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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 184, कुल 508 में से

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पृष्ठ 184

१९४ रंगनाथ रामायण
पर्णशाला के सम्मुख खड़े हुए उस कपटवेशधारी को देखकर सीता ने उसे एक
संयमी मुनि समझा । तुरंत अत्यंत भक्ति-युक्त हो, कर-कमलों को जोड़कर उसे प्रणाम किया
और सौमित्र की खींची हुई रेखाओं को पारकर बड़ी भक्ति के साथ उस अभ्यागत का
पूजन-सत्कार किया । तब उस कल्याणी सीता को देखकर उसने कहा—'हे सुंदरी, तुम
ऐसे दुर्गम कानन में किस प्रकार अकेली रहती हो ? पता नहीं, तुम रति हो, या लक्ष्मी
हो, या भारती हो ? नहीं तो पृथ्वी तथा स्वर्गलोक की स्त्रियों में ऐसा सौंदर्य कहाँ ?
तुम्हारा मुख पूर्ण चंद्र की राका का उपहास कर रहा है, तुम्हारे अधर पद्मराग मणियों
को परास्त कर रहे हैं; तुम्हारा शरीर विद्युल्लता को लज्जित कर रहा है, तुम्हारी वाणी
सुधा से भी अधिक पवित्र है, तुम्हारी वेणी जलद की वेणी को परास्त कर रही है,
तुम्हारे सौंदर्य का वर्णन करना मेरे लिए असंभव है । हे तरुणी, तुम्हारे आलिंगन-पाश में
बंधकर सुख-भोग करनेवाला व्यक्ति ही पुरुषों में श्रेष्ठ है । तुम्हारा साहचर्य
प्राप्त करनेवाला व्यक्ति ही पूर्णकामी तथा नित्यकल्याणसंपन्न है । हे कमलाक्षी, तुमको
यहाँ रहते देखकर, हमें आश्चर्य तथा दुःख हो रहा है । हे सुंदरी, तुम कौन हो ? इस
कानन में किस लिए तुम रहती हो ? हमें सारा समाचार कहो ।'
तब सीता ने बड़ी भक्ति से कहा—"हे अनघ, मैं रघुराम की पत्नी हूँ । मेरे
पिता महाराज जनक हैं । महाराज दशरथ मेरे ससुर हैं । मेरा नाम सीता है । उन्नत
कीर्तिवान् रामचंद्रजी अपने पिता की आज्ञा के अनुसार गृह त्यागकर वनवास के लिए
आये, तो मैं और लक्ष्मण उनके साथ चले आये हैं । इस आश्रम में हम तीनों तपस्वियों का-सा जीवन
व्यतीत करते हैं । आज हमने अपने आश्रम के सामने एक स्वर्ण-मृग को चौकड़ी भरते देखा, तो मैंने
अपने पति से उसे किसी तरह ला देने के लिए कहा । इसी हेतु वे गये हैं । उसके पश्चात्,
'हाय लक्ष्मण' का आर्तनाद शूल की तरह मेरे कानों को चुभाते हुए सुनाई पड़ा । भयभीत हो
मैंने लक्ष्मण को भेजा । वह गया हुआ है, किन्तु न जाने अब तक वह क्यों नहीं लौटा ।”
इतना कहकर, उन्होंने उस कपट मुनि को संबोधित करके कहा—'हे अनघ, आपका
शुभ नाम क्या है ? और आप यहाँ क्यों आये हैं ?' तब लंकाधिपति ने अपना कपट
तजकर उनसे कहा—'हे वनजाक्षी, मैं समुद्र के मध्य में स्थित लंका का राजा हूँ । राक्षसों
में श्रेष्ठ हूँ, विश्रवसु का पुत्र हूँ, यक्षेश का अनुज हूँ, दिग्विजयी हूँ । मेरा नाम रावण हैं,
युद्ध में देवता तथा राक्षसों में किसी को भी मारने की क्षमता रखता हूँ । हे सुन्दरी,
मैंने तुम्हारे रूप-सौंदर्य की प्रशंसा सुनी थी, इसलिए बड़े हर्ष से तुम्हें देखने आया हूँ ।
इस अकिंचन मानव के साथ तुम इन घोर वनों में क्यों रहती हो ? हे विशालाक्षी, तुम
अपनी इच्छा से शासन करती हुई अपनी मनोज्ञता को प्रकट करती हुई, अत्यधिक आदर
के साथ, पुष्पक आदि विमानों तथा ऊँची अट्टालिकाओं में सुर, गरुड़, उरग, असुर तथा
सिद्धों की श्रेष्ठ कन्याओं की सेवाएँ प्राप्त करती हुई निवास करो । तुम्हारे चरणों की
कांति मेरे महलों का मणिमय कुट्टिम (फर्श) बन जाय । हे सुंदरी, तुम्हारे कटाक्ष की शोभा
मेरे अंतःपुर की कुमुदिनियों के साथ होड़ लगावे । तुम्हारा मंद हास प्रतिदिन मेरे प्रेम-सागर
के लिए चंद्रिका बन जाय । तुम मेरी लंकापुरी को चलो ।'