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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 178, कुल 508 में से

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पृष्ठ 178

१४८ रंगनाथ रामायण
आज्ञा से अपने अनुज तथा पत्नी के साथ तपस्वी की तरह जीवन बिताने के लिए दंडक-वन
में आया है और अपने सहज स्वभाव के कारण यहाँ के मुनियों को अभय-दान देकर यहीं
रहने लगा है । उसने निर्भय होकर अकारण ही हमारी शूर्पणखा की नाक और कान काट
लिये हैं तथा खर-दूषण आदि राक्षसों का वध किया है । उस युद्ध में मरे हुए चौदह सहस्र
राक्षस-बंधुओं का प्रतिशोध लिये बिना मेरे मन की पीड़ा दूर नहीं होगी । तुमने इसके
पहले मुझे अच्छा उपदेश तो दिया था, किन्तु उसका अनुसरण करने से मेरा मान-भंग
होगा । इसलिए मैं उस रामचंद्र की स्त्री का माया से अपहरण करके ले जाने के लिए
जा रहा हूँ । मैंने एक उपाय सोचा है । यदि तुम चाहो, तो वह सिद्ध होगा । तुम अत्यधिक
प्रयत्न से उस आश्रम के पास जाना और माया-मृग का रूप धारण करके विचरण
करते रहना । सीता तुम्हें देखकर तुम्हारे प्रति आकृष्ट होगी और राम तथा लक्ष्मण से
तुम्हें लाकर देने की प्रार्थना करेगी । तुम मृग-सुलभ कौशल से उन्हें भुलाते हुए घने वन
के मध्यभाग में ले जाकर अंतर्धान होकर अपने आश्रम में पहुँच जाना । मैं यहाँ सीता
को बड़े हर्ष से लंका ले जाऊँगा । मैं चाहता हूँ कि राम सीताजी की विरहाग्नि में ही
भस्म हो जाय । इसलिए तुम ऐसा करो, मैं अपना आधा राज्य तुम्हें दे दूंगा ।”
१६ मारीच का पुनः उद्बोधन
उस नीच के वचनों को सुनकर मारीच अत्यंत भयभीत हुआ और दुःख-सागर
की लहरों में डूबते-उतराते सौजन्य छोड़कर कहा—"हे दनुजेश्वर, ऐसा विचार तुम्हें कैसे
उत्पन्न हुआ ? ऐसा अनुचित मार्ग तुम्हें कैसे शोभा देगा ? किसने तुम्हें ऐसा उपदेश दिया ?
सुख-चैन से रहनेवाले तुम, अपने सभी बंधु-मित्रों के साथ क्यों मरना चाहते हो ?
न जाने तुमने कुटिल राक्षस-वंश का नाश करनेवाले राम को क्या समझ रखा है ?
मैं उनकी बाल्यावस्था का थोड़ा-सा हाल जानता हूँ । वे नित्य कल्याणगुण-संपन्न हैं,
असमान साहसी हैं । विश्वामित्र के यज्ञ की रक्षा करने के लिए जब वे आये और
यज्ञ की रक्षा कर रहे थे, तब मैं और सुबाहु ने अपनी समस्त शक्ति के साथ उनसे युद्ध
किया था । तब उन्होंने क्रुद्ध होकर एक ही शर से सुबाहु का वध कर दिया और दूसरे
बाण से मुझे समुद्र के मध्य में फेंक दिया । अस्त्रहीन होते हुए भी, बालक होते हुए भी
बाल्यावस्था में ही उस अकलंक साहसी ने वैसा शौर्य दिखाया था । आज वे प्रबल अस्त्रों
से सुसज्जित शौर्यनिधि हैं । आज उनके प्रताप के आगे कौन टिक सकता है ?
उनके वर्त्तमान शौर्य का भी थोड़ा-सा हाल मैं जानता हूँ, तुम अवश्य सुनो । पहले
की शत्रुता से प्रेरित होकर मैं दो और भयंकर राक्षसों के साथ बाघ का रूप धारण किये हुए,
उनके तप में अपने-आपको नष्ट करने के उद्देश्य से गया । तब की बात कैसे कहूँ ?
उन्होंने तीन बाणों से हम तीनों को गिरा दिया । किन्तु हममें से दो ही मरे । न जाने
मेरी शेष आयु की कितनी शक्ति है ? मैं यहाँ आकर गिरा और अपने-आपको सजीव
पाया । तब से राम के अतुल पराक्रम का विचार करके मैंने अपना समस्त पौरुष त्याग
दिया और 'रकार' ('र' ध्वनि) से प्रारंभ होनेवाले—रव, रथ, रमणीय, रवि, रति, रत्न
आदि शब्दमात्र के सुनने से उनका स्मरण करके भयभीत होता हुआ इस प्रकार तपस्वी