रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१४६ रंगनाथ रामायण
मंत्री ने तुम्हें ऐसा परामर्श दिया है ? तुम उसे अपना शत्रु जानो । मैं तुम्हारा हित
चाहनेवाला मंत्री हूँ, अन्य नहीं हूँ । यह तुम्हारे लिए उचित नहीं है । इस पृथ्वी पर
किसी भी पतिव्रता स्त्री को प्राप्त करने की इच्छा अनुचित ही है । ऐसी इच्छा तुम करोगे
तो तुम्हारे वंश का सर्वनाश हो जायगा । इसलिए हे दानवनाथ, तुम लंका को लौट जाओ
और प्रसन्नता से रहो । अपनी स्त्रियों के साथ सुख-भोग प्राप्त करो ।' मारीच की इन
बातो को सुनकर रावण लंका लौट गया ।
१४ शूर्पणखा का रावण से दीनालाप
खर, दूषण आदि राक्षसो को राम की शर-वह्नि में भस्म हुए देखकर शूर्पणखा
अत्यंत संतप्त होती हुई लंका पहुँची । देव-सभा के बीच चिंतामणि से निर्मित सिंहासन पर
विराजनेवाले इंद्र के समान, सम्माननीय सभा-मंडप के बीच सिंहासन पर आसीन,
गरुड़, उरग, अमर तथा गंधर्व-युवतियों की सेवाएँ प्राप्त करनेवाले, ऐरावत के भयंकर
दाँतो के अग्रभाग से रगड़ खाये हुए उर को श्रेष्ठ आभूषणों से आच्छादित रखनेवाले,
सारे संसार में एकमात्र भीषण आकारवाले, संग्राम में भयंकर रूप से गर्जन करनेवाले,
शत्रुओं का सर्वनाश करनेवाले रावण को देखकर शूर्पणखा रोती हुई हाथ जोड़कर अपने
हृदय के विषाद को व्यक्त करती हुई बोली—'हे असुरेन्द्र, तुम समझते हो कि मैं समस्त
लोको में अद्वितीय शक्तिशाली हूँ, तुम गर्व करते रहते हो कि मैंने तीनो लोको के
शत्रुओं का सर्वनाश किया है । तुम प्रसन्नता से फूले रहते हो कि मेरा राज्य
अकंटक है । वही समस्त लोको का स्वामी कहला सकता है, जो गुप्तचरो के
द्वारा (अन्य) राजाओ का, (उनके) राजकोषों का, उनकी इच्छाओ का, तथा रहस्यो
का पता लगाकर कार्य करता रहता है । तुम्हारी भयंकर मायाओ की शक्ति, तुम्हारा
प्रताप, तुम्हारा बाहुबल और तुम्हारा वैभव—ये सब इसके पहले सफल होते थे, अब
नही । इसका कारण भी सुन लो । भानुकुल का पावन व्यक्ति राम तपस्वी के रूप में
अपने पिता महाराज दशरथ की आज्ञा से अपने प्रिय अनुज लक्ष्मण तथा पत्नी सीता के
साथ दंडक वन में आया है और मुनियों पर दया करके उन्हें अभय-दान देकर पंचवटी में
बड़े आनंद के साथ रहता है । मैं उस पर आसक्त होकर उसके निकट पहुँची, तो क्रोध में
आकर उसने मेरी ऐसी दुर्गति कर दी । मैंने खर से सारा वृत्तांत कहा, तो उसने अत्यंत
क्रुद्ध होकर प्रलयकाल के रुद्र के समान भयंकर रूप धारण कर, दूषण तथा त्रिशिरो के
साथ चौदह सहस्र मानव-भक्षक वीर राक्षस-सैनिको के सहित राम पर आक्रमण किया और
रघुराम के बाण-रूपी अग्नि-शिखाओ में भस्मीभूत हो गये । इसलिए अब मेरे अपमान
को दूर करनेवाले तुम्हारे सिवा और कौन है ? मेरे मुख की विकृति देखो और मेरा
दुःख तुम अपना दुःख मानो ।'
उसकी बातें सुनकर दानवनाथ विस्मित हुआ और (थोड़ी देर तक) सोचने के
बाद उस राक्षसी से कहा—'मैंने अपने जातियों का वध तथा तुम्हारे वहाँ पहुँचने आदि
का समाचार सुना है । उसे रहने दो । तुम तो मुझे यह बताओ कि उस राम की शक्ति
कैसी है ? उसका कैसा रूप है ? उसकी क्या अवस्था है ? उसका आकार कैसा है ? उसके