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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 174, कुल 508 में से

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पृष्ठ 174

१४४ रंगनाथ रामायण
सूर्य की दीप्ति मद-सी हो गई और दिशाओ में अंधकार व्याप्त हो गया । न खर
राघव से भीत था, न राघव ही खर से भीत थे । दोनो विजय की आकाक्षा से
दो हाथियो के समान, दो सिंहो के समान और महिष-द्वय के समान आपस में जूझ गये और
अपने बाहुबल को प्रदर्शित करने लगे । तब खर ने एक अर्द्धचंद्राकार बाण से राम के
हाथ के धनुष को काट डाला, उनके कवच को छिन्न-भिन्न कर दिया, और उनके शरीर
को शर-वर्षा से भर दिया । उन बाणो की परवाह किये बिना ही सूर्यवंशी राम ने
अगस्त्य से प्राप्त वैष्णव-चाप का तुरत संधान किया, धनुष की टंकार की और तेज बाण
चलाकर उस राक्षस की पताका को काट डाला । तब उस राक्षस ने राम के हृदय का
विदारण कर सकने की शक्ति रखनेवाले चार बाण चलाये । रक्त-सिक्त अंगो से-राम ने
उस राक्षस को विविध बाणो से पीडित करते हुए एक प्रबल अस्त्र से उसका धनुष
तोड़ दिया, चार बाणो से घोड़ो को मार गिराया और सारथी को मार डाला । उनका धनुष
ऐसा दीखने लगा, मानो वह अपनी बाणाग्नि में रथ की पूर्णाहुति देना चाहता हो । तब
रथ से वंचित हो खर प्रलयकाल के रुद्र की भाँति हाथ में गदा लिये हुए राम की ओर आने लगा
तो पहाड़ो के साथ पृथ्वी काँप गई । उस दुष्ट दैत्य को देखकर रघुराम ने बड़े
दर्प के साथ कहा—'हे राक्षस, हे नीच, अब भी तुम्हारी शूरता किस काम की ? तुम्हारी
सेना नष्ट हो गई; तुम्हारे बंधु कट मरे; तुम्हारी अस्त्र-संपत्ति समाप्त हो चली, इस
दण्डक वन में अपने अद्वितीय शौर्य से बढ़ते हुए, यहाँ के पुण्यात्मा मुनियो को मारनें के
पाप-फल को भोगने का (तुम्हारा) समय आ गया है । उसे अब भोगो, मैं अभी तुम्हारा
वध करता हूँ ।'
इन वचनो को सुनकर खर क्रोध से जलते हुए बड़े घमंड के साथ बोला-
'हे राघव, ऐसा गर्व क्यो करते हो ? युद्ध में कुछ क्षुद्र राक्षसो को मारने से (गर्व से)
फूलकर अपनी प्रशसा आप क्यो कर लेते हो ? कुलीन जन कही अपनी प्रशसा आप करते हैं ?
यह लो, में गदा लिये हुए आया । मुझसे भिड़ो और मेरी शक्ति देखो । देवता तथा
असुर मेरी ओर दृष्टि तक नही उठा सकते, तब क्या तुम मेरे आगे खडे रहने योग्य शूर हो ?
मैं एक-एक करके तुम्हारी मास-पेशियों को काटकर अपनी बहन को दे दूँगा ।'
इस प्रकार कहकर उसने अपनी गदा घुमाकर उसे राम पर फेंका । पवन की शीघ्र
गति, सूर्य का तेज, अग्नि का ताप, और बिजली की कठोरता मानो उस गदा के रूप में
आ रही हो । उस गदा को, अत्यन्त प्रचड वेग से अपनी तरफ आते देखकर राम ने उस
गदा के लंबे काड (भाग) को खड-खड कर दिया और बोले—'क्यो रे, तुम्हारी
गर्वोक्तियाँ तथा घमंड चूर हुए कि नहीं ?' तब उसने (खर) गर्जन करते हुए एक वृक्ष को
उखाड़कर अपने बाहुबल से उसे घुमाकर 'लो, मरो'—कहते हुए राम पर फेंका । राघव ने
तुरत उस वृक्ष को काटकर सूर्य की सहस्र किरणो की आभा के समान उज्ज्वल सहस्र
शरो को उस पर छोड़ा, जिससे वह अत्यत व्याकुल हो उठा । उसके शरीर से रक्त की
धाराएँ बहने लगी । फिर भी वह अपना समस्त साहस एकत्रित करके राम के आगे आया ।
उसे देखकर राम ने, दया त्यागकर, समस्त भुवनो को व्याकुल करते हुए, ऐन्द्रास्त्र का संधान करके