रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
पृष्ठ 183, कुल 508 में से
संदर्भ में पढ़ेंतव धरणिजा (जानकी) ने रोषाग्नि से जलते हुए सौमित्र की निंदा करते हुए
कहा—"हे लक्ष्मण, तुम तो रामचन्द्र के परम भक्त हो, आज तुम इतने नीच कैसे हो
गये ? श्रीराम के पुकारते रहने पर भी भयंकर शत्रु के समान तुम चुप क्यों हो ?
क्या यह तुम्हारे लिए उचित है ? 'मेरा अनुज बुद्धिमान् है, उत्तम हैं', यो सोचकर, तुम्हारा
विश्वास करके, जब तुम्हारे भाई यहाँ से गये हैं, तुम ऐसा पापमय व्यवहार क्यो करते हो ?
हाँ, मैं जानती हूँ, असुरो की माया से राम का वध होगा, इसे अच्छी तरह जानकर
अनुचित बुद्धि से, नि शक हो, अपने भाई को दिये हुए वचन की अवहेलना करते हुए मुझे
प्राप्त करने का विचार कर रहे हो, या कदाचित् यह सोचते हो कि मै इसको कैकेयी-
सुत को सौप दूंगा । अपने इस शरीर में मुझे अब प्राणो को रखना उचित नही प्रतीत होता ।
मै तुरत गोदावरी में डूबकर अपना प्राण-त्याग करूँगी । अब अन्य वातो से कोई
प्रयोजन नही है ।"
सीता के ऐसे कठोर वचन कहने पर लक्ष्मण अत्यत क्षुब्ध हो गये । उन्होने राम
का नाम लेते हुए अपने कर्णपुटो पर हाथ रखे तथा चारो ओर देखते हुए बोले—'हे वन-
देवताओ, क्या तुम लोग सुन रहे हो ? सीता कठोर होकर मुझे कैसे पापपूर्ण कटु वचन
सुना रही है ।' इस प्रकार कहकर उन्होने आंखो में आंसू भरे हुए, अब यहाँ रहना
अनुचित समझकर, सीता से कहा—'माता, मै अभी जा रहा हूँ । मैं आपके पति को शीघ्र
ही लिवा लाऊँगा । आप दुखी मत होइए ।'
इसके पश्चात् उन्होने पर्णशाला के चारो ओर सात रेखाएँ खींच दी और कहा—
'माता, इन रेखाओ को पार करके वाहर मत जाइए । यदि कोई इन रेखाओ को पार
करेगा, तो उसका सिर उसी क्षण चूर-चूर हो जायगा ।' तव उन्होने अनल से प्रार्थना की
और उन्हें सीता की रक्षा का भार सौपकर, जानकी को वडी भक्ति से प्रणाम करके वहाँ
से राम की खोज में चल पडे ।
१९. भिक्षुक के वेश में रावण का सीता के पास आना
उसी अवसर की प्रतीक्षा में, अत्यत उद्विग्न होकर रहनेवाला रावण कपट सन्यासी
का वेश धारण करके वहाँ आया । उसके हाथ में दंड और कमडल थे । विशाल ललाट
पर तिलक था, उंगलियो में कुश की पवित्री थी, विशाल उर पर जनेऊ था, दायें हाथ
में रुद्राक्ष की माला थी, और वह गेरुए रंग के वस्त्र पहने हुए था । कई प्रकार की
जपमालाएँ धारण करने से उसकी गरदन एक ओर झुकी हुई थी । उसका गात्र कृश था
और उसके हाथ में एक जीर्ण छत्र था । उसकी वँधी हुई शिखा पीछे की ओर लटक
रही थी । सन्यासी का ऐसा छद्म-वेश धरकर वह उगलियो को गिनता हुआ, कुछ मत्रो को गुन-
गुनाता हुआ, कही मुनि उसे पहचान न जायें, ऐसा मन-ही-मन भयभीत होता हुआ, जरा-
पीडित वृद्ध के समान सिर को किंचित् हिलाता हुआ, थके हुए के समान जहाँ-तहाँ ठहरता
हुआ 'हरि-हरि' शब्द का उच्चारण करके मानो शांति प्राप्त करता हुआ-सा, धीरे-धीरे
पर्णशाला के निकट पहुँचा । वनदेवताओ ने जब देखा कि जगद्रोही वहाँ पहुँच गया है,
तव वे अत्यत भयभीत होकर एक ओर सटककर रह गई ।
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