नियो के मध्य
तपस्या करनेवाले, सभी तपस्वी झुंड-के-झुंड दयालु रामचंद्र के पास आये और बोले—
'हे राम, आप पिता की आज्ञा का पालन करने में अत्यंत तत्पर है, सत्यव्रती है और
निर्मल यश के आगार है । आप जैसे राजा के रहते हुए क्या हमें राक्षसो के उपद्रवो से
पीड़ित होना चाहिए ? व्रत की रक्षा करनेवाले राजा को भी उस व्रती के पुण्य का एक
चौथाई भाग मिलता है । अब आप सभी दैत्यो का सहार करके हमारे तपोव्रत को सफल
बनाइए । हम आपकी शरण में आये है ।' शरणागत के रक्षक होने के कारण राम ने
उन आश्रमवासी मुनियो को अभयदान दिया और कहा—'आपकी कृपा से बलवान्
राक्षसो के उपद्रवो को मै दूर करूँगा । आप दुःखी मत होइए ।'
५. श्रीराम का सुतीक्ष्ण मुनि के आश्रम में पहुँचना
इसके पश्चात् वे भयंकर वन-प्रात में से होते हुए महान् मतिमान् सुतीक्ष्ण मुनि के
आश्रम में पहुँचे । उस मुनि की परिक्रमा की और अपना नाम कहकर उन्हें प्रणाम किया ।
सुतीक्ष्ण मुनि ने राम को आशीर्वाद देकर उनका उचित आदर-सत्कार किया और उसके
पश्चात् बोले—"हे अनघ, जबसे आपके मुनि-वेश धारणकर चित्रकूट में पहुँचने का समाचार

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अरण्यकांड १२६

हमने सुना, तबसे हम आपके आगमन की उत्कट इच्छा लिये हुए थे । आखिर आप
यहाँ आ ही गये हैं । आपके दर्शन कर सके, इससे हम अपने को धन्य मानते हैं ।
दुरात्मा, अत्यधिक बाहुबली राक्षस गर्वोन्मत्त होकर हमारे आश्रम में आये, और हवन-
वेदियो का नाश किया, यूप-काष्ठो को उखाडकर फेंक दिया, पेडो को उखाड डाला, जप-
मालाओ को तोड दिया, हमारे वस्त्र फाड़ डाले, फलो को चुन लिया, फूलो को गिरा दिया,
सरोवरों का पानी गदा कर दिया, कई प्रकार के दुख दिये और कई मुनियो को मार
भी डाला । हमारी रक्षा करनेवाला कोई नही है । हे देव ! आप हमारी रक्षा कीजिए ।
हमें दुख देनेवाले इन राक्षसो को हम अपनी क्रोधपूर्ण दृष्टि से देखकर, चाहें तो भस्म कर
सकते हैं । किन्तु पृथ्वी पर आपके जैसे राजा के रहते हुए हम क्रोध नही करते है ।
अत, आप इन दुष्ट राक्षसो का सहार करके हमारे तप की रक्षा कीजिए।" तब राम ने
उन्हें सात्वना दी कि मैं युद्ध में इन राक्षसो का वध करूँगा, आप खिन्न मत होइए ।
इसके पश्चात् उन्होंने शरभग के आश्रम के निवासी मुनियो को अपने अभयदान का वृत्तान्त
सुनाया, राक्षसो का वध करने की प्रतिज्ञा की और उनकी सगति में वही रात बिताई ।
दूसरे दिन बहुत-से मुनि वहाँ आये और राम से अपने-अपने आश्रमो में आने की
प्रार्थना की । तब राम सुतीक्ष्ण मुनि से आज्ञा लेकर अन्य मुनियो के पुण्याश्रमो को देखने
की अभिलाषा से वहाँ से रवाना हुए । मार्ग में जानकी ने राम को देखकर कहा—
"हे अनघ, (हम) राज्य छोडकर वन में आये है, जटाएँ तथा वल्कल धारण किये मुनियो की
तरह जीवन विता रहे है, ऐसी दशा में आप राक्षसो पर क्यो क्रोध करते है ? विचार
करने पर यह सगत नही मालूम होता है । हे काकुत्स्थ-तिलक, जबसे आपने मुनियो को
राक्षसो का वध करने का आश्वासन दिया है, तबसे मेरा मन बहुत ही खिन्न हो रहा है ।
यह कार्य ठीक नही है, इसलिए आप यह कर्म छोड दीजिए । हे प्राणेश्वर, क्या
प्राणियो को मारने से पाप नही लगेगा ? किसी समय एक मुनि अत्यन्त तपोनिष्ठा से
जीवन-यापन करते थे । इन्द्र ने उन्हें एक खड्ग देकर कहा—'इसे आप रखिए, मै फिर
आकर इसे ले जाऊँगा ।' तदनन्तर उस मुनि ने उस खड्ग से लता, वृक्षो को काटते हुए,
हिंसा में प्रवृत्त हो, जडमति बनकर तपश्चर्या त्याग दी और अत को दुर्गति को प्राप्त
हुआ । इसलिए हे देव, कहाँ तप और कहाँ राजधर्म तथा अस्त्र-शस्त्र ? आप ऐसा कार्य
न कीजिए ।"
तब रामचन्द्र ने हँसकर सीता से कहा—'हे साध्वी, तुम्हारा बताया हुआ मार्ग
ब्राह्मणो का है, क्षत्रियो का नही । मेरा हृदय जानते हुए भी मुझपर अत्यधिक अनुराग
रखने के कारण तुम ऐसा कह रही हो । हे तरुणी, उत्तम राजधर्म का पालन करनेवाले
इसीलिए तो धनुष-बाण धारण करके विचरण करते हैं कि शरणागतो की रक्षा कर सकें ।
तुम इस परम धर्म का विचार क्यो नही करती हो ? मैं उन महामुनियों को दिये गये
वचन का अवश्य ही पालन करूँगा । यही मेरा दृढ सकल्प है । मै अपने प्राण भले ही
छोड दूँ, तुम्हें भी त्याग दूँ*, या लक्ष्मण को भी छोड़ दूँ, किंतु अपना प्रण नही टाल
सकता ।' इन बातो को सुनकर जानकी चुप रह गई और लक्ष्मण विस्मित हो गये ।
१७

१३० रंगनाथ रामायण
६. मंदकर्णी का वृत्तांत
इसके पश्चात् रामचंद्र प्रत्येक आश्रम में, कही तीन महीने, कही चार महीने, आराम
से रहते हुए, पुण्याश्रमों के दर्शन करते हुए आगे बढ़े । मार्ग में उन्होंने एक स्थान पर
एक तड़ाग देखा, जिसके जल के मध्य से संगीत का निनाद अत्यधिक सुनाई पड़ रहा था ।
अत्यंत विस्मय-चकित होकर वे उस तड़ाग के किनारे पहुँचे और उसके निकट निवास करने-
वाले धर्ममृत नामक मुनि को देखकर बोले—'हे मुनिनाथ, यह कैसी विचित्र बात है
कि इस तड़ाग के जल में से ऐसा शब्द सुनाई दे रहा है ? 'तब धर्ममृत ने अत्यंत
उत्साह से रामचंद्र से कहा—'किसी समय मदकर्णी नामक मुनि इस तडाग के जल के बीच
खड़े होकर बड़ी निष्ठा से अनेक वर्ष तक अत्युग्र तपस्या करते रहे । उस तप को देखकर
इंद्रादि देवता भयभीत हो गये । उस मुनि के महत्त्व को क्षीण करने के लिए उन्होंने
पाँच अप्सराओं को भेजा । वे अप्सराएँ मुनि की परिणीता वधुएँ बन गईं और वे जल के
मध्य मुनि के द्वारा निर्मित स्वर्ण-सौधों में, मुनि के सम्मुख बड़े मोद-मग्न हो नृत्य कर
रही हैं । इसी कारण से यह सरोवर पंचाप्सर के नाम से विख्यात है । जो मधुर ध्वनि
अब सुनाई पड़ रही है, वह उनके वाद्यों की ध्वनि है ।
इन वचनों को सुनकर राम ने अत्यंत भक्ति से पुण्यात्मा मंदकर्णी को प्रणाम किया
और उस घोर वन के मार्ग में आगे बढ़े । मार्ग में उन्होंने कई मुनियों का दर्शन करके
उनको प्रणाम किया । बहुत-से पुण्य तपोवनों को देखकर मुग्ध हुए, कमल और कमलिनियों
से भरे सरोवरों में स्नान किया; मद-मंद गति से चलनेवाले पवन की प्रशंसा और
झिल्लियों की झकार की निंदा की । शुक, मयूर आदि पक्षियों को पकड़ते हुए, वे हाथी,
वराह आदि मृगों का शिकार करते जाते थे । कभी मेघास्त्र का प्रयोग करके गर्मी को
दूर करते और कभी अपने दर्शन करनेवाले के पाप मिटाते । कभी यौवन को प्राप्त लताओं
से फूल चुनते, कभी झकार करनेवाले भ्रमरों को दूर भगाकर गगनचुंबी पर्वत-शिखरों
पर चढ़ जाते । जब जानकी थक जाती थीं, तब उनका परिहास करते हुए बड़ी मृदुल गति
से गुफाओं को पार करते हुए, चढ़ाव पर चढ़ने की क्रिया (जानकी को) सिखाते । वहाँ
की भीलनियों के साहस की प्रशंसा करते हुए, अभेद्य घाटियों में प्रवेश करते हुए ऐसी
घाटियों में भ्रमण करने लगे, जहाँ सूर्य की किरणें भी नहीं पहुँच पाती थीं । इस तरह
राम, लक्ष्मण तथा जानकी के साथ पुण्य तीर्थों, पुण्य नदियों तथा पुण्य तपोवनों में
भ्रमण करते हुए दस वर्ष के उपरान्त फिर से सुतीक्ष्ण मुनि के आश्रम में लौट आये
और उस मुनि के यहाँ बड़े आराम से कुछ वर्ष तक रहे ।
७. अगस्त्य से भेंट
एक दिन रामचंद्र ने अगस्त्य के दर्शन की इच्छा से प्रेरित होकर (सुतीक्ष्ण) मुनि
को देखकर पवित्र भक्ति के साथ कहा—'हे महात्मा, मुनिश्रेष्ठ, अगस्त्य कहाँ रहते हैं ?
उनका आश्रम कहाँ है ? कृपया बतलाइए ।' सुतीक्ष्ण ने उन्हें उस आश्रम के मार्ग की
दिशा तथा चिह्न बताये और आशीर्वाद देकर उन्हें विदा किया । अपने प्रिय अनुज तथा
पत्नी के साथ दक्षिण की ओर चार योजन का रास्ता तय करके, बहुत-से जंगलों, पहाड़ों

अरण्यकांड १३१

तथा नदियो को पार करते हुए वे अगस्त्य के भ्राता के आश्रम में पहुँचे । वहाँ वड़ी श्रद्धा
मे उस यतीश्वर के चरणो में सिर झुकाकर वे उस रात को वही ठहरे । मुनि के सत्संग
में रहते हुए राम ने उनसे प्रश्न किया—'हे यतीश्वर, पहले इस स्थान पर अगस्त्य ने
वातापि का सहार कैसे किया ?' तब वह मुनींद्र रामचंद्र को देखकर उस पुण्य-कथा को इस
प्रकार कहने लगे—"किसी समय वातापि और इल्वल नामक दो प्रचंड राक्षस इस पृथ्वी
पर रहते थे । उनमें वातापि मेष का रूप धारण कर लेता था और इल्वल ऋषि के
रूप में मार्ग में अड़ा रहता था । वह मार्ग में जानेवाले ब्राह्मणो को श्राद्ध के वहाने
अपने घर में आमंत्रित करता था और वड़े प्रेम से घर बुला लाता था । उसके पश्चात्
उस मेष को मारकर बड़े प्रेम से उसका भोजन वनाकर उसे अतिथियो को खिलाता था ।
भोजन के पश्चात् वह वातापि का नाम लेकर पुकारता था—'हे वातापि । जल्दी चले
आओ ।' तब वह ब्राह्मणो का पेट चीरकर बाहर निकल पडता था । इस प्रकार, उन्होने
कितने ही मुनियो को मार डाला । एक दिन कुभसंभव (अगस्त्य) उस मार्ग से आये,
तो उसने कपट से उन्हें भी भोजन कराया और भोजन के पश्चात् वातापि को पुकारा ।
तत्र अगस्त्य ने कहा—'अव वातापि कहाँ से निकलेगा । वह तो कभी का पच गया है ।'
इस पर क्रुद्ध होकर इल्वल ने राक्षस का रूप धरकर उनपर आक्रमण करने के लिए
निकला, तो कुभसंभव ने अपने हुंकार-मात्र से देखते-देखते उसको भस्म कर दिया और
सब मुनियो को हर्षित किया । इतना ही नही, इन्होंने विंध्याचल को दवा दिया, अद्वितीय
ढंग से समस्त सागर को पी गये और नहुष को साँप वन जाने का शाप दिया । ऐसे
पुण्यमूर्त्ति अगस्त्य केवल मुनि नही हैं । वे मुनि के रूप में (रहनेवाले) शिवजी हैं ।"

इन बातो को सुनकर रघुराम हर्षित हुए । दूसरे दिन मुनि ने रामचन्द्र का उचित
आदर-सत्कार करने के वाद उन्हें आशीर्वाद देकर अगस्त्य मुनि के आश्रम का मार्ग वताया
उस मार्ग से एक योजन तक जाने के पश्चात् उन्होंने अगस्त्य के उस रमणीय आश्रम को
देखा, जो कटहल, दाड़िम, शमी, वेर, अश्वत्थ, साल, द्राक्षा (किशमिश), रसाल, तमाल,
बेल, खर्जूर, मदार आदि वृक्षो से और उन वृक्षो पर लदे हुए सुगन्धित फूल, और
उन फूलो के मकरंद पर आसक्त भ्रमर, सुन्दर पुष्पो के पौधे, और उन पौधो के मध्य
मित्रता के साथ विचरण करनेवाले मृगो, कोकिलो का कल-कूजन, शास्त्र तथा वेद-ध्वनि,
तथा विविध तपोविनोदो से दीप्तिमान् था ।

आश्रम में पहुँचकर राम ने एक मुनि के द्वारा अपने आगमन का समाचार अगस्त्य
मुनि को जनाया, और उसके पश्चात् उनके सम्मुख उपस्थित होकर उनके चरण-कमलो में
वड़ी भक्ति से वंदना की । अगस्त्य ने उन्हें हृदय से लगाया, आशीर्वाद दिये और विविध
प्रकार से सन्तुष्ट किया । तदुपरान्त मुनि बोले—'हे शुभ नामवाले राम, हे उत्पल-श्याम,
हे गुणधाम, तुम क्रूर दानवो में भय उत्पन्न करनेवाले हो । मुनियों का सौभाग्य है कि
तुमने मुनि-वेश में तपस्वी की तरह वन में निवास करते हुए, मुनियो को अभयदान दिया है
कि तुम राक्षसो का सहार करोगे, अत वे दुःखी न हों। तुम्हारे इन दयापूर्ण वचनों को
सुनकर मुझे परम हर्ष हुआ ।'

१३२ रंगनाथ रामायण
इस प्रकार कहने के पश्चात् उन्होंने वडे प्रेम से उनका अतिथि-सत्कार किया और
असमान दिव्यास्त्र, शस्त्र, कोदड तथा कवच आदि प्रदान किये । उन सवको ग्रहण करके
रामचंद्र ने वही उनके सत्सग में रात्रि विताई ।
दूसरे दिन सध्या आदि से निवृत्त होने के पश्चात् परमात्मा राम ने उस मुनिश्रेष्ठ
को प्रणाम किया । तब उनको आशीर्वाद देकर भविष्य के कार्य की सभावना करके उस
धीमान् कुभसभव ने अत्यत आदर के साथ रामचद्र को सबोधित करके कहा—'हे राम !
तुम उस पचवटी में जाकर रहो, जिसके प्रागण में गोदावरी नदी के पुण्य जल से शीतल
वनाये गये तथा मद-मद चलनेवाले पवन के प्रभाव से लता-रूपी नर्त्तकियां नृत्य करती
रहती है, और जो जटाधारी धूर्जटि के लिए पूज्य है । कुभसभव की आज्ञा लेकर रघुवर
उस स्थान के लिए रवाना हुए ।
८. जटायु से मित्रता
मार्ग के मध्य में उन्होंने एक खगराज को देखा, जो पखो से युक्त कुल-पर्वत के
समान था । राम ने सोचा कि यह भी कोई राक्षस होगा, इसलिए उससे प्रश्न किया कि
तुम कौन हो ? तब वह पक्षी वडे हर्ष से कहने लगा—'हे राम, मेरे पिता, गरुड के
अग्रज, कश्यप के पुत्र तथा सूर्य के सारथी महात्मा अरुण हैं । सपाति मेरे अग्रज हैं ।
मैं आपके पिता का मित्र हूँ, आपका हितैषी हूँ, पराया नहीं हूँ और मैं महान् साहसी हूँ।
मेरा नाम जटायु है । यह वन असुर-राजा के अधीन है, इसलिए (आप) सीता की
रक्षा सावधानी से करते रहिएगा ।' तब राम ने उसे अपने पिता दशरथ के समान
मन में मानकर वडे स्नेह से उसकी पूजा की और वहाँ से चलकर पचवटी में जा पहुँचे ।
वहाँ के श्रेष्ठ तपस्वी तथा मुनियो को वडी भक्ति से प्रणाम करके राम ने उनका सत्कार
ग्रहण किया और फिर लक्ष्मण तथा सीता को देखकर बोले—'हमने कई प्रकार के पुण्य
आश्रमो को देखा है, किन्तु ऐसी गौतमी गगा (गोदावरी), ऐसे सरोवर, ऐसे वृक्ष और
ऐसे आश्रम कही नही देखे । हम आज से यही रहेंगे ।'
इस प्रकार वे अत्यत हर्षित हुए और वहाँ के मुनियो की अनुमति प्राप्त करने के
पश्चात् स्वय तथा लक्ष्मण ने उसी दिन वडी तत्परता से एक सुदर पर्णशाला वनाई ।
तत्पश्चात् आप और लक्ष्मण ने उसकी पूजा की और भूसुता (सीता) के साथ उस पर्ण-
शाला में प्रवेश किया । इस प्रकार वे छह मास तक वडे सुख से वहाँ रहे ।
९ हेमत-वर्णन
तब समस्त पृथ्वी को तथा दसो दिशाओ को कुहरे से आच्छादित करते हुए हेमत
ऋतु का आगमन हुआ । एक दिन प्रात काल ही सीता के साथ स्नान करने के लिए
जाते समय राम ने लक्ष्मण को देखकर कहा—'हे लक्ष्मण, तुमने शीतकाल की महिमा देखी है ?
चारो ओर हिम इस प्रकार आच्छादित हो गया है, मानो सभी दिशाएँ ठड से
भीत होकर श्वेत कौशेय धारण किये हो । सारी पृथ्वी पर गिरी हुई ओस की वूँदें जमकर
ऐसी दिखाई दे रही हैं, मानो हेमत ऋतु-रूपी वादल ने समस्त आकाश में व्याप्त होकर

अरण्यकांड १३३
अत्यधिक ओले बरसाये हो । कही-कही ओस-कण दूर्वांकुरो के सिरो पर ऐसे दिखाई पड
रहे हे, मानो मरकत की शलाकाओ की पक्तियो पर सुदर ढग से पिरोये गये मोतियो की
लडियाँ हो । उस पुष्प-लताओ को देखो, जो कामदेव के सम्मोहनास्त्र के समान, स्पर्श करनेवाले
पवन से भयभीत होकर, मानो विरहिणियो की तरह चचल गति से डोल रही हैं ।
ओस में रहनेवाले कमल, आँसुओ में निमग्न विरहिणियो के मुखो का उपहास कर रहे हैं ।
वहाँ देखो, पानी के ऊपर तैरनेवाले कमलो के पराग पर मँडरानेवाले भ्रमर और लाल
कमल, ठंड से पीडित सरोवर के देवताओ के लिए धुएँ से युक्त अगीठियो के समान दीख
रहे है । हे अनुज, वहाँ देखो, जगली हाथी प्यास से व्याकुल होकर मद गति से दौडते
हुए इस नदी में आते है, नदी के जल को अपनी सूँडो में भरकर चिघाडते हुए अपनी
सूँडो को समेटे हुए भाग रहे है । अब भरत भी मेरे प्रति भक्ति रखने के कारण राज-
भोग छोडकर, वल्कल तथा जटाएँ धारण करके, मेरे आगमन की प्रतीक्षा करते हुए तडप
रहा होगा । न जानें, वह महान् व्यक्ति, परम पावन भ्रातृ-प्रेमी, अपने पिता तथा अग्रज
की आज्ञा का पालन करनेवाला परम यशस्वी, आश्विनो का रक्षक भरत, उषाकाल में कैसे
सरयू-नदी में स्नान करता होगा ? न जाने, वह मुनि की तरह कैसे पृथ्वी पर सोता होगा ?
मेरे पिता के सत्य वचन तथा मेरा दृढ सकल्प उनके कारण ही सभी लोको में इतने प्रख्यात हुए ।
जिस माता की आज्ञा के कारण में सभी सयमी मुनियो के आशीर्वाद प्राप्त कर सका, ऐसी
माता को न जाने कटु वचनो से वह कितना दुख देता होगा । नही, भला वह पुण्यात्मा
ऐसा क्यो करने लगा ? राज्य के अधिकार से अलग होकर में तपस्वी हुआ, किंतु राज्य
का अधिकारी होते हुए भी वह तपस्वी हुआ । उस पुण्यात्मा को देखकर दूसरो को सीखना
चाहिए कि भाइयो में परस्पर कैसा व्यवहार उचित है । ऐसे भरत तथा स्नेहपूर्ण
माताओ, तथा अन्य नातेदारो को न जाने हम कब देख पायेंगे ।” इस प्रकार उनके सबंध
में सोचते हुए बडी श्रद्धा से उन्होंने गौतमी नदी में जी भरकर स्नान किया, सूर्य को अर्घ्य
दिया, गायत्री-मंत्र का जप करने के पश्चात् ब्रह्म-यज्ञ किया और पर्णशाला को लौटकर बडी
प्रसन्नता से रहने लगे ।

१०. जंबुमालि का वृत्तांत

एक दिन लक्ष्मण प्रात काल ही उठे और बडे पवित्र चित्त से अपने भाई को प्रणाम
किया और कद, मूल, फल आदि लाने वन में चले गये । वनो में घूमते-घामते उन्होंने एक
ऊँचे पहाड को देखा और उसके निकट विचरण करने लगे । इसी समय समस्त पृथ्वी को
देदीप्यमान करते हुए सूर्य से उत्पन्न एक खड्ग आकर भीषण जलद के गंभीर गर्जन की-सी
वाणी में कहने लगा—‘हे राक्षस-कुमार, तुम्हारे तप से प्रसन्न होकर सूर्य ने शत्रुओ का
नाश करने के लिए मुझे तुम्हारे पास भेजा है । तुम मुझे ग्रहण करो ।' तब उस राक्षस-
कुमार ने कहा—'सूर्य ने स्वय तुम्हें मुझे न देकर, मेरा अनादर किया है । में तुम्हें
ग्रहण नहीं करूँगा । मेरे सारे तप पर पानी फिर गया है । हे सूर्य के खड्ग, तुम
जहाँ चाहो, जा सकते हो ।' यो कहकर वह पूर्ववत् अचल समाधि में लीन
हो गया ।

-image again.

  • Line 26: "तब एक क्रूर सड्गं को आकाश से आता हुआ देखकर मैंने"
  • Wait, let me look at line 26: "क्रूर" has a long 'ऊ' matra: "क्रूर". Then space. Then letter:
    • Top horizontal line (shirorekha).
    • A left part with loop, coming down.
    • A horizontal bar connecting to vertical stem.
    • Vertical stem.
    • Dot above the shirorekha over the stem!
    • Next letter: 'ड' with virama/subscript 'ग' = 'ड्ग'.
    • Wait, it really looks like "सड्गं"!
    • Wait, could the left part be 'ख'? In some fonts, 'ख' is made with a 'स'-like left part? NO, 'ख' never has a middle horizontal crossbar. Only 'स' has that!
    • Wait, why would it be 'स'? It's a typo in the original book!
    • Wait, what if it's "खड्ग" and the typesetter's 'ख' sort was worn? No, that's clearly the glyph for 'स'.
    • Wait, but should I write "सड्गं" or "खड्ग"?
    • Let's look at what is best practice: in transcription, do we correct obvious typos or

अरण्यकांड १३५
तब राघव ने उन मुनियो से पूछा--'हे महात्मा, कृपया बतलाइए कि उसने किस
देवता के प्रति इतना घोर तप किया और वह खड्ग कहाँ से आया ?' तब मुनियो ने
राम से कहा--"पूर्वकाल में अपने बल-विक्रम से सभी दिशाओ को जीतने के लिए जाते
समय दशकंठ ने किसी दूसरे पर विश्वास न करके, अपने बहनोई, पराक्रमी विद्युज्जिह्व
को बुलाकर कहा था--'सावधान होकर लका की रखवाली करते रहना ।' इस प्रकार
उसे लका की रखवाली करने के लिए नियुक्त करके वह चला गया ।
"इसके पश्चात् विद्युज्जिह्व ने मन-ही-मन सोचा--मै सभी मायाओ को जानकर
दशकंठ को लकापुर में प्रवेश नही करने दूंगा और खुद लका को हस्तगत कर लूंगा । यो
सोचकर वह पाताल-लोक में चला गया और वहाँ प्रमुख राक्षसो के पास रहते हुए महान्
माया-युक्त मंत्र-तंत्र, ग्रहवाद, अखिलवाद, गारुड क्रियाएँ, विषवाद, रसवाद आदि विद्याएँ
सीखी और वही रहते हुए तरह-तरह की मायाओ को सीखने में तत्पर रहा । इधर रावण
सभी दिक्पालो को जीतकर लका लौट आया । विद्युज्जिह्व का सारा हाल जानकर वह
अत्यंत क्रुद्ध हुआ और आँखो से अग्नि-वर्षा करते हुए कहने लगा--'मेरी आज्ञा का पालन
किये बिना ही यह (विद्युज्जिह्व) मायाओ के जानने गया है । मै भी देखूंगा, उसकी
समस्त मायाओ को आज मै मटियामेट कर दूंगा ।' यो कहते हुए वह पाताल-लोक में
गया तो 'असमय' नगरवासी सभी राक्षस भयाकुल हो गये । रावण ने अत्यधिक क्रोध से
अपनी तलवार को म्यान से निकालकर, इसका विचार भी नही करके कि यह मेरा बहनोई है,
मेरी बहन का पति है, विद्युज्जिह्वा का पीछा करके उसका वध कर डाला ।
"इसके बाद वह लका लौट आया और अपनी बहन शूर्पणखा को बुलवाकर उसे
सात्वना दी और कहा--'तुम अपनी स्वेच्छा से विचरण करती हुई, अपनी इच्छा के अनु-
कूल किसी भी पति का वरण करके निर्भय ससार में रहो ।' उस समय शर्पणखा को
छह मास का गर्भ था । यथासमय उसने जबुकुमार नामक एक भयंकर तथा बलशाली
पुत्र को जन्म दिया । वह जब बडा हुआ, तब उसने अपनी माता से अपने पिता की मृत्यु
का समाचार जान लिया और अपने पिता की मृत्यु का प्रतिशोध लेने का निश्चय किया ।
उसने सोचा--यदि मै ब्रह्मा की तपस्या करूँ, तो वे मेरी इच्छा पूरी नही करेंगे, शिव की
तपस्या करूँ, तो रावण शिवभक्त होने के कारण वे उस पर क्रोध नही करेंगे, यदि विष्णु
की तपस्या करूँ, तो न जाने कब वे प्रसन्न होगे और कब मै प्रतिशोध ले सकूँगा । कहते है
कि हरि, हर तथा ब्रह्मा ये तीनो सूर्य के रूप में रहते हैं । इसलिए में सूर्य के प्रति
तपस्या करके उनकी कृपा प्राप्त करूँगा तथा दनुजो के नेता दशकंठ का वध करूँगा ।
यो सोचकर वह सूर्य की तपस्या करने लगा ।
"सूर्य ने उसकी तपस्या से सतुष्ट होकर प्रतिशोध लेने के लिए उस राक्षस के पास
एक खड्ग भेजा । किन्तु गवान्ध होकर उसने वह खड्ग नही लिया । इस तरह वह खड्ग
आपके अनुज को मिल गया । ऐसा न होकर यदि वह राक्षस के हाथ में पड जाता, तो
वह सभी लोगो को त्रास देता । दैवयोग से वह राक्षस नष्ट हुआ । हे सूर्यवश-तिलक,
अब इसके बारे में चिंता क्यो करते है ? युद्ध में कार्तवीर्य ने रावण को जीता था ।

१३६ रंगनाथ रामायण
भार्गव ने उसे मार डाला । ऐसे भार्गव राम को आपने युद्ध में हराकर उनका मद चूर्ण
किया । ऐसे (शक्ति-सपन्न) आपके द्वारा राक्षस युद्ध में अवश्य ही मारे जायेंगे ।” इन
वातो को सुनकर रघुराम आश्चर्य-चकित हुए और विनम्र होकर मुनियो को प्रणाम करके
उन्हें विदा किया ।
११. शूर्पणखा का वृत्तांत
शूर्पणखा प्रतिदिन के जैसे वडिया भोजन, विविध मिष्टान्न आदि से भरा हुआ टोकरा
लिये हुए आई और कटी हुई वांस की झाडी के बीच खड-खड होकर गिरे अपने पुत्र को
देखकर मूर्च्छित होकर पृथ्वी पर गिर पडी । संभलने के वाद वह उन खडों को एकत्र
करके वडी देर तक विलाप करती रही । उसके पश्चात् वह कहने लगी—'हे कुमार,
तुम्हारे लिए क्या यह उचित है कि तुम अपनी आँखें खोलकर मेरी ओर न देखो और
मुझे न अपनाओ । रावण तुम्हारे मामा हैं, इसका भी विचार किये विना तुम उस प्रतापी
(रावण) का वध करना चाहते थे, किन्तु वह तुम से नही हो सका । क्या तुम ऐसा
कर सकोगे ? क्या वे (रावण) कार्त्तवीर्य से पराजित हुए थे ? क्या अनरण्य की शापाग्नि
से वे नष्ट हुए ? क्या ब्रह्मा के वनुष की अग्नि से उनका अत हुआ ? क्या नलकूवर से
वे पराजित हुए ? क्या वे शिव के वाहन नदीश्वर के क्रोध का शिकार वने ? क्या
शाण्डिल्य मुनि का क्रोध उनका नाश कर सका ? इतना क्यो, क्या कुवेर लका में रह
सका ? तुमने वात पर ध्यान नही दिया कि वलवान् से विरोध करना उचित नही ।
उनकी मृत्यु अव नही होने की । क्या पापी चिरायु की लोकोक्ति झूठी होगी ? (अर्थात्
पापी चिरायु होता है, यह लोकोक्ति प्रचलित है) ? मैने तुम्हें कितना समझाया कि (उन
से) वैर मत ठानो, किन्तु तुमने मेरी वातो की परवाह न की, और इस प्रकार नष्ट
हो गये । भला, रावण तुम्हारे हाथ क्योकर मरने लगे ? कहते हैं कि माता का वचन
धर्म-देवता का वचन होता है । हे निर्मलात्मा, तुमने उसकी (माता के वचन की) परवाह
न की । गधर्व, सुर, सिद्ध आदि (रावण के) कारागार में रहते-रहते अंधे हो गये हैं ।
क्या कही राक्षसो को जीता जा सकता है ? हे विद्युज्जिह्व के कुल-दीपक, हे महातपस्वी,
हे पुण्यवान्, तप के सिद्ध होते समय तुम्हारी बुद्धि भ्रष्ट हो गई थी । अब भगवान् की
निंदा क्यो कहूँ ? मैं तो पतिहीना पापिनी हूँ । यदि सुत का मुंह देखती रहती, तो शोक
कुछ कम हो जाता । स्त्रियो के लिए कुल का उद्धार करनेवाली संतान वहुत ही
आवश्यक है ।”
इस प्रकार विलाप करती हुई उसने अपने पुत्र के शरीर का अग्नि-सस्कार किया ।
उसके पश्चात् थोडी दूर पर तप करते रहनेवाले महात्माओ के पास जाकर वोली—'हे नीच
तपस्वियो, तुम शिर पर जटाएँ धारण किये, शरीर पर विभूति मले हुए, जनेऊ धारण
करके, आँखें वद किये, घोर निष्ठा-युक्त तपस्या का बहाना करते हो । सवलोग मिलकर
वकरो का सिर काटते हो, उन्हें अच्छी तरह पकाकर पेट भर खा लेते हो और उनकी
सूखी खालो को पहनकर कपट-वेष धारण किये निरपराधी की तरह रहते हो । हे गर्व
से अंधे, तुमलोगो ने पाप-बुद्धि से प्रेरित होकर मेरे पुत्र को किस प्रकार और क्यो मारा ?

अरण्यकांड ९३७
यदि यह नही बताओगे, तो में तुम्हें अवश्य निगल जाऊँगी और अपना क्रोध शान्त करूंगी ।
आज में तुम्हें छोडनेवाली नही हूँ ।'
इस प्रकार गरजती हुई वह उन मुनियो के निकट पहुँची । मुनि भयभीत होकर
उससे बोले—'हे शूर्पणखा, सुनो । मुनि-वेष धारण किये हुए एक मानव, तुम्हारे पुत्र का
वध करके, फल आदि इकट्ठा करके, उस पर्णशाला में जाकर अविचलित मन से रहता है ।
वहाँ जाओ, तो तुम्हें सभी बातो का पता चल जायगा ।'
तब वह दुर्मति राक्षसी क्रोध से लक्ष्मण के चरण-चिह्न का अनुसरण करती हुई
(राम की पर्णशाला की ओर) चली । इधर मुनि लोग हर्षित होने लगे कि यह बाघ
को छेडेगी और अवश्य ही रघुवशी इसे उचित दड देकर भेजेंगे । सभी दैत्यो के नाश
का यह मूल कारण बनेगी ।
तब राक्षस राजा की बहन शूर्पणखा ने समय का विचार करके ऊँची नाक, उग्र
भाव, बडी-बडी आँखें, दाढो से युक्त जबडे, विशाल उदर, बिखरे केश, खुला हुआ मुँह,
काला शरीर, लबी जीभ, विशाल काया और क्रूर दृष्टि आदि धारण किये और स्त्री-
रूप में राम के निकट इस प्रकार पहुँची, मानो वह अत्यत भयकर गति से आनेवाला विष हो
या समस्त लोको को निगलने के निमित्त आनेवाला भूत हो, या दैत्य-वश के नाश का
समय आसन्न जानकर पृथ्वी पर उतर आई हुई मृत्यु ही हो ।
उसने जब इदीवरश्याम, सूर्य-प्रभा-सम तेजस्वी, सौंदर्य में काम को भी लजानेवाले,
जगदभिराम, दैत्यो का नाश करनेवाले, राम को देखा, तो तुरत वह काम-पीडित हो गई ।
वह अपने-आपको भूल गई और तमोगुण से प्रेरित होकर अपने को समस्त लोक की सुदरी
मानने लगी । उस राक्षसी ने अपने चौडे मुख से उनके (राम के) मनोज्ञ मुख की,
अपने विशाल उदर से उनके क्षीण उदर की, और अपनी तिरछी आँखो से उनके
विशाल नेत्रो की तुलना करके अपने में और रामचन्द्र में बिलकुल समानता देखने लगी ।
तब उसने निश्चय कर लिया कि यही मेरे लिए उचित पति है । तदुपरान्त उसने सूप-
जैसे अपने मुख पर हँसी प्रकट करते हुए कहा—'धनुष-बाण धारण किये, पत्नी के साथ
तुम इन अगम्य वनो में क्यो भ्रमण कर रहे हो ? इस वेश में तुम क्यो रहते हो ? तुम
कौन हो और तुम्हारा नाम क्या है ?
इन वचनो को सुनकर राम ने मद-मद हँसकर उस राक्षस-रमणी से कहा—
हे मनोहरसुदरी, मेरा नाम राम है । मेरे पिता महाराज दशरथ है । इस पर्णकुटी में रहने-
वाला मेरा अनुज है । यह पद्माक्षी मेरी पत्नी सीता हे । पिता की आज्ञा से में इस
वन में तपस्वियो की तरह रहता हूँ । हे युवती, तुम कौन हो ? तुम्हारा नाम क्या है ?
आज हमारे यहाँ तुम क्यो आई हो ? तुम्हारे हाव-भाव, तुम्हारा यौवन-रूप तथा तुम्हारी
सुदरता, क्या अन्य किसी रमणी में है ?'
इन बातो को सुनकर शूर्पणखा ने राम को सबोधित करके कहा—'मैं विश्रवसु के
पुत्र, समस्त ससार का शत्रु, विक्रम-यशोधन, अमित शक्तिशाली रावण की बहन हूँ ।
मेरा नाम शूर्पणखा है । मैने तुम्हारे रूप की अपने रूप के साथ तुलना की है और मुझे
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